PretikaGhost Storiesनीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार

एपिसोड 13 — आख़िरी रात का पहला घंटा

firoj saifi · Ghost Stories · 9 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
Chapter
13 of 15
Category
Ghost Stories
Reading time
9 min
Words
1672
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

हवेली की घड़ी ने बारहवीं बार घंटा बजाया।

टन…

आवाज़ इतनी भारी थी कि पूरा भूमिगत कमरा काँप उठा।

फ़िरोज़ के सामने खड़ा बच्चा मुस्कुरा रहा था।

वह बच्चा बिल्कुल फ़िरोज़ जैसा था।

वही चेहरा।

वही आँखें।

वही माथे पर हल्का-सा निशान।

लेकिन उसके अंदर कुछ ऐसा था, जिसे देखकर फ़िरोज़ को अपने ही चेहरे से डर लगने लगा।

बच्चे ने कहा—

“तुम्हारी बारी मरने की है।”

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

“तुम कौन हो?”

बच्चे ने गर्दन तिरछी की।

“मैं वही हूँ, जिसे तुमने अपने अंदर बंद कर रखा था।”

“अयान?”

बच्चे की मुस्कान गायब हो गई।

“अयान मेरा नाम नहीं था।”

फ़िरोज़ ने कुएँ की तरफ देखा।

“तो फिर किसका नाम था?”

बच्चे ने कहा—

“उसका… जिसे तुमने पहली बार मारा था।”

भूमिगत कमरे में खड़े सभी चेहरे धीरे-धीरे फ़िरोज़ की तरफ मुड़ गए।

पालनों में पड़े बच्चे रोना बंद कर चुके थे।

अब वे सभी एक साथ फुसफुसा रहे थे—

“नाम बताओ…”

“नाम बताओ…”

“नाम बताओ…”

फ़िरोज़ ने अपने कान बंद कर लिए।

“चुप हो जाओ!”

बच्चा उसके पास आया।

“तुम्हें अपना नाम चाहिए न?”

फ़िरोज़ ने गुस्से से कहा—

“हाँ!”

बच्चे ने अपनी उँगली फ़िरोज़ की छाती पर रखी।

“तो पहले ये मानो कि तुम कभी फ़िरोज़ थे ही नहीं।”

फ़िरोज़ ने उसका हाथ झटक दिया।

“मैं फ़िरोज़ हूँ!”

“नहीं।”

“मैं फ़िरोज़ हूँ!”

“तुम सिर्फ़ एक नाम हो।”

बच्चे ने धीरे से कहा—

“और नाम बदलते रहते हैं।”

अचानक फ़िरोज़ के पीछे खड़ी सलीमा आगे आई।

उसके हाथ में वही लोहे की छड़ थी।

फ़िरोज़ ने उसे देखा।

“अब क्या करने वाली हो?”

सलीमा ने कहा—

“तुम्हें रोकने।”

“किससे?”

“तुमसे।”

फ़िरोज़ की आँखें भर आईं।

“तुम मुझे हर बार रोकती क्यों हो?”

सलीमा ने छड़ कसकर पकड़ ली।

“क्योंकि हर बार जब तुम सच के करीब जाते हो… कोई न कोई मर जाता है।”

“इस बार कौन मरेगा?”

सलीमा ने उसकी तरफ देखा।

“मैं।”

फ़िरोज़ चुप हो गया।

सलीमा ने छड़ ज़मीन पर रख दी।

“अगर तुम्हारी असली आत्मा जाग गई, तो मेरी ज़रूरत खत्म हो जाएगी।”

“तुम्हारी ज़रूरत?”

“मैं तुम्हारे अंदर बंद तीन आत्माओं के बीच का बंधन हूँ। जब तक मैं ज़िंदा हूँ, वे एक-दूसरे को नष्ट नहीं कर सकतीं।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“और अगर तुम मर गईं?”

सलीमा ने कहा—

“तो तुममें से सिर्फ़ एक बचेगा।”

“कौन?”

सलीमा ने कुएँ के अंदर देखा।

“जो सबसे ज़्यादा ताक़तवर होगा।”

बच्चा हँस पड़ा।

“और तुम जानते हो कि वो कौन है।”

फ़िरोज़ ने बच्चे की तरफ देखा।

“तुम?”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

उसने फ़िरोज़ की छाती की तरफ इशारा किया।

“वो।”

फ़िरोज़ के सीने पर काला निशान चमकने लगा।

निशान के बीच एक आँख खुल गई।

आँख के अंदर एक और चेहरा दिखाई दिया।

हामिद।

हामिद की आवाज़ आई—

“तुम्हें मेरे साथ एक सौदा करना होगा।”

फ़िरोज़ ने कहा—

“मैं तुम्हारे साथ कोई सौदा नहीं करूँगा।”

“तुम्हें अपनी आत्मा वापस चाहिए।”

“हाँ।”

“तो मुझे अपनी दे दो।”

फ़िरोज़ ने हँसकर कहा—

“तुम्हारे पास पहले से मेरी आत्मा है।”

हामिद की आवाज़ धीमी हो गई।

“नहीं। मेरे पास तुम्हारी मौत है।”

कमरे में अचानक अंधेरा छा गया।

फ़िरोज़ ने महसूस किया कि कोई उसके पीछे खड़ा है।

वह मुड़ा।

वहाँ एक लंबा आदमी खड़ा था।

उसने काला कोट पहना हुआ था।

उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

लेकिन उसकी कलाई पर काली घड़ी थी।

घड़ी की सुइयाँ उल्टी घूम रही थीं।

2:50… 2:49… 2:48…

आदमी ने कहा—

“तुम्हें अपनी आत्मा चाहिए?”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“तुम कौन हो?”

आदमी ने सिर उठाया।

उसका चेहरा खाली था।

न आँखें।

न नाक।

न होंठ।

सिर्फ़ एक चिकना, सफ़ेद चेहरा।

उसने कहा—

“मैं वो हूँ, जो हर जन्म के बाद तुम्हारा चेहरा पहनता है।”

फ़िरोज़ की साँस अटक गई।

“मौत?”

“मौत मेरा नाम नहीं।”

“तो फिर?”

आदमी ने हाथ बढ़ाया।

“मुझे अपना नाम दो। मैं तुम्हें तुम्हारी आत्मा दे दूँगा।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“अगर मैंने नाम दे दिया तो?”

“तुम आज़ाद हो जाओगे।”

“और तुम?”

“मैं तुम्हारी जगह जीऊँगा।”

सलीमा चीख पड़ी—

“फ़िरोज़, उसकी बात मत मानना!”

आदमी ने सलीमा की तरफ देखा।

उसके चेहरे पर अचानक सलीमा की आँखें उभर आईं।

“तुमने भी तो यही किया था।”

सलीमा पीछे हट गई।

“मैंने किसी का नाम नहीं चुराया।”

आदमी ने कहा—

“तुमने ज़ोया का चेहरा चुराया।”

सलीमा के हाथ काँपने लगे।

“मैंने उसे बचाने की कोशिश की थी।”

“तुमने उसे मारकर उसकी आत्मा को बच्चे में बाँध दिया।”

“मैं मजबूर थी!”

“मजबूरी और लालच में फर्क सिर्फ़ इतना है…”

आदमी उसके करीब आया।

“कि मजबूरी के बाद इंसान रोता है, और लालच के बाद झूठ बोलता है।”

फ़िरोज़ ने सलीमा की तरफ देखा।

“तुमने ज़ोया को क्यों मारा?”

सलीमा ने जवाब नहीं दिया।

आदमी ने कहा—

“क्योंकि ज़ोया ने तुम्हें जन्म नहीं दिया था।”

फ़िरोज़ ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

“क्या?”

“तुम्हारी असली माँ कोई और थी।”

सलीमा ने चीखकर कहा—

“बस!”

आदमी ने फ़िरोज़ से कहा—

“तुम्हारी असली माँ ने तुम्हें जन्म दिया… और उसी रात तुम्हें मौत के हवाले कर दिया।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“कौन थी वो?”

आदमी ने धीरे-धीरे अपना चेहरा बदला।

पहले सलीम…

फिर हामिद…

फिर ज़ोया…

और आखिर में—

नूर।

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

“नूर?”

