PretikaGhost Storiesफ़रमाइश

सिरके की गंध

Pretika · Ghost Stories · 6 मिनट

Writer
Pretika
Story
फ़रमाइश
Chapter
1 of 7
Category
Ghost Stories
Reading time
6 min
Words
1001
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

सुनो... रात हो गई है। सब सो गए हैं। और तुम अकेले हो।

एक काम करो। अपने कमरे में चारों तरफ़ नज़र दौड़ाओ और ऐसी कोई एक चीज़ ढूँढो जो बोल सकती हो। मोबाइल, टीवी, स्पीकर, कोई पुराना रेडियो जो सालों से एक कोने में पड़ा धूल खा रहा हो। मिल गई? अच्छा है। अब उससे नज़र हटा लो और मेरी बात सुनो।

आज की कहानी उन आवाज़ों की है जो किसी के बंद कर देने से बंद नहीं होतीं।

इस कहानी का नाम है — फ़रमाइश।

आकाशवाणी भवन के तहख़ाने में उस रात सिरके की गंध भरी हुई थी।

समर सक्सेना अब इस बू को पहचानने लगा था। पुरानी टेप जब मरने लगती है तो उसमें से यही महक उठती है — खट्टी, तीखी, नाक के भीतर तक चुभने वाली। किताबों में इसे विनेगर सिंड्रोम कहते हैं। समर इसे कुछ और कहता था। वह इसे टेप की आख़िरी साँस कहता था।

उसकी उम्र उनतीस साल थी और उसका काम अजीब था। ठेके पर रखा गया एक आदमी, जिसे हर रात नौ बजे से सुबह पाँच बजे तक ज़मीन के अठारह फ़ुट नीचे बैठकर मरती हुई आवाज़ें बचानी थीं। दिल्ली के संसद मार्ग पर खड़ी उस भारी-भरकम इमारत के पेट में दो लाख चालीस हज़ार स्पूल रखे थे। नेहरू के भाषण, बेगम अख़्तर की ग़ज़लें, पैंसठ की लड़ाई के समाचार बुलेटिन, गाँव-देहात के लोकगीत, और हज़ारों ऐसे कार्यक्रम जिनका नाम भी अब किसी को याद नहीं। सरकार ने पाँच साल का ठेका दिया था कि यह सब डिजिटल कर दिया जाए, इससे पहले कि टेप गल जाए और आवाज़ें हमेशा के लिए चुप हो जाएँ।

रात की पाली इसलिए, क्योंकि दिन में इमारत की बिजली दूसरे कामों में लगती थी। और शायद इसलिए भी, क्योंकि उस तहख़ाने में दिन में भी रात ही रहती थी।

ग्यारह अगस्त की उस रात समर रैक नंबर ग्यारह पर काम कर रहा था। यह हिस्सा उन्नीस सौ अस्सी से चौरासी के बीच का था। ज़्यादातर डिब्बे कार्डबोर्ड के थे, सफ़ेद लेबल वाले, सलीक़े से नंबरवार सजे हुए। मगर सबसे नीचे के ख़ाने में, दीवार से सटा हुआ, एक डिब्बा ऐसा था जो वहाँ का नहीं लगता था।

वह टीन का था। जंग खाया हुआ। ऊपर से जूट की डोरी से बाँधा गया, और डोरी की गिरह पर लाख की लाल मुहर लगी थी। समर ने आठ महीने में हज़ारों डिब्बे खोले थे, मगर मुहर वाला डिब्बा पहली बार देखा।

लेबल टाइपराइटर से छपा था, और अक्षर जगह-जगह हल्के पड़ चुके थे।

छाया गीत।

प्रसारण तिथि : चौदह अगस्त उन्नीस सौ तिरासी।

स्थिति : अप्रसारित।

आदेश : नष्ट किया जाए।

समर ने उँगली से धूल हटाकर आख़िरी लाइन दोबारा पढ़ी। नष्ट किया जाए। तैंतालीस साल पुराना आदेश, जिस पर किसी ने अमल नहीं किया। डिब्बा वहीं पड़ा रहा, दीवार से चिपका हुआ, जैसे किसी ने उसे फेंकने का हुक्म देकर फिर हिम्मत खो दी हो।

आर्काइव का नियम साफ़ था — नष्टीकरण के आदेश वाली सामग्री दर्ज नहीं की जाती। मगर समर ने घड़ी देखी। रात के दो बजकर दस मिनट। ऊपर की पूरी इमारत में एक चौकीदार था और वह भी सो चुका होगा।

उसने डोरी काटी। लाख की मुहर चटककर फ़र्श पर गिरी और किसी दाँत की तरह लुढ़कती हुई मेज़ के नीचे चली गई।

अंदर पड़ी रील को देखकर उसका माथा ठनका। टेप का रंग सामान्य नहीं था। भूरा होने की जगह वह लगभग काला था, और उस पर बारीक चमकीले ज़र्रे बिखरे हुए थे — जैसे किसी ने कोई सुनहरी बुरादा उस पर छिड़क दिया हो। समर ने उँगली रगड़ी। ज़र्रे उँगली से चिपक गए और रोशनी में झिलमिलाने लगे।

उसने रील मशीन पर चढ़ाई, टेप को हेड से गुज़ारा, हेडफ़ोन कान पर लगाए और प्ले दबा दिया।

पहले चालीस सेकंड तक कुछ नहीं था। बस एक ख़ालीपन, जिसमें से कभी-कभी कोई पुराना खरोंच-सा गुज़र जाता।

फिर एक भिनभिनाहट उठी। और उस भिनभिनाहट के भीतर से एक आदमी की आवाज़ निकली।

"नमस्कार। मैं मनोहर काले।"

समर सीधा हो गया।

वह आवाज़ भारी नहीं थी, ऊँची भी नहीं थी। वह ऐसी थी जैसे कोई गीली रेत पर बहुत धीरे-धीरे चल रहा हो। हर लफ़्ज़ के बाद एक हल्का-सा ठहराव, जिसमें साँस सुनाई देती थी।

"आज का छाया गीत आपके नाम। और आज की पहली फ़रमाइश आई है — झुमरी तिलैया से।"

समर के होंठ हल्के-से मुस्कुरा दिए। झुमरी तिलैया। वह नाम जो पूरे देश के लिए एक मज़ाक़ था। जिस शहर का नाम लोग तब लेते हैं जब उन्हें किसी दूर-दराज़, बेतुकी जगह का नाम लेना हो। बचपन में समर के पिता भी उसे चिढ़ाते थे कि पढ़ाई नहीं की तो झुमरी तिलैया भेज दूँगा।

फिर आवाज़ ने नाम पढ़ना शुरू किया।

"सुखदेव तुरी। रामखेलावन महतो। इसराइल अंसारी। जगेसर भुइयाँ। बुधन तुरी। छेदी लाल।"

नाम एक के बाद एक आते रहे। हर नाम के बाद वही ठहराव, वही साँस। समर ने पहले तीस तक गिना, फिर कॉपी उठाकर लिखने लगा। मनोहर काले की आवाज़ में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। वह ऐसे पढ़ रहा था जैसे कोई मास्टर हाज़िरी ले रहा हो और उसे मालूम हो कि आज कोई जवाब नहीं देगा।

छियालीसवें नाम पर वह रुका।

फिर उसने कहा, "और आख़िरी फ़रमाइश उन सबके नाम, जो लौटेंगे नहीं। यह फ़रमाइश भेजी है, चौक बाज़ार से, बिर—"

टेप वहीं कट गई।

समर ने काउंटर देखा। रील पर अभी बाईस मिनट का टेप बाक़ी था।

उसने आवाज़ तेज़ की। बाक़ी टेप ख़ाली नहीं थी। उसमें कुछ था। पानी टपकने की आवाज़ — बहुत गहराई से आती हुई, हर बूँद के बीच लंबा अंतराल। और उस टपकन के पीछे, बहुत धीमे, कई लोगों के साँस लेने की आवाज़। दस-बीस नहीं। बहुत सारे लोग, बहुत छोटी-सी जगह में, बहुत आहिस्ता साँस ले रहे थे। जैसे कोई भीड़ अँधेरे में खड़ी हो और सबने तय कर रखा हो कि आवाज़ नहीं करनी।

समर ने हेडफ़ोन खींचकर उतार दिया।

और तभी उसकी नज़र मशीन पर पड़ी।

रील घूम रही थी। दोनों स्पूल आराम से चल रहे थे। मगर टेप हेड से होकर नहीं गुज़र रही थी। वह किनारे से लटकी हुई थी, ढीली, मशीन के धातु के फ्रेम पर बेकार पड़ी हुई। पिछले चार मिनट से मशीन कुछ भी नहीं बजा रही थी।

समर पीछे हटा और उसकी कोहनी मेज़ पर रखे मग से टकराई। चाय फैल गई।

तहख़ाने के दूसरे कोने में, बंद पड़े रिकॉर्डिंग स्टूडियो की छत में लगे मरे हुए स्पीकर से, आवाज़ आती रही।

"बिर—"

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