Pretika › Psychological Horror › भूत, प्रेत और रहस्य, काले कुंए का श्राप
भाग 1: वापसी
Yogesh Kumar Maurya · Psychological Horror · 8 मिनट
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- भूत, प्रेत और रहस्य, काले कुंए का श्राप
- Chapter
- 1 of 2
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 8 min
- Words
- 1475
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
योगेश की डायरी से — भानपुरा, ग़ाज़ियाबाद बॉर्डर
यह कहानी डराने के लिए नहीं है। यह कहानी तुम्हें सोचने पर मजबूर करेगी कि क्या भूत सच में होते हैं, या हम अपने अपराधबोध को ही भूत बना देते हैं। हर भाग में एक नाम है। हर नाम में एक कहानी है जो कुएँ ने निगल ली थी।
तुम बीस साल बाद लौट रहे हो। ग़ाज़ियाबाद बॉर्डर पार करते ही जो सड़क ईंट-भट्टों के धुएँ से काली पड़ जाती है, वही सड़क तुम्हें भानपुरा ले जाती है। तुम्हारी उम्र पैंतालीस साल है, पर इस सड़क पर आते ही तुम फिर बारह साल के हो जाते हो। बस का हॉर्न, धूल, और एक अजीब सी बदबू — सड़ी हुई मिट्टी और सरसों के तेल की। तुम्हारे कंधे पर एक छोटा बैग है, जिसमें तुम्हारे चाचा की चिट्ठी है। चिट्ठी नहीं, मुखिया ने लिखवाई थी — 'रामलाल गुजर गए, अजीब मौत। घर आ जाओ।'
रामलाल तुम्हारे सगे चाचा नहीं थे, पर तुम्हारी माँ के मरने के बाद उन्होंने ही तुम्हें पाला था। फिर तुम भाग गए थे। दिल्ली, नौकरी, शादी, तलाक, और फिर एक खाली फ्लैट में अकेलेपन की आवाज़। तुमने बीस साल तक इस गाँव का नाम भी नहीं लिया। तुम्हें लगता था कि तुम भूल गए हो। पर शरीर भूलता नहीं है। जैसे ही भानपुरा का पहला पीपल दिखा, तुम्हारे पेट में वही पुराना गोला बन गया। डर नहीं, अपराधबोध का गोला।
गाँव वैसा ही है — आधा बदला, आधा वैसा ही सड़ा हुआ। पक्की सड़कें आ गई हैं, पर नालियाँ अब भी खुली हैं। तुम्हारा पुश्तैनी घर गाँव के आखिरी छोर पर है, जहाँ खेत शुरू होते हैं। लकड़ी का भारी दरवाज़ा, उस पर जंग लगा ताला। ताले पर धूल की मोटी परत। मुखिया ने चाबी दी थी, पर चाबी डालते ही तुम्हें लगा जैसे तुम किसी कब्र को खोल रहे हो।
अंदर घुसते ही वही गंध — बंद घर की गंध। सीलन, चूहे की लीद, और सरसों के तेल की पुरानी शीशियाँ। आँगन में तुलसी का पौधा सूख चुका है, उसकी सूखी लकड़ियाँ जैसे उंगलियाँ बनकर तुम्हारी तरफ इशारा कर रही हैं। तुम्हारे बचपन का झूला अब भी है, पर उसकी रस्सियाँ सड़ चुकी हैं। तुम सोचते हो — क्या घर भी इंतज़ार करता है? या हम ही उस पर अपनी यादें थोप देते हैं?
तुमने दो कमरे खोले। एक में रामलाल की चारपाई, जिस पर अब भी उनका कंबल पड़ा है। डॉक्टर ने कहा था — हार्ट अटैक। पर मुखिया ने फोन पर धीरे से कहा था — 'आँखें खुली थीं, और मुँह में काली मिट्टी भरी थी, जैसे कुएँ की मिट्टी।' तुमने उस बात को हँसी में उड़ा दिया था। अब इस कमरे में खड़े होकर हँसी नहीं आ रही।
शाम ढल रही है। गाँव की औरतें तुम्हें देखने आईं। एक बूढ़ी — शायद तुम्हारी दादी की सहेली — ने तुम्हारा हाथ पकड़ा और फुसफुसाई, 'पीछे मत जाना, योगेश। पिछले आँगन वाला कुआँ मत खोलना।' तुमने पूछा क्यों। उसने कहा, 'उस पर सात ताले हैं। तेरे परदादा ने लगाए थे। वो पानी का कुआँ नहीं है।' तुमने पूछा फिर क्या है। वो चुप हो गई और चली गई।
तुम्हें उत्सुकता नहीं, गुस्सा आया। गाँव के लोग हमेशा कहानियाँ बनाते हैं। तुम शहर के आदमी हो, तुम भूत-प्रेत में नहीं मानते। तुम तो अपनी माँ की मौत में भी नहीं मानते, जिसे तुमने देखा तक नहीं क्योंकि तुम हॉस्टल में थे। तुमने सोचा था कि माँ बीमार थी, पर बाद में पता चला कि वो कुएँ में गिर गई थी। या कूद गई थी? कोई साफ़-साफ़ नहीं बताता।
रात के आठ बजे बिजली चली गई। भानपुरा में अब भी बिजली आती-जाती है। तुमने मोमबत्ती जलाई। उसी मोमबत्ती की लौ में तुम्हें पिछला आँगन दिखा। घर दो आँगन का है — आगे वाला जहाँ तुम हो, और पीछे वाला, जो एक छोटी दीवार से अलग है। उस दीवार में एक छोटा दरवाज़ा है, जिस पर नया ताला नहीं, बहुत पुराना, बड़ा ताला है। और उसके पीछे से... तुम्हें लगा जैसे कोई हवा नहीं, पर पत्ते हिल रहे हैं।
तुमने खुद को रोका। तुम थके हो। तुमने खाना नहीं खाया। तुमने रामलाल की अलमारी से एक बोतल निकाली — देसी शराब, आधी भरी। तुमने दो घूंट लिए और चारपाई पर लेट गए। नींद नहीं आई। तुम्हें लगा जैसे घर साँस ले रहा है। लकड़ी चटख रही है। कहीं दूर कोई कुत्ता रो रहा है। और फिर, ठीक बारह बजकर सात मिनट पर, तुम्हें अपना नाम सुनाई दिया।
पहले लगा कि हवा है। फिर लगा कि भ्रम है। पर तीसरी बार जब आवाज़ आई, तो तुम्हारी रीढ़ की हड्डी में बर्फ जम गई। 'यो...गेश... बेटा...' वो आवाज़ तुम्हारी माँ की थी। वही आवाज़ जो तुम्हें बचपन में 'मुन्ना' कहकर उठाती थी, जब तुम बुखार में तप रहे होते थे। तुम्हारी माँ मरी हुई है। तेईस साल पहले। तुमने उसकी चिता भी नहीं देखी।
तुम उठकर बैठ गए। मोमबत्ती की लौ तेज़ हवा के बिना भी फड़फड़ा रही थी, जैसे कोई उसके पास से गुज़र रहा हो। आवाज़ पीछे वाले आँगन से आ रही थी। कुएँ की तरफ से। तुम्हारा दिमाग कह रहा था — ये अपराधबोध है, योगेश। तुमने माँ को अकेला छोड़ा, तुम गाँव से भागे, तुम चाचा की मौत पर भी नहीं रोए। तुम्हारा मन तुम्हें सजा दे रहा है। पर तुम्हारा शरीर कह रहा था — जाकर देख।
तुमने लालटेन उठाई। पिछली दीवार के दरवाज़े के पास गए। वहाँ ताला नहीं था अब। शायद पहले से खुला था, या तुम्हारी याददाश्त धोखा दे रही थी। दरवाज़ा चरमराया। पीछे वाला आँगन... हे भगवान। तुमने ऐसा कुछ नहीं देखा था।
आँगन छोटा नहीं, बहुत बड़ा था, पर उसमें एक भी पौधा नहीं। जमीन काली थी, जैसे जली हुई। बीच में एक कुआँ। गोल नहीं, थोड़ा टेढ़ा। उसके ऊपर लोहे की मोटी-मोटी चादरें, जंग लगी हुईं, और उन पर सात ताले। सातों ताले अलग-अलग आकार के। एक ताला तो इतना बड़ा था कि वो किसी जेल का लगता था। चादरों के बीच से काली मिट्टी बाहर आ रही थी, जैसे कुआँ अंदर से कुछ उगल रहा हो।
और आवाज़ अब साफ़ थी। कुएँ के अंदर से। 'योगेश... अंदर आ...' माँ की आवाज़ में अब रोना था। तुम लालटेन को कसकर पकड़े हुए थे। तुम्हें याद आया — बचपन में माँ कहती थी, 'कुएँ के पास मत जाना, उसमें चुड़ैल रहती है।' तुम हँसते थे। आज तुम्हें हँसी नहीं आ रही। क्योंकि तुम्हें एक और आवाज़ सुनाई दी। एक बच्चे की। फिर एक बूढ़े की। जैसे कुएँ में कई लोग एक साथ तुम्हारा नाम ले रहे हों।
तुम एक कदम पीछे हटे। तुम्हारा पैर किसी चीज़ से टकराया। नीचे देखा — एक छोटी सी गुड़िया, मिट्टी की, जिसकी आँखें फूटी हुई थीं। तुम्हारी गुड़िया नहीं, तुम्हारी बहन की? तुम्हारी बहन तो थी ही नहीं। फिर ये किसकी है? तुम्हें चक्कर आने लगा। तुम्हें लगा जैसे जमीन थोड़ी धंस रही है।
तभी लालटेन की लौ बुझ गई। अंधेरा। पूरा अंधेरा। और उस अंधेरे में कुआँ बोल रहा था। अब माँ की आवाज़ नहीं, तुम्हारी अपनी आवाज़ — बारह साल के योगेश की आवाज़। 'मुझे मत छोड़ो... मुझे मत छोड़ो...' तुम चिल्लाए। तुम्हारी आवाज़ कुएँ ने निगल ली। कोई इको नहीं। जैसे तुम किसी बंद संदूक में चिल्ला रहे हो।
तुम भागकर आगे वाले आँगन में आए। दरवाज़ा बंद किया। तुम्हारा दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि तुम्हें लगा वो फट जाएगा। तुमने पानी पिया। तुमने खुद को समझाया — नींद की कमी, थकान, पुरानी यादें। भूत नहीं होते, योगेश। होते तो तुम्हारी माँ तुम्हें लेने कब की आ गई होती। पर फिर भी, तुम्हारे कान में वो फुसफुसाहट अब भी थी, जैसे कोई तुम्हारे बिल्कुल पीछे खड़ा होकर तुम्हारे नाम की स्पेलिंग धीरे-धीरे बोल रहा हो।
तुमने रात भर जागकर बिताई। सुबह हुई तो तुमने सोचा तुम पागल हो रहे हो। तुम कुएँ को दिन में देखोगे। दिन में सब ठीक लगता है। तुम पीछे गए। धूप थी। कुआँ वैसा ही था। पर अब चादरों के बीच से एक कागज़ का कोना बाहर निकला हुआ दिखा। कल रात नहीं था।
तुमने कांपते हाथों से वो कागज़ खींचा। वो कागज़ नहीं, एक छोटी डायरी थी। प्लास्टिक कवर वाली, जिस पर मिकी माउस बना था। तुम्हारी डायरी। पाँचवीं क्लास की डायरी। जिस पर तुमने लिखा था — 'मेरी प्यारी डायरी, आज माँ ने...'
तुम सन्न रह गए। ये डायरी तुमने कब की खो दी थी। तुमने इसे कभी कुएँ के पास नहीं लाया। तुम तो कुएँ से डरते थे। तो ये डायरी पिछले तीस साल से कुएँ की दीवार के अंदर क्या कर रही थी? और सबसे डरावनी बात — डायरी के आखिरी पन्ने पर, जो तुमने कभी नहीं लिखा था, तुम्हारी ही हैंडराइटिंग में लिखा था — 'पहला ताला कल खुलेगा। मत खोलना।'
तुमने डायरी बंद की और पीछे देखा। सात ताले वैसे ही थे। पर तुम्हें लगा, जैसे सबसे ऊपर वाला ताला, जो कल सबसे ज्यादा जंग लगा था, आज थोड़ा साफ़ है। जैसे किसी ने उसे अंदर से रगड़ा हो। और कुएँ के अंदर से, अब दिन में भी, तुम्हें अपना नाम सुनाई दे रहा था। पर इस बार माँ की आवाज़ में नहीं। तुम्हारी अपनी आवाज़ में, जो कह रही थी — 'अब तुम्हारी बारी है, योगेश।'
क्रमश: