Pretika › Ghost Stories › नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
एपिसोड 15 — “अब्बा कौन था?”
firoj saifi · Ghost Stories · 13 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
- Chapter
- 15 of 15
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 13 min
- Words
- 2598
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
“अब्बा… घर चलो।”
सलीम की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज गई।
लेकिन वह आवाज़ सलीम की नहीं थी।
वह आवाज़ किसी ऐसे आदमी की थी, जो बरसों से अपने ही घर के बाहर खड़ा था… और अब उसे यक़ीन हो गया था कि दरवाज़ा खुल चुका है।
फ़िरोज़ जम गया।
उसके सामने खड़ा साया धीरे-धीरे सलीम का चेहरा पहने हुए था। वही आँखें… वही दाढ़ी… वही माथे पर पुराना निशान, जो फ़िरोज़ को बचपन से याद था।
उसके अब्बा का चेहरा।
लेकिन फ़िरोज़ जानता था—
उसके अब्बा मर चुके थे।
या शायद…
जिसे वह अब तक अपना अब्बा समझता रहा, वह कभी ज़िंदा था ही नहीं।
पीछे ज़मीन पर सलीमा पड़ी थी। उसके सीने से खून बह रहा था। हाथ में अब भी लोहे की छड़ का टूटा हुआ टुकड़ा था। उसकी साँसें बहुत धीमी हो चुकी थीं।
फ़िरोज़ ने एक नज़र सलीमा पर डाली।
“अम्मी…”
सलीमा ने मुश्किल से आँखें खोलीं।
उसकी आँखों में डर नहीं था।
सिर्फ़ थकान थी।
और एक ऐसा पछतावा… जो शायद चालीस साल से भी पुराना था।
“उसे… अब्बा मत कहना…” सलीमा फुसफुसाई।
साया मुस्कुराया।
“क्यों नहीं, सलीमा?”
उसकी आवाज़ अब दो आवाज़ों में बदल गई थी।
एक सलीम की।
दूसरी किसी गहरी, खोखली आवाज़ की… जैसे कुएँ के नीचे से कोई बोल रहा हो।
“बेटे को अपने अब्बा के साथ घर नहीं जाना चाहिए क्या?”
फ़िरोज़ पीछे हट गया।
“तुम मेरे अब्बा नहीं हो।”
साया ने गर्दन एक तरफ़ झुका दी।
“तो फिर किसे अब्बा कहते हो?”
कमरे की दीवारों पर टंगी सारी घड़ियाँ एक साथ चलने लगीं।
टिक…
टिक…
टिक…
हर घड़ी की सुई अलग समय दिखा रही थी।
लेकिन एक घड़ी—
काली घड़ी—
अब भी 2 बजकर 48 मिनट पर अटकी थी।
साया ने अपनी कलाई उठाई।
काली घड़ी उसके हाथ में थी।
वही घड़ी, जिस पर पहले लिखा था—
सलीम — 1987
और बाद में—
फ़िरोज़ — 2026
अब उस पर तीसरा नाम उभर रहा था।
धीरे-धीरे।
जैसे किसी ने अंदर से नाखून से खुरचा हो।
अब्बा
फ़िरोज़ की साँस अटक गई।
“ये क्या है?”
साया ने घड़ी उसकी तरफ़ बढ़ाई।
“तुम्हारा नाम।”
“मेरा नाम फ़िरोज़ है।”
“नाम?” साया हँसा। “नाम तो लोग रखते हैं। मौत नाम मिटाती है। और घर… घर नाम याद रखता है।”
कमरे के कोने से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।
फ़िरोज़ ने पलटकर देखा।
वहाँ कोई बच्चा नहीं था।
सिर्फ़ एक लकड़ी का पालना था, जो अपने आप हिल रहा था।
धीरे-धीरे।
आगे…
पीछे…
आगे…
पीछे…
पालने के अंदर सफ़ेद कपड़े में लिपटा कुछ रखा था।
फ़िरोज़ ने उसे पहले भी देखा था।
कमरा -1 में।
उस रात, जब उसने अपने लिए एक नक़ली परिवार देखा था।
वही बच्चा।
वही चेहरा।
वही बंद आँखें।
लेकिन इस बार बच्चा रो नहीं रहा था।
वह हँस रहा था।
और उसके होंठ हिल रहे थे।
“अब्बा…”
फ़िरोज़ ने आँखें बंद कर लीं।
“ये सब झूठ है।”
साया उसके पास आ गया।
“झूठ?”