नूर की आत्मा कमरे के दूसरे छोर पर दिखाई दी।

उसका चेहरा पीला था।

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ देखा।

“क्या तुमने मुझे मौत के हवाले किया था?”

नूर ने आँखें झुका लीं।

“मैंने तुम्हें मौत से बचाने की कोशिश की थी।”

“सच बोलो!”

“हाँ।”

“तुमने मुझे मौत को दिया?”

नूर की आवाज़ टूट गई।

“क्योंकि अगर मैं ऐसा नहीं करती… तो मौत तुम्हारे अब्बा को ले जाती।”

फ़िरोज़ की आँखों में दर्द उतर आया।

“तो तुमने मुझे बचाने के लिए अब्बा को चुना?”

नूर ने सिर हिलाया।

“मैंने तुम्हें चुना था।”

“फिर अब्बा क्यों मरे?”

नूर चुप रही।

सलीमा ने धीरे से कहा—

“क्योंकि सौदा पूरा नहीं हुआ था।”

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ देखा।

“कौन-सा सौदा?”

सलीमा ने कहा—

“हामिद ने मौत से अपने बेटे को वापस माँगा था। नूर ने तुम्हें उसके बदले दे दिया। सलीम ने उस सौदे को तोड़ने की कोशिश की। और मैं…”

“तुमने?”

सलीमा ने लोहे की छड़ उठाई।

“मैंने तुम्हारी पहली मौत पूरी की।”

फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।

“नहीं…”

सलीमा बोली—

“तुम्हारा शरीर मर चुका था। लेकिन तुम्हारी आत्मा मौत के पास थी। मैंने उसे वापस खींचा। उस प्रक्रिया में ज़ोया मरी, नूर की आत्मा बँधी, और हामिद की मौत तुम्हारे अंदर आ गई।”

“और सलीम?”

“सलीम ने अपना चेहरा दे दिया।”

फ़िरोज़ ने फुसफुसाकर पूछा—

“अपना चेहरा?”

सलीमा ने कहा—

“हामिद को रोकने के लिए सलीम ने अपनी पहचान छोड़ दी। इसलिए मौत हर बार उसके चेहरे में लौटती रही।”

फ़िरोज़ की आँखों में आँसू भर गए।

“तो अब्बा की मौत… असली मौत नहीं थी?”

सलीमा ने सिर झुका लिया।

“सलीम मरना चाहता था। लेकिन हामिद ने उसे मरने नहीं दिया।”

कमरे में अचानक एक तेज़ आवाज़ हुई।

कड़ाक!

दीवार पर लगी सभी तस्वीरें गिर गईं।

एक तस्वीर फ़िरोज़ के पैरों के पास आकर रुकी।

तस्वीर में एक परिवार था।

सलीम।

नूर।

एक छोटा बच्चा।

और पीछे खड़ी सलीमा।

लेकिन बच्चे के चेहरे पर काला कपड़ा बँधा था।

तस्वीर के पीछे लिखा था—

“जिसे चेहरा दिया गया, उसका नाम छीन लिया गया।”

फ़िरोज़ ने तस्वीर पलटी।

नीचे एक और लाइन थी—

“पहचान वापस लेने के लिए उसे अपने क़ातिल को मारना होगा।”

फ़िरोज़ ने धीरे से सलीमा की तरफ देखा।

सलीमा समझ गई।

“नहीं…”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“मुझे अपनी पहचान वापस लेने के लिए तुम्हें मारना होगा?”

सलीमा पीछे हटने लगी।

“फ़िरोज़, मेरी बात सुनो।”

“क्या यही सच है?”

“हाँ।”

“तो तुमने मुझे यहाँ क्यों लाया?”

“क्योंकि मैं चाहती थी कि तुम मुझे मारने से पहले सब जान लो।”

फ़िरोज़ की आँखों में गुस्सा भर गया।

“तुम चाहती थीं कि मैं तुम्हें मार दूँ?”

सलीमा ने कहा—

“मैंने तुम्हें जन्म नहीं दिया… लेकिन मैंने तुम्हें पाला है।”

“तुमने मुझे झूठ दिया!”

