PretikaGhost Storiesफ़रमाइश

नसीम रेडियो हाउस

Pretika · Ghost Stories · 7 मिनट

Writer
Pretika
Story
फ़रमाइश
Chapter
4 of 7
Category
Ghost Stories
Reading time
7 min
Words
1204
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

चौक बाज़ार सुबह नौ बजे तक जाग जाता है।

सब्ज़ी वाले, साइकिल पंचर की दुकान, एक बड़ा-सा नीम का पेड़ जिसके नीचे बूढ़े ताश खेल रहे थे। समर ने चाय पी और पूछताछ शुरू की। तिरासी की खदान का नाम लेते ही लोगों का चेहरा बदल जाता था। कोई कंधे उचकाकर चला जाता, कोई कह देता कि उसे कुछ नहीं मालूम, वह तो बाद में आया है।

आख़िर में चाय वाले लड़के ने गली की तरफ़ इशारा किया।

"नसीम चचा से पूछिए। रेडियो की दुकान है।"

दुकान गली के आख़िर में थी और शटर आधा खुला था। ऊपर लकड़ी का बोर्ड टँगा था, जिस पर हरे रंग से लिखा था — नसीम रेडियो हाउस, सन् उन्नीस सौ इकसठ से।

अंदर घुसते ही समर ठिठक गया।

दुकान की तीनों दीवारें छत तक रेडियो से भरी हुई थीं। सैकड़ों रेडियो। मर्फ़ी, बुश, फ़िलिप्स, नेशनल पैनासोनिक, और कुछ ऐसे भी जिनके नाम मिट चुके थे। कुछ के डायल टूटे हुए थे, कुछ के जाल फटे, कुछ पर इतनी धूल थी कि उनका रंग पहचानना मुश्किल था। किसी में तार नहीं था। यह दुकान नहीं थी। यह क़ब्रिस्तान था।

काउंटर के पीछे एक बहुत बूढ़ा आदमी बैठा था। सफ़ेद दाढ़ी, सिर पर टोपी, आँखों पर मोटा चश्मा। उसके हाथ में एक स्क्रूड्राइवर था और वह एक ऐसे रेडियो के पेंच कस रहा था जिसे कभी कोई लेने नहीं आएगा।

"नसीम साहब?"

बूढ़े ने ऊपर देखा। फिर उसने स्क्रूड्राइवर रख दिया।

"दिल्ली से आए हो?"

समर की रीढ़ में एक ठंडी लकीर दौड़ गई। "आपको कैसे मालूम?"

"यहाँ बाहर से जो आता है, वो या तो पत्थर ख़रीदने आता है या पुरानी बात खोदने। तुम्हारे हाथ साफ़ हैं।" उसने कुर्सी की तरफ़ इशारा किया। "बैठो।"

समर बैठ गया और उसने सब कुछ बता दिया। टेप, नाम, समय का फ़र्क़, शुक्ल जी, पोस्टकार्ड।

पोस्टकार्ड का नाम सुनते ही नसीम के हाथ काँपे।

"बिरजू," उसने कहा।

फिर वह कुछ देर चुप रहा। बाहर गली में कोई साइकिल की घंटी बजाता हुआ गुज़रा।

"तुम्हें झुमरी तिलैया का नाम कैसे मालूम हुआ था?" उसने पूछा।

"सबको मालूम है। मज़ाक़ में लोग नाम लेते हैं।"

"हाँ।" नसीम मुस्कुराया, मगर वह मुस्कुराहट किसी घाव जैसी थी। "पूरा हिंदुस्तान हमारा नाम जानता है और किसी को नहीं मालूम कि हम क्यों जाने जाते हैं।"

उसने बताना शुरू किया।

पचास और साठ के दशक में इस इलाक़े की ज़मीन के नीचे से अभ्रक निकलता था। वही अभ्रक जो दुनिया भर के कारख़ानों में जाता था, जो पेंट में चमक लाता था, जो बिजली के उपकरणों में लगता था, जो औरतों के सिंगार के डिब्बों तक पहुँचता था। और उसी की वजह से इस छोटे-से क़स्बे में इतना पैसा आ गया कि लोगों को समझ नहीं आता था कि उसका करें क्या।

तो उन्होंने रेडियो ख़रीदे।

"हर घर में," नसीम ने कहा। "बड़े व्यापारी के यहाँ चार-चार, पाँच-पाँच। और फिर एक दिन किसी ने विविध भारती को पोस्टकार्ड भेज दिया कि फ़लाँ गीत बजा दीजिए। और वो बज गया। रेडियो पर हमारे शहर का नाम लिया गया।"

उसकी आँखों में कुछ चमका।

"उसके बाद तो जैसे बाढ़ आ गई। रोज़ सैकड़ों पोस्टकार्ड। डाकख़ाने वाले परेशान। लोग चंदा करके भेजते थे। किसी की शादी हो, किसी के बच्चे का जन्म हो, किसी की परीक्षा हो — फ़रमाइश भेजो। और रात को पूरा मोहल्ला एक रेडियो के आगे बैठकर इंतज़ार करता था कि अपना नाम सुनाई दे जाए। जिस दिन किसी का नाम आ जाता, वो आदमी हफ़्ते भर सीना तानकर चलता था।"

"सारा देश हँसता था हम पर," नसीम ने कहा, "और हमें अच्छा लगता था। कम से कम कोई हमारा नाम तो लेता था।"

फिर उसकी आवाज़ बैठ गई।

"मगर किसी ने कभी नहीं पूछा कि इतना पैसा ज़मीन के नीचे से आता कैसे था।"

