PretikaGhost Storiesनीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार

एपिसोड 12 — मेरा शरीर, मेरी मौत

firoj saifi · Ghost Stories · 12 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
Chapter
12 of 15
Category
Ghost Stories
Reading time
12 min
Words
2317
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

फ़िरोज़ की चीख हवेली की दीवारों से टकराकर वापस आई।

लेकिन इस बार वह सिर्फ़ फ़िरोज़ की आवाज़ नहीं थी।

उसके भीतर से दो आवाज़ें निकल रही थीं।

एक उसकी अपनी—

“मैं किसी का शरीर नहीं हूँ!”

और दूसरी—

“तुम मेरा शरीर हो।”

अचानक फ़िरोज़ के हाथों में पकड़ा नवजात बच्चा धुएँ में बदल गया।

धुआँ उसकी हथेलियों से होकर सीधा उसकी छाती में समा गया।

फ़िरोज़ पीछे की तरफ गिर पड़ा।

धड़ाम!

उसकी पीठ पत्थर के फ़र्श से टकराई।

सलीमा दौड़कर उसके पास आई।

“फ़िरोज़!”

उसने फ़िरोज़ को उठाने की कोशिश की।

लेकिन फ़िरोज़ का शरीर बर्फ़ की तरह ठंडा था।

उसकी आँखें खुली थीं।

पुतलियाँ गायब थीं।

सिर्फ़ सफ़ेद खालीपन।

सलीमा ने उसके चेहरे पर थप्पड़ मारा।

“बेटा, आँखें खोलो!”

फ़िरोज़ ने अचानक उसका हाथ पकड़ लिया।

उसकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि सलीमा की हड्डियाँ चरमराने लगीं।

फ़िरोज़ की आवाज़ बदली हुई थी—

“मुझे बेटा मत कहो।”

सलीमा दर्द से कराह उठी।

“फ़िरोज़, मेरी बात सुनो!”

“मेरा नाम फ़िरोज़ नहीं है।”

“तो क्या है?”

फ़िरोज़ ने उसकी आँखों में देखा।

“मुझे नहीं पता।”

यह कहते ही उसकी पकड़ ढीली पड़ गई।

वह फिर बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ा।

कुछ पल तक सिर्फ़ बारिश की आवाज़ आती रही।

फिर नूर की आत्मा ने धीरे से कहा—

“उसे नीचे ले जाना होगा।”

सलीमा ने सिर उठाया।

“कहाँ?”

“जहाँ उसका पहला नाम दफ़न है।”

सलीमा ने डरकर कहा—

“वहाँ जाने का मतलब है कि वो वापस नहीं आएगा।”

नूर ने उत्तर दिया—

“वो पहले ही वापस नहीं रहा।”

हवेली के नीचे का रास्ता

सलीमा और नूर ने मिलकर फ़िरोज़ को उठाया।

लेकिन जैसे ही वे Room 0 से बाहर निकले, हवेली के गलियारे बदलने लगे।

जो सीढ़ियाँ ऊपर जाती थीं, वे अब नीचे उतर रही थीं।

दीवारों पर लगी तस्वीरों में चेहरे बदल रहे थे।

हर तस्वीर में एक ही बच्चा था।

कभी वह हँस रहा था।

कभी रो रहा था।

कभी उसके हाथ खून से सने थे।

और हर तस्वीर के नीचे एक ही तारीख़ लिखी थी—

8 सितंबर 1939

फ़िरोज़ बेहोशी में बड़बड़ा रहा था—

“मुझे वापस मत भेजो…”

सलीमा ने उसका माथा छुआ।

“कहाँ वापस नहीं भेजना?”

फ़िरोज़ ने आँखें खोले बिना कहा—

“उस कुएँ में…”

सलीमा रुक गई।

“कौन-सा कुआँ?”