उसने फ़िरोज़ के कंधे पर हाथ रखा।
स्पर्श ठंडा था।
इतना ठंडा, जैसे किसी मुर्दे की उँगलियाँ।
“तुम्हें बचपन याद है, फ़िरोज़?”
फ़िरोज़ ने उसका हाथ झटक दिया।
“मुझे सब याद है।”
“सच?”
“हाँ।”
“तो बताओ… तुम्हारे अब्बा की मौत कब हुई थी?”
फ़िरोज़ चुप हो गया।
उसने बचपन में सुना था—
अब्बा का एक्सीडेंट हुआ था।
एक सुनसान सड़क।
तेज़ बारिश।
टूटी हुई कार।
और अस्पताल में एक सफ़ेद चादर।
लेकिन उसने अपने अब्बा की लाश कभी नहीं देखी थी।
सलीमा ने हमेशा कहा था—
“बेटा, तुम्हारे अब्बा बहुत दूर चले गए हैं।”
बहुत दूर।
इतना दूर कि कोई कब्र भी नहीं।
इतना दूर कि कोई तस्वीर भी नहीं।
सिर्फ़ एक घड़ी।
सिर्फ़ एक नाम।
सिर्फ़ एक अधूरी कहानी।
साया उसके कान के पास झुका।
“तुम्हारे अब्बा की मौत… कभी हुई ही नहीं।”
फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।
“झूठ।”
“तुम्हारे अब्बा मरे नहीं थे।”
साया की मुस्कान गहरी हो गई।
“उन्हें मारा गया था।”
पीछे पड़ी सलीमा ने अचानक काँपते हुए कहा—
“फ़िरोज़… उसकी बात मत सुनना…”
साया ने उसकी तरफ़ देखा।
“तुमने तो हमेशा मेरी बात सुनी थी, सलीमा।”
सलीमा ने आँखें बंद कर लीं।
“मैंने तुम्हें ख़त्म करने की कोशिश की थी…”
“नहीं।”
साया की आवाज़ भारी हो गई।
“तुमने मुझे जन्म दिया था।”
कमरे की दीवार पर एक काली दरार फैल गई।
दरार के अंदर से पीली रोशनी आने लगी।
फिर एक दृश्य उभरा।
8 सितंबर 1987।
बारिश हो रही थी।
वही हवेली।
वही बरामदा।
लेकिन हवेली नई थी।
दीवारों पर सीलन नहीं थी।
खिड़कियों के शीशे टूटे नहीं थे।
और कमरे के बीच में एक आदमी खड़ा था।
उसका नाम था—
सलीम सैफ़ी।
फ़िरोज़ का अब्बा।
सलीम के सामने एक लकड़ी की मेज़ पर नवजात बच्चा पड़ा था।
बच्चे की आँखें खुली थीं।
लेकिन वह रो नहीं रहा था।
उसकी छाती उठ-गिर नहीं रही थी।
फिर भी वह ज़िंदा था।
सलीम बच्चे को देख रहा था।
उसके चेहरे पर डर था।
उसके पीछे जवान सलीमा खड़ी थी।
उसकी बाँहों में एक और बच्चा था।
दोनों बच्चे एक जैसे दिखते थे।
एक ही चेहरा।
एक ही माथा।
एक ही छोटी-सी काली बिंदी, जो जन्म से ही उनकी गर्दन के नीचे थी।
सलीम ने काँपते हुए पूछा—
“ये दोनों कौन हैं?”
सलीमा ने जवाब नहीं दिया।
कमरे के अँधेरे कोने से हामिद की आवाज़ आई—
“एक बेटा है…”
फिर अँधेरे में एक लंबी परछाईं उभरी।
“और दूसरा… मौत।”
सलीम पीछे हट गया।
“तुमने मुझसे कहा था कि बच्चा बच जाएगा।”
सलीमा ने धीमे से कहा—
“बच जाएगा।”
“कौन?”
