PretikaPsychological Horrorभूत, प्रेत और रहस्य, काले कुंए का श्राप

भाग 2: पहला ताला

Yogesh Kumar Maurya · Psychological Horror · 5 मिनट

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
भूत, प्रेत और रहस्य, काले कुंए का श्राप
Chapter
2 of 2
Category
Psychological Horror
Reading time
5 min
Words
941
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

रात के दो बज रहे थे।

योगेश उस डायरी को हाथ में लिए आंगन में बैठा था। डायरी के कवर पर उसी की बचपन की हैंडराइटिंग में लिखा था — योगेश की गुप्त किताब, किसी को मत दिखाना।

समस्या ये थी कि योगेश ने ऐसी कोई डायरी कभी लिखी ही नहीं थी।

उसे याद था, वो इस घर से 17 साल की उम्र में भागा था। माँ की मौत के बाद। पिता ने दूसरी शादी कर ली थी और योगेश को ये घर, ये कुआँ, ये गाँव — सब कुछ एक बोझ लगता था। वो गाज़ियाबाद चला गया, फिर वहीं का होकर रह गया। पिछले 28 सालों में उसने एक बार भी इस घर में कदम नहीं रखा था।

फिर चाचा की चिट्ठी कैसे आई? चाचा तो 5 साल पहले ही मर चुके थे।

गाँव के डाकिये ने जो पीला लिफाफा दिया था, उस पर तारीख 12 दिन पुरानी थी और लिखावट चाचा की ही थी — बेटा, जल्दी आ जा। कुआँ फिर से नाम ले रहा है। इस बार तेरा नाम।

योगेश ने डायरी खोली।

पहला पन्ना। तारीख - 14 जून, 1998।
आज माँ ने फिर कहा कुएं के पास मत जाना। पर मुझे उसकी आवाज सुनाई देती है। वो मेरा नाम पुकारता है। आज मैंने उसमें झाँका। अंदर पानी नहीं है। अंदर सीढ़ियाँ हैं जो नीचे जाती हैं। और नीचे कोई बैठा है।
योगेश का गला सूख गया। 1998 में उसकी उम्र 17 साल थी। ये लिखावट उसकी ही है, पर ये याद उसकी नहीं है।

दूसरा पन्ना।
आज रामू काका ने बताया कि इस कुएं में 7 आत्माएं बंद हैं। हर आत्मा को एक ताले से बंद किया गया है। अंग्रेजों के जमाने में एक तांत्रिक ने इसे बंद किया था। जो भी 7 ताले खोल देगा, वो 7 आत्माओं को आजाद कर देगा, पर 8वीं आत्मा उसकी खुद की बन जाएगी।
तीसरा पन्ना खाली था, पर उस पर पानी के धब्बे थे। जैसे किसी ने रोते हुए लिखा हो और फिर मिटा दिया हो।

तभी पीछे से आवाज आई — "साहब, अंदर आ जाओ, बाहर मत बैठो।"

गाँव का चौकीदार हरिया था। हाथ में लालटेन।

"ये डायरी तुम्हें कहाँ मिली?" हरिया की आँखें डायरी पर टिकी थीं।

"कुएं की दीवार में।" योगेश ने कहा।

हरिया का चेहरा सफेद पड़ गया। "तुमने कुएं को छुआ?"

"नहीं, दीवार में फंसी थी।"

"वो दीवार नहीं है। वो कुएं का मुंह है।" हरिया फुसफुसाया। "तुम्हारे चाचा ने मरने से पहले एक ताला तोड़ दिया था। पहला ताला। उसी रात से कुआँ फिर से जाग गया है।"

योगेश उठा। "कौन सा पहला ताला?"

हरिया उसे कुएं के पास ले गया। लोहे की चादर पर 7 ताले लगे थे। जंग लगे हुए, बड़े-बड़े, हर एक पर एक अलग निशान बना था। पहला ताला — सबसे नीचे वाला — टूटा हुआ था। उसकी कड़ी खुली हुई थी। और उस टूटे ताले के ठीक नीचे, लोहे की चादर में एक छोटा सा छेद हो गया था। छेद से ठंडी हवा आ रही थी। और उस हवा में एक आवाज।

"यो...गे...श..."

