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कोडरमा जंक्शन
Pretika · Ghost Stories · 4 मिनट
उसे याद नहीं कि उसने टिकट कब बुक किया।
यह बात उसे ट्रेन में बैठने के बाद परेशान करने लगी। उसने अपना बटुआ खोला और टिकट निकाला — बारह अगस्त, नई दिल्ली से कोडरमा जंक्शन, कोच बी-दो, बर्थ इकतालीस। बुकिंग का समय था रात दो बजकर चौदह मिनट।
वह ठीक वही समय था जब वह तहख़ाने में उस डिब्बे की डोरी काट रहा था।
ट्रेन रात भर चलती रही। समर खिड़की के शीशे से सिर टिकाए बाहर देखता रहा। मुग़लसराय के बाद अँधेरा गाढ़ा होने लगा और बस्तियाँ कम हो गईं। कहीं-कहीं ईंट के भट्ठों की आग दिखती, नारंगी और अकेली, और फिर पीछे छूट जाती।
गया के बाद पहाड़ शुरू हुए। छोटे, गोल, काले पहाड़, जो अँधेरे में सोए हुए जानवरों की तरह लगते थे।
कोडरमा जंक्शन रात के तीन बजकर चालीस मिनट पर आया।
प्लेटफ़ॉर्म पर धुंध थी और सिर्फ़ चार-पाँच लोग उतरे। समर ने बैग कंधे पर डाला और बाहर निकला। ठंडी हवा में एक अजीब-सी बू थी — पत्थर की, बारूद की, और उसके नीचे कुछ मीठा-सा।
बाहर एक ही ऑटो खड़ा था। ड्राइवर की उम्र पचास के आसपास रही होगी, कान पर मफ़लर बँधा था।
"झुमरी तिलैया," समर ने कहा।
रास्ता तीन किलोमीटर का था और उस पूरे रास्ते समर की आँखें सड़क से हट नहीं पाईं।
ऑटो की रोशनी जहाँ भी पड़ती, ज़मीन चमक उठती। सड़क के किनारे की मिट्टी में, गड्ढों में, बबूल के पत्तों पर, दीवारों के प्लास्टर में — हर जगह बारीक चमकीले ज़र्रे बिखरे थे। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने पूरे इलाक़े पर एक टूटा हुआ आईना बिखेर दिया हो और फिर उसे उठाना भूल गया हो।
"अभ्रक है साहब," ड्राइवर ने बिना पूछे कहा। "पूरा शहर इसी पर बसा है। हवा में भी है, पानी में भी। यहाँ का आदमी मरता है तो उसकी राख भी चमकती है।"
उसका नाम भोला था।
शहर सोया हुआ था। पुराने ढंग के मकान, लोहे के जंगले, बंद दुकानों के शटर, और बीच-बीच में बड़े-बड़े हवेलीनुमा घर, जिनके दरवाज़ों पर ताले पड़े थे और जिनकी बालकनियों से घास उग आई थी।
"ये किसके घर हैं?"
"अभ्रक वालों के। सत्तर-अस्सी के ज़माने में यहाँ इतना पैसा था कि लोग गिनते नहीं थे, तौलते थे।" भोला हँसा, मगर हँसी में कुछ था नहीं। "अब ज़्यादातर राँची में हैं, या पटना में। जो बचे हैं, वो चले गए। और जो चले नहीं गए, वो चुप हो गए।"
विश्राम लॉज चौक बाज़ार से थोड़ा पहले था। भोला ने ऑटो रोका और पैसे लेते वक़्त कहा — "एक बात बता दूँ साहब। कल चौदह है।"
"तो?"
भोला ने उसे देखा। धुंध में उसकी आँखें गीली लग रही थीं।
"कल रात नौ बजे के बाद कोई भी बजने वाली चीज़ मत चलाइएगा। रेडियो, टीवी, मोबाइल, कुछ भी नहीं। और अगर अपने आप बजने लगे," वह रुका, "तो सुनिएगा मत।"
ऑटो मुड़ा और धुंध में चला गया।
लॉज का मैनेजर रामनिहोर था — दुबला, सफ़ेद बाल, बनियान पहने हुए। उसने चाबी दी, रजिस्टर में समर से दस्तख़त कराए और चुपचाप ऊपर ले गया।
कमरा नंबर चार। छोटा कमरा, एक पलंग, एक कुर्सी, दीवार पर एक कैलेंडर जिसका साल पुराना था।
और दीवार पर, ऊपर की तरफ़, एक रेडियो।
वह पुराने ज़माने का लकड़ी वाला रेडियो था, जिसका सामने का जाल कहीं-कहीं से फट गया था। मगर सबसे अजीब बात यह थी कि वह दीवार में दो लोहे के पट्टों से कसकर जकड़ा हुआ था, और उसका बिजली का तार जड़ से काट दिया गया था।
"ये यहाँ क्यों लगा है?" समर ने पूछा।
रामनिहोर दरवाज़े पर ठिठका। "सब कमरों में है।"
"तार तो कटा हुआ है।"
"जी।"
"तो फिर बोल्ट क्यों?"
रामनिहोर ने जवाब नहीं दिया। उसने बस इतना कहा — "पानी नीचे से भरना पड़ेगा। ऊपर की टंकी ख़राब है।" और सीढ़ियाँ उतर गया।
समर लेट गया। थकान इतनी थी कि नींद तुरंत आ गई।
तीन घंटे बाद वह अचानक जागा। कमरे में अँधेरा था और कुछ भी नहीं हो रहा था।
उसने बत्ती जलाई। कमरा वैसा ही था।
फिर वह उठकर दीवार के पास गया और रेडियो पर हाथ रखा।
लकड़ी गर्म थी।
- Writer
- Pretika
- Story
- फ़रमाइश
- Chapter
- 3 of 7
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 4 min
- Words
- 667
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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