उसने बताया कि खदानों के भीतर आदमी काम करते थे, और बाहर, मलबे के ढेरों पर, औरतें और बच्चे बैठे रहते थे। इसे ढिबरा कहते हैं। पत्थर के टुकड़ों से अभ्रक की परतें छीलना, टोकरी भरना, तौलना, बेचना। सुबह से शाम तक। छोटे बच्चों के हाथ इस काम के लिए सबसे अच्छे माने जाते थे, क्योंकि उनकी उँगलियाँ पतली होती हैं और अभ्रक की परत बहुत नाज़ुक होती है।

"धूल फेफड़ों में जाती थी," नसीम ने कहा। "उम्र चालीस पार करते ही खाँसी शुरू। और खाँसी के साथ जो निकलता था, उसमें भी चमक होती थी।"

बिरजू उन्हीं बच्चों में से एक था।

तेरह साल का। तुरी परिवार का। गिद्धीघाट खदान की पाली में उसका बाप और चाचा दोनों काम करते थे। मगर बिरजू की एक ख़ासियत थी — वह लिख सकता था। मिशन स्कूल में दो साल पढ़ा था।

"तो वो पूरी पाली के पोस्टकार्ड लिखता था," नसीम ने कहा। "पाँच पैसे में एक नाम। मज़दूर लोग शाम को उसे घेर लेते थे। कोई कहता मेरा नाम लिख, कोई कहता मेरी घरवाली का लिख। और वो सबका लिखता था।"

"और अपना?"

नसीम ने चश्मा उतार लिया।

"अपना नाम वो हमेशा सबसे आख़िर में लिखता था। कहता था, पहले सबका, बाद में मेरा। कहता था, एक दिन रेडियो पर मेरा नाम आएगा तो पूरा शहर सुनेगा।"

तेरह अगस्त, उन्नीस सौ तिरासी को उसने एक पोस्टकार्ड लिखा जिसमें छियालीस नाम थे — पूरी रात की पाली के।

और नीचे सैंतालीसवाँ नाम।

चौदह अगस्त की रात नौ बजकर पंद्रह मिनट पर प्रसारण शुरू हुआ। नसीम उस वक़्त इसी दुकान में था, दस-बारह लोगों के साथ।

"आवाज़ आई — नमस्कार, मैं मनोहर काले।" नसीम ने अपनी उँगलियाँ मेज़ पर रखीं। "और उसने नाम पढ़ने शुरू किए।"

"पहले तो हम ख़ुश हुए। ताली बजी। किसी ने मिठाई मँगवाई। फिर तीसवाँ नाम आया, चालीसवाँ आया, और दुकान में सन्नाटा हो गया। क्योंकि हम सब समझ गए कि ये पूरी की पूरी रात वाली पाली है। एक भी नाम छूटा नहीं है।"

"फिर उसने कहा — यह गीत उनके नाम जो लौटेंगे नहीं।"

नसीम ने खिड़की की तरफ़ देखा।

"नौ बजकर चालीस मिनट पर ज़मीन हिली। और गिद्धीघाट बैठ गया।"

समर की हथेलियाँ पसीने से भीगी हुई थीं।

"और बिरजू?"

"बिरजू उस रात खदान में नहीं था। वो बाहर था, मलबे पर। मगर धँसान इतनी बड़ी थी कि मलबा भी नीचे चला गया।" नसीम ने साँस ली। "उसका नाम पूरा नहीं पढ़ा गया था। टेप में सिर्फ़ 'बिर' आया और आवाज़ कट गई।"

दुकान में बहुत देर तक कोई नहीं बोला।

फिर नसीम उठा। उसने काउंटर के नीचे से एक टीन का बड़ा डिब्बा निकाला और खोला।

अंदर पोस्टकार्ड भरे थे। सैकड़ों। सब पीले, सब एक जैसे।

"हर साल," नसीम ने कहा, "पंद्रह अगस्त की सुबह मेरी चिट्ठी वाली पेटी में एक पोस्टकार्ड मिलता है। उस पर उन लोगों के नाम लिखे होते हैं जिनका नाम पिछली रात प्रसारण में पढ़ा गया था। और वो सब लोग उसी हफ़्ते ख़त्म हो जाते हैं।"

उसने एक पोस्टकार्ड उठाकर समर की तरफ़ बढ़ाया। लिखावट बच्चों जैसी थी। वही टेढ़े-मेढ़े अक्षर।

"इस साल का अभी नहीं आया," नसीम ने कहा। "आज तेरह है।"

समर ने काँपते हाथ से पोस्टकार्ड वापस रखा।

"तो पूरा शहर जानता है?"

"पूरा शहर जानता है।" नसीम ने डिब्बा बंद किया। "इसीलिए चौदह की रात यहाँ कोई कुछ नहीं चलाता। बिजली काट देते हैं। बच्चों को घर के अंदर कर लेते हैं। जिनके पास पुराने रेडियो हैं, उन्हें दीवार में जकड़ देते हैं, ताकि कोई नशे में या शौक़ में उन्हें उठाकर चालू न कर दे।"

"मगर तार तो कटे होते हैं।"

नसीम ने उसे देखा और पहली बार उसकी आवाज़ में डर आया।

"तार से क्या होता है बेटा। वो बिजली से नहीं चलते।"

समर उठकर जाने लगा तो नसीम ने पीछे से आवाज़ दी।

"रुको। एक बात।"

"जी।"

"अपना नाम मुझे मत बताना।"

"क्यों?"

"क्योंकि जो नाम बोला जाता है, वो हवा में रह जाता है।" बूढ़े ने स्क्रूड्राइवर दोबारा उठा लिया। "और यहाँ की हवा सब कुछ याद रखती है।"

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