Pretika › Horror Poetry › फ़तेहगढ़ का किला — जिन्नों की डाक
भाग तीसरा — जवाब की डाक
Piyashi Atma · Horror Poetry · 3 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- फ़तेहगढ़ का किला — जिन्नों की डाक
- Chapter
- 3 of 3
- Category
- Horror Poetry
- Reading time
- 3 min
- Words
- 494
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
उस पहले ही दिन, जब इम्तियाज़ चिट्ठियाँ रखकर लौट रहा था, तो बारादरी की सीढ़ियों के पास एक गिरी हुई चिट्ठी उसकी नज़र में आई — खुली हुई, हल्की-सी धूल में लिपटी, और उसने झुककर उठाते हुए अनजाने में उस पर पड़ी स्याही की लकीरें पढ़ लीं — "हज़रत, मेरा बेटा तीन साल की उम्र से बोल नहीं पा रहा, डॉक्टर हार चुके हैं, हकीम हार चुके हैं, अब आप ही आखिरी सहारा हो — अगर उसकी ज़ुबान खुल जाए तो मैं हर जुमेरात यहाँ आऊँगी, ज़िंदगी भर आऊँगी, और हर बार दो मोमबत्तियाँ जलाऊँगी — एक आपके नाम की, एक आपके दरबार के उन फ़रिश्तों के नाम की जो दुआएँ सुनते हैं — एक माँ।"
इम्तियाज़ की आँखों में आँसू आ गए — उसे अपनी अम्मी याद आ गईं, जो उसके अब्बा के मरने के बाद पूरे मोहल्ले में सिलाई का काम करके उसे पढ़ाया करती थीं, और जिनके हाथों में आज भी उस सुई के निशान थे जो ग़रीबी के वक़्त में रात-रात भर चलती थी। उसने बहुत धीरे से, दोनों हाथों से, चिट्ठी को वापस दीवार की दरार में रखा, सिर झुकाया, और कहा — "हज़रत, अगर सच में सुनते हो, तो इस माँ की सुन लेना — बाकी की चिट्ठियाँ बाद में पढ़ लेना।"
पर उसी रात, जब इम्तियाज़ अपने छोटे से कमरे में सोने की तैयारी कर रहा था, उसके घर का दरवाज़ा बहुत धीरे से खटखटाया — ऐसी खटखटाहट जो कोई मेहमान नहीं करता, बल्कि कोई ऐसा करता है जो अंदर आने की इजाज़त माँगने की बजाय अंदर वाले को बाहर बुला रहा हो। इम्तियाज़ ने दरवाज़े के पास जाकर कान लगाए, तो बाहर से एक धीमी-सी, रेत में लिपटी हुई आवाज़ आ रही थी, जो बार-बार, बिना रुके, एक ही बात दोहरा रही थी — "डाकिया साहब... जवाब... जवाब पहुँचाना है... डाकिया साहब... जवाब पहुँचाना है..." — और उस आवाज़ की ख़ास बात यह थी कि वो किसी इंसान की आवाज़ को नकल कर रही थी, पर नकल में वो गर्माहट नहीं थी जो किसी की भी अपनी आवाज़ में होती है — जैसे कोई पुरानी रिकॉर्डिंग चल रही हो, जिसे सुनने वाला पहली बार सुन रहा हो और बोलने वाला हज़ार बार बोल चुका हो।
इम्तियाज़ ने दरवाज़ा नहीं खोला — गौस मियाँ की बातें कानों में गूँज रही थीं। वो रात उसने दरवाज़े से सटकर, मुसल्ले पर बैठकर काटी, और सुबह जब दरवाज़ा खोला तो दरवाज़े के नीचे की दरार से एक पुरानी, पीली पड़ चुकी चिट्ठी अंदर रखी हुई थी — जिस पर लाल मोम की मुहर लगी थी, और मुहर पर ऐसे निशान थे जो किसी अंगूठी के नहीं, बल्कि किसी पंजे के लगते थे। चिट्ठी पर पता लिखा था — "उस माँ के नाम, जिसका बेटा तीन साल से ख़ामोश है — सदर: जिन्नात-ए-दरबार-ए-फ़तेहगढ़।" इम्तियाज़ की थैली उसके हाथ से गिर गई — क्योंकि उस माँ का पता, उस माँ का नाम, उस माँ का शहर — उसने किसी को नहीं बताया था, और चिट्ठी पर लिखा पता बिल्कुल सही था, गली का नाम तक।