PretikaGhost Storiesनीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार

एपिसोड 14 — जिस नाम से मौत डरती थी

firoj saifi · Ghost Stories · 11 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
Chapter
14 of 15
Category
Ghost Stories
Reading time
11 min
Words
2115
Language
Hindi (हिंदी)
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Free to read

फ़िरोज़ आईने के टूटे हुए टुकड़ों के बीच खड़ा था।

उसके चारों तरफ अंधेरा था।

सामने वही बच्चा खड़ा था।

बच्चा फ़िरोज़ जैसा दिखता था, लेकिन उसकी आँखों में ऐसी गहराई थी जैसे उसने सदियों से इंसानों को मरते देखा हो।

बच्चे ने फिर पूछा—

“तुम जीना चाहते हो… या अपना नाम वापस लेना?”

फ़िरोज़ ने कहा—

“अगर मेरा नाम नहीं है, तो मेरा जीना किस काम का?”

बच्चा मुस्कुराया।

“यही जवाब चाहिए था।”

उसने अपनी हथेली फ़िरोज़ की तरफ बढ़ाई।

“तो अपना नाम मुझे दे दो।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“मेरा नाम देने से क्या होगा?”

“तुम्हें अपनी असली पहचान मिल जाएगी।”

“और तुम?”

“मैं तुम्हारी जगह जीऊँगा।”

“तुम कौन हो?”

बच्चे ने कहा—

“मैं तुम्हारा पहला जन्म हूँ।”

फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।

“मेरा पहला जन्म तो मर चुका है।”

“हाँ।”

“तो तुम ज़िंदा कैसे हो?”

बच्चा उसके करीब आया।

“क्योंकि तुमने मुझे मारा नहीं था।”

फ़िरोज़ के चेहरे पर उलझन उभरी।

“लेकिन सलीमा ने कहा था…”

“सलीमा ने कहा था कि उसने मुझे मारा।”

“हाँ।”

“उसने सिर्फ़ मेरा शरीर मारा था।”

बच्चे ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“मेरी आत्मा तुम्हारे अंदर चली गई थी।”

फ़िरोज़ ने फुसफुसाकर कहा—

“तो तुम मेरे अंदर थे?”

“मैं तुम्हारी हर याद में था।”

“मेरे हर सपने में?”

“हाँ।”

“मेरी हर चीख में?”

“हाँ।”

“तो जब मैं अकेला रोता था…?”

बच्चे ने कहा—

“तब मैं तुम्हारे अंदर से रोता था।”

फ़िरोज़ की आँखों से आँसू बहने लगे।

“तुमने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

बच्चे ने धीरे से कहा—

“क्योंकि सलीमा ने मेरा नाम मिटा दिया था।”

“तुम्हारा नाम क्या था?”

बच्चा चुप रहा।

कमरे में अचानक दूर से किसी घड़ी की आवाज़ आई।

टिक…

बच्चे ने कहा—

“नाम बोलने से पहले तुम्हें एक बात याद करनी होगी।”

“क्या?”

“तुमने मुझे क्यों मारा था?”

फ़िरोज़ के सामने अंधेरा घूमने लगा।

फिर एक दृश्य उभरा।

एक पुराना घर।

बाहर तूफ़ान।

अंदर छोटा फ़िरोज़ छह साल का बैठा था।

उसके सामने एक बच्चा खड़ा था।

वह बच्चा बिल्कुल उसके जैसा था।

सलीमा दरवाज़े पर खड़ी थी।

उसके हाथ में लोहे की छड़ थी।

सलीमा ने कहा—

“फ़िरोज़, उसे अपने अंदर वापस भेजो।”

छोटे फ़िरोज़ ने बच्चे का हाथ पकड़ा।

“वो मेरा भाई है।”

सलीमा ने कहा—

“वो तुम्हारा भाई नहीं। वो मौत है।”

बच्चे ने फ़िरोज़ से कहा—

“अगर तुमने मुझे बाहर नहीं निकाला, तो मैं तुम्हारे अंदर हमेशा के लिए बंद हो जाऊँगा।”

छोटे फ़िरोज़ ने पूछा—

“क्या तुम मुझे नुकसान पहुँचाओगे?”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

सलीमा चीखी—

“झूठ!”

