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भाग 7 — जिस औरत ने कहा, “मैं तुम्हारी असली माँ हूँ”
Yogesh Kumar Maurya · Serial Horror · 8 मिनट
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- जिस घर में रात के बाद कोई ज़िंदा नहीं रहता
- Chapter
- 7 of 7
- Category
- Serial Horror
- Reading time
- 8 min
- Words
- 1460
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
सुरंग के भीतर अंधेरा इतना गहरा था कि आरव को लगा जैसे वह किसी रास्ते पर नहीं, बल्कि किसी जीवित चीज के पेट के अंदर उतर रहा हो।
उसके हाथ में सविता की डायरी थी।
दूसरे हाथ में काले डिब्बे से मिली छोटी चाबी।
पीछे गोविंद था।
और उनसे कुछ कदम आगे मीरा।
लेकिन सबसे आगे...
वह आवाज थी।
एक औरत की आवाज।
वही आवाज जो अभी-अभी अंधेरे के भीतर से आई थी—
"बेटा... मुझे यहाँ से निकालो।"
आरव की साँसें तेज हो गईं।
उसने धीरे से पूछा—
"कौन हो तुम?"
कुछ पल कोई उत्तर नहीं आया।
फिर वही आवाज—
"इतने सालों बाद भी तुम मेरी आवाज नहीं पहचानते?"
आरव रुक गया।
उसके दिमाग में जैसे कई बंद दरवाजे एक साथ खुलने लगे।
एक कमरा...
पीली रोशनी...
किसी औरत की गोद...
लोरी...
फिर एक तेज चीख...
और उसके बाद अंधेरा।
आरव ने सिर पकड़ लिया।
"मुझे कुछ याद क्यों नहीं आ रहा?"
मीरा पीछे मुड़ी।
उसने कहा—
"क्योंकि तुम्हारी यादें तुम्हारी नहीं हैं।"
गोविंद ने उसे घूरकर देखा।
"चुप रहो, मीरा।"
मीरा मुस्कुराई।
"अब डर लग रहा है, काका?"
गोविंद ने कोई उत्तर नहीं दिया।
आरव ने दोनों को देखा।
"आप दोनों एक-दूसरे को पहले से जानते हैं?"
गोविंद चुप।
मीरा ने कहा—
"बहुत पहले से।"
"कब से?"
"जब मैं जिंदा थी।"
आरव की आँखें मीरा पर टिक गईं।
"तुम्हारी उम्र तब कितनी थी?"
मीरा ने उत्तर नहीं दिया।
वह आगे बढ़ गई।
सुरंग संकरी होती जा रही थी।
दीवारों पर जगह-जगह लोहे के छल्ले लगे थे।
कुछ पर जंग थी।
कुछ पर सूखे खून के निशान।
आरव ने एक दीवार पर हाथ रखा।
वहाँ छोटे-छोटे निशान बने थे।
जैसे किसी बच्चे ने नाखून से पत्थर खुरचकर गिनती लिखी हो।
एक...
दो...
तीन...
चार...
पाँच...
फिर अचानक गिनती उलटी हो गई।
दस... नौ... आठ... सात...
आरव ने पूछा—
"यह किसने बनाया?"
मीरा ने बिना पीछे देखे कहा—
"मैंने।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे नहीं पता था कि मैं कितने दिन जिंदा रहूँगी।"
आरव रुक गया।
"तुम्हें यहाँ बंद रखा गया था?"
"हाँ।"
"किसने?"
मीरा ने उत्तर दिया—
"तुम्हारे पिता ने।"
गोविंद ने तुरंत कहा—
"झूठ!"
मीरा पलटी।
"तो सच बताओ, काका।"
गोविंद का चेहरा कठोर हो गया।
"तुम्हारे पिता ने तुम्हें यहाँ बंद नहीं किया था।"
"फिर?"
"डॉक्टर राघव ने।"
मीरा ने सिर झुका लिया।
"और तुम्हारे पिता ने उसे रोकने की कोशिश की थी।"
आरव के कदम रुक गए।
"तो मेरे पिता बुरे नहीं थे?"
गोविंद ने कहा—
"तुम्हारे पिता ने बहुत गलतियाँ की थीं। लेकिन वह राक्षस नहीं थे।"
आरव ने धीमे से पूछा—
"फिर मेरी माँ?"
गोविंद ने आँखें बंद कर लीं।
"सविता भी राक्षस नहीं थी।"
"तो राक्षस कौन था?"
