PretikaSerial Horrorजिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता

भाग 4 — वह आदमी जो आरव के पिता की आवाज़ में बोलता था

Yogesh Kumar Maurya · Serial Horror · 10 मिनट

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
जिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता
Chapter
4 of 7
Category
Serial Horror
Reading time
10 min
Words
1914
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

📖 जिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता
भाग 4 — वह आदमी जो आरव के पिता की आवाज़ में बोलता था
✍️ लेखक: योगेश कुमार मौर्य
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अंधेरा।
ऐसा अंधेरा जिसमें आरव को अपनी हथेली भी दिखाई नहीं दे रही थी।
कुछ क्षण पहले तक कमरे में टेप रिकॉर्डर की हल्की लाल बत्ती जल रही थी, लेकिन अब वह भी बुझ चुकी थी।
उसके कानों में सिर्फ अपनी तेज धड़कन सुनाई दे रही थी।
धक...
धक...
धक...
फिर कहीं बहुत पास से किसी के साँस लेने की आवाज आई।
आरव ने अपनी साँस रोक ली।
आवाज सामने से नहीं आ रही थी।
वह उसके बिल्कुल पीछे थी।
किसी ने बहुत धीमे से कहा—
"बेटा..."
आरव की आँखें फैल गईं।
वही आवाज।
वही लहजा।
वही अपनापन।
यह उसके पिता महेश मिश्रा की आवाज थी।
आरव ने अपने बचपन में यह आवाज हजारों बार सुनी थी।
"बेटा, डरना मत।"
"बेटा, गिर जाओगे।"
"आरव, पढ़ाई कर ली?"
"बेटा..."
वह आवाज फिर आई।
"मैं तुम्हें लेने आया हूँ।"
आरव की उंगलियाँ काँपने लगीं।
लेकिन उसे मीरा की आखिरी चेतावनी याद थी—
"वह तुम्हारा पिता नहीं है!"
आरव ने पीछे मुड़ने की हिम्मत नहीं की।
"अगर आप मेरे पिता हैं..."
उसने काँपती आवाज में कहा,
"...तो मेरे बचपन की एक ऐसी बात बताइए जो सिर्फ मेरे पिता जानते थे।"
सन्नाटा।
पीछे खड़ा व्यक्ति कुछ नहीं बोला।
आरव ने फिर पूछा—
"बताइए।"
कुछ सेकंड बाद आवाज आई—
"तुम पाँच साल के थे..."
आरव की साँस रुक गई।
"उस दिन बारिश हो रही थी। तुम छत पर जाकर पतंग उड़ाना चाहते थे। तुम्हारी माँ ने मना किया था। लेकिन तुम नहीं माने। तुम सीढ़ियों से भागते हुए ऊपर गए और..."
आवाज अचानक रुक गई।
आरव की आँखें बंद थीं।
उसे वह घटना याद थी।
वह घटना उसके और उसके पिता के बीच की सबसे निजी यादों में से एक थी।
"और?"
पीछे से आवाज आई—
"तुम गिर गए थे। तुम्हारे घुटने से खून निकला था।"
आरव ने धीरे से सिर हिलाया।
"नहीं।"
अंधेरे में खामोशी छा गई।
"तुम गलत हो।"
पीछे से आवाज नहीं आई।
आरव ने कहा—
"मैं पाँच साल की उम्र में छत से नहीं गिरा था।"
उसकी आवाज में अब डर से ज्यादा गुस्सा था।
"मैं आठ साल का था।"
सन्नाटा।
आरव ने धीरे-धीरे कहा—
"और उस दिन बारिश नहीं हुई थी। गर्मियों की दोपहर थी।"
पीछे खड़ी चीज बिल्कुल शांत हो गई।
आरव ने महसूस किया कि उसके पीछे मौजूद व्यक्ति एक कदम पीछे हट गया।
अब आरव को यकीन हो चुका था।
वह उसका पिता नहीं था।
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अचानक कमरे के कोने से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।
धड़ाम!
आरव ने मोबाइल निकाला।
बैटरी केवल 17 प्रतिशत थी।
उसने फ्लैशलाइट जलाई।
कमरे में कोई नहीं था।
न वह परछाईं।
न मीरा।
न कोई दूसरा व्यक्ति।
सिर्फ एक पुरानी कुर्सी।
मेज।
टेप रिकॉर्डर।
और फर्श पर पड़ी सविता की वह चिट्ठी।
आरव ने चिट्ठी उठाई।
उसने उसे दोबारा पढ़ा।
"अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि तुम्हें आखिरकार अपनी माँ की मौत का सच जानने की जरूरत पड़ गई है।"
नीचे लिखा था—
"गोविंद पर भरोसा मत करना।"
आरव ने दाँत भींचे।
गोविंद।
क्या वह सचमुच इस पूरे खेल का हिस्सा था?
उसने कमरे का दरवाजा देखा।
दरवाजा खुला था।
लेकिन बाहर कोई नहीं था।
"मीरा?"
कोई उत्तर नहीं।
"मीरा!"
सन्नाटा।
आरव कमरे से बाहर निकल आया।
तहखाने का गलियारा पहले से ज्यादा लंबा लग रहा था।
दीवारों पर लगी छोटी-छोटी लाल बत्तियाँ अब एक-एक करके जल रही थीं।
टिक।
एक बत्ती।
टिक।
दूसरी।
टिक।
तीसरी।
आरव ने गौर किया—
हर बत्ती के नीचे एक नंबर लिखा था।
1...
2...
3...
4...
5...
6...
7...
फिर 8...
वह रुक गया।
आठवाँ नंबर पहले वहाँ नहीं था।
उसने दीवार के पास जाकर देखा।
नंबर 8 के नीचे किसी ने ताजा लाल रंग से लिखा था—
"विषय बदल दिया गया।"
आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
"विषय?"
उसे तस्वीर याद आई।
प्रयोग संख्या 7।
क्या यह हवेली केवल किसी हत्या का स्थान नहीं थी?
क्या यहाँ लोगों पर प्रयोग किए जाते थे?
किस तरह के प्रयोग?
और कौन करता था?
तभी पीछे से कदमों की आवाज आई।
आरव पलटा।
गोविंद सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था।
उसके हाथ में एक बंदूक थी।
आरव तुरंत पीछे हट गया।
"आपके पास बंदूक है?"
गोविंद ने कुछ नहीं कहा।
वह धीरे-धीरे आरव की तरफ बढ़ता रहा।
"रुकिए!"
गोविंद रुक गया।
आरव ने पूछा—
"मीरा कहाँ है?"
गोविंद ने कहा—
"तुमने उसे देखा?"
"हाँ।"
"उससे बात की?"
"हाँ।"
गोविंद की आँखें बंद हो गईं।
"तो अब बहुत देर हो चुकी है।"
"किसके लिए?"
"तुम्हारे लिए।"
आरव ने दीवार से पीठ लगा ली।
"सच बताइए। मेरी माँ को क्या हुआ था?"
गोविंद ने बंदूक नीचे कर दी।
"तुम्हारी माँ यहाँ आई थी।"
"कब?"
"17 अगस्त 1999।"
"क्यों?"
"तुम्हें बचाने।"
"किससे?"
गोविंद ने उत्तर नहीं दिया।
आरव चिल्लाया—
"किससे?"
गोविंद ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
"तुम्हारे पिता से।"
आरव कुछ क्षण तक उसे देखता रहा।
"मेरे पिता?"
"हाँ।"
"आपने अभी कहा था कि मेरे पिता की मौत के बाद..."
"मैंने बहुत कुछ झूठ बोला है।"
आरव चुप हो गया।
गोविंद की आवाज टूट रही थी।
"तुम्हारे पिता की मौत दुर्घटना नहीं थी।"
"तो क्या हुआ था?"
"उन्हें मारा गया था।"
"किसने?"
गोविंद ने बंदूक कसकर पकड़ ली।
"तुम्हारी माँ ने।"
आरव का चेहरा पत्थर हो गया।
"क्या?"
"सविता ने महेश को मारा था।"
"नहीं।"
"हाँ।"
"झूठ!"
आरव ने गोविंद को धक्का दे दिया।
"मेरी माँ ऐसा नहीं कर सकती!"
गोविंद लड़खड़ा गया।
उसने कहा—
"तुम्हें अपनी माँ के बारे में उतना ही पता है जितना इस हवेली के बारे में।"
आरव की मुट्ठियाँ भींच गईं।
"सबूत?"
गोविंद चुप रहा।
"सबूत कहाँ है?"
गोविंद ने तहखाने के अंत की तरफ इशारा किया।
"कमरा नंबर छह।"
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कमरा नंबर छह का दरवाजा आधा खुला था।
आरव और गोविंद वहाँ पहुँचे।
गोविंद ने दरवाजा खोला।
अंदर एक छोटी-सी प्रयोगशाला जैसी जगह थी।
पुरानी मेजें।
काँच की बोतलें।
कुछ जंग लगे उपकरण।
दीवार पर कागज।
और एक बड़ा बोर्ड।
आरव बोर्ड के सामने जाकर रुक गया।
उस पर कई नाम लिखे थे।
महेश मिश्रा।
सविता मिश्रा।
मीरा।
और...
आरव मिश्रा।
आरव का दिल धड़कना भूल गया।
उसके नाम के सामने लिखा था—
विषय संख्या 7-B।
नीचे—
"स्मृति पुनर्निर्माण।"
आरव ने गोविंद की तरफ देखा।
"यह क्या है?"
गोविंद चुप रहा।
"मुझ पर प्रयोग हुआ था?"
"हाँ।"
"क्यों?"
"क्योंकि तुमने वह देखा था जो तुम्हें नहीं देखना चाहिए था।"
"क्या?"
गोविंद ने सिर झुका लिया।
"उस रात तुम अपनी माँ के साथ यहाँ आए थे।"
"मैं?"
"हाँ।"
"लेकिन मुझे कुछ याद क्यों नहीं?"
"क्योंकि तुम्हारी यादें बदल दी गई थीं।"
आरव की आँखों में अविश्वास था।
"किसने?"
गोविंद ने कहा—
"तुम्हारे पिता ने।"
आरव ने बोर्ड पर अपना नाम देखा।
"मेरे पिता वैज्ञानिक थे?"
"नहीं।"
"फिर?"
गोविंद ने उत्तर दिया—
"तुम्हारे पिता उस आदमी के साथ काम करते थे जिसने यह प्रयोग शुरू किया था।"
"कौन आदमी?"
गोविंद ने धीरे से कहा—
"डॉक्टर राघव भटनागर।"
आरव ने नाम सुना तो उसके भीतर जैसे कोई पुराना दरवाजा खुलने लगा।
एक धुंधली याद।
सफेद कोट।
एक कमरा।
तेज रोशनी।
एक आदमी की आवाज—
"आरव, आँखें बंद करो।"
आरव ने अपना सिर पकड़ लिया।
"नहीं..."
उसके सामने तस्वीरें चमकने लगीं।
वह छोटा था।
शायद सात साल का।
उसके हाथ कुर्सी से बंधे थे।
सामने एक आदमी खड़ा था।
सफेद कोट।
चश्मा।
और उसके पीछे—
उसकी माँ।
सविता रो रही थी।
आरव ने आँखें खोल दीं।
"मुझे याद आ रहा है..."
गोविंद पीछे हट गया।
"क्या?"
"मेरी माँ मुझे रोक रही थी।"
"क्या?"
"वह कह रही थी—"
आरव की आवाज काँपने लगी।
"उसे मेरे पास मत आने देना।"
गोविंद का चेहरा बदल गया।
"किसे?"
आरव ने आँखें बंद कर लीं।
"डॉक्टर..."
फिर उसकी आँखें खुलीं।
"डॉक्टर राघव।"
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तभी कमरे की छत से कुछ गिरा।
ठक!
आरव ने ऊपर देखा।
छत के कोने से एक पुराना कागज नीचे गिरा था।
गोविंद ने उसे उठाया।
कागज पर लिखा था—
"प्रयोग संख्या 7-B सफल। विषय की स्मृति के प्रमुख हिस्से मिटा दिए गए। लेकिन विषय ने एक स्मृति सुरक्षित रखी है।"
आरव ने पूछा—
"कौन-सी?"
गोविंद ने कागज पलटा।
पीछे केवल एक चित्र था।
एक बच्चा।
एक महिला।
और एक आदमी।
तीनों के सामने आग जल रही थी।
आरव ने चित्र देखा।
फिर अचानक उसकी नजर बच्चे के हाथ पर पड़ी।
बच्चे ने एक छोटा काला डिब्बा पकड़ा हुआ था।
आरव ने फुसफुसाकर कहा—
"यह..."
"क्या?"
"यह डिब्बा..."
उसे याद आया।
उसके बचपन के घर में एक काला डिब्बा था।
पिता उसे किसी को छूने नहीं देते थे।
वह डिब्बा उनकी मृत्यु के बाद गायब हो गया था।
गोविंद ने पूछा—
"तुम्हें कुछ याद आया?"
आरव ने कहा—
"मेरे पिता के पास एक काला डिब्बा था।"
गोविंद का चेहरा सफेद हो गया।
"वह डिब्बा कहाँ है?"
"पता नहीं।"
"तुम्हें ढूँढना होगा।"
"क्यों?"
गोविंद ने धीरे से कहा—
"क्योंकि उसमें वह सब है जो तुम्हारी माँ ने छिपाया था।"
"क्या?"
गोविंद ने उत्तर देने के लिए मुँह खोला ही था कि—
तहखाने में अचानक सभी बल्ब बुझ गए।
अंधेरा।
फिर ऊपर कहीं से किसी बच्चे की हँसी आई।
मीरा की।
"काका..."
गोविंद ने बंदूक उठा ली।
"मीरा?"
"आपने फिर झूठ बोला।"
गोविंद काँपने लगा।
"मैंने क्या किया?"
"आपने आरव को सब नहीं बताया।"
गोविंद ने अंधेरे में कहा—
"मीरा, बाहर आओ।"
हँसी बंद हो गई।
फिर आवाज आई—
"काका..."
"हाँ?"
"आपने मेरी माँ को कहाँ छिपाया?"
गोविंद के हाथ से बंदूक गिर गई।
आरव ने उसकी ओर देखा।
"मीरा की माँ?"
गोविंद ने सिर झुका लिया।
"वह..."
"कहाँ है?"
गोविंद ने कुछ नहीं कहा।
आरव ने उसकी कॉलर पकड़ ली।
"कहाँ है?"
तभी अंधेरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा—
"ऊपर।"
आरव और गोविंद दोनों ने एक साथ सिर उठाया।
ऊपर सीढ़ियों के मुहाने पर एक स्त्री खड़ी थी।
सफेद साड़ी।
लंबे बाल।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
गोविंद पीछे हट गया।
"नहीं..."
आरव ने पूछा—
"कौन है?"
स्त्री ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया।
आरव के शरीर में बिजली दौड़ गई।
चेहरा...
सविता का था।
उसकी माँ का।
आरव की आँखों से आँसू निकल आए।
"माँ?"
स्त्री मुस्कुराई।
"आरव..."
आरव उसकी तरफ बढ़ने लगा।
गोविंद चिल्लाया—
"मत जाना!"
लेकिन आरव नहीं रुका।
"माँ..."
स्त्री ने हाथ बढ़ाया।
"मेरे पास आओ।"
आरव ने सीढ़ियों की ओर कदम बढ़ाया।
तभी पीछे से गोविंद ने उसे पकड़ लिया।
"वह तुम्हारी माँ नहीं है!"
आरव ने गुस्से से कहा—
"छोड़िए!"
"नहीं!"
"मैंने उसे पहचाना है!"
गोविंद ने चिल्लाकर कहा—
"तुम्हारी माँ की बाईं आँख के नीचे तिल था!"
आरव जम गया।
उसने ऊपर देखा।
स्त्री की आँखों के नीचे कुछ नहीं था।
आरव धीरे-धीरे पीछे हट गया।
स्त्री की मुस्कान गायब हो गई।
उसका चेहरा अचानक बदलने लगा।
त्वचा जैसे पिघलने लगी।
आँखें काली हो गईं।
बाल चेहरे से हटे।
और अगले ही पल—
वहाँ कोई स्त्री नहीं थी।
सिर्फ वही लंबी, पतली परछाईं।
जिसे आरव ने पहले देखा था।
उसने अपना सिर एक तरफ झुकाया।
फिर पिता की आवाज में बोली—
"तुम्हें बहुत जल्दी सच समझ में आ रहा है, आरव।"
गोविंद ने काँपते हुए कहा—
"वह वापस आ गया।"
आरव ने पूछा—
"कौन?"
परछाईं ने उत्तर दिया—
"जिसे तुम्हारे पिता ने भी कभी नहीं हराया।"
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परछाईं अचानक सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी।
एक कदम।
दूसरा।
तीसरा।
गोविंद ने आरव को पीछे किया।
"भागो!"
दोनों गलियारे की तरफ दौड़े।
पीछे कदमों की आवाज आती रही।
धीमी।
लेकिन लगातार।
ठक...
ठक...
ठक...
आरव ने कमरा नंबर सात देखा।
दरवाजा खुला था।
वह अंदर घुस गया।
गोविंद भी पीछे आया।
दरवाजा बंद कर दिया।
बाहर कदमों की आवाज रुक गई।
कुछ सेकंड शांति।
फिर दरवाजे पर एक हल्की दस्तक हुई।
ठक।
फिर—
ठक।
गोविंद ने अपनी साँस रोक ली।
बाहर से आवाज आई—
"गोविंद..."
गोविंद ने आँखें बंद कर लीं।
"मुझे पता है तुम अंदर हो।"
आरव ने फुसफुसाकर पूछा—
"यह कौन है?"
गोविंद ने कहा—
"डॉक्टर राघव।"
आरव ने सिर उठाया।
"वह तो मर चुका था।"
गोविंद ने उसकी तरफ देखा।
"हाँ।"
"तो फिर?"
"यही तो इस हवेली का सबसे बड़ा रहस्य है।"
बाहर से फिर आवाज आई—
"आरव..."
इस बार आवाज डॉक्टर राघव की थी।
"तुम्हें अपनी माँ का सच चाहिए?"
आरव चुप रहा।
"तो काले डिब्बे को ढूँढो।"
आरव की धड़कन तेज हो गई।
"वह कहाँ है?"
बाहर से उत्तर आया—
"तुम्हारे घर में।"
आरव ने गोविंद की तरफ देखा।
फिर आवाज आई—
"लेकिन सावधान..."
कुछ क्षण का सन्नाटा।
"तुम्हारे घर में अब तुम अकेले नहीं रहते।"
आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।
"क्या मतलब?"
बाहर से धीमी हँसी सुनाई दी।
"जब तुम यहाँ आने के लिए निकले थे..."
आवाज बहुत धीमी हो गई।
"...तब कोई तुम्हारे घर में दाखिल हुआ था।"
आरव ने तुरंत मोबाइल निकाला।
उसमें कई मिस्ड कॉल थीं।
सभी एक ही नंबर से।
उसके अपने घर का लैंडलाइन नंबर।
आरव की उंगलियाँ काँपने लगीं।
तभी मोबाइल पर एक नया संदेश आया।
"घर मत लौटना।"
आरव ने प्रेषक का नाम देखा।
उसकी साँस रुक गई।
नाम था—
सविता मिश्रा।
उसकी मृत माँ।
संदेश के नीचे सिर्फ एक और पंक्ति थी—
"क्योंकि जो तुम्हारे घर में है, वह तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।"
उसी क्षण कमरे के भीतर...
किसी ने आरव के कंधे पर हाथ रखा।
आरव ने पलटकर देखा।
मीरा उसके पीछे खड़ी थी।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
उसने फुसफुसाकर कहा—
"अब हमें यहाँ से निकलना होगा।"
आरव ने पूछा—
"क्यों?"
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
"क्योंकि तहखाने का दरवाजा बंद हो चुका है।"
आरव ने पीछे देखा।
कमरे का दरवाजा सचमुच बंद था।
लेकिन दरवाजे पर बाहर से किसी ने लाल रंग से सिर्फ एक वाक्य लिख दिया था—
"अब अगला प्रयोग शुरू होगा।"
और उसी क्षण...
कमरे के भीतर एक पुराना बल्ब अपने आप जल उठा।
उस रोशनी में आरव ने देखा—
दीवार पर उसके नाम के नीचे एक नया नाम लिखा था।
"विषय 8 — मीरा।"
आरव ने मीरा की तरफ देखा।
लेकिन मीरा गायब थी।
उसकी जगह...
एक खाली कुर्सी पड़ी थी।
कुर्सी पर खून की एक बूंद थी।
और उसके नीचे एक छोटा काला कागज पड़ा था—
"भागना मत।
घर जाओ।
काला डिब्बा खोलो।
तभी तुम्हें पता चलेगा कि तुम्हारे पिता कौन थे।"
आरव ने कागज उठाया।
उसी क्षण ऊपर हवेली में घड़ी ने एक बजाया।
टन...
रात का एक बज चुका था।
और हवेली के बाहर...
एक कार धीरे-धीरे आकर रुकी।
उस कार से एक आदमी उतरा।
उसके हाथ में वही काला डिब्बा था...
जिसे आरव अपने बचपन से खोज रहा था।
आदमी ने हवेली की तरफ देखा।
फिर मुस्कुराया।
और बोला—
"आरव को अब सच जानना ही होगा।"
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भाग 4 समाप्त
अगले भाग में — भाग 5: "काला डिब्बा और घर में छिपा हुआ आदमी"
आरव के घर में कौन घुसा है?
काला डिब्बा किसके हाथ में है?
डॉक्टर राघव वास्तव में मर चुका है या वह अब भी इस खेल को चला रहा है?
और सबसे बड़ा रहस्य—
सविता की आवाज़ आरव के मोबाइल पर कैसे आई, जबकि उसकी मौत को अठारह वर्ष हो चुके हैं?

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