उसने लोहे की छड़ उठाई।

छोटे फ़िरोज़ ने बच्चे को बचाने के लिए उसे अपने पीछे कर लिया।

लेकिन उसी पल बच्चे की आँखें सफ़ेद हो गईं।

उसकी उँगलियाँ छोटे फ़िरोज़ की गर्दन पर कस गईं।

फ़िरोज़ साँस नहीं ले पा रहा था।

सलीमा ने छड़ से बच्चे पर वार किया।

बच्चा पीछे गिरा।

छोटा फ़िरोज़ भी उसके साथ गिर गया।

सलीमा ने बच्चे को उठाया और फ़िरोज़ से कहा—

“इसे भूल जाओ।”

फिर उसने बच्चे की छाती पर काला निशान बना दिया।

बच्चा चिल्लाया—

“भैया!”

छोटे फ़िरोज़ ने रोते हुए कहा—

“मुझे माफ़ कर दो…”

सलीमा ने उसे कुएँ के पास ले जाकर अंधेरे में फेंक दिया।

दृश्य टूट गया।

फ़िरोज़ वर्तमान में लौट आया।

उसकी साँसें तेज़ थीं।

उसने बच्चे की तरफ देखा।

“मैंने तुम्हें नहीं मारा था।”

बच्चा बोला—

“तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया था।”

“मैं बच्चा था।”

“लेकिन तुम्हारी आत्मा जाग रही थी।”

“मुझे कुछ याद नहीं था।”

“यादें मिटाई गई थीं।”

“किसने?”

बच्चे ने कहा—

“सलीमा ने नहीं।”

फ़िरोज़ चौंका।

“तो किसने?”

बच्चे ने अपनी उँगली फ़िरोज़ की छाती पर रखी।

“तुमने खुद।”

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

“मैंने?”

“तुमने अपनी यादें बंद कीं, ताकि तुम्हें अपने किए का दर्द न सहना पड़े।”

“मैंने क्या किया था?”

बच्चा उसकी आँखों में देखने लगा।

“तुमने अपनी माँ को मौत के हवाले किया था।”

फ़िरोज़ के सामने नूर का चेहरा उभरा।

वह रो रही थी।

उसने फ़िरोज़ को सीने से लगाया था।

फिर एक काली परछाईं उनके पीछे खड़ी हो गई थी।

नूर ने छोटे फ़िरोज़ से कहा—

“बेटा, अगर मैं तुम्हारे अंदर चली जाऊँ… तो मुझे कभी बाहर मत निकालना।”

छोटे फ़िरोज़ ने पूछा—

“क्यों?”

“क्योंकि बाहर मौत है।”

फिर फ़िरोज़ ने नूर को अपने सीने से लगा लिया।

नूर की आत्मा उसके अंदर समा गई।

लेकिन उसी क्षण हामिद की मौत भी उसके अंदर घुस गई।

फ़िरोज़ चीख उठा।

उसकी चीख से नूर की आत्मा दो हिस्सों में टूट गई।

एक हिस्सा उसके अंदर रह गया।

दूसरा हिस्सा काली घड़ी में बंद हो गया।

फ़िरोज़ ने आँखें खोल दीं।

“मैंने नूर को नहीं मारा…”

बच्चे ने कहा—

“तुमने उसे बाँट दिया।”

“मैं बच्चा था!”

“लेकिन तुम्हारे अंदर मौत थी।”

फ़िरोज़ ने अपने सीने पर हाथ रखा।

“तो मेरी आत्मा?”

बच्चे ने कहा—

“तुम्हारी आत्मा नूर के साथ बँट गई थी।”

“और जो बचा?”

“वो सिर्फ़ इच्छा थी।”

“किसकी इच्छा?”

बच्चा मुस्कुराया।

“जीने की।”

फ़िरोज़ ने धीरे-धीरे समझना शुरू किया।

वह शरीर था।

उसके अंदर नूर की आत्मा का टुकड़ा था।

हामिद की मौत थी।

उसका पहला चेहरा था।

लेकिन उसकी अपनी आत्मा—

सिर्फ़ जीने की इच्छा थी।

एक ऐसी इच्छा, जिसने उसे हर बार मौत से वापस खींचा था।

बच्चे ने कहा—

“तुम्हारा नाम फ़िरोज़ नहीं था।”

“तो क्या था?”