गोविंद ने सामने के अंधेरे की ओर देखा।
"वह अभी भी जिंदा है।"
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सुरंग अचानक खुलकर एक बड़े कमरे में बदल गई।
आरव ने मोबाइल की फ्लैशलाइट आगे की।
कमरे के बीच में लोहे की एक कुर्सी थी।
उसके चारों तरफ मोटी जंजीरें।
दीवार पर पुरानी चिकित्सा मशीनें।
काँच की बोतलें।
और एक बड़ा लोहे का दरवाजा।
दरवाजे के पीछे से वही औरत रो रही थी।
"आरव..."
इस बार आवाज ज्यादा स्पष्ट थी।
आरव दरवाजे के पास गया।
"तुम्हारा नाम क्या है?"
अंदर से उत्तर आया—
"शालिनी।"
आरव का दिल एक पल को रुक गया।
यह नाम...
उसे कहीं सुना हुआ लग रहा था।
लेकिन कहाँ?
"तुम मुझे जानती हो?"
"तुम्हें पैदा होने से पहले से।"
आरव की उंगलियाँ दरवाजे पर जम गईं।
"क्या मतलब?"
"दरवाजा खोलो।"
आरव ने पीछे देखा।
गोविंद बेचैन था।
"इसे मत खोलना।"
आरव ने पूछा—
"क्यों?"
"क्योंकि हमें नहीं पता कि अंदर कौन है।"
अंदर से औरत की आवाज आई—
"गोविंद..."
गोविंद जम गया।
"तुम मुझे पहचानते हो।"
गोविंद ने कुछ नहीं कहा।
"तुमने ही मुझे यहाँ बंद किया था।"
आरव ने तुरंत गोविंद की तरफ देखा।
"क्या?"
गोविंद ने सिर हिलाया।
"मैंने नहीं।"
अंदर से आवाज आई—
"झूठ।"
गोविंद ने दरवाजे की ओर देखा।
"तुम्हें नहीं पता उस रात क्या हुआ था।"
"मुझे सब याद है।"
"तुम्हारी यादें भी बदली गई थीं।"
"मेरी नहीं।"
गोविंद चुप हो गया।
शालिनी ने कहा—
"मेरी यादें उन्होंने बदलने की कोशिश की थी। लेकिन वे असफल रहे।"
आरव ने पूछा—
"उन्होंने कौन?"
"राघव।"
कमरे में फिर सन्नाटा।
आरव ने जेब से चाबी निकाली।
गोविंद ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"सोच लो।"
"मैंने बहुत सोच लिया।"
"अगर वह सचमुच तुम्हारी माँ नहीं हुई तो?"
आरव ने कहा—
"तो भी मुझे जानना होगा कि वह कौन है।"
उसने ताले में चाबी डाल दी।
क्लिक।
ताला खुल गया।
दरवाजा धीरे-धीरे खुला।
अंदर से ठंडी हवा बाहर आई।
आरव ने मोबाइल की रोशनी अंदर की।
एक औरत फर्श पर बैठी थी।
उम्र लगभग पचास वर्ष।
बाल पूरी तरह सफेद।
चेहरा कमजोर।
कलाई पर पुराने घावों के निशान।
लेकिन उसकी आँखें...
वह आँखें आरव को देखते ही भर आईं।
औरत धीरे-धीरे खड़ी हुई।
"आरव..."
आरव का दिल जोर से धड़का।
वह उसके करीब गई।
उसने काँपता हाथ आरव के चेहरे पर रखा।
"तुम बिल्कुल वैसे ही हो।"
आरव पीछे नहीं हटा।
"आप मुझे कैसे जानती हैं?"
औरत रो पड़ी।
"क्योंकि मैंने तुम्हें जन्म दिया है।"
आरव ने आँखें बंद कर लीं।
"आप मेरी माँ हैं?"
औरत ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
गोविंद पीछे हट गया।
मीरा चुपचाप उस औरत को देख रही थी।
आरव ने पूछा—
"मेरा नाम जन्म के समय क्या था?"
औरत ने तुरंत कहा—
"आरव नहीं।"
आरव की साँस रुक गई।
"तो?"
"अर्णव।"
आरव की आँखें फैल गईं।
"अर्णव?"
"हाँ।"
"फिर मेरा नाम आरव कैसे हुआ?"
शालिनी ने कहा—
"सविता ने रखा था।"
"क्यों?"
शालिनी की आँखों से आँसू बह निकले।
"क्योंकि वह तुम्हें मुझसे बचा रही थी।"
आरव चुप।
"किससे?"
शालिनी ने जवाब दिया—
"तुम्हारे अपने पिता से नहीं।"
वह रुकी।
"तुम्हें उन लोगों से बचाया जा रहा था जो तुम्हें इंसान नहीं, प्रयोग समझते थे।"
आरव ने पूछा—
"मेरे पिता कौन थे?"
