Pretika › Ghost Stories › फ़रमाइश
रात नौ बजकर पंद्रह मिनट
Pretika · Ghost Stories · 7 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- फ़रमाइश
- Chapter
- 6 of 7
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 7 min
- Words
- 1215
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
झुमरी तिलैया को बंद होते हुए देखना अजीब था।
शाम सात बजते-बजते दुकानें गिरने लगीं। शटर एक के बाद एक नीचे आते गए, और उनकी आवाज़ पूरी गली में गूँजती रही। सब्ज़ी वालों ने ठेले खींचकर गलियों में डाल दिए। नीम के नीचे ताश खेलने वाले बूढ़े बिना कुछ कहे उठ गए।
आठ बजे तक सड़क पर एक भी आदमी नहीं था।
समर लॉज के बाहर खड़ा देखता रहा। बिजली के खंभे पर लगी स्ट्रीट लाइट भी बुझा दी गई थी। शहर पर एक ऐसा अँधेरा उतरा जो सिर्फ़ रोशनी न होने से नहीं आता — वह किसी के जान-बूझकर छिप जाने से आता है।
नसीम की दुकान के आगे से गुज़रते वक़्त उसने देखा कि बूढ़ा शटर के किनारों पर चिपकाने वाली टेप लगा रहा है। भीतर की एक भी दरार खुली नहीं छोड़ रहा था।
नसीम ने उसे देखा। कुछ बोला नहीं। बस सिर हिलाकर अंदर चला गया।
लॉज में रामनिहोर मेन स्विच के पास खड़ा था। उसने बिना पूछे बत्ती गिरा दी और मोमबत्ती जलाकर काउंटर पर रख दी।
"कमरे में रहिए," उसने कहा। "और चाहे कुछ भी सुनाई दे, दरवाज़ा मत खोलिएगा।"
समर अपने कमरे में गया और बैग खोला।
उसने अपना फ़ील्ड रिकॉर्डर निकाला — काला, हथेली भर का, जिसमें आठ घंटे की रिकॉर्डिंग की जगह थी। बैटरी भरी हुई थी।
वह पलंग पर बैठा रहा और उस रिकॉर्डर को देखता रहा।
आठ बजकर बीस मिनट।
उसने ख़ुद से कहा कि वह पागल है। कि उसे ट्रेन पकड़नी चाहिए। कि दिल्ली में तीन महीने का किराया बाक़ी है और माँ का फ़ोन दो दिन से नहीं उठाया।
और फिर उसने वह बात सोची जो पिछले तीन दिन से उसके भीतर बैठी थी।
बोरे में उसका नाम था।
वहाँ जाने या न जाने से अब कुछ बदलने वाला नहीं था। पोस्टकार्ड पहले से लिखा जा चुका था।
आठ बजकर पैंतालीस मिनट पर वह लॉज से निकला।
रात में जंगल का रास्ता तय करने में उसे एक घंटा लगा। टॉर्च की रोशनी में अभ्रक जुगनुओं की तरह जलता-बुझता रहा। एक बार उसे लगा कि पीछे कोई चल रहा है, मगर पलटने पर सिर्फ़ पेड़ थे और पेड़ों के बीच से आती हुई एक हवा, जो मीठी थी।
नौ बजकर दस मिनट पर वह प्रेषण केंद्र में घुसा।
कमरा वैसा ही था। पोस्टकार्ड फ़र्श पर बिखरे पड़े थे। रजिस्टर खुला था।
समर ने रिकॉर्डर मेज़ पर रखा और चालू कर दिया। लाल बत्ती जल उठी।
नौ बजकर बारह मिनट।
प्रेषण यंत्र की सुई ऊपर चढ़ने लगी।
नौ बजकर चौदह मिनट पर पूरे कमरे में एक भिनभिनाहट भर गई — वही भिनभिनाहट जो उसने दिल्ली के तहख़ाने में सुनी थी। दीवार पर टँगा हेडफ़ोन काँपने लगा।
और नौ बजकर पंद्रह मिनट पर आवाज़ आई।
"नमस्कार। मैं मनोहर काले।"
समर ने कुर्सी की तरफ़ देखा।
कुर्सी अब ख़ाली नहीं थी।
उस पर एक आदमी बैठा था। सलेटी नीली वर्दी, कलफ़ लगा कॉलर, बालों में तेल, और कान पर हेडफ़ोन। वह माइक की तरफ़ थोड़ा झुका हुआ था, बिल्कुल उस तरह जैसे उद्घोषक बैठते हैं।
उसके होंठ हिल नहीं रहे थे।
आवाज़ यंत्र से आ रही थी।
"आज हमारे साथ एक मेहमान भी हैं।"
समर का गला सूख गया।
"बहुत दूर से आए हैं। और बहुत काम के आदमी हैं।" ठहराव। साँस। "आपने हमारी पहुँच बढ़ा दी, समर बाबू। तैंतालीस साल से हम इसी एक शहर तक सीमित थे। सात हज़ार श्रोता। बस।"
समर के मुँह से आवाज़ नहीं निकली।
"अब हम जाल पर हैं।"
कमरे में एक हल्की-सी घरघराहट हुई, जैसे कोई पुरानी मशीन गला साफ़ कर रही हो।
"तो आज की फ़रमाइश।"
और उसने नाम पढ़ने शुरू किए।
पहला नाम सुनते ही समर के घुटने ढीले पड़ गए।
तान्या मिश्रा। आर्काइव में उसके साथ काम करने वाली लड़की, जो सुबह की पाली में आती थी और जिसने पिछले हफ़्ते उससे पूछा था कि तहख़ाने में डर नहीं लगता।
फिर — रफ़ीक़ हुसैन। तकनीकी विभाग।
फिर — ज्ञानचंद शुक्ल। और उस नाम के बाद मनोहर काले ने एक छोटा-सा ठहराव लिया, जैसे कोई पुराना हिसाब चुकता कर रहा हो।
फिर वे नाम आने लगे जिन्हें समर नहीं जानता था। मुंबई, चेन्नई, गुवाहाटी, जालंधर। आकाशवाणी की शाखाएँ। वे सब लोग जिनके कंप्यूटर पर वह फ़ाइल पहुँच चुकी थी।
नाम आते रहे। ग्यारह। उन्नीस। सत्ताईस।
समर ने चीख़कर कहा — "बंद करो!"
आवाज़ रुकी।
और फिर, बहुत नरमी से, उसने कहा — "मैं नहीं पढ़ूँगा तो कौन पढ़ेगा? नाम पढ़े जाने के लिए ही लिखे जाते हैं।"
तभी समर को अपनी पीठ पर कुछ महसूस हुआ।
वह पलटा।
दरवाज़े पर एक लड़का खड़ा था।
तेरह-चौदह साल का। दुबला, नंगे पाँव, आधी बाँह की क़मीज़ पहने। उसकी पूरी खाल पर अभ्रक की सफ़ेद परत जमी थी — बालों में, पलकों पर, कानों के भीतर तक। जब वह हिलता तो पूरे शरीर से बारीक चमकीली धूल झरती थी।
उसने मुँह खोला और समर ने देखा कि उसके दाँतों के बीच भी वही चमक भरी है।
हाथ में उसके एक पोस्टकार्ड था।
"साहब," लड़के ने कहा। उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई सूखे पत्ते पर चल रहा हो। "मेरा नाम पूरा कर दीजिए।"
समर पीछे हटा और मेज़ से टकरा गया।
लड़के ने पोस्टकार्ड आगे बढ़ाया।
उस पर छियालीस नाम लिखे थे, एक के नीचे एक, छोटी-छोटी क़तारों में। और सबसे नीचे, सैंतालीसवीं जगह पर, लिखा था — बिरजू प्र
और वहीं क़लम रुक गई थी। स्याही की एक लकीर काग़ज़ के किनारे तक खिंची चली गई थी, जैसे लिखते-लिखते किसी ने काग़ज़ नीचे से खींच लिया हो।
"तेरह साल का था," लड़के ने कहा। "सब का नाम लिखा। अपना पूरा नहीं कर पाया।"
"मैं क्या कर सकता हूँ," समर की आवाज़ काँप रही थी।
"आपकी आवाज़ अच्छी है।" लड़का माइक की तरफ़ देखने लगा। "जिसका नाम अधूरा रह जाता है, वो न ऊपर जाता है न नीचे। बयालीस साल से मैं इसी मैदान पर बैठा हूँ। रोज़ पत्थर छीलता हूँ। रोज़ चिट्ठी लिखता हूँ।"
"और अगर मैंने पढ़ दिया?"
लड़का चुप रहा।
और उस चुप्पी में समर को सब समझ आ गया।
सूची कभी छोटी नहीं होती। नाम पूरा होगा तो एक जगह ख़ाली होगी, और ख़ाली जगह भरनी पड़ेगी।
पीछे से मनोहर काले की आवाज़ आई, बहुत शांत, लगभग मीठी —
"माइक चालू है, समर बाबू।"
समर ने लड़के की तरफ़ देखा।
उस चेहरे पर डर नहीं था। ज़िद नहीं थी। बस एक बहुत पुरानी थकान थी — उस तरह की, जो किसी बच्चे के चेहरे पर नहीं होनी चाहिए।
समर बहुत देर तक खड़ा रहा। इतनी देर कि उसे लगा उसके पैर ज़मीन में गड़ गए हैं।
फिर उसने माइक उठाया।
उसका हाथ सधा हुआ था। यह उसे बाद में सबसे ज़्यादा अजीब लगा — कि उस पल में उसके हाथ बिल्कुल नहीं काँपे।
उसने माइक होंठों के पास किया और कहा —
"बिरजू प्रसाद तुरी।"
पूरे मैदान की चमक एक साथ बुझी।
लड़के ने आँखें बंद कीं। उसकी छाती से एक लंबी साँस निकली, ऐसी जैसे किसी ने बयालीस साल से रोक रखी हो। फिर उसका शरीर ढीला पड़ा और वह धूल में बदलकर बिखर गया — सफ़ेद, बारीक, चमकीली धूल, जो हवा में उठी और दरवाज़े से बाहर चली गई।
फ़र्श पर सिर्फ़ पोस्टकार्ड रह गया।
समर ने उसे उठाया। सैंतालीसवाँ नाम अब पूरा लिखा हुआ था।
कुर्सी की तरफ़ मुड़ा तो वह ख़ाली थी।
हेडफ़ोन दीवार पर वापस टँगा था और अब भी गर्म था।
समर ने रिकॉर्डर उठाया। लाल बत्ती जल रही थी। उसने बंद करने के लिए बटन दबाया।
बटन दबा नहीं।
और तभी प्रेषण यंत्र की सुई फिर से ऊपर उठी।
स्पीकर से एक आवाज़ आई। मनोहर काले की नहीं।
वह उसकी अपनी आवाज़ थी।
"नमस्कार।" थोड़ी भारी, थोड़ी थकी हुई, मगर उसकी अपनी। "आज की आख़िरी फ़रमाइश उनके नाम, जो लौटेंगे नहीं। यह फ़रमाइश भेजी है — सम—"
आवाज़ कट गई।
समर ने मुँह खोला। उसने अपना पूरा नाम कहना चाहा। उसने ज़ोर लगाया, इतना कि गर्दन की नसें तन गईं।
मगर आवाज़ बाहर नहीं आई।
मेज़ पर रखा रजिस्टर हवा से पलटा।
अगले साल की तारीख़ पहले से लिखी थी।