Pretika › Horror Poetry › फ़तेहगढ़ का किला — जिन्नों की डाक
भाग पहला — अजीब डाक
Piyashi Atma · Horror Poetry · 4 मिनट
दिल्ली के पुराने शहर में, जहाँ गलियाँ इतनी तंग हैं कि दोपहर की धूप भी झुककर गुज़रती है, वहाँ से थोड़ा हटकर, बहले ही आज के नक्शे में सड़कें और गाड़ियाँ हों, खड़ा है फ़तेहगढ़ का किला — छह सौ साल पुराना खंडहर, जिसकी दीवारों ने तुग़लक़ों के वक़्त की बादशाहत देखी है, अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े की शामें देखी हैं, और आज़ादी के बाद की वो सारी सुबहें देखी हैं जिनमें शहर बदलता गया और यह किला वैसे का वैसा खड़ा रहा — चुपचाप, धूल में लिपटा, और भरा हुआ उन राज़ों से जो किताबों में कभी नहीं लिखे गए।
किले के ऊपरी हिस्से में अशोक का लाट स्तंभ खड़ा है — दो हज़ार साल से भी पुराना पत्थर, जिसे पहाड़ों से घसीटकर यहाँ लाया गया था और जिसके नीचे बैठकर आज भी बूढ़े लोग कहते हैं कि इस स्तंभ की जड़ों में पुराने वक़्त की ताक़त बंद है। और स्तंभ के नीचे, ज़मीन के अंदर उतरती हुई सीढ़ियों के आख़िर में है वो जगह जिसकी वजह से यह किला पूरे हिंदुस्तान में मशहूर है — अँधेरी बारादरी, जहाँ दिन में भी मोमबत्ती जलानी पड़ती है, जहाँ की दीवारों में हज़ारों की तादाद में चिट्ठियाँ ठूंसी हुई हैं, और जहाँ हर जुमेरात की शाम को दूर-दूर से लोग आते हैं — कोई साइकिल से, कोई बस से, कोई बीमारी की आखिरी उम्मीद लेकर, कोई टूटे दिल का मरहम लेकर।
यहाँ की परंपरा बहुत साफ़ है — अपनी दुआ, अपनी परेशानी, अपनी ख़्वाहिश कागज़ पर लिखो, उसे मोड़ो, दीवार की दरार में रखो, मोमबत्ती जलाओ, और चुपचाप चले जाओ। चिट्ठी के ऊपर पता लिखा होता है — "हज़रत जिन्नात साहब — दरबार-ए-फ़तेहगढ़ — किले के नीचे, अँधेरी बारादरी" — और यक़ीन मानिए, यह परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है और आज भी उतनी ही जीवित है जितनी कभी थी। लोग कहते हैं कि यहाँ रखी चिट्ठियाँ पढ़ी जाती हैं — और यह भी कहते हैं कि कुछ चिट्ठियों का जवाब भी आता है, बस जवाब पहचानने वाला चाहिए।
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इम्तियाज़ सिद्दीकी — उम्र चब्बीस साल, पुरानी दिल्ली का एक साधारण सा डाकिया, जिसकी साइकिल की घंटी की आवाज़ को उस मोहल्ले की हर अम्मी पहचानती थी, क्योंकि जब-जब घंटी बजती थी तब-तब किसी के घर बेटे की चिट्ठी आती थी या किसी के घर नौकरी की सूचना। इम्तियाज़ को उसकी नौकरी से मोहब्बत थी — वो मानता था कि चिट्ठी सिर्फ़ कागज़ नहीं होती, चिट्ठी उन लोगों की साँस होती है जो एक-दूसरे से दूर होते हैं, और डाकिया उन साँसों का हामिल होता है।
एक सोमवार की सुबह, जब इम्तियाज़ डाक दफ़्तर पहुँचा, तो छँटाई की मेज़ पर एक अजीब बंडल पड़ा था — सत्रह चिट्ठियाँ, सब एक ही पते पर, और पता देखकर छँटाई करने वाले बाबू ने इतनी ज़ोर से हँसी ठहाकी कि चाय का कप हिल गया — "इम्तियाज़ मियाँ, आज से ये डाक तुम्हारी है — हज़रत जिन्नात साहब, फ़तेहगढ़ किला! पिछला डाकिया इसी डाक की वजह से नौकरी छोड़कर भाग गया था — कहता था कि ये चिट्ठियाँ रोज़ सुबह वज़न में भारी होती जाती हैं, जैसे रात में कोई इनमें कुछ और भर देता हो!"
इम्तियाज़ ने भी हँसकर कहा — "बाबू जी, जिन्नों को चिट्ठियाँ? ये पागलपन है — लोगों को अपनी उम्मीदों के लिए कोई पता चाहिए होता है, बस, और किले का पता बाज़ार में सबसे सस्ता मिलता है।" यह कहकर उसने बंडल उठाया — और उसी पल उसकी हँसी गले में अटक गई, क्योंकि बंडल गरम था। कागज़ का बंडल, धूप में रखा हुआ कागज़ नहीं, बल्कि ऐसी गर्माहट जैसे सत्रह चिट्ठियों के अंदर सत्रह दिल बंद हों — जिन्होंने अभी-अभी, बस कुछ पल पहले ही, धड़कना बंद किया हो। इम्तियाज़ ने बंडल को पलटकर देखा, थैली में रखा, और साइकिल की तरफ़ बढ़ते हुए अपने आप से बोला — "पुरानी दिल्ली में तीन चीज़ें कभी सवाल नहीं पूछतीं — गरम कागज़, ठंडी शामें, और बूढ़ों की नसीहतें।" उसे तब नहीं पता था कि यह उसकी ज़िंदगी की आखिरी आम सुबह थी।
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- फ़तेहगढ़ का किला — जिन्नों की डाक
- Chapter
- 1 of 3
- Category
- Horror Poetry
- Reading time
- 4 min
- Words
- 653
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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