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भाग 3 — हवेली के नीचे दूसरी हवेली
Yogesh Kumar Maurya · Serial Horror · 9 मिनट
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- जिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता
- Chapter
- 3 of 7
- Category
- Serial Horror
- Reading time
- 9 min
- Words
- 1788
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
📖 जिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता
भाग 3 — हवेली के नीचे दूसरी हवेली
✍️ लेखक: योगेश कुमार मौर्य
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तहखाने का दरवाजा खुल चुका था।
आरव उस चौकोर खुली जगह के सामने खड़ा था और नीचे घुप्प अंधेरे को देख रहा था।
नीचे जाने के लिए पत्थर की सीढ़ियाँ थीं।
कितनी?
दस?
बीस?
या उससे भी ज्यादा?
अंधेरे के कारण कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
लेकिन आवाज साफ सुनाई दे रही थी।
किसी औरत के रोने की आवाज।
धीमी।
टूटी हुई।
और इतनी वास्तविक कि आरव के शरीर का हर रोम खड़ा हो गया।
"मैं कभी मरी ही नहीं थी..."
वही आवाज फिर सुनाई दी।
आरव ने पीछे देखा।
गोविंद अभी भी दरवाजे के बाहर फर्श पर घुटनों के बल बैठा था।
उसका चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था।
कुछ देर पहले तक जो बूढ़ा आदमी हवेली के हर रहस्य को अपने भीतर दबाए बैठा था, अब किसी छोटे बच्चे की तरह काँप रहा था।
आरव ने पूछा—
"गोविंद जी..."
गोविंद ने उसकी तरफ नहीं देखा।
"किसकी आवाज है?"
कोई उत्तर नहीं।
"सत्रह साल से किसे यहाँ रखा गया है?"
गोविंद ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया।
"मत पूछो।"
"मैं पूछूँगा।"
"मत पूछो, आरव।"
"मुझे यहाँ बुलाया ही इसलिए गया है।"
गोविंद ने अचानक सिर उठाया।
"तुम्हें किसने बुलाया?"
आरव चुप हो गया।
"तुम्हें यह पत्र किसने भेजा?"
आरव ने जेब से वह पुराना पत्र निकाला।
गोविंद ने उसे देखा।
फिर उसकी आँखों में डर और बढ़ गया।
"तुम्हें यह पत्र किस तारीख को मिला?"
"छह दिन पहले।"
"कहाँ?"
"मेरे घर के बाहर।"
"किसने दिया?"
"पता नहीं।"
गोविंद धीरे-धीरे खड़ा हुआ।
"पत्र पर नाम किसका था?"
"मेरा।"
"और नीचे?"
आरव ने पत्र पलटा।
"कुछ नहीं।"
गोविंद ने लंबी साँस ली।
"तुम्हें झूठ बोला गया है।"
"किसने?"
"जिसने तुम्हें यहाँ बुलाया।"
आरव ने तहखाने की तरफ देखा।
"क्या वह नीचे है?"
गोविंद ने उत्तर नहीं दिया।
तभी नीचे से आवाज आई—
"गोविंद..."
गोविंद के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।
आवाज फिर आई—
"उसे नीचे भेजो।"
आरव ने पूछा—
"वह मुझे बुला रही है?"
गोविंद ने फुसफुसाकर कहा—
"हाँ।"
"तो मैं जा रहा हूँ।"
"नहीं!"
गोविंद ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"अगर तुम नीचे गए तो वापस नहीं आओगे।"
आरव ने उसकी आँखों में देखा।
"और अगर नहीं गया?"
गोविंद चुप रहा।
"तब?"
गोविंद ने धीरे से कहा—
"तब शायद वह ऊपर आ जाएगी।"
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कुछ सेकंड तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर आरव ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।
उसने पहला कदम नीचे रखा।
पत्थर की सीढ़ी गीली थी।
दूसरा कदम।
तीसरा।
पीछे गोविंद की आवाज आई—
"आरव!"
आरव रुका।
"क्या?"
"अगर नीचे कोई बच्चा मिले..."
"हाँ?"
"उसकी आँखों में मत देखना।"
आरव ने पलटकर देखा।
"क्यों?"