“जिसे बचाना था।”
सलीम ने दोनों बच्चों को देखा।
“और दूसरा?”
सलीमा की आँखों में आँसू आ गए।
“दूसरे को मरना होगा।”
अचानक कमरे में तीन बार दस्तक हुई।
ठक…
ठक…
ठक…
सलीम ने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
बाहर कोई नहीं था।
लेकिन दरवाज़े के नीचे से काला पानी अंदर आने लगा।
पानी नहीं।
साया।
वह धीरे-धीरे फ़र्श पर फैलता हुआ बच्चों के पास पहुँच गया।
एक बच्चे ने रोना शुरू कर दिया।
दूसरा अब भी चुप था।
हामिद ने कहा—
“जिस बच्चे की आवाज़ है, उसे बचा लो।”
सलीमा ने चुप बच्चे की तरफ़ देखा।
“और जिस बच्चे की आवाज़ नहीं है?”
हामिद ने मुस्कुराकर कहा—
“वही बड़ा होकर सबकी आवाज़ बन जाएगा।”
दृश्य अचानक टूट गया।
फ़िरोज़ वर्तमान में लौट आया।
उसका सिर घूम रहा था।
“ये… ये क्या था?”
साया ने कहा—
“तुम्हारा जन्म।”
“नहीं।”
“तुम्हारा असली जन्म।”
फ़िरोज़ ने सलीमा की तरफ़ देखा।
“अम्मी, ये सच है?”
सलीमा ने जवाब नहीं दिया।
फ़िरोज़ उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।
“मुझे बताओ।”
सलीमा की आँखों से आँसू बह निकले।
“तुम्हें सच जानना ही है?”
“हाँ।”
“तो सुनो…”
उसने काँपता हुआ हाथ फ़िरोज़ के चेहरे पर रखा।
“जिस बच्चे को उस रात बचाया गया था… वह तुम नहीं थे।”
फ़िरोज़ का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“तो कौन था?”
सलीमा ने साया की तरफ़ देखा।
“वह।”
साया ने सिर झुका लिया।
“और जिसे मारना था…”
सलीमा की आवाज़ टूट गई।
“वह भी तुम ही थे।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
फ़िरोज़ ने धीरे से पूछा—
“मैं… दो बच्चे था?”
“नहीं,” सलीमा ने कहा। “तुम एक बच्चा भी नहीं थे।”
साया की आँखें चमकने लगीं।
“तुम एक वादा थे।”
काली घड़ी अचानक ज़ोर से बज उठी।
टन्न्न्न्न…
फ़िरोज़ ने अपने सीने पर हाथ रखा।
उसकी धड़कनें तेज़ हो गईं।
एक धड़कन उसकी थी।
दूसरी किसी और की।
धक…
धक…
धक…
धक…
साया उसके सामने खड़ा था।
अब उसका चेहरा सलीम का नहीं था।
कभी सलीम।
कभी हामिद।
कभी अरिफ़।
कभी नूर।
और हर चेहरे के पीछे…
फ़िरोज़ का अपना चेहरा।
“तुम्हारे अब्बा कौन थे?” साया ने पूछा।
फ़िरोज़ ने दाँत भींच लिए।
“सलीम।”
“सलीम कौन था?”
“मेरे पिता।”
“पिता कौन होता है?”
फ़िरोज़ चुप।
साया ने आगे कहा—
“जो जन्म देता है?”
“हाँ।”
“तो तुम्हें किसने जन्म दिया?”
फ़िरोज़ की आँखों के सामने सारे चेहरे घूमने लगे।
ज़ोया।
सलीमा।
नूर।
हामिद।
सलीम।
अरिफ़।
और फिर…
एक ऐसा चेहरा, जिसका कोई चेहरा नहीं था।
साया ने धीरे से कहा—
“तुम्हारे अब्बा ने तुम्हें जन्म नहीं दिया था।”
“तो?”
“उन्होंने तुम्हें नाम दिया था।”
“नाम?”