इस बार ये माँ की आवाज नहीं थी। ये एक बच्चे की आवाज थी।

योगेश झुक कर उस छेद से अंदर देखने लगा। अंदर घना अंधेरा था। पर अंधेरे में कुछ चमक रहा था। जैसे किसी ने दीवार पर चाक से लिखा हो।

उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई और अंदर डाली।

दीवार पर लिखा था — मदद करो। मैं राजू हूँ। मैं 1972 से यहाँ हूँ।

राजू।

योगेश को याद आया। बचपन में माँ एक कहानी सुनाती थी — गाँव के राजू की, जो कुएं में खेलते-खेलते गिर गया था और उसकी लाश कभी नहीं मिली थी। सब कहते थे कुएं ने उसे खा लिया।

हरिया ने योगेश का हाथ खींचा। "मत देखो! जो एक बार देख लेता है, कुआँ उसका नाम भी लिख लेता है।"

योगेश ने टॉर्च हटाई, पर अब देर हो चुकी थी। छेद से निकल रही हवा अब तेज हो गई थी। और उस हवा के साथ, टूटे हुए ताले के पास, जमीन पर धीरे-धीरे कुछ उभर रहा था। जैसे कोई अदृश्य उंगली धूल में लिख रही हो।

दूसरा ताला खोलो।

योगेश ने हरिया की तरफ देखा। हरिया रो रहा था।

"तुम्हारे चाचा ने भी यही देखा था। उन्होंने सोचा था कि अगर एक आत्मा को आजाद कर देंगे तो पुण्य मिलेगा। पर कुआँ आजाद नहीं करता, बदलता है। एक आत्मा गई, तो दूसरी को खींच लेता है। तुम्हारे चाचा की आत्मा अब पहले ताले की जगह पर है।"

योगेश के पैरों तले जमीन खिसक गई।

"तो चाचा की मौत...?"

"मौत नहीं। कैद।" हरिया ने कहा। "और अब कुआँ तुम्हें चुन रहा है, क्योंकि तुम्हारे खून में इस घर का खून है। ये कुआँ इसी घर के लोगों से ही खुलता है।"

रात भर योगेश सो नहीं पाया। डायरी के बाकी पन्ने खाली थे, सिवाय आखिरी पन्ने के।

आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी, और वो स्याही से नहीं, खून से लिखी लग रही थी —
अगर तुम ये पढ़ रहे हो, तो मतलब मैं अब कुएं में हूँ। मत आना।
और नीचे उसी हैंडराइटिंग में, जो उसकी अपनी थी, पर थोड़ी कांपती हुई —
पर मैं जानता हूँ तुम आओगे।
सुबह हुई तो योगेश ने फैसला कर लिया था। वो दूसरा ताला नहीं खोलेगा। वो इस घर को हमेशा के लिए बंद करके वापस गाज़ियाबाद चला जाएगा।

उसने अपना बैग पैक किया। डायरी को वहीं कुएं के पास छोड़ दिया।

जैसे ही वो मुख्य दरवाजे से बाहर निकलने लगा, दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

और पीछे से, कुएं वाले आंगन से, लोहे की चादर के हिलने की आवाज आई। खड़-खड़-खड़।

जैसे कोई अंदर से उसे पीट रहा हो।

और फिर एक साथ 6 तालों के हिलने की आवाज। और उन सबके बीच, टूटे हुए पहले ताले की खाली कड़ी में, एक नया ताला अपने आप बनने लगा — जंग से नहीं, हड्डी से।

योगेश समझ गया।

कहानी खत्म नहीं हुई है। पहला ताला टूटने से एक आत्मा आजाद नहीं हुई, बल्कि एक नई जगह खाली हुई है।

और कुआँ उस खाली जगह को भरना चाहता है।

क्रमश:

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