फ़िरोज़ की आवाज़ बहुत धीमी थी।

“जहाँ पहली बार… मेरी आवाज़ बंद की गई थी।”

नूर ने सलीमा की तरफ देखा।

“उसे सब याद आने लगा है।”

सलीमा ने फुसफुसाकर कहा—

“अगर उसे सब याद आ गया, तो वो हमें कभी माफ़ नहीं करेगा।”

नूर बोली—

“शायद उसे माफ़ करने के लिए हममें से कोई ज़िंदा नहीं बचेगा।”

गलियारे के अंत में एक लोहे का दरवाज़ा दिखाई दिया।

उस पर कोई नंबर नहीं था।

सिर्फ़ एक निशान बना था—

एक काली आँख।

आँख के नीचे लिखा था—

“जिसका नाम मिटा दिया गया।”

सलीमा ने दरवाज़ा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।

दरवाज़े ने खुद ही रास्ता दे दिया।

अंदर नीचे जाती हुई पत्थर की सीढ़ियाँ थीं।

सीढ़ियों से सड़ी हुई मिट्टी की गंध आ रही थी।

और कहीं नीचे से पानी टपकने की आवाज़—

टप… टप… टप…

फ़िरोज़ अचानक उठ बैठा।

उसने चारों तरफ देखा।

“हम यहाँ क्यों आए हैं?”

सलीमा ने उसका हाथ पकड़ना चाहा।

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

“मुझसे दूर रहो।”

“फ़िरोज़, तुम्हें बचाने के लिए—”

“मुझे बचाना बंद करो!”

उसकी आवाज़ सीढ़ियों में गूँज गई।

“तुमने बचाने के नाम पर मेरी पूरी ज़िंदगी चुरा ली।”

सलीमा की आँखें भर आईं।

“मैंने तुम्हें खोने के डर से…”

“तुमने मुझे कभी पाया ही नहीं था!”

यह सुनकर सलीमा चुप हो गई।

फ़िरोज़ ने नूर की तरफ देखा।

“और तुम?”

नूर ने धीरे से कहा—

“मैंने तुम्हें अपनी आत्मा में छुपाया।”

“क्यों?”

“क्योंकि मैं चाहती थी कि तुम मौत से बच जाओ।”

“या तुम चाहती थीं कि मौत मेरे अंदर कैद रहे?”

नूर ने कोई जवाब नहीं दिया।

फ़िरोज़ मुस्कुराया।

“तुम दोनों में फर्क ही क्या है?”

तभी नीचे से एक बच्चे की आवाज़ आई—

“फर्क है…”

तीनों नीचे देखने लगे।

सीढ़ियों के आख़िरी पायदान पर एक छोटा बच्चा खड़ा था।

उसके हाथ में मिट्टी का खिलौना था।

चेहरा अंधेरे में छिपा था।

बच्चे ने कहा—

“एक ने तुम्हें बनाया।”

वह एक कदम ऊपर आया।

“दूसरी ने तुम्हें छुपाया।”

फिर उसने सिर उठाया।

उसकी आँखें सफ़ेद थीं।

“और मैंने तुम्हें मारा।”

फ़िरोज़ का चेहरा कठोर हो गया।

“तुम कौन हो?”

बच्चे ने खिलौना फ़र्श पर रख दिया।

“मैं वो हूँ… जो तुम्हारी पहली मौत के बाद बचा था।”

“आरिफ़?”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“आरिफ़ सिर्फ़ एक नाम था।”

“तो असली नाम क्या है?”

बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—

“नाम वही होता है, जिसे लोग याद रखें।”

फ़िरोज़ ने गुस्से में कहा—

“पहेलियाँ बंद करो!”

बच्चा धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता हुआ उसके पास आया।

“तुम्हारी पहली मौत के बाद तुम्हारा नाम मिटा दिया गया था।”

“किसने?”

बच्चे ने सलीमा की तरफ देखा।

सलीमा ने आँखें बंद कर लीं।

“मैंने।”

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ देखा।

“क्यों?”

सलीमा ने काँपती आवाज़ में कहा—

“क्योंकि तुम्हारा असली नाम लेते ही मौत जाग जाती थी।”

पहला कुआँ

सीढ़ियाँ एक विशाल भूमिगत कमरे में जाकर खत्म हुईं।

कमरे के बीचोंबीच एक पुराना कुआँ था।

कुएँ के चारों तरफ लाल धागे बँधे थे।

दीवारों पर सैकड़ों नाम लिखे थे।

कुछ नाम मिटे हुए थे।

कुछ खून से लिखे थे।

और कुछ नाम बार-बार दोहराए गए थे—

आरिफ़ फ़िरोज़ हामिद नूर ज़ोया

कुएँ के किनारे एक पत्थर रखा था।

उस पर लिखा था—

“पहली मौत यहीं हुई।”

फ़िरोज़ कुएँ के पास गया।

अंदर से ठंडी हवा ऊपर आ रही थी।

उसने नीचे झाँका।

कुएँ में पानी नहीं था।

सिर्फ़ अंधेरा था।

फिर उस अंधेरे में एक चेहरा उभरा।

एक छोटे बच्चे का चेहरा।

बच्चा रो रहा था।

“मुझे बाहर निकालो…”

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

“ये कौन है?”

सलीमा ने कहा—

“तुम।”

“मैं?”

“तुम्हारा पहला रूप।”

कुएँ के अंदर से बच्चे की आवाज़ आई—

“अम्मी…”

फ़िरोज़ का दिल काँप गया।

वह आवाज़ उसी की थी।

छह साल के फ़िरोज़ की।

“अम्मी, मुझे बहुत ठंड लग रही है…”

सलीमा ने दोनों हाथ अपने कानों पर रख लिए।

“बस करो…”

बच्चा फिर बोला—

“अम्मी, आपने मुझे यहाँ क्यों छोड़ा?”

फ़िरोज़ ने सलीमा की तरफ देखा।

“तुमने मुझे कुएँ में छोड़ा था?”

सलीमा ने सिर हिलाया।

“मैंने तुम्हें नहीं छोड़ा।”

“तो किसने?”

नूर ने धीरे से कहा—

“तुम खुद यहाँ आए थे।”

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ देखा।

“मैं?”

नूर ने कहा—

“तुम्हारे अंदर की मौत तुम्हें यहाँ खींच लाई थी।”

फ़िरोज़ कुएँ के किनारे बैठ गया।

उसने नीचे देखते हुए पूछा—

“फिर मैं बाहर कैसे आया?”

सलीमा ने कहा—

“तुम्हारी माँ ने तुम्हें बाहर निकाला।”

“ज़ोया?”

सलीमा ने सिर झुका लिया।

“हाँ।”

“लेकिन तुमने कहा था कि ज़ोया मर चुकी थी।”

“वो मर चुकी थी।”

“तो उसने मुझे कैसे निकाला?”

सलीमा ने जवाब नहीं दिया।

कुएँ के अंदर से अचानक ज़ोया की आवाज़ आई—

“क्योंकि मैंने मरने से पहले तुम्हें जन्म नहीं दिया था…”

फ़िरोज़ ने नीचे देखा।

अंधेरे में ज़ोया का चेहरा उभरा।

“मैंने तुम्हें मौत से वापस खींचा था।”

फ़िरोज़ की साँस अटक गई।

“क्या?”

ज़ोया की आवाज़ कुएँ में गूँजने लगी—

“तुम्हारा शरीर जन्म के समय मर गया था। तुम्हारी आत्मा कुएँ में गिर गई थी। हामिद ने तुम्हारी आत्मा को वापस बुलाया। लेकिन मौत तुम्हारे साथ लौट आई।”

“तो मैं ज़िंदा नहीं था?”

“तुम ज़िंदा थे… मगर पूरे नहीं।”

“मेरी आत्मा का कौन-सा हिस्सा नहीं था?”

ज़ोया ने कहा—

“तुम्हारा नाम।”

फ़िरोज़ ने अपने सीने पर हाथ रखा।

“नाम से आत्मा कैसे जुड़ी है?”

ज़ोया ने उत्तर दिया—

“जिसे दुनिया पुकारती है, वही आत्मा दुनिया से जुड़ी रहती है। तुम्हारा नाम मिटा दिया गया था। इसलिए मौत तुम्हें अपना समझती रही।”

फ़िरोज़ ने सलीमा की तरफ देखा।

“और तुमने मेरा नाम फ़िरोज़ रखा?”

“हाँ।”

“क्यों?”

सलीमा ने धीरे से कहा—

“क्योंकि तुम्हारा असली नाम सुनते ही हामिद जाग जाता।”

कुएँ के अंदर से भारी हँसी गूँजी।

“वो अब भी जाग चुका है।”

अचानक कुएँ की दीवारें टूटने लगीं।

लाल धागे एक-एक करके टूट गए।

कमरे में काला धुआँ भरने लगा।

नूर ने चीखकर कहा—

“पीछे हटो!”

लेकिन फ़िरोज़ कुएँ के सामने खड़ा रहा।

कुएँ के अंदर से एक हाथ बाहर निकला।

हाथ बहुत लंबा था।

उँगलियाँ पतली और काली थीं।

उस हाथ ने फ़िरोज़ की कलाई पकड़ ली।

काली घड़ी फिर उसकी त्वचा पर उभर आई।

फ़िरोज़ दर्द से चीखा।

सलीमा ने उसे खींचना चाहा।

लेकिन कुएँ के अंदर से आवाज़ आई—

“उसे छोड़ दो, सलीमा।”

यह आवाज़ हामिद की नहीं थी।

यह आवाज़ फ़िरोज़ की थी।

“वो अब मेरा है।”

नाम की सच्चाई

फ़िरोज़ का आधा शरीर कुएँ के अंदर खिंचने लगा।

सलीमा ने उसकी कमर पकड़ ली।

नूर ने फ़िरोज़ के चारों तरफ सफ़ेद रोशनी का घेरा बना दिया।

काला हाथ पीछे हटने लगा।

लेकिन तभी फ़िरोज़ ने खुद सलीमा को धक्का दे दिया।

“मुझे जाने दो!”

सलीमा दूर जा गिरी।

“फ़िरोज़!”

फ़िरोज़ कुएँ के किनारे झुक गया।

नीचे उसे एक विशाल कमरा दिखाई दिया।

उस कमरे में दर्जनों पालने रखे थे।

हर पालने में एक बच्चा था।

हर बच्चे का चेहरा फ़िरोज़ जैसा था।

और हर बच्चे की कलाई पर काली घड़ी बँधी थी।

एक पालने के पास हामिद खड़ा था।

वह एक बच्चे के कान में कुछ फुसफुसा रहा था।

बच्चा आँखें खोलकर बोला—

“मेरा नाम क्या है?”

हामिद ने कहा—

“तुम्हारा नाम वही होगा, जो तुम्हें मौत देगी।”

फ़िरोज़ ने चीखकर कहा—

“हामिद!”

हामिद ने ऊपर देखा।

उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई।

“आ गए तुम।”

“ये सब क्या है?”

“तुम्हारे अधूरे जन्म।”

“कितने हैं?”

“जितनी बार तुमने मरने से इनकार किया।”

फ़िरोज़ ने नीचे देखा।

“क्या ये सब मैं हूँ?”

हामिद ने कहा—

“नहीं।”

वह एक पालने के पास गया।

“ये वो हैं… जो तुम बन सकते थे।”

दूसरे पालने की तरफ इशारा किया।

“ये वो हैं… जिन्हें तुमने मार दिया।”

तीसरे पालने की तरफ देखा।

“और ये…”

वह रुक गया।

“ये तुम्हारा असली रूप है।”

फ़िरोज़ की नज़र तीसरे पालने पर टिक गई।

उसमें एक बच्चा सो रहा था।

उसके चेहरे पर कोई निशान नहीं था।

उसकी कलