PretikaSerial Horrorजिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता

भाग 5 — काला डिब्बा और घर में छिपा हुआ आदमी

Yogesh Kumar Maurya · Serial Horror · 10 मिनट

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
जिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता
Chapter
5 of 7
Category
Serial Horror
Reading time
10 min
Words
1816
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

रात के ठीक एक बजकर सात मिनट।

पुरानी हवेली के बाहर काली सड़क पर वह कार खड़ी थी।

बारिश बंद हो चुकी थी, लेकिन आसमान में बादल अब भी इतने घने थे कि चाँद का नामोनिशान नहीं था।

कार के पास खड़ा आदमी बिल्कुल शांत था।

उसके हाथ में वही काला डिब्बा था।

छोटा।

चौकोर।

पुराना।

लेकिन उसके ऊपर जमी धूल के बावजूद ताले पर एक चीज साफ दिखाई दे रही थी—

आर.एम.

आरव मिश्रा।

आदमी ने डिब्बे को देखा और हल्का-सा मुस्कुराया।

"अब बहुत देर हो चुकी है, आरव।"

वह हवेली की तरफ मुड़ा।

लेकिन उसी क्षण हवेली की तीसरी मंजिल की एक खिड़की अपने आप खुल गई।

आदमी वहीं रुक गया।

खिड़की के पीछे कुछ सेकंड तक एक सफेद चेहरा दिखाई दिया।

फिर खिड़की बंद हो गई।

आदमी की मुस्कान गायब हो गई।

उसने पहली बार डरते हुए हवेली की तरफ देखा।

"तुम भी जाग गई?"

कोई उत्तर नहीं आया।

उसने काला डिब्बा अपनी जैकेट के भीतर रखा और कार में बैठ गया।

कार स्टार्ट हुई।

लेकिन जाने से पहले उसने हवेली की तरफ आखिरी बार देखा।

तीसरी मंजिल की वही खिड़की फिर खुली।

और इस बार वहाँ एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

मीरा।

उसने हाथ उठाकर कार को रोकने का इशारा किया।

आदमी ने ब्रेक लगा दिया।

मीरा ने दूर से केवल दो शब्द कहे—

"बहुत देर।"

कार अचानक तेज गति से वहाँ से निकल गई।

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उधर तहखाने में आरव अब भी कमरे नंबर सात में खड़ा था।

उसके हाथ में कागज था।

उस पर सिर्फ एक संदेश था—

"भागना मत। घर जाओ। काला डिब्बा खोलो। तभी तुम्हें पता चलेगा कि तुम्हारे पिता कौन थे।"

आरव ने कागज मोड़कर जेब में रख लिया।

उसके भीतर डर था।

लेकिन उससे ज्यादा सवाल।

उसकी माँ सविता ने मरने से पहले ऐसा क्या छिपाया था?

उसके पिता महेश वास्तव में कौन थे?

डॉक्टर राघव का इस सबमें क्या संबंध था?

और सबसे बड़ा सवाल—

काला डिब्बा आखिर कहाँ था?

गोविंद कमरे के दरवाजे के पास खड़ा था।

"चलो।"

आरव ने उसकी तरफ देखा।

"कहाँ?"

"ऊपर।"

"और फिर?"

"हवेली से निकलना होगा।"

आरव ने पूछा—

"अगर वह बाहर हमारा इंतजार कर रहा हो?"

गोविंद ने कहा—

"तो भी हमें निकलना होगा।"

"क्यों?"

गोविंद ने धीमे स्वर में कहा—

"क्योंकि यह तहखाना अब सुरक्षित नहीं है।"

उसी समय ऊपर से एक भारी आवाज आई।

धड़ाम!

फिर दूसरी।

धड़ाम!

जैसे कोई ऊपर के कमरे में फर्नीचर पटक रहा हो।

आरव ने सिर उठाया।

"वह है?"

गोविंद ने सिर हिलाया।

"नहीं।"

"फिर कौन?"

गोविंद ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

"जिससे डॉक्टर राघव भी डरता था।"

आरव कुछ पूछता, उससे पहले ही कमरे की दीवार पर लगी छोटी बत्ती बुझ गई।

पूरा तहखाना अंधेरे में डूब गया।

गोविंद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

"मेरे पीछे रहना।"

दोनों सीढ़ियों की ओर दौड़े।

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

तहखाने से ऊपर आते ही आरव ने महसूस किया कि हवेली का वातावरण बदल चुका था।

कुछ देर पहले तक जहाँ हवा भारी और ठंडी थी, अब वहाँ अजीब गर्मी थी।

गलियारे की सभी खिड़कियाँ खुली थीं।

पर्दे हवा में फड़फड़ा रहे थे।

लेकिन बाहर हवा नहीं थी।

आरव ने खिड़की से बाहर देखा।

बगीचे में पेड़ों की पत्तियाँ तक स्थिर थीं।

"यह हवा अंदर से आ रही है," उसने कहा।

गोविंद ने कोई जवाब नहीं दिया।

वह जल्दी-जल्दी मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ रहा था।

आरव उसके पीछे चल पड़ा।

जैसे ही दोनों नीचे पहुँचे, गोविंद ने दरवाजा खोला।

बाहर अंधेरा था।

सड़क खाली।

आरव ने अपनी कार की तरफ देखा।

वही कार।

वही जगह।

लेकिन उसके ड्राइवर साइड के शीशे पर अंदर से किसी ने उंगली से लिखा था—

"घर मत जाना।"

आरव जम गया।

"गोविंद जी..."

गोविंद ने शीशे पर लिखा संदेश देखा।

उसने आँखें बंद कर लीं।

"वह पहले ही पहुँच गया।"

"कौन?"

"जिसका नाम तुम अभी नहीं जानना चाहते।"

आरव ने कार का दरवाजा खोला।

अंदर बैठकर उसने इंजन स्टार्ट किया।

गोविंद पीछे बैठ गया।

कार आगे बढ़ी।

हवेली पीछे छूटने लगी।

लेकिन आरव की नजर रियर-व्यू मिरर पर थी।

तीसरी मंजिल की खिड़की अब भी दिखाई दे रही थी।

और वहाँ...

एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

मीरा।

आरव ने ब्रेक दबाया।

"वह..."

गोविंद ने कहा—

"मत देखो।"

"मीरा वहाँ है।"

"नहीं।"

"मैंने उसे देखा!"

गोविंद ने कठोर स्वर में कहा—

"वह अब वहाँ नहीं है।"

आरव ने दोबारा शीशे में देखा।

खिड़की खाली थी।

उसने सड़क पर ध्यान लगाया।

लेकिन तभी उसकी जेब में रखा मोबाइल बज उठा।

स्क्रीन पर नाम था—

माँ।

आरव की उंगलियाँ काँपने लगीं।

गोविंद ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

"मत उठाना।"

"क्यों?"

"क्योंकि अगर उसने फोन किया है..."

गोविंद ने वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

आरव ने कॉल काट दी।

कुछ सेकंड बाद फिर कॉल आया।

इस बार वही नंबर।

फिर।

फिर।

आरव ने फोन बंद कर दिया।

लेकिन स्क्रीन बंद होने से पहले एक संदेश दिखाई दिया—

"तुम घर से केवल तीन मिनट दूर हो।"

आरव ने घड़ी देखी।

रास्ता सचमुच लगभग तीन मिनट का था।

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तीन मिनट बाद कार उसके घर के सामने रुकी।

पुराना दो मंजिला मकान।

गेट आधा खुला था।

आरव ने कार बंद की।

दोनों कुछ क्षण वहीं बैठे रहे।

गोविंद ने कहा—

"तुम्हारे घर में कोई है।"

आरव ने पूछा—

"आपको कैसे पता?"

"ऊपर वाली खिड़की।"

आरव ने देखा।

दूसरी मंजिल की खिड़की में हल्की रोशनी थी।

उसके घर से निकलते समय वहाँ कोई रोशनी नहीं थी।

गोविंद ने कहा—

"पहले मैं अंदर जाता हूँ।"

आरव ने रोक दिया।

"नहीं।"

"क्यों?"

