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भाग 6 — वह रात जो आरव भूल चुका था
Yogesh Kumar Maurya · Serial Horror · 9 मिनट
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- जिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता
- Chapter
- 6 of 7
- Category
- Serial Horror
- Reading time
- 9 min
- Words
- 1677
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
काले डिब्बे का ढक्कन पूरी तरह खुल चुका था।
कमरे में मौजूद तीनों चीजें आरव को घूरती हुई-सी लग रही थीं।
एक पुरानी तस्वीर।
खून से सना रूमाल।
और एक वीडियो-कैसेट।
लेकिन सबसे ऊपर रखा वह कागज...
वही आरव के हाथों में काँप रहा था।
उस पर उसकी माँ सविता की लिखावट थी—
"आरव के लिए—अगर यह डिब्बा खुल गया है, तो अब मुझे तुमसे डरना चाहिए।"
आरव ने वह पंक्ति दोबारा पढ़ी।
फिर तीसरी बार।
उसका दिमाग जैसे उस एक वाक्य को स्वीकार करने से इनकार कर रहा था।
"मुझे तुमसे डरना चाहिए..."
उसने बुदबुदाकर कहा।
"माँ मुझसे क्यों डरती?"
पीछे खड़ा गोविंद बिल्कुल शांत था।
उसके चेहरे पर ऐसा भाव था जैसे वह इस कागज को पहले भी देख चुका हो।
आरव ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
"आप जानते थे?"
गोविंद ने आँखें चुरा लीं।
"क्या?"
"यह डिब्बा।"
कोई उत्तर नहीं।
"आप जानते थे कि इसमें यह सब है?"
गोविंद ने धीरे से कहा—
"हाँ।"
आरव के भीतर गुस्सा उबल पड़ा।
"तो इतने सालों तक आपने मुझे कुछ क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि तुम्हारी माँ ने मना किया था।"
"मेरी माँ मर चुकी थीं!"
"फिर भी उनका आदेश था।"
"मृत आदमी का आदेश कोई क्यों मानेगा?"
गोविंद ने उसकी आँखों में देखा।
"क्योंकि तुम्हारी माँ ने मरने से पहले मुझसे एक वादा लिया था।"
"क्या वादा?"
गोविंद चुप रहा।
आरव ने मेज पर पड़ी वीडियो-कैसेट उठा ली।
"यह क्या है?"
"तुम्हारे सवालों का पहला जवाब।"
"और दूसरा?"
गोविंद ने खून से सने रूमाल की तरफ देखा।
"वह तुम्हारे सवालों का आखिरी जवाब हो सकता है।"
आरव ने रूमाल उठाया।
उस पर खून के धब्बे सूख चुके थे।
लेकिन कोने में एक छोटा-सा अक्षर कढ़ा हुआ था—
S
आरव की उंगलियाँ ठंडी पड़ गईं।
"सविता..."
गोविंद ने सिर हिलाया।
"शायद।"
"शायद?"
"हो सकता है यह किसी और का भी हो।"
आरव ने रूमाल मेज पर रख दिया।
फिर तस्वीर उठाई।
तस्वीर देखकर उसकी धड़कन रुक गई।
तस्वीर में वह स्वयं था।
लेकिन उसकी उम्र करीब सात वर्ष थी।
उसके सामने उसकी माँ खड़ी थी।
माँ की आँखों में भय था।
और आरव के हाथ में...
एक चमकदार धातु की वस्तु।
चाकू।
तस्वीर के पीछे लिखा था—
"17 अगस्त 1999 — रात 11:43"
आरव ने तस्वीर गिरा दी।
"नहीं..."
उसकी आवाज टूट गई।
"यह नहीं हो सकता।"
गोविंद ने तस्वीर उठाई।
"तुम्हें यही याद नहीं था।"
आरव ने उसे घूरकर देखा।
"मैंने किसी को चाकू नहीं मारा।"
गोविंद ने कहा—
"मैंने ऐसा नहीं कहा।"
"लेकिन तस्वीर..."
"तस्वीर केवल इतना साबित करती है कि चाकू तुम्हारे हाथ में था।"
आरव चुप हो गया।
गोविंद ने आगे कहा—
"यह नहीं कि तुमने किसी को मारा।"
आरव ने वीडियो-कैसेट कसकर पकड़ ली।
"तो सच क्या है?"
गोविंद ने कहा—
"देख लो।"
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पुराना कमरा।
पुराना टेलीविजन।
और उसके साथ एक वीसीआर मशीन।
आरव को विश्वास नहीं हो रहा था कि यह सब अभी भी उसके घर में मौजूद था।
गोविंद ने कमरे के कोने में रखी पुरानी अलमारी खोली।
अंदर धूल से ढकी मशीन रखी थी।
उसने उसे बाहर निकाला।
आरव ने पूछा—
"यह कब से है?"
