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भाग दूसरा — गौस मियाँ

Piyashi Atma · Horror Poetry · 3 मिनट

किले का चौकीदार गौस मियाँ — उम्र अस्सी साल, और इस किले में बिताए हुए साल — पूरे चालीस। उसकी झुकी हुई कमर, धुंधली आँखें और हाथ में हमेशा पकड़ी हुई लाठी को देखकर लगता था कि शायद किला ही उसे खड़े रहने की ताक़त देता है, और शायद किले को भी गौस मियाँ की ज़रूरत है — क्योंकि चालीस साल में उसने किले की हर दरार, हर सुरंग, हर मोमबत्ती की बू ऐसे पहचान ली थी जैसे कोई बाप अपने बच्चों की आहट पहचानता है।

उसने जब इम्तियाज़ को चिट्ठियाँ बारादरी की दीवार में ठूंसते देखा — बिना दुआ पढ़े, बिना सिर झुकाए, ऐसे जैसे किराने की दुकान की बोर्ड पर बिल चिपका रहा हो — तो उसकी लाठी ज़ोर से ज़मीन पर टिकी और उसकी आवाज़ पूरी बारादरी में गूँज उठी — "नवाब साहब! रुक जाओ! यहाँ चिट्ठियाँ ऐसे नहीं रखी जातीं — ये कोई नोटिस बोर्ड नहीं है जहाँ कहीं भी चिपका दो! यहाँ हर चिट्ठी एक दुआ है, और दुआ सिर झुकाकर रखी जाती है — क्योंकि जिसके दरबार में रख रहे हो, वो देख रहा है!"

इम्तियाज़ ने पलटकर देखा — बूढ़ा चौकीदार मोमबत्ती की रोशनी में खड़ा था, और उसकी आँखों में वो थकान थी जो सिर्फ़ उन लोगों की आँखों में होती है जो बहुत कुछ देख चुके होते हैं और देखने की आदत नहीं छोड़ पाते। गौस मियाँ ने इम्तियाज़ को अपने पास बुलाया, मोमबत्ती के पास बिठाया, और तीनों नियम एक-एक करके समझाए — धीरे-धीरे, हर नियम के साथ एक वाक़िया, हर वाक़िये के साथ एक नाम, और हर नाम के साथ एक ऐसी शाम जिसके बाद वो नाम किले के रजिस्टर से मिटा दिया गया था।

इम्तियाज़ ने मज़ाक में कहा — "बाबा, मैं डाकिया हूँ — मेरा काम सिर्फ़ चिट्ठियाँ पहुँचाना है, और डाकिए पर कोई नियम लागू नहीं होता, ये तो मैंने नियम-किताब में पढ़ा है।" गौस मियाँ ने बहुत देर तक उसकी आँखों में देखा, फिर मोमबत्ती की लौ को अपनी हथेली से ढकते हुए बोला — "डाकिया साहब, यहाँ एक बात समझ लो, और इस बात को अपनी हड्डियों में उतार लो — तुम चिट्ठियाँ तो पहुँचा रहे हो, पर कभी इस किले में खड़े होकर सोचा है कि इन चिट्ठियों के जवाब... कौन पहुँचाता है? कौन सा डाकिया है जो दीवार से चिट्ठी उठाता है और दुआ माँगने वाले के घर तक जवाब पहुँचाता है?" इम्तियाज़ के पास कोई जवाब नहीं था — और उसकी ख़ामोशी को सुनकर गौस मियाँ ने सिर हिलाया और कहा — "जिस दिन इस सवाल का जवाब मिल जाए ना, उस दिन तुम समझ जाओगे कि तुम्हारी नौकरी डाकिया बनने से कहाँ शुरू हुई थी और कहाँ ख़त्म होने वाली है।"

Writer
Piyashi Atma
Story
फ़तेहगढ़ का किला — जिन्नों की डाक
Chapter
2 of 3
Category
Horror Poetry
Reading time
3 min
Words
441
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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