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गिद्धीघाट
Pretika · Ghost Stories · 4 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- फ़रमाइश
- Chapter
- 5 of 7
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 4 min
- Words
- 755
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
चौदह अगस्त की सुबह वह खदान की तरफ़ निकल गया।
गिद्धीघाट शहर से सात किलोमीटर दूर था और वहाँ तक जाने के लिए कोई सवारी नहीं मिली। भोला ने साफ़ मना कर दिया। दूसरे ऑटो वाले सुनते ही मुँह फेर लेते थे। आख़िर में एक लड़के ने अपनी मोटरसाइकिल पर मोड़ तक छोड़ दिया और वहीं से लौट गया।
आख़िरी दो किलोमीटर उसने पैदल तय किए।
रास्ता जंगल से होकर जाता था — साल और पलाश के पेड़, सूखे नाले, और बीच-बीच में गड्ढे, जिनमें बरसात का पानी भरा था। पानी काला था, मगर उसकी सतह पर सूरज की रोशनी पड़ते ही वह किसी पिघली हुई धातु की तरह चमक उठता।
फिर पेड़ ख़त्म हो गए और सामने खुला मैदान आ गया।
गिद्धीघाट एक बहुत बड़ा घाव था।
ज़मीन में एक विशाल गड्ढा, जिसके किनारे मलबे के पहाड़ बने हुए थे। हर पहाड़ पर, हर पत्थर पर, हर मुट्ठी मिट्टी में अभ्रक की परतें थीं। दोपहर की तेज़ धूप उस पर पड़ रही थी और पूरा मैदान झिलमिला रहा था — इस तरह जैसे किसी ने आसमान से सारे सितारे उतारकर ज़मीन पर पटक दिए हों और वे सब वहीं पड़े-पड़े मर गए हों।
एक तरफ़ लोहे की पुरानी विंच खड़ी थी, जंग खाई हुई, उसका पहिया आधा ज़मीन में धँसा हुआ। रस्सी कब की गल चुकी थी।
और गड्ढे के बीचोंबीच, कंक्रीट का एक मोटा ढक्कन था — खदान का मुँह, जिसे सरकार ने चौरासी में सील किया था। ढक्कन एक कोने से टूट गया था और वहाँ लगभग एक बालिश्त चौड़ी दरार बन गई थी।
समर उस दरार के पास घुटनों के बल बैठ गया।
नीचे से हवा आ रही थी। ठंडी, नम, और उसमें वही मीठी बू थी जो उसने स्टेशन पर सूँघी थी।
उसने कान लगाया।
बहुत गहराई से, बहुत धीमे, संगीत आ रहा था।
पुराने फ़िल्मी गाने जैसा कुछ, इतना दूर कि धुन पकड़ में नहीं आती थी। और उस धुन के साथ आवाज़ें थीं। बहुत सारे लोग साथ-साथ गुनगुना रहे थे। बेसुरे, अटकते हुए, जैसे किसी के गले में पानी भरा हो।
समर पीछे हट गया और उसकी हथेली मलबे पर पड़ी।
उठाते वक़्त उसने देखा — बग़ल में, अभ्रक की सफ़ेद धूल पर, एक छोटा-सा हाथ का निशान था।
बच्चे का। ताज़ा। इतना ताज़ा कि उसकी उँगलियों के किनारों पर धूल अभी जमी नहीं थी।
समर खड़ा हो गया और उसने चारों तरफ़ देखा। मैदान ख़ाली था। सात किलोमीटर तक कोई नहीं था।
तभी उसकी नज़र मैदान के दूसरे छोर पर पड़ी।
वहाँ एक छोटी-सी पक्की इमारत थी, जिसे उसने पहले नहीं देखा था। ऊपर एक लोहे का मस्तूल खड़ा था — पुराना एंटीना, जिसके तार अब भी तने हुए थे।
दीवार पर लगी पट्टिका आधी टूटी थी, मगर पढ़ी जा रही थी।
आकाशवाणी सहायक प्रेषण केंद्र, गिद्धीघाट। सेवा समाप्त — उन्नीस सौ पचासी।
दरवाज़ा खुला था।
अंदर एक ही कमरा था। मेज़, कुर्सी, और मेज़ पर एक भारी-भरकम प्रेषण यंत्र, जिसके ऊपर काँच के पीछे एक सुई लगी थी। दीवार से एक माइक लटक रहा था, और उसके बग़ल में हेडफ़ोन का जोड़ा टँगा था।
बिजली का कोई कनेक्शन नहीं था। तार दीवार से बाहर निकलकर बीच में ही कटा हुआ था और उसका सिरा घास में पड़ा था।
मगर सुई हिल रही थी।
बहुत हल्के-हल्के, बाएँ से दाएँ, जैसे किसी की नब्ज़ चल रही हो।
समर मेज़ के पास गया। उस पर एक रजिस्टर खुला पड़ा था — प्रसारण पंजी।
उसने पन्ने पलटे।
पिछले पन्नों की स्याही उड़ चुकी थी, काग़ज़ भूरा पड़ चुका था। मगर एक तारीख़ के बाद लिखावट बदल जाती थी और स्याही एकदम नीली और साफ़ थी।
चौदह अगस्त उन्नीस सौ तिरासी। प्रसारण : रात्रि नौ बजकर पंद्रह मिनट। श्रोता : सात हज़ार।
उसके नीचे अगले साल की तारीख़। फिर अगले साल की। हर साल, सिर्फ़ चौदह अगस्त। कभी कोई पन्ना छूटा नहीं।
समर पन्ने पलटता चला गया, तेज़, और तेज़, और आख़िरी लिखी हुई लाइन पर उसका हाथ रुक गया।
आज की तारीख़ थी।
प्रसारण : रात्रि नौ बजकर पंद्रह मिनट। श्रोता : एक।
स्याही अभी सूखी नहीं थी।
समर ने उँगली छुआई और नीला दाग़ उसकी उँगली पर आ गया।
वह पलटा और भागने ही वाला था कि कुर्सी के पीछे रखे बोरे पर उसकी नज़र पड़ी।
बोरा फटा हुआ था और उसमें से पोस्टकार्ड बाहर गिरे पड़े थे। हज़ारों। पूरे कमरे के कोने तक फैले हुए, गड्डियों में बँधे, कुछ खुले।
समर ने एक उठाया।
पता — श्री मनोहर काले, आकाशवाणी सहायक प्रेषण केंद्र, गिद्धीघाट।
भेजने वाला — समर सक्सेना, आकाशवाणी भवन, संसद मार्ग, नई दिल्ली।
उसने दूसरा उठाया। वही। तीसरा। वही।
पूरे बोरे में उसका नाम था। हज़ारों बार। और हर एक पर वही टेढ़ी-मेढ़ी बचकानी लिखावट।
वह उन्हें फेंककर बाहर भागा।
जब वह मैदान पार करके जंगल में घुसा, तो उसने घड़ी देखी। उसने सोचा था कि दोपहर होगी।
शाम के छह बजकर पचास मिनट हो रहे थे।
और आसमान पीला पड़ रहा था।