"तुम्हारे पिता के समय से।"
"और आपने इसे कभी चलाया नहीं?"
गोविंद ने कहा—
"तुम्हारी माँ ने मना किया था।"
"क्यों?"
"क्योंकि इसमें वह रात कैद है।"
आरव ने वीडियो-कैसेट मशीन में डाल दी।
कुछ सेकंड तक स्क्रीन काली रही।
फिर सफेद रेखाएँ दौड़ीं।
कर्कश आवाज।
फिर तस्वीर उभरी।
पुरानी हवेली का तहखाना।
कैमरा स्थिर था।
जैसे किसी ने उसे एक कोने में रख दिया हो।
स्क्रीन पर समय दिखाई दे रहा था—
23:17:08
आरव आगे झुक गया।
गोविंद पीछे खड़ा था।
स्क्रीन पर एक आदमी आया।
वह महेश था।
आरव के पिता।
उसके हाथ में कुछ कागज थे।
वह कैमरे के सामने आकर बोला—
"अगर यह रिकॉर्डिंग किसी के हाथ लगी है, तो इसका मतलब है कि योजना विफल हो गई।"
आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।
महेश आगे बोला—
"सविता को आज रात यहाँ नहीं आना चाहिए था।"
फिर स्क्रीन के बाहर से किसी महिला की आवाज आई—
"महेश!"
महेश पलटा।
सविता फ्रेम में आई।
उसकी गोद में सात साल का आरव था।
आरव ने स्क्रीन को छू लिया।
"मैं..."
उसकी आवाज नहीं निकली।
सविता ने महेश से कहा—
"उसे छोड़ दो।"
महेश ने जवाब दिया—
"अब बहुत देर हो चुकी है।"
"वह बच्चा है!"
"वह केवल बच्चा नहीं है।"
सविता चीखी—
"वह मेरा बेटा है!"
महेश ने ठंडे स्वर में कहा—
"वह विषय संख्या 7-B है।"
आरव के हाथ काँपने लगे।
स्क्रीन पर छोटा आरव कुर्सी पर बैठा था।
सविता उसे अपने पीछे छिपाने की कोशिश कर रही थी।
तभी एक तीसरा व्यक्ति कमरे में दाखिल हुआ।
सफेद कोट।
चश्मा।
डॉक्टर राघव।
आरव की साँस अटक गई।
डॉक्टर राघव ने महेश से कहा—
"इसे अब रोकना संभव नहीं है।"
सविता ने कहा—
"तुमने मेरे बेटे के साथ क्या किया?"
राघव मुस्कुराया।
"हमने केवल उसकी याददाश्त को छुआ है।"
"तुमने उसके दिमाग के साथ खेला!"
"उसे भूलना जरूरी था।"
"क्या?"
राघव ने छोटे आरव की तरफ देखा।
"उसने जो देखा है, वह अगर उसे याद रहा तो सब खत्म हो जाएगा।"
सविता ने पूछा—
"उसने क्या देखा?"
राघव चुप रहा।
फिर उसने महेश की ओर देखा।
महेश ने कहा—
"उसे याद है कि हमने किसे मारा था।"
सविता का चेहरा सफेद पड़ गया।
"तुमने..."
वह पीछे हट गई।
"तुमने किसी को मारा?"
महेश ने कहा—
"तुम्हें सच जानना है?"
तभी वीडियो में बिजली चली गई।
स्क्रीन काली हो गई।
आरव ने मशीन बंद कर दी।
"नहीं!"
वह उठ खड़ा हुआ।
"आगे क्या हुआ?"
गोविंद ने कहा—
"कैसेट का दूसरा हिस्सा है।"
"कहाँ?"
गोविंद ने कोई उत्तर नहीं दिया।
आरव ने उसकी कॉलर पकड़ ली।
"कहाँ?"
गोविंद ने धीरे से कहा—
"हवेली में।"
आरव ने उसे छोड़ दिया।
"तो हमें वापस जाना होगा।"
गोविंद ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
लेकिन तभी टीवी स्क्रीन अपने आप फिर जल उठी।
वीसीआर बंद था।
फिर भी स्क्रीन पर तस्वीर आने लगी।
इस बार वीडियो पुराना नहीं था।
वह वर्तमान का दृश्य था।
आरव का अपना घर।
कैमरा उसके कमरे में लगा हुआ था।
स्क्रीन पर कोई व्यक्ति कमरे में प्रवेश कर रहा था।
आरव ने पहचानने की कोशिश की।
वह आदमी...
विनोद था।
आरव ने स्क्रीन के पास जाकर देखा।
विनोद उसके कमरे में अलमारी खोल रहा था।
फिर उसने जेब से वही काला डिब्बा निकाला।
आरव पीछे हट गया।
"यह कैसे..."
गोविंद ने कहा—
"यह लाइव है।"
"कहाँ से?"
"तुम्हारे घर से।"
स्क्रीन पर विनोद अचानक कैमरे की तरफ देखने लगा।
जैसे उसे पता हो कि कोई उसे देख रहा है।
फिर उसने सीधे कैमरे की तरफ उंगली उठाई।
और कहा—
"आरव..."
आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
"अगर तुम यह देख रहे हो..."
विनोद मुस्कुराया।
"...तो तुमने डिब्बा खोल लिया है।"
आरव ने टीवी की ओर देखा।
विनोद आगे बोला—
"लेकिन तुमने अभी उसका असली हिस्सा नहीं देखा।"
"कौन-सा हिस्सा?"
विनोद ने जेब से एक फोटो निकाली।
"यह।"
उसने फोटो कैमरे के सामने कर दी।
फोटो में सविता थी।
लेकिन उसके साथ एक आदमी और था।
आरव की आँखें फैल गईं।
वह आदमी...
उसका पिता नहीं था।
वह डॉक्टर राघव भी नहीं था।
वह था—
गोविंद।
आरव ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।
गोविंद वहीं खड़ा था।
उसके चेहरे से सारा रंग उड़ चुका था।
"आप..."
गोविंद ने कुछ कहने की कोशिश की।
लेकिन आरव ने हाथ उठा दिया।
"कुछ मत कहिए।"
गोविंद चुप हो गया।
आरव ने स्क्रीन की ओर देखा।
विनोद हँस रहा था।
"अब समझे?"
स्क्रीन काली हो गई।
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कमरे में कई सेकंड तक कोई आवाज नहीं हुई।
आरव के हाथ काँप रहे थे।
उसने गोविंद की तरफ देखा।
"आप मेरी माँ के साथ थे?"
गोविंद ने धीरे से कहा—
"हाँ।"
"उस रात?"
"हाँ।"
"और आपने मुझे बचाया?"
"हाँ।"
"या मुझे यहाँ लाया?"
गोविंद चुप रहा।
आरव ने चीखकर पूछा—
"सच!"
गोविंद ने सिर झुका लिया।
"मैं तुम्हें यहाँ लाया था।"
आरव पीछे हट गया।
"क्यों?"
"क्योंकि तुम्हारी माँ ने कहा था कि यही एक जगह है जहाँ तुम्हें बचाया जा सकता है।"
"किससे?"
गोविंद ने उत्तर दिया—
"तुम्हारे पिता से।"
"लेकिन वीडियो में तो मेरे पिता डॉक्टर राघव के साथ थे!"
"हाँ।"
"तो वह मुझे मारना चाहते थे?"
"नहीं।"
"फिर?"
गोविंद ने कहा—
"वह तुम्हें बचाने की कोशिश कर रहे थे।"
आरव कुछ क्षण तक उसे देखता रहा।
"क्या?"
"तुम्हारे पिता आखिरी समय में बदल गए थे।"
"क्यों?"
"क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि डॉक्टर राघव वास्तव में क्या कर रहा था।"
"क्या?"
गोविंद ने कहा—
"वह केवल बच्चों की याददाश्त पर प्रयोग नहीं कर रहा था।"
आरव चुप।
"वह मृत लोगों की यादें दूसरे लोगों के दिमाग में डालने की कोशिश कर रहा था।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरव ने धीरे से पूछा—
"इसका मतलब?"
गोविंद ने कहा—
"किसी मर चुके इंसान की यादें किसी जिंदा व्यक्ति में डाल दी जाएँ..."
वह रुका।
"...तो वह जिंदा व्यक्ति उस मृत इंसान की तरह सोचने, बोलने और व्यवहार करने लगेगा।"
आरव के चेहरे पर डर उतर आया।
"तो..."
गोविंद ने उसकी बात पूरी की—
"जो तुम्हें तुम्हारे पिता की आवाज में बुलाता है..."
आरव ने फुसफुसाकर कहा—
"वह कोई भूत नहीं है।"
"नहीं।"
"तो कौन है?"
गोविंद ने कहा—
"कोई ऐसा इंसान जिसके दिमाग में तुम्हारे पिता की यादें डाल दी गई हैं।"
आरव की आँखें फैल गईं।
उसे हवेली में सुनी आवाज याद आई।
"बेटा..."
"लेकिन किसके दिमाग में?"
गोविंद ने उत्तर नहीं दिया।
तभी घर के बाहर किसी वाहन के रुकने की आवाज आई।
दोनों खिड़की की ओर दौड़े।
नीचे सड़क पर एक काली वैन खड़ी थी।
उसमें से तीन लोग उतरे।
तीनों ने काले कपड़े पहन रखे थे।
गोविंद का चेहरा बदल गया।
"वे आ गए।"
"कौन?"
"राघव के लोग।"
आरव ने पूछा—
"डॉक्टर राघव के?"
गोविंद ने सिर हिलाया।
"लेकिन डॉक्टर राघव कहाँ है?"
गोविंद ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा—
"यही तो समस्या है।"
"क्या?"
"वह कभी मरा ही नहीं।"
आरव पीछे हट गया।
"आप क्या कह रहे हैं?"
गोविंद ने उसकी ओर देखा।
"सत्रह साल पहले जिस आदमी की लाश जलाई गई थी..."
वह रुका।
"...वह राघव नहीं था।"
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नीचे मुख्य दरवाजे पर दस्तक हुई।
ठक।
फिर दूसरी।
ठक।
फिर तीसरी।
ठक।
तीनों आवाजें बिल्कुल समान अंतराल पर।
गोविंद ने बंदूक उठाई।
"पीछे हटो।"
आरव ने पूछा—
"क्या करेंगे?"
"बाहर निकलने का दूसरा रास्ता है।"
"कहाँ?"
गोविंद ने फर्श की तरफ देखा।
"यहीं।"
उसने कमरे की पुरानी अलमारी हटाई।
नीचे लकड़ी का ढक्कन दिखाई दिया।
आरव ने कहा—
"यह रास्ता कहाँ जाता है?"
गोविंद ने कहा—
"उस जगह जहाँ तुम्हारी माँ ने आखिरी बार तुम्हें छिपाया था।"
आरव ने ढक्कन खोला।
नीचे अंधेरी सीढ़ियाँ थीं।
उसी समय मुख्य दरवाजा टूटने की आवाज आई।
धड़ाम!
गोविंद ने आरव को नीचे धकेला।
"चलो!"
दोनों नीचे उतरने लगे।
लेकिन जैसे ही आरव अंतिम सीढ़ी पर पहुँचा, उसे सामने एक दीवार दिखाई दी।
दीवार पर लाल रंग से लिखा था—
"आरव, तुम्हें अब अपनी असली माँ को ढूँढना होगा।"
आरव रुक गया।
"असली माँ?"
गोविंद ने भी वह संदेश पढ़ा।
उसके चेहरे पर भय उतर आया।
"यह किसने लिखा?"
आरव ने दीवार को देखा।
फिर अचानक पीछे से एक बच्ची की आवाज आई—
"मैंने।"
दोनों पलटे।
मीरा अंधेरे में खड़ी थी।
लेकिन इस बार उसके हाथ में एक पुरानी डायरी थी।
उसने डायरी आरव की तरफ बढ़ाई।
"यह तुम्हारी माँ की है।"
आरव ने डायरी ले ली।
पहला पन्ना खोला।
ऊपर तारीख थी—
16 अगस्त 1999।
और नीचे पहली पंक्ति—
"आज मुझे पहली बार पता चला कि आरव मेरा बेटा नहीं है।"
आरव की उंगलियाँ डायरी पर जम गईं।
उसने अगली पंक्ति पढ़ी।
"जिस बच्चे को मैंने अपना समझकर सात साल पाला..."
आगे स्याही फैली हुई थी।
फिर नीचे केवल एक वाक्य बचा था—
"उसकी असली माँ अभी जिंदा है।"
आरव की साँस रुक गई।
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
"अब तुम्हें समझ आया कि मैं तुम्हें क्यों खोज रही हूँ?"
आरव ने काँपते हुए पूछा—
"मेरी असली माँ कौन है?"
मीरा ने उत्तर नहीं दिया।
उसने बस अंधेरे सुरंग के अंत की तरफ देखा।
वहाँ किसी स्त्री के रोने की आवाज आ रही थी।
बहुत धीमी।
बहुत दूर से।
और फिर...
वही आवाज बोली—
"आरव..."
आरव के हाथ से डायरी गिर गई।
क्योंकि वह आवाज...
उसकी माँ सविता की नहीं थी।
वह आवाज किसी ऐसी औरत की थी...
जिसे आरव ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी नहीं सुना था।
लेकिन आवाज के अगले शब्द सुनते ही उसका खून जम गया—
"बेटा... मुझे यहाँ से निकालो।"
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भाग 6 समाप्त
अगले भाग में — भाग 7: "जिस औरत ने कहा—मैं तुम्हारी असली माँ हूँ"
सुरंग के अंत में कैद वह औरत कौन है?
क्या आरव सचमुच सविता का बेटा नहीं था?
डॉक्टर राघव ने बच्चों की याददाश्त पर प्रयोग क्यों किया?
और सबसे बड़ा रहस्य—
अगर आरव की असली माँ अभी जिंदा है, तो सविता ने उसे अपने बेटे की तरह सात साल तक क्यों पाला?