बच्चे ने पहली बार सिर झुकाया।

“तुम्हारा नाम…”

अचानक पूरा कमरा काँप उठा।

ऊपर से सलीमा की चीख सुनाई दी—

“फ़िरोज़! जल्दी बाहर आओ!”

फ़िरोज़ ने ऊपर देखा।

बच्चे ने कहा—

“वो आ गई।”

“कौन?”

अंधेरे के पीछे से एक लंबी परछाईं निकली।

उसने फ़िरोज़ का चेहरा पहन रखा था।

लेकिन उसके पीछे सैकड़ों चेहरे घूम रहे थे।

सलीम।

हामिद।

ज़ोया।

नूर।

सलीमा।

और उन सभी के बीच एक चेहरा ऐसा था, जिसे फ़िरोज़ पहचान नहीं पा रहा था।

परछाईं ने कहा—

“अब नाम जानने का समय नहीं।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“तुम मुझे रोकना चाहते हो?”

“नहीं।”

“तो?”

“मैं तुम्हें सच से बचाना चाहता हूँ।”

“सच क्या है?”

परछाईं ने धीरे से कहा—

“तुम्हारा जन्म किसी माँ से नहीं हुआ।”

फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।

“क्या?”

“तुम्हें बनाया गया था।”

“ये मैं जानता हूँ।”

“नहीं। तुम नहीं जानते।”

परछाईं उसके पास आई।

“तुम्हें किसी आत्मा से नहीं बनाया गया।”

“तो?”

“तुम्हें एक मौत से बनाया गया।”

फ़िरोज़ के चेहरे पर भय उतर आया।

परछाईं ने कहा—

“तुम्हारे अंदर हामिद की मौत नहीं है।”

“तो क्या है?”

“तुम खुद हामिद की मौत हो।”

फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।

“नहीं…”

“तुम्हारा शरीर एक खाली पात्र था। नूर ने उसमें अपनी आत्मा रखी। सलीमा ने उसमें अपनी यादें रखीं। सलीम ने उसमें अपना चेहरा रखा।”

परछाईं ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“लेकिन जो चीज़ तुम्हें चलाती रही… वो मैं था।”

“तुम?”

“तुम्हारी मौत।”

फ़िरोज़ ने गुस्से में कहा—

“मैं तुम्हें खत्म कर दूँगा!”

परछाईं हँस पड़ी।

“तुम मुझे कैसे खत्म करोगे? मैं तुम्हारे बिना मौजूद ही नहीं।”

“तो मैं खुद को खत्म कर दूँगा।”

“तब मैं आज़ाद हो जाऊँगा।”

फ़िरोज़ चुप हो गया।

परछाईं ने कहा—

“यही कारण है कि तुम्हें बार-बार मरने से रोका गया।”

“किसने रोका?”

“सलीमा ने।”

“क्यों?”

“क्योंकि वो जानती थी कि अगर तुम मर गए, तो तुम्हारी मौत शरीर से अलग होकर पूरी दुनिया में फैल जाएगी।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“तो मुझे क्या करना होगा?”

परछाईं ने कहा—

“अपनी मौत को नाम देना होगा।”

“कैसे?”

“उसका असली नाम याद करके।”

फ़िरोज़ ने बच्चे की तरफ देखा।

“तुम जानते हो?”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“तो बताओ।”

बच्चा उसके करीब आया।

उसने फ़िरोज़ के कान में एक नाम फुसफुसाया।

नाम सुनते ही फ़िरोज़ के शरीर में बिजली दौड़ गई।

उसकी आँखों के सामने सभी दृश्य एक साथ घूमने लगे।

1939 का कुआँ।

ज़ोया का खून।

सलीमा की लोहे की छड़।

सलीम का चेहरा।

नूर की आत्मा।

हामिद की चीख।

और एक बच्चा—

जो कुएँ में गिरते हुए चिल्ला रहा था।

“मेरा नाम फ़िरोज़ नहीं… मेरा नाम…”

फ़िरोज़ ने अपनी पूरी ताक़त से चीखकर वह नाम बोल दिया।

कमरा सफ़ेद रोशनी से भर गया।

ऊपर हवेली में सभी घड़ियाँ टूटने लगीं।

सलीमा ने चीखते हुए कहा—

“नहीं! उसने नाम याद कर लिया!”

नूर की आत्मा काँपने लगी।

हामिद का चेहरा धुएँ में बदल गया।

काली परछाईं पीछे हट गई।

और बच्चे का शरीर धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगा।

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

“रुको!”

बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—

“अब तुम मुझे बचा सकते हो।”

“कैसे?”

“मुझे अपने अंदर वापस आने दो।”

फ़िरोज़ ने कहा—

“नहीं। इस बार मैं तुम्हें कैद नहीं करूँगा।”

“तो?”

“तुम मेरे साथ रहोगे।”

बच्चे की आँखों में पहली बार सुकून आया।

वह रोशनी बनकर फ़िरोज़ की छाती में समा गया।

लेकिन इस बार फ़िरोज़ की छाती पर कोई काला निशान नहीं बना।

उसके सीने पर एक सफ़ेद निशान उभरा।

एक नाम की तरह।

ऊपर से सलीमा की आवाज़ आई—

“फ़िरोज़… जल्दी करो!”

फ़िरोज़ ने ऊपर देखा।

कुएँ की दीवार टूट रही थी।

वह सीढ़ियों की तरफ दौड़ा।

ऊपर पहुँचते ही उसने देखा—

सलीमा ज़मीन पर पड़ी थी।

उसके सीने में लोहे की छड़ धँसी हुई थी।

नूर की आत्मा उसके ऊपर झुकी थी।

हामिद सामने खड़ा था।

उसके हाथ में काली घड़ी थी।

फ़िरोज़ चीखा—

“सलीमा!”

सलीमा ने मुश्किल से आँखें खोलीं।

“तुमने… अपना नाम याद कर लिया?”

फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

सलीमा ने काँपते हुए पूछा—

“क्या नाम था?”

फ़िरोज़ उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।

“मेरा नाम फ़िरोज़ नहीं था।”

“तो?”

फ़िरोज़ ने उसके कान के पास झुककर कहा—

“मेरा नाम…”

लेकिन वह रुक गया।

क्योंकि सलीमा की आँखों में अचानक डर नहीं, बल्कि राहत दिखाई दी।

उसने फुसफुसाकर कहा—

“मत बताना…”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“क्यों?”

सलीमा ने हामिद की तरफ देखा।

“क्योंकि अगर तुमने अपना नाम ज़ोर से बोल दिया…”

हामिद मुस्कुराया।

“तो मैं तुम्हें पहचान लूँगा।”

फ़िरोज़ धीरे-धीरे खड़ा हुआ।

“तुम मुझे पहले से जानते हो।”

हामिद ने कहा—

“नहीं।”

उसका चेहरा बदलने लगा।

पहले बूढ़ा हामिद।

फिर जवान हामिद।

फिर सलीम।

फिर फ़िरोज़।

और आख़िर में—

एक बिल्कुल अनजान चेहरा।

वह चेहरा फ़िरोज़ के चेहरे से भी पुराना था।

हामिद ने कहा—

“मैं तुम्हें नहीं जानता।”

फ़िरोज़ ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

सफ़ेद निशान चमक रहा था।

“तो फिर तुम्हें मेरे नाम से डर क्यों लग रहा है?”

हामिद पीछे हट गया।

काली घड़ी उसके हाथ से गिर गई।

घड़ी ज़मीन पर टूटते ही हवेली के ऊपर से एक भयानक चीख सुनाई दी।

आसमान में बिजली चमकी।

सभी दरवाज़े खुल गए।

और हर दरवाज़े के पीछे से एक ही आवाज़ आई—

“मेरा नाम मत लेना…”

फ़िरोज़ ने हामिद की तरफ कदम बढ़ाया।

“अब मैं अपना नाम बोलूँगा।”

हामिद ने चीखकर कहा—

“नहीं!”