“और नाम देने वाला… हमेशा पिता नहीं होता।”
फ़िरोज़ ने अचानक साया की गर्दन पकड़ ली।
“तुम क्या चाहते हो?”
साया ने कोई विरोध नहीं किया।
उसका शरीर धुएँ जैसा था।
“घर।”
“कौन-सा घर?”
“वही घर… जहाँ तुम पहली बार पैदा हुए थे।”
“मैं यहाँ पैदा नहीं हुआ था।”
साया मुस्कुराया।
“तुम यहाँ पैदा नहीं हुए थे, फ़िरोज़।”
उसने हवेली की दीवार की तरफ़ इशारा किया।
दीवार पर एक दरवाज़ा उभर आया।
उस पर कोई नंबर नहीं था।
कोई निशान नहीं था।
सिर्फ़ एक वाक्य लिखा था—
“जिस घर में कोई पैदा नहीं हुआ।”
सलीमा ने दरवाज़ा देखते ही चीखने की कोशिश की।
लेकिन उसके मुँह से आवाज़ नहीं निकली।
फ़िरोज़ ने उसकी तरफ़ देखा।
“तुम इस दरवाज़े को जानती हो?”
सलीमा ने सिर हिला दिया।
“इसे कभी मत खोलना।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसके अंदर तुम्हारा घर है।”
“तो मैं देखना चाहता हूँ।”
“नहीं!”
सलीमा ने पहली बार ज़ोर से चिल्लाया।
उसकी आवाज़ के साथ पूरी हवेली काँप गई।
छत से धूल गिरने लगी।
खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।
बाहर अँधेरे में सैकड़ों परछाइयाँ खड़ी थीं।
हर परछाईं फ़िरोज़ जैसी दिख रही थी।
सलीमा ने फ़िरोज़ का हाथ पकड़ लिया।
“अगर तुम अंदर गए… तो वापस फ़िरोज़ बनकर नहीं आओगे।”
“तो क्या बनूँगा?”
सलीमा ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम्हारे अब्बा।”
फ़िरोज़ ने हाथ छुड़ा लिया।
साया दरवाज़े के सामने जा खड़ा हुआ।
“चलो, अब्बा।”
फ़िरोज़ ने गुस्से से कहा—
“मुझे अब्बा मत कहो!”
साया ने धीरे से दरवाज़ा खोला।
अंदर अँधेरा नहीं था।
अंदर एक छोटा-सा घर था।
साफ़ दीवारें।
पीली रोशनी।
रसोई से आती चाय की खुशबू।
एक मेज़ पर दो कप।
दीवार पर फ़िरोज़ की बचपन की तस्वीरें।
एक कोने में सलीमा बैठी थी।
दूसरे कोने में सलीम।
दोनों मुस्कुरा रहे थे।
जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं।
जैसे कोई मौत नहीं हुई।
जैसे कोई हवेली नहीं थी।
जैसे कोई साया नहीं था।
सलीम ने फ़िरोज़ को देखते ही कहा—
“आ गए बेटा?”
फ़िरोज़ दरवाज़े पर रुक गया।
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
“अब्बा…”
सलीम उठकर उसकी तरफ़ बढ़ा।
“बहुत देर कर दी तुमने।”
“आप… ज़िंदा हैं?”
सलीम मुस्कुराया।
“मैं कभी मरा ही नहीं था।”
फ़िरोज़ ने काँपते हुए पूछा—
“तो फिर उस रात क्या हुआ था?”
सलीम का चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।
उसकी मुस्कान गायब हो गई।
“उस रात…”
कमरे की रोशनी झिलमिलाई।
“उस रात मैंने तुम्हें बचाने के लिए… तुम्हारी जगह ले ली थी।”
फ़िरोज़ की साँस रुक गई।
“किसकी जगह?”
सलीम ने उसके सीने की तरफ़ देखा।
“मौत की।”
अचानक घर की सारी खिड़कियाँ बंद हो गईं।
दरवाज़ा पीछे से बंद हो गया।
सलीम की आँखें काली हो गईं।
“तुम्हें याद है, फ़िरोज़… जब तुम छह साल के थे, तुमने मुझसे क्या पूछा था?”
फ़िरोज़ की यादों में एक पुराना दृश्य चमका।
छोटा फ़िरोज़।
बारिश की रात।
सलीम उसके पास बैठा था।
फ़िरोज़ ने पूछा था—
“अब्बा, अगर कोई मर जाए तो कहाँ जाता है?”
सलीम ने उसके सिर पर हाथ रखा था।
“घर।”
“कौन-सा घर?”
“जिसे वह सबसे ज़्यादा याद करता है।”
वर्तमान में सलीम ने कहा—
“मैं उसी घर में चला गया था।”
फ़िरोज़ ने धीरे से पूछा—
“और आप वापस क्यों नहीं आए?”
सलीम की आँखों से काला तरल बहने लगा।
“क्योंकि घर ने मुझे जाने नहीं दिया।”
उसके पीछे दीवार पर एक विशाल परछाईं उभरी।
उस परछाईं का चेहरा नहीं था।
लेकिन उसकी आवाज़ सलीम की थी।
“क्योंकि सलीम कभी फ़िरोज़ का अब्बा था ही नहीं…”
फ़िरोज़ ने पीछे हटना चाहा।
लेकिन उसके पैर फ़र्श में धँस गए।
सलीम ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
“आओ बेटा।”
फ़िरोज़ ने हाथ नहीं पकड़ा।
“आप कौन हैं?”
सलीम का चेहरा टूटने लगा।
त्वचा के नीचे से काला धुआँ निकलने लगा।
उसकी आँखें खाली हो गईं।
और फिर उसने कहा—
“मैं वो हूँ… जिसने तुम्हारे लिए मरने का वादा किया था।”
“और तुमने वादा पूरा किया?”
“नहीं।”
सलीम ने सिर उठाया।
“मैंने तुम्हें अपनी मौत दे दी।”
कमरे की दीवारों पर लिखे सारे नाम मिटने लगे।
ज़ोया।
नूर।
अरिफ़।
हामिद।
सलीमा।
सलीम।
सब मिट गया।
सिर्फ़ एक नाम बचा—
फ़िरोज़।
फिर उस नाम के नीचे एक और नाम उभरा।
अब्बा।
फ़िरोज़ ने पूरी ताक़त से चीखकर कहा—
“मैं किसी का अब्बा नहीं हूँ!”
घर की छत फट गई।
ऊपर से काली घड़ी नीचे गिरी।
वह फ़र्श पर टूट गई।
उसके अंदर से खून नहीं…
एक छोटी-सी सफ़ेद हड्डी निकली।
सलीम ने उसे उठाया।
“ये तुम्हारी पहली हड्डी है।”
फ़िरोज़ ने घबराकर पूछा—
“क्या?”
“तुम्हारे पहले शरीर की।”
“मेरा पहला शरीर?”
सलीम ने हड्डी फ़िरोज़ के सीने से लगा दी।
अचानक फ़िरोज़ के अंदर कोई दरवाज़ा खुल गया।
उसने देखा—
एक बच्चा।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
हर बच्चा उसी कमरे में पैदा हो रहा था।
हर बच्चे की गर्दन पर काली बिंदी थी।
हर बच्चे की आँखें खुली थीं।
हर बच्चे के सामने सलीम खड़ा था।
और हर बार सलीम एक ही बात कहता था—
“इस बार इसे बचा लेंगे।”
लेकिन हर बार…
बच्चे की परछाईं अलग हो जाती।
हर बार…
एक बच्चा मर जाता।
हर बार…
एक नया फ़िरोज़ पैदा होता।
फ़िरोज़ ने अपने कान बंद कर लिए।
“बस करो!”
लेकिन दृश्य नहीं रुका।
आख़िरी कमरे में एक बच्चा अकेला पड़ा था।
उसके पास न सलीमा थी।
न सलीम।
न नूर।
न हामिद।
सिर्फ़ एक आईना।
बच्चे ने आईने में देखा।
आईने में उसका चेहरा नहीं था।
आईने में फ़िरोज़ खड़ा था।
वर्तमान वाला फ़िरोज़।
बच्चे ने धीरे से कहा—
“अब्बा आ गए।”
फ़िरोज़ चीख उठा।
“नहीं!”
आईने में खड़ा फ़िरोज़ मुस्कुराया।
“तुम मुझे छोड़कर चले गए थे।”
“मैं तुम्हें नहीं जानता!”
“तुमने मुझे बंद किया था।”
“मैंने किसी को बंद नहीं किया!”
“तुमने अपनी मौत को बंद किया था।”
आईना चटक गया।
उसमें से वही बच्चा बाहर निकल आया।
उसका चेहरा फ़िरोज़ जैसा था।
लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
बच्चा फ़िरोज़ के सामने खड़ा हो गया।
“तुम्हें याद है अब?”
फ़िरोज़ काँपते हुए बोला—
“क्या?”
बच्चे ने अपनी छोटी उँगली फ़िरोज़ के सीने पर रखी।
“तुमने मुझे मारा नहीं था…”
वह मुस्कुराया।
“तुमने मुझे अपने अंदर बंद कर दिया था।”
फ़िरोज़ के सीने पर काली दरार फैल गई।
उस दरार के अंदर से किसी की आवाज़ आई।
धीमी।
बहुत पुरानी।
“फ़िरोज़…”
फिर वही आवाज़ बदलकर बोली—
“अब्बा…”
बच्चा पीछे हट गया।
सलीम ने सिर झुका लिया।
और घर की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।
अँधेरे में सिर्फ़ काली घड़ी की टूटी हुई सुई चमक रही थी।
वह सुई अपने आप घूमी।
2:48…
2:49…
2:50…
फिर अचानक वापस—
2:47।
फ़िरोज़ ने महसूस किया कि उसके पीछे कोई खड़ा है।
उसने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।
वहाँ सलीमा थी।
लेकिन वह अब घायल नहीं थी।
उसके कपड़े साफ़ थे।
चेहरा जवान था।
आँखें चमक रही थीं।
और उसके हाथ में वही लोहे की छड़ थी।
सलीमा ने फ़िरोज़ को देखा।
“बेटा…”
फ़िरोज़ ने राहत की साँस ली।
“अम्मी…”
सलीमा ने छड़ उठाई।
“इस बार…”
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“इस बार मैं तुम्हें नहीं मारूँगी।”
फ़िरोज़ पीछे हट गया।
“तो क्या करोगी?”
सलीमा ने छड़ अपने सीने में घोंप दी।
काला खून फ़र्श पर फैल गया।
वह मुस्कुराई।
“इस बार…”
उसका शरीर धीरे-धीरे राख बनने लगा।
“मैं तुम्हें जन्म दूँगी।”
फ़िरोज़ चीखता हुआ उसकी तरफ़ बढ़ा।
लेकिन सलीमा की राख हवा में घुल चुकी थी।
सिर्फ़ उसकी आवाज़ बची—
“क्योंकि असली फ़िरोज़…”
दीवार के पार से सैकड़ों आवाज़ें एक साथ आईं—
“अभी पैदा ही नहीं हुआ।”
दरवाज़ा ज़ोर से बंद हुआ।
सलीम का चेहरा अँधेरे में गायब हो गया।
और फ़िरोज़ के सीने के अंदर से एक बच्चा रोने लगा।
इस बार…
वह बच्चा बाहर नहीं था।
वह फ़िरोज़ के अंदर पैदा हो रहा था।
अचानक उसके सीने पर शब्द उभरे—
जन्म: 8 सितंबर 2026 समय: 2:47 पिता: सलीम सैफ़ी माँ: मृत्यु
फ़िरोज़ ने आख़िरी बार चीखकर कहा—
“मैं फ़िरोज़ हूँ!”
अँधेरे से जवाब आया—
“नहीं…”
फिर एक भारी आवाज़ गूँजी—
“तुम्हारा नाम फ़िरोज़ नहीं है।”
काली घड़ी की सुई 2:48 पर पहुँची।
और किसी ने उसके कान में फुसफुसाया—
“अब्बा… अपने असली घर में आपका स्वागत है।”
एपिसोड 15 समाप्त।