शालिनी ने कुछ क्षण उसे देखा।
फिर कहा—
"महेश।"
"तो आप..."
"महेश की पत्नी नहीं थी।"
आरव के चेहरे पर उलझन थी।
"फिर?"
शालिनी ने कहा—
"मैं तुम्हारी जैविक माँ हूँ।"
"और महेश?"
"वह तुम्हारा जैविक पिता नहीं था।"
कमरे की हवा जैसे जम गई।
आरव पीछे हट गया।
"तो मेरे पिता कौन थे?"
शालिनी ने आँखें झुका लीं।
"मुझे नहीं पता।"
आरव स्तब्ध रह गया।
"क्या?"
"मुझे नहीं पता।"
"आप मेरी माँ हैं और आपको मेरे पिता का नाम नहीं पता?"
शालिनी रोते हुए बोली—
"क्योंकि तुम्हें पैदा करने के लिए..."
वह रुक गई।
गोविंद ने कहा—
"शालिनी, अभी नहीं।"
आरव ने गुस्से में कहा—
"नहीं! अब सब बताएँगी।"
शालिनी ने उसकी तरफ देखा।
"तुम्हारे जन्म की कहानी सामान्य नहीं है।"
"किस तरह?"
"तुम्हें मैंने जन्म दिया था..."
उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"...लेकिन तुम्हारे पिता का चयन डॉक्टर राघव ने किया था।"
आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
"चयन?"
"हाँ।"
"किसलिए?"
शालिनी ने कहा—
"तुम्हारे दिमाग में एक विशेष स्मृति रखने की क्षमता थी।"
आरव ने अविश्वास से कहा—
"मैं कोई प्रयोगशाला का बच्चा नहीं हूँ।"
शालिनी ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया।
"मैंने भी यही कहा था।"
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अचानक कमरे की छत पर लगी पुरानी बत्ती जल उठी।
सभी चौंक गए।
बत्ती के नीचे एक कैमरा था।
वह लाल रंग की रोशनी के साथ रिकॉर्ड कर रहा था।
गोविंद ने तुरंत ऊपर देखा।
"यह अभी तक चालू है?"
शालिनी का चेहरा सफेद पड़ गया।
"वह देख रहा है।"
आरव ने पूछा—
"कौन?"
शालिनी ने कहा—
"राघव।"
गोविंद ने बंदूक निकाली और कैमरे पर गोली चला दी।
धाँय!
कैमरा टूटकर नीचे गिर गया।
लेकिन उसी क्षण कमरे में एक स्पीकर से आवाज आई।
"गोविंद..."
सभी जम गए।
आवाज शांत थी।
"तुमने फिर मेरी मशीन तोड़ दी।"
गोविंद ने चारों ओर देखा।
"राघव!"
स्पीकर से हँसी आई।
"तुम अभी भी उतने ही मूर्ख हो।"
आरव ने पूछा—
"अगर तुम राघव हो तो सामने क्यों नहीं आते?"
कुछ पल सन्नाटा।
फिर आवाज—
"क्योंकि सामने आने की जरूरत नहीं।"
आरव ने कहा—
"तुमने मेरी माँ को कैद किया।"
हँसी।
"कौन-सी माँ?"
आरव चुप।
स्पीकर से आवाज आई—
"सविता?"
फिर—
"या शालिनी?"
आरव की मुट्ठियाँ भींच गईं।
"तुमने यह सब क्यों किया?"
राघव ने कहा—
"क्योंकि तुम्हारी याददाश्त में ऐसी चीज छिपी है जिसे दुनिया को नहीं पता चलना चाहिए।"
"क्या?"
"एक नाम।"
"किसका?"
राघव चुप रहा।
फिर बोला—
"उस आदमी का जिसने इस पूरे प्रयोग को शुरू किया।"
आरव ने पूछा—
"कौन?"
स्पीकर से धीमी आवाज आई—
"तुम्हारा असली पिता।"
आरव की धड़कन तेज हो गई।
"नाम बताओ!"
राघव हँसा।
"तुम्हें खुद याद करना होगा।"
फिर स्पीकर बंद हो गया।
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शालिनी अचानक काँपने लगी।
उसने आरव का हाथ पकड़ लिया।
"हमें यहाँ से जाना होगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि अब वह तुम्हें ढूँढने नहीं आएगा।"
आरव ने पूछा—
"तो?"
शालिनी ने कहा—
"वह तुम्हें याद दिलाने आएगा।"
"क्या?"
"वह रात।"
"कौन-सी रात?"
शालिनी ने उसकी आँखों में देखा।
"तुम्हारे जन्म की रात।"
आरव के दिमाग में अचानक एक तेज दर्द उठा।
उसने सिर पकड़ लिया।
और फिर...
एक दृश्य।
काली रात।
तेज बारिश।
एक अस्पताल जैसा कमरा।
शालिनी बिस्तर पर।
उसकी गोद में नवजात बच्चा।
सामने डॉक्टर राघव।
और उसके पीछे महेश।
महेश कह रहा था—
"इसे सविता के पास ले जाओ।"
राघव बोला—
"क्यों?"
"क्योंकि अगर शालिनी इसे रखेगी तो वे इसे खोज लेंगे।"
फिर एक तीसरी आवाज।
बहुत गहरी।
बहुत शांत।
"बच्चा मुझे चाहिए।"
आरव ने आँखें खोल दीं।
"मैंने..."
वह हाँफ रहा था।
"मैंने किसी की आवाज सुनी।"
शालिनी ने पूछा—
"किसकी?"
आरव ने कहा—
"एक आदमी की।"
"क्या कहा उसने?"
आरव ने आँखें बंद कीं।
"उसने कहा..."
वह रुक गया।
फिर अचानक उसके चेहरे पर भय छा गया।
"उसने मेरा नाम लिया।"
शालिनी काँप उठी।
"क्या नाम?"
आरव ने कहा—
"अर्णव।"
शालिनी की आँखों से आँसू निकल पड़े।
"तो तुम्हें याद आ रहा है।"
"क्या?"
"तुम्हारे पिता का पहला शब्द।"
आरव ने उसकी तरफ देखा।
"क्या?"
शालिनी ने कहा—
"वह आदमी तुम्हें तुम्हारे नाम से नहीं बुलाता था।"
"फिर?"
शालिनी ने काँपती आवाज में कहा—
"वह तुम्हें 'विषय सात' कहता था।"
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उसी क्षण सुरंग के बाहर जोरदार विस्फोट हुआ।
दीवारें हिल गईं।
धूल छत से गिरने लगी।
गोविंद चिल्लाया—
"सब नीचे झुको!"
दूसरा धमाका।
धड़ाम!
सुरंग का एक हिस्सा टूट गया।
रास्ता बंद हो गया।
आरव ने ऊपर देखा।
"हम फँस गए।"
गोविंद ने कहा—
"दूसरा रास्ता है।"
शालिनी ने सिर हिलाया।
"नहीं।"
गोविंद ने पूछा—
"क्या?"
शालिनी ने कहा—
"वह रास्ता बंद है।"
"तुम्हें कैसे पता?"
शालिनी ने दीवार की तरफ देखा।
"क्योंकि वह यहीं आ रहा है।"
आरव ने पूछा—
"कौन?"
शालिनी ने उत्तर दिया—
"राघव।"
दूर सुरंग में कदमों की आवाज गूँजी।
धीमी।
नपी-तुली।
ठक...
ठक...
ठक...
गोविंद ने बंदूक तैयार की।
मीरा अचानक आरव के पास आकर खड़ी हो गई।
उसने आरव का हाथ पकड़ लिया।
"डरना मत।"
आरव ने पूछा—
"तुम्हें पता है वह क्या करेगा?"
मीरा ने कहा—
"हाँ।"
"क्या?"
मीरा ने उसकी आँखों में देखा।
"वह तुम्हारी यादें वापस लाएगा।"
"तो अच्छी बात है।"
मीरा ने सिर हिलाया।
"नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि..."
उसने धीरे से कहा—
"तुम्हें अपनी आखिरी याद याद आ गई तो तुम खुद को पहचानना बंद कर दोगे।"
आरव कुछ बोल पाता उससे पहले अंधेरे में एक आदमी दिखाई दिया।
सफेद कोट।
हाथ में छोटा उपकरण।
चेहरे पर शांत मुस्कान।
डॉक्टर राघव।
वह सचमुच उनके सामने खड़ा था।
सत्रह साल बाद।
जिंदा।
उसने आरव को देखा।
और मुस्कुराकर कहा—
"स्वागत है, विषय सात।"
आरव की आँखें फैल गईं।
राघव ने हाथ में पकड़ा उपकरण चालू किया।
एक तीखी आवाज सुरंग में गूँजी।
आरव का सिर अचानक दर्द से फटने लगा।
और उसकी आँखों के सामने...
एक आखिरी दृश्य चमका—
एक बच्चा खून से सने हाथों के साथ खड़ा था।
उसके सामने सविता जमीन पर पड़ी थी।
और बच्चे के हाथ में...
वही चाकू था।
आरव चीख पड़ा—
"नहीं!"
राघव मुस्कुराया।
"अब तुम्हें सब याद आने वाला है।"
क्रमश: