PretikaGhost Storiesफ़रमाइश

छियालीस नाम

Pretika · Ghost Stories · 4 मिनट

Writer
Pretika
Story
फ़रमाइश
Chapter
2 of 7
Category
Ghost Stories
Reading time
4 min
Words
692
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अगली सुबह वह सोया नहीं। वह ऊपर, पहली मंज़िल के संदर्भ विभाग में चला गया, जहाँ पुराने अख़बारों की माइक्रोफ़िल्म रखी रहती है।

पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ तिरासी। पहला पन्ना पूरा स्वतंत्रता दिवस से भरा था। पाँचवें पन्ने पर, कोने में, दो कॉलम की एक छोटी-सी ख़बर थी।

बिहार के कोडरमा ज़िले की गिद्धीघाट अभ्रक खदान में शनिवार रात धँसान। छियालीस मज़दूर भीतर फँसे। मलबा हटाने का काम जारी। शव निकालने में कई दिन लगने की आशंका। मृतकों में अधिकांश स्थानीय तुरी और भुइयाँ परिवारों से।

समर ने अपनी कॉपी खोली और नाम मिलाने लगा।

सुखदेव तुरी। रामखेलावन महतो। इसराइल अंसारी।

सब मिल रहे थे। एक भी इधर-उधर नहीं।

फिर उसने ख़बर में समय ढूँढा। धँसान रात नौ बजकर चालीस मिनट पर हुई थी।

और टेप के डिब्बे पर, अंदर की तरफ़, पेंसिल से लिखा था — रिकॉर्डिंग समाप्त, सायं चार बजकर बीस मिनट।

समर बहुत देर तक उस माइक्रोफ़िल्म रीडर के सामने बैठा रहा। खिड़की से आती धूप उसकी गर्दन पर गर्म हो रही थी और उसे ठंड लग रही थी।

पाँच घंटे बीस मिनट पहले। छियालीस आदमी उस वक़्त ज़िंदा थे। शायद खाना खा रहे थे, शायद खदान की तरफ़ चल दिए थे। और दिल्ली में बैठा एक आदमी उनके नाम पढ़ चुका था। उनके लिए गाना बजा चुका था। और कह चुका था कि ये लौटेंगे नहीं।

दोपहर में वह ज्ञानचंद शुक्ल के पास गया।

शुक्ल जी आर्काइव के प्रभारी थे, इकसठ साल के, तीन महीने बाद रिटायर होने वाले। तहख़ाने की चाबी उन्हीं के पास रहती थी और वे उसे गले में डाले घूमते थे, जैसे कोई ताबीज़ हो। समर ने उन्हें कभी हँसते नहीं देखा था।

जब समर ने डिब्बा मेज़ पर रखा, तो शुक्ल जी ने उसे छुआ नहीं। बस देखते रहे। फिर उन्होंने चश्मा उतारा और आँखें मलने लगे, और मलते ही रहे, ज़रूरत से बहुत ज़्यादा देर तक।

"तुमने बजा दी?" उन्होंने पूछा।

"जी।"

"पूरी?"

"जहाँ तक चली।"

शुक्ल जी ने चश्मा दोबारा पहना। "एक बात याद रखना बेटा। जिस दिन तुमने उसे सुन लिया, समझ लो वह तुम्हें सुन चुका है।"

समर हँसने ही वाला था, फिर रुक गया। शुक्ल जी मज़ाक़ नहीं कर रहे थे।

उन्होंने बताया — मनोहर काले उन्नीस सौ इकहत्तर में आकाशवाणी में उद्घोषक बनकर आया था। आवाज़ के मामले में उसका कोई मुक़ाबला नहीं था। लोग कहते थे कि वह ख़बर पढ़े तो भी लगता है गीत गा रहा हो। पहले दिल्ली, फिर राँची, और फिर उसकी बदली एक छोटे-से सहायक प्रेषण केंद्र पर कर दी गई, जो कोडरमा के पास के जंगल में था। किसी ने कभी नहीं समझा कि इतनी बड़ी आवाज़ को इतनी छोटी जगह क्यों भेजा गया।

चौरासी में उसका नाम विभाग के काग़ज़ों से हटा दिया गया। सेवा पुस्तिका, वेतन रजिस्टर, कार्यक्रम सूची — सब जगह से। जैसे वह आदमी कभी था ही नहीं।

"नाम मिटा देने से आदमी नहीं मिटता," शुक्ल जी ने कहा। "और आवाज़ तो बिल्कुल नहीं मिटती।"

फिर उन्होंने डिब्बे को उलटा किया और उसकी तली में हाथ डाला। अंदर, टीन और गत्ते की परत के बीच, एक पोस्टकार्ड फँसा हुआ था। पंद्रह पैसे वाला, पीला, कोनों से घिसा हुआ।

पता — श्री मनोहर काले, आकाशवाणी।

भेजने वाला — बिरजू, चौक बाज़ार, झुमरी तिलैया।

और नीचे, बच्चों जैसी टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट में, तीन लाइनें।

गीत ज़रूर बजा दीजिएगा साहब। हम सब सुनेंगे। नीचे से भी सुनाई देता है।

उस रात समर ने वह टेप डिजिटल की।

यह उसका काम था। उसने ख़ुद से यही कहा — यह मेरा काम है। उसने फ़ाइल बनाई, नाम दिया, तारीख़ डाली और आर्काइव के सर्वर पर चढ़ा दी, जहाँ से देश की किसी भी शाखा का कोई भी कर्मचारी उसे खोल सकता था। बटन दबाते वक़्त उसके हाथ में हल्की-सी झिझक ज़रूर हुई, मगर वह भी एक सेकंड की थी।

अपलोड पूरा होते ही उसके कानों में एक सरसराहट भर गई।

उसने हेडफ़ोन उतारकर देखा। हेडफ़ोन का तार किसी भी चीज़ में लगा हुआ नहीं था।

अगले दिन शुक्ल जी दफ़्तर नहीं आए।

करोल बाग़ वाले उनके फ़्लैट का दरवाज़ा शाम को तोड़ा गया। वे अपनी कुर्सी पर बैठे थे, आँखें खुली हुईं, गोद में एक पुराना रेडियो रखा हुआ। रेडियो चालू था और उसकी आवाज़ पूरी ऊँचाई पर थी। सुई एक ऐसे नंबर पर टिकी थी जिस पर कोई स्टेशन नहीं आता।

पड़ोसियों ने पुलिस को बताया कि रात भर कोई आवाज़ नहीं आई थी।

घर लौटकर समर ने दीवार पर टँगे कैलेंडर की तरफ़ देखा।

ग्यारह अगस्त।

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