“मैंने तुम्हें ज़िंदगी दी!”

“तुमने मेरी ज़िंदगी को जेल बना दिया!”

सलीमा रोते हुए बोली—

“मैं तुम्हारी क़ातिल हूँ, फ़िरोज़… लेकिन मैं तुम्हारी दुश्मन नहीं हूँ।”

तभी बच्चे ने धीरे से कहा—

“यही उसकी सबसे बड़ी चाल है।”

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ देखा।

“क्या?”

“वो चाहती है कि तुम उसे मारो।”

“क्यों?”

बच्चे ने कहा—

“क्योंकि सलीमा की मौत से तुम्हारा नाम वापस नहीं आएगा।”

“तो क्या होगा?”

बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—

“तुम्हारी आत्मा उसके अंदर चली जाएगी।”

सलीमा ने चीखकर कहा—

“झूठ!”

बच्चे ने कहा—

“वो तुम्हें मारकर खुद आज़ाद होना चाहती है। लेकिन तुम्हारी आत्मा उसके शरीर में बंद हो जाएगी। और तुम हमेशा के लिए उसकी जगह ले लोगे।”

फ़िरोज़ ने सलीमा की तरफ देखा।

“क्या ये सच है?”

सलीमा चुप रही।

उसकी चुप्पी ही जवाब थी।

फ़िरोज़ ने आँखें बंद कर लीं।

उसके अंदर तीन आवाज़ें लड़ रही थीं।

नूर—

“बेटा, उसे मत मारना।”

हामिद—

“उसे मार दो। तभी तुम आज़ाद होगे।”

सलीम—

“फ़िरोज़… डर के सामने खड़े होना।”

और फिर एक चौथी आवाज़ आई।

बहुत धीमी।

बहुत मासूम।

“भैया… मुझे भी बचा लो।”

फ़िरोज़ ने आँखें खोल दीं।

कुएँ के अंदर पहला बच्चा खड़ा था।

वह रो रहा था।

फ़िरोज़ ने कहा—

“मैं सबको बचाऊँगा।”

बच्चा हँस पड़ा।

“तुम सबको नहीं बचा सकते।”

“क्यों?”

“क्योंकि किसी एक को मरना होगा।”

फ़िरोज़ ने कुएँ के अंदर छलाँग लगा दी।

सलीमा चीख उठी—

“फ़िरोज़!”

लेकिन फ़िरोज़ अंधेरे में गिरता चला गया।

नीचे जाते हुए उसने देखा—

कुएँ की दीवारों पर उसकी पूरी ज़िंदगी लिखी थी।

उसका बचपन।

उसके अब्बा की मौत।

उसकी अम्मी की लोरी।

नूर की आवाज़।

सलीमा का झूठ।

और सबसे नीचे—

एक तारीख़।

17 सितंबर 2026

उसके नीचे लिखा था—

“आज फ़िरोज़ मरेगा।”

फ़िरोज़ ज़मीन पर आ गिरा।

उसके सामने एक विशाल दरवाज़ा था।

दरवाज़े पर लिखा था—

“आत्मा का कमरा।”

दरवाज़े के पीछे से किसी ने कहा—

“अंदर आओ।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“कौन?”

आवाज़ आई—

“तुम्हारा असली नाम।”

दरवाज़ा खुल गया।

अंदर एक आईना रखा था।

आईने में फ़िरोज़ नहीं था।

वहाँ एक बच्चा खड़ा था।

बच्चे ने कहा—

“मेरा नाम फ़िरोज़ है।”

फ़िरोज़ ने धीरे से पूछा—

“तो मैं कौन हूँ?”

बच्चे ने उत्तर दिया—

“तुम वो हो… जिसने मुझे मारा था।”

फ़िरोज़ ने आईने को छुआ।

आईना टूट गया।

और उसके पीछे से एक काली परछाईं बाहर आई।

उस परछाईं ने फ़िरोज़ का चेहरा पहन लिया।

फिर उसने कहा—

“अब तय करो… तुम जीना चाहते हो या अपना नाम वापस लेना?”
एपिसोड 13 समाप्त।

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