"यह मेरा घर है।"

"और यही वजह है कि तुम खतरे में हो।"

आरव ने कार से एक लोहे की रॉड निकाली।

"चलते हैं।"

दोनों गेट से अंदर गए।

मुख्य दरवाजा बंद था।

लेकिन ताला खुला हुआ था।

आरव ने धीरे से दरवाजा खोला।

अंदर अंधेरा।

घर बिल्कुल शांत।

लेकिन उस शांति में एक चीज असामान्य थी।

रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी।

आरव रुक गया।

"मैंने घर छोड़ते समय गैस बंद की थी।"

गोविंद ने कहा—

"चाय अभी बनाई गई है।"

वे रसोई की तरफ बढ़े।

टेबल पर दो कप रखे थे।

एक कप आधा भरा हुआ।

दूसरे कप से अभी भी भाप निकल रही थी।

आरव ने कप को छुआ।

गर्म।

बहुत गर्म।

गोविंद ने फुसफुसाकर कहा—

"कोई यहाँ बैठा था।"

तभी ऊपर से कुर्सी घिसटने की आवाज आई।

घ्र्र्र्र...

दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

आरव ने रॉड कसकर पकड़ी।

"ऊपर।"

सीढ़ियाँ चढ़ते समय हर कदम भारी लग रहा था।

पहली मंजिल।

कोई नहीं।

दूसरी मंजिल।

गलियारा खाली।

लेकिन आरव के कमरे का दरवाजा खुला था।

वह रुक गया।

"मैंने इसे बंद किया था।"

गोविंद ने कहा—

"अंदर मत जाना।"

आरव ने उसकी बात नहीं मानी।

वह कमरे में दाखिल हुआ।

सब कुछ बिखरा पड़ा था।

अलमारी खुली।

कपड़े फर्श पर।

पुरानी किताबें जमीन पर।

ड्रॉअर बाहर निकले हुए।

किसी ने पूरे कमरे की तलाशी ली थी।

आरव दौड़कर अपनी मेज के पास गया।

उसने एक दराज खोली।

खाली।

दूसरी।

खाली।

तीसरी—

उसमें सिर्फ एक पुरानी तस्वीर थी।

आरव ने तस्वीर उठाई।

तस्वीर में वह छोटा बच्चा था।

उसकी माँ सविता उसके पीछे खड़ी थी।

और बगल में—

उसका पिता महेश।

लेकिन तस्वीर का सबसे डरावना हिस्सा पीछे था।

कमरे के दरवाजे के पास एक चौथी आकृति खड़ी थी।

एक आदमी।

चेहरा धुंधला।

लेकिन उसके हाथ में...

वही काला डिब्बा था।

आरव की सांस रुक गई।

"यह आदमी कौन है?"

गोविंद तस्वीर देखकर पीछे हट गया।

"मैं नहीं जानता।"

आरव ने उसकी तरफ देखा।

"आप झूठ बोल रहे हैं।"

गोविंद चुप रहा।

"आप इसे जानते हैं।"

गोविंद की आँखों में डर था।

"हाँ।"

"कौन है?"

गोविंद ने धीरे से कहा—

"तुम्हारे पिता का बड़ा भाई।"

आरव का चेहरा बदल गया।

"मेरे पिता का कोई भाई नहीं था।"

गोविंद ने कहा—

"तुम्हें यही बताया गया था।"

"उसका नाम?"

गोविंद ने बहुत धीमे स्वर में कहा—

"विनोद मिश्रा।"

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आरव के दिमाग में जैसे विस्फोट हुआ।

"मेरे पिता का भाई था?"

"हाँ।"

"कहाँ है वह?"

"मर चुका है।"

"कब?"

गोविंद चुप।

"कब?"

"सत्रह साल पहले।"

आरव ने तस्वीर फिर देखी।

"लेकिन इस तस्वीर की तारीख?"

तस्वीर के नीचे तारीख थी—

18 अगस्त 1999।

आरव ने कहा—

"मेरी माँ की मौत के अगले दिन।"

गोविंद ने सिर झुका लिया।

"हाँ।"

"और यह तस्वीर मेरे घर में किसने रखी?"

"विनोद ने।"

आरव ने उसकी तरफ देखा।

"अगर वह मर चुका था तो?"

गोविंद ने कोई जवाब नहीं दिया।

अचानक नीचे मुख्य दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

धड़ाम!

दोनों चौंक गए।

फिर किसी के कदमों की आवाज।

नीचे से ऊपर की ओर।

धीरे-धीरे।

एक...

दो...

तीन...

आरव ने रॉड उठाई।

गोविंद ने बंदूक निकाल ली।

"कौन है?"

कोई उत्तर नहीं।

कदमों की आवाज ऊपर आती रही।

सीढ़ियों के मोड़ पर एक आदमी दिखाई दिया।

काली जैकेट।

सफेद शर्ट।

चेहरा आधा अंधेरे में।

उसके हाथ में—

काला डिब्बा।

आरव ने उसे देखा।

आदमी ने कहा—

"इसे खोज रहे थे?"

आरव ने पूछा—

"आप कौन हैं?"

आदमी मुस्कुराया।

"जिसे तुम्हारे पिता ने मरवा दिया था।"

गोविंद ने बंदूक तान दी।

"विनोद!"

आदमी की मुस्कान गायब हो गई।

"बहुत साल बाद नाम लिया है मेरा।"

आरव ने गोविंद की तरफ देखा।

"यह विनोद है?"

गोविंद ने कहा—

"हाँ।"

आरव ने आदमी की तरफ देखा।

"लेकिन आप तो मर चुके हैं।"

विनोद ने हँसते हुए कहा—

"तुम्हें किसने बताया?"

"गोविंद ने।"

विनोद ने गोविंद की तरफ देखा।

"इस बूढ़े ने?"

गोविंद ने बंदूक और सीधी कर दी।

"डिब्बा नीचे रखो।"

विनोद ने डिब्बा मेज पर रखा।

"इसे खोलना है?"

आरव आगे बढ़ा।

"हाँ।"

विनोद ने कहा—

"तो पहले एक बात जान लो।"

"क्या?"

"इस डिब्बे में तुम्हारी माँ की आखिरी इच्छा है।"

आरव रुक गया।

"क्या लिखा है?"

विनोद ने कहा—

"तुम्हें खुद पढ़ना होगा।"

"चाबी?"

विनोद ने अपनी जेब से छोटी चाबी निकाली।

आरव की नजर चाबी पर टिक गई।

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

लेकिन तभी गोविंद ने कहा—

"आरव, रुको!"

आरव पलटा।

गोविंद के चेहरे पर आतंक था।

"यह चाबी असली नहीं है।"

विनोद मुस्कुराया।

"बहुत देर से पहचाना, गोविंद।"

उसने अपनी उंगली चटकाई।

अचानक घर की सारी लाइटें बुझ गईं।

अंधेरा।

गोविंद की बंदूक चली।

धाँय!

गोलियों की आवाज पूरे घर में गूँज गई।

आरव नीचे झुक गया।

कुछ सेकंड बाद रोशनी वापस आई।

विनोद गायब था।

काला डिब्बा भी गायब था।

फर्श पर केवल खून की कुछ बूंदें थीं।

आरव ने उन्हें देखा।

"गोली लगी?"

गोविंद ने सिर हिलाया।

"नहीं।"

"फिर यह खून?"

गोविंद धीरे-धीरे खून के पास गया।

उसने उंगली से छुआ।

फिर उसकी आँखें फैल गईं।

"यह इंसानी खून नहीं है।"

आरव ने पूछा—

"फिर?"

गोविंद ने कहा—

"यह वही चीज है जो तहखाने की दीवारों पर थी।"

आरव ने पीछे देखा।

दीवार पर ताजा लाल अक्षर उभर रहे थे।

धीरे-धीरे।

जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उन्हें लिखना शुरू किया हो।

पहले—

क...

फिर—

ा...

फिर—

ल...

फिर—

ा...

पूरा शब्द बना—

"काला डिब्बा"

और उसके नीचे एक दूसरा वाक्य उभरा—

"डिब्बा विनोद के पास नहीं है।"

आरव ने घबराकर पूछा—

"तो कहाँ है?"

दीवार पर अगला शब्द उभरा।

"नीचे।"

गोविंद पीछे हट गया।

"नहीं..."

आरव ने कहा—

"नीचे कहाँ?"

दीवार पर अंतिम पंक्ति उभरी—

"जहाँ मीरा को दफनाया गया था।"

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

"मीरा..."

उसने गोविंद की तरफ देखा।

"वह मर चुकी थी?"

गोविंद की आँखों से आँसू निकल आए।

"हाँ।"

"कहाँ?"

"तहखाने के नीचे।"

"तो वह मुझे दिखाई कैसे दे रही थी?"

गोविंद ने काँपते हुए कहा—

"क्योंकि मीरा की लाश कभी मिली ही नहीं।"

आरव कुछ बोल नहीं पाया।

उसी समय ऊपर वाले कमरे से आवाज आई।

एक बच्चे की।

बहुत धीमी।

"आरव..."

आरव ने सिर उठाया।

आवाज फिर आई—

"मुझे ढूँढो।"

गोविंद ने फुसफुसाकर कहा—

"मत जाना।"

लेकिन आरव जा चुका था।

वह कमरे से बाहर निकला।

आवाज घर के पीछे वाले बंद कमरे से आ रही थी।

वही कमरा जिसे उसके पिता ने जीवनभर बंद रखा था।

आरव ने दरवाजे का हैंडल पकड़ा।

दरवाजा अपने आप खुल गया।

अंदर धूल।

एक पुरानी मेज।

दीवार पर कई तस्वीरें।

और फर्श पर—

एक काला निशान।

जैसे किसी भारी चीज को घसीटकर वहाँ रखा गया हो।

आरव ने जमीन पर हाथ फेरा।

उसे एक लोहे का छोटा ढक्कन मिला।

उसने उसे उठाया।

नीचे एक संकरी सुरंग थी।

और सुरंग के अंदर...

एक छोटी लाल रोशनी जल रही थी।

आरव ने मोबाइल नीचे किया।

वहाँ एक चीज पड़ी थी।

काला डिब्बा।

वही डिब्बा।

आरव ने उसे उठा लिया।

उसके ऊपर अब कोई धूल नहीं थी।

ताला लगा था।

लेकिन चाबी?

आरव ने जेब टटोली।

कुछ नहीं।

तभी पीछे से एक आवाज आई—

"चाबी तुम्हारे पास हमेशा से थी।"

आरव पलटा।

दरवाजे पर...

मीरा खड़ी थी।

लेकिन इस बार उसका चेहरा पहले जैसा नहीं था।

उसकी आँखें लाल थीं।

और उसके हाथ में एक छोटी-सी चाबी थी।

वह मुस्कुराई।

"लेकिन इसे खोलने से पहले..."

वह धीरे-धीरे आरव की तरफ बढ़ी।

"...तुम्हें अपनी एक याद वापस करनी होगी।"

आरव ने पूछा—

"कौन-सी याद?"

मीरा उसके बिल्कुल सामने आ गई।

उसने चाबी आरव की हथेली पर रखी।

फिर फुसफुसाई—

"वह रात, जब तुमने अपनी माँ को मरते हुए देखा था।"

आरव का चेहरा जम गया।

"मैंने..."

मीरा ने कहा—

"हाँ, आरव।"

फिर उसके होंठों पर एक अजीब मुस्कान फैल गई।

"तुम्हारी माँ को किसी और ने नहीं मारा था।"

आरव की साँस रुक गई।

मीरा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

"उन्हें मारने वाला तुम खुद थे।"

उसी क्षण काले डिब्बे का ताला अपने आप खुल गया।

क्लिक।

ढक्कन धीरे-धीरे ऊपर उठा।

अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।

एक खून से सना रूमाल।

एक छोटी वीडियो-कैसेट।

और सबसे ऊपर—

एक कागज।

उस पर लिखा था—

"आरव के लिए — अगर यह डिब्बा खुल गया है, तो अब मुझे तुमसे डरना चाहिए।"

आरव ने काँपते हाथों से कागज उठाया।

नीचे हस्ताक्षर थे—

सविता।

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भाग 5 समाप्त

अगले भाग में — भाग 6: "वह रात जो आरव भूल चुका था"

काले डिब्बे में सविता ने क्या छिपाया था?

क्या सचमुच आरव अपनी माँ की मौत का जिम्मेदार था?

मीरा आखिर आरव से क्या चाहती है?

और वीडियो-कैसेट में रिकॉर्ड वह दृश्य क्या है, जिसे देखकर आरव की पूरी जिंदगी उलटने वाली है?

लेकिन सबसे बड़ा सवाल—अगर मीरा मर चुकी थी, तो वह आरव के सामने बार-बार कैसे आ रही है?

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