गोविंद ने काँपते हुए कहा—
"क्योंकि वह बच्चा नहीं है।"
आरव ने कुछ नहीं कहा।
वह नीचे उतरता गया।
सीढ़ियाँ खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं।
दस कदम।
बीस।
तीस।
हवा बदलने लगी।
ऊपर की सीलन की गंध के बजाय नीचे एक अजीब गंध थी।
जली हुई लकड़ी।
पुरानी दवा।
और...
खून जैसी धातु की गंध।
आरव ने अपनी नाक सिकोड़ ली।
उसने मोबाइल की रोशनी आगे की।
आखिरकार सीढ़ियाँ समाप्त हुईं।
सामने एक लंबा गलियारा था।
दीवारें कच्चे पत्थर की थीं।
छत बहुत नीची थी।
और दोनों तरफ लोहे के छोटे-छोटे दरवाजे थे।
आरव ने पहला दरवाजा देखा।
उस पर सफेद रंग से लिखा था—
कमरा 1
दूसरे पर—
कमरा 2
तीसरे पर—
कमरा 3
आरव धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
उसने चारों तरफ देखा।
"हवेली के नीचे दूसरी हवेली..."
उसने बुदबुदाया।
गोविंद ने ऊपर से शायद उसकी आवाज सुन ली थी।
उसने चिल्लाकर कहा—
"आरव! वापस आ जाओ!"
आरव ने उत्तर नहीं दिया।
गलियारे के अंत में एक बड़ा दरवाजा था।
उस पर कोई नंबर नहीं था।
सिर्फ एक शब्द लिखा था—
"माँ"
आरव की धड़कन तेज हो गई।
उसने दरवाजे के पास जाकर कान लगाया।
अंदर से किसी के साँस लेने की आवाज आ रही थी।
धीमी।
भारी।
जैसे कोई बहुत बूढ़ा व्यक्ति सो रहा हो।
आरव ने हैंडल पकड़ा।
दरवाजा बंद था।
उसने खींचा।
नहीं खुला।
तभी पीछे से एक बच्ची की आवाज आई—
"उसे मत खोलो।"
आरव ने झटके से पीछे देखा।
गलियारा खाली था।
"कौन?"
कोई उत्तर नहीं।
फिर आवाज आई—
"अगर तुमने वह दरवाजा खोल दिया..."
आरव ने पूछा—
"क्या होगा?"
"तो वह तुम्हें पहचान लेगी।"
"कौन?"
सन्नाटा।
फिर बहुत धीमी आवाज—
"तुम्हारी माँ।"
आरव की साँस अटक गई।
"मेरी माँ?"
वह पीछे हट गया।
उसकी माँ को मरे हुए अठारह साल हो चुके थे।
और वह कभी इस गाँव में नहीं आई थी।
या कम से कम...
आरव को ऐसा ही लगता था।
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आरव ने जेब से मोबाइल निकाला।
स्क्रीन पर नेटवर्क नहीं था।
बैटरी 63 प्रतिशत थी।
लेकिन अचानक स्क्रीन झिलमिलाई।
एक नया नोटिफिकेशन दिखाई दिया।
एक नया ऑडियो संदेश।
आरव ने उसे खोला।
रिकॉर्डिंग की तारीख थी—
17 अगस्त 1999
उसकी उंगलियाँ सुन्न हो गईं।
"यह मेरे फोन में कैसे आया?"
उसने प्ले दबाया।
कुछ सेकंड तक सिर्फ हवा की आवाज।
फिर एक पुरुष की आवाज—
"अगर कोई यह रिकॉर्डिंग सुन रहा है, तो समझो योजना असफल हो गई।"
आरव की आँखें फैल गईं।
आवाज परिचित थी।
बहुत परिचित।
उसने रिकॉर्डिंग तेज की।
"गोविंद पर भरोसा मत करना।"
आरव का दिल धड़क उठा।
फिर आवाज आई—
"और सबसे जरूरी बात..."
कुछ सेकंड शोर।
फिर—
"आरव को कभी इस हवेली में मत आने देना।"
आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।
रिकॉर्डिंग में अचानक तेज चीख सुनाई दी।
फिर आवाज कट गई।
आरव कुछ सेकंड तक मोबाइल को देखता रहा।
फिर उसकी नजर तारीख पर गई।
17 अगस्त 1999।
उसका जन्म कब हुआ था?
उसने अपने जीवन में वह तारीख सैकड़ों बार देखी थी।
लेकिन अब पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसके जन्म की तारीख और इस हवेली का इतिहास शायद एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
उसका जन्म प्रमाणपत्र...
उसने कभी मूल प्रमाणपत्र देखा ही नहीं था।
बचपन में पिता ने उसके दस्तावेज संभाले थे।
और पिता की मृत्यु के बाद वे कागज कहाँ गए—
उसे पता नहीं था।
पीछे से फिर वही बच्ची की आवाज आई—
"अब समझे?"
आरव ने धीरे से पूछा—
"तुम कौन हो?"
"जिसे तुम खोज रहे हो।"
"तुम्हारा नाम?"
कुछ क्षण सन्नाटा रहा।
फिर उत्तर आया—
"मीरा।"
आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
"मीरा कौन?"
"जिसे सत्रह साल पहले मार दिया गया था।"
"तुम मर चुकी हो?"
"हाँ।"
"फिर बोल कैसे रही हो?"
बच्ची ने कहा—
"क्योंकि जिसने मुझे मारा..."
वह रुक गई।
"...वह अभी जिंदा है।"
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आरव ने पीछे देखा।
इस बार गलियारे के अंतिम छोर पर कोई खड़ा था।
एक छोटी लड़की।
लगभग दस या ग्यारह साल की।
सफेद फ्रॉक।
बाल दो चोटियों में।
चेहरा बेहद पीला।
लेकिन आँखें...
आँखें सामान्य थीं।
वह डरावनी नहीं लग रही थी।
बल्कि उदास।
आरव धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।
"तुम मीरा हो?"
लड़की ने सिर हिलाया।
"तुम्हें किसने मारा?"
मीरा ने जवाब नहीं दिया।
"गोविंद?"
लड़की ने सिर हिलाया।
"नहीं।"
"फिर कौन?"
मीरा ने आरव के पीछे देखा।
"वह।"
आरव ने पलटकर देखा।
कोई नहीं।
"कौन?"
मीरा ने कहा—
"जो तुम्हें यहाँ तक लेकर आया।"
"मुझे तो कोई लेकर नहीं आया। मैं खुद आया।"
मीरा मुस्कुराई।
"नहीं।"
"क्या मतलब?"
"तुम्हें रास्ता किसने दिखाया था?"
आरव को ड्राइवर याद आया।
बारिश में सड़क पर खड़ा बूढ़ा आदमी याद आया।
वह आदमी...
जो अचानक गायब हो गया था।
आरव ने पूछा—
"वह बूढ़ा आदमी?"
मीरा ने सिर हिलाया।
"वह आदमी नहीं था।"
"तो कौन था?"
मीरा ने कहा—
"इस हवेली का पहला रखवाला।"
"उसका नाम?"
"रघुवीर।"
आरव चौंका।
उसने नाम पहले कहीं पढ़ा था।
उसे याद आया—
हवेली से जुड़े पुराने दस्तावेजों में एक नाम था।
रघुवीर सिंह।
लेकिन उन दस्तावेजों के अनुसार वह 1968 में मर चुका था।
आरव ने पूछा—
"वह तो पचास साल पहले मर गया था।"
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
"हाँ।"
"फिर मैंने उसे देखा कैसे?"
मीरा ने कहा—
"तुमने उसे नहीं देखा।"
"फिर?"
"उसने तुम्हें देखा।"
आरव की धड़कन तेज हो गई।
"क्या फर्क है?"
मीरा ने पहली बार मुस्कुराया।
"बहुत बड़ा।"
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ऊपर अचानक जोर से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।
गोविंद चीखा—
"आरव!"
आरव ने ऊपर देखा।
मीरा गायब थी।
"मीरा?"
कोई उत्तर नहीं।
आरव ने सीढ़ियों की तरफ देखा।
ऊपर अंधेरा था।
गोविंद की आवाज फिर आई—
"जल्दी ऊपर आओ!"
आरव सीढ़ियों की ओर बढ़ा।
लेकिन जैसे ही उसने पहला कदम रखा, उसे कुछ दिखाई दिया।
सीढ़ियों की दीवार पर एक पुरानी तस्वीर टंगी थी।
उसने मोबाइल की रोशनी उस पर डाली।
तस्वीर में छह लोग थे।
वही छह लोग।
लेकिन इस बार आरव ने एक बात देखी—
तस्वीर के पीछे खड़ी सातवीं आकृति।
एक छोटी लड़की।
मीरा।
उसने तस्वीर को करीब से देखा।
तस्वीर के नीचे तारीख थी—
17 अगस्त 1999।
और सबसे नीचे हाथ से लिखा था—
"प्रयोग संख्या 7।"
आरव के माथे पर पसीना आ गया।
"प्रयोग?"
उसने तस्वीर उतार ली।
पीछे कुछ और लिखा था।
"विषय: स्मृति।
परिणाम: असफल।
विषय जीवित।
स्मृति नष्ट।"
आरव ने यह पढ़ा ही था कि अचानक पीछे से किसी ने उसकी कलाई पकड़ ली।
वह चीख पड़ा।
लेकिन हाथ बहुत छोटा था।
मीरा फिर उसके पीछे खड़ी थी।
उसने कहा—
"तुम्हें अपनी यादें पूरी नहीं हैं।"
आरव ने पूछा—
"क्या?"
"तुम यहाँ पहले भी आए थे।"
"नहीं।"
"आए थे।"
"कब?"
मीरा ने कहा—
"जब तुम सात साल के थे।"
आरव की साँस रुक गई।
"झूठ।"
"तुम्हें याद नहीं।"
"मेरे पिता मुझे कभी यहाँ नहीं लाए।"
मीरा ने धीरे से कहा—
"तुम्हारे पिता नहीं लाए थे।"
"फिर कौन?"
मीरा ने ऊपर की तरफ देखा।
"तुम्हारी माँ।"
आरव की आँखें भर आईं।
"मेरी माँ तो..."
"हाँ।"
मीरा ने उसकी बात पूरी कर दी।
"वह मर चुकी है।"
फिर उसने धीरे से कहा—
"लेकिन मरने से पहले वह यहाँ आई थी।"
आरव ने दीवार पकड़ ली।
"कब?"
"उसी रात।"
"कौन-सी रात?"
मीरा ने उत्तर दिया—
"जिस रात मैं मरी थी।"
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आरव को लगा जैसे जमीन घूम रही है।
उसकी माँ?
सत्रह साल पहले?
लेकिन तब वह केवल चौदह साल का था।
और उसकी माँ की मृत्यु तो उसके बचपन में ही हो गई थी।
उसे याद था—
अस्पताल।
सफेद चादर।
डॉक्टर।
पिता की आँखों में आँसू।
अंतिम संस्कार।
फिर वर्षों तक एक खाली घर।
क्या यह सब झूठ था?
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"चलो।"
"कहाँ?"
"कमरा नंबर सात।"
"वह कहाँ है?"
मीरा ने गलियारे के दूसरे हिस्से की तरफ इशारा किया।
"जहाँ कोई दरवाजा नहीं है।"
आरव उसके पीछे चल पड़ा।
कुछ कदम बाद मीरा एक खाली दीवार के सामने रुक गई।
"यहीं।"
आरव ने दीवार देखी।
सिर्फ पत्थर।
"यहाँ तो कुछ नहीं।"
मीरा ने कहा—
"है।"
"क्या?"
"दरवाजा।"
आरव ने दीवार पर हाथ फेरा।
कुछ नहीं।
मीरा ने उसकी उंगली एक पत्थर पर रख दी।
"इसे दबाओ।"
आरव ने दबाया।
टक।
दीवार के भीतर से धातु की आवाज आई।
फिर पूरा पत्थर अंदर धँस गया।
दीवार का एक हिस्सा धीरे-धीरे खुलने लगा।
पीछे एक छोटा कमरा था।
आरव ने मोबाइल की रोशनी अंदर डाली।
कमरे में सिर्फ एक कुर्सी थी।
एक मेज।
और मेज पर रखा एक पुराना टेप रिकॉर्डर।
उसके पास एक कागज था।
आरव ने कागज उठाया।
ऊपर लिखा था—
"आरव के लिए।"
उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
उसने कागज खोला।
अंदर केवल एक वाक्य था—
"अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि तुम्हें आखिरकार अपनी माँ की मौत का सच जानने की जरूरत पड़ गई है।"
नीचे हस्ताक्षर थे—
"सविता।"
आरव के हाथ काँपने लगे।
सविता...
उसकी माँ का नाम।
उसने टेप रिकॉर्डर चालू किया।
कुछ सेकंड तक खरखराहट।
फिर एक औरत की आवाज आई।
"आरव..."
आरव की आँखों से आँसू निकल आए।
वह आवाज उसकी माँ की थी।
"अगर तुम कभी इस कमरे तक पहुँचो..."
आवाज काँपी।
"...तो गोविंद पर भरोसा मत करना।"
आरव ने आँखें बंद कर लीं।
फिर आवाज आई—
"मैंने तुम्हें बचाने के लिए तुम्हारी यादें बदलवाई थीं।"
आरव ने रिकॉर्डर को दोनों हाथों से पकड़ लिया।
"तुम्हें जो कुछ याद है..."
आवाज आगे बोली—
"वह पूरा सच नहीं है।"
फिर कुछ सेकंड की खामोशी।
"तुम्हारे पिता की मौत दुर्घटना नहीं थी।"
आरव का शरीर सुन्न हो गया।
"और मैं अस्पताल में नहीं मरी थी।"
टेप में अचानक चीख सुनाई दी।
फिर आवाज बहुत धीमी हो गई—
"मुझे इसी हवेली में मारा गया था।"
आरव की साँस अटक गई।
"लेकिन जिसने मुझे मारा..."
रिकॉर्डिंग में सविता की आवाज टूटने लगी।
"...वह तुम्हारा अपना—"
अचानक टेप बंद हो गया।
आरव ने बटन दबाया।
कुछ नहीं।
"माँ!"
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
मीरा दरवाजे पर खड़ी थी।
उसने धीरे से कहा—
"अब तुम समझ रहे हो।"
आरव ने उसकी ओर देखा।
"मेरी माँ को किसने मारा?"
मीरा ने उत्तर नहीं दिया।
"बताओ!"
मीरा की आँखें अचानक डर से फैल गईं।
वह आरव के पीछे देखने लगी।
"वह आ गया।"
आरव ने पूछा—
"कौन?"
मीरा पीछे हट गई।
"जिसका नाम दीवारों पर नहीं लिखा जाता।"
"कौन है वह?"
मीरा ने फुसफुसाकर कहा—
"तुम्हारे पिता।"
आरव का चेहरा जम गया।
"मेरे पिता तो मर चुके हैं।"
मीरा ने सिर हिलाया।
"नहीं।"
उसी क्षण कमरे के बाहर कदमों की आवाज आई।
धीरे-धीरे।
एक...
दो...
तीन...
कदम।
आरव ने दरवाजे की तरफ देखा।
एक आदमी की परछाईं दरवाजे पर आकर रुक गई।
फिर आवाज आई—
"आरव..."
वही आवाज।
जिसे उसने बचपन में हजारों बार सुना था।
उसके पिता की आवाज।
"बेटा..."
आरव के हाथ से रिकॉर्डर गिर गया।
परछाईं ने कहा—
"बहुत देर कर दी तुमने।"
और कमरे की सारी रोशनियाँ एक साथ बुझ गईं।
अंधेरे में आरव ने केवल एक चीज सुनी—
मीरा की चीख।
"भागो आरव! वह तुम्हारा पिता नहीं है!"
फिर किसी भारी चीज के गिरने की आवाज हुई।
और उसके बाद—
पूर्ण सन्नाटा।
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भाग 3 समाप्त
अगले भाग में — भाग 4: "वह आदमी जो आरव के पिता की आवाज में बोलता था"
आरव के सामने खड़ी वह परछाईं आखिर कौन है?
सविता ने अपनी आखिरी रिकॉर्डिंग में किस सच को छिपाया था?
मीरा अचानक कहाँ गायब हो गई?
और सबसे बड़ा सवाल—
अगर आरव के पिता सचमुच मर चुके थे, तो हवेली के तहखाने में उनकी आवाज कौन निकाल रहा था?