फ़िरोज़ ने पूरी ताक़त से अपना नाम पुकारा—

“मेरा नाम… फ़िरोज़ सैफ़ी है!”

कुछ भी नहीं हुआ।

न कोई विस्फोट।

न कोई चीख।

न कोई मौत।

हामिद हँसने लगा।

“तुमने गलत नाम लिया।”

फ़िरोज़ के चेहरे पर हैरानी छा गई।

हामिद ने कहा—

“फ़िरोज़ सैफ़ी तुम्हारा दिया हुआ नाम है।”

वह उसके करीब आया।

“तुम्हारा असली नाम कुछ और है।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“तो बताओ!”

हामिद ने उसके कान के पास झुककर कहा—

“तुम्हारा असली नाम… मौत है।”

अचानक फ़िरोज़ के पीछे खड़ी परछाईं ने अपना सिर उठाया।

उसका चेहरा अब किसी इंसान का नहीं था।

वह एक विशाल काली आँख बन चुकी थी।

आँख के अंदर एक शब्द चमक रहा था—

“मौत”

फ़िरोज़ की छाती में सफ़ेद निशान जलने लगा।

सलीमा ने आख़िरी ताक़त से चीखकर कहा—

“फ़िरोज़! अपना नाम मत मानना!”

हामिद गरजा—

“अब बहुत देर हो चुकी है!”

फ़िरोज़ ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

उसके अंदर से एक बच्चे की आवाज़ आई—

“भैया… तुम्हारा नाम मौत नहीं है।”

फ़िरोज़ ने आँखें बंद कीं।

“तो मेरा नाम क्या है?”

बच्चे ने कहा—

“तुम्हारा नाम वही है… जिसे तुम खुद चुनोगे।”

फ़िरोज़ ने आँखें खोल दीं।

उसने हामिद की तरफ देखा।

“मैं मौत नहीं हूँ।”

हामिद पीछे हटने लगा।

“तुम क्या हो?”

फ़िरोज़ ने कहा—

“मैं वो हूँ… जो मौत के सामने खड़ा है।”

उसकी छाती से सफ़ेद रोशनी निकली।

नूर की आत्मा उसके अंदर लौट आई।

बच्चे की आत्मा उसके साथ मिल गई।

सलीम की आवाज़ उसके भीतर गूँजी—

“डर के सामने खड़े होना।”

फ़िरोज़ ने हाथ उठाया।

काली परछाईं चीख उठी।

हामिद का चेहरा टूटने लगा।

लेकिन उसी पल सलीमा ने फ़िरोज़ का हाथ पकड़ लिया।

उसकी साँसें बहुत धीमी थीं।

“बेटा…”

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ देखा।

सलीमा ने कहा—

“मुझे माफ़ मत करना।”

“क्यों?”

“क्योंकि मैंने अभी तक तुम्हें सबसे बड़ा सच नहीं बताया।”

फ़िरोज़ झुक गया।

“क्या?”

सलीमा ने उसकी कलाई पकड़ी।

उसकी उँगलियाँ बर्फ़ जैसी ठंडी थीं।

“तुम्हारा नाम…”

वह खाँसी।

उसके होंठों से खून निकला।

“तुम्हारा नाम फ़िरोज़ नहीं…”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“तो?”

सलीमा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

“तुम्हारा नाम… सलीम है।”

फ़िरोज़ पत्थर की तरह जम गया।

सलीमा ने आख़िरी साँस लेते हुए कहा—

“क्योंकि तुम… मेरे बेटे नहीं…”

उसकी आँखें बंद हो गईं।

“तुम्हारे अब्बा हो।”

उसी क्षण हवेली की सारी घड़ियाँ रुक गईं।

हामिद गायब हो गया।

नूर की आत्मा चीख उठी।

और फ़िरोज़ के पीछे खड़ी परछाईं ने धीरे-धीरे सलीम का चेहरा पहन लिया।

उसने फ़िरोज़ की तरफ देखकर कहा—

“अब्बा… घर चलो।”
एपिसोड 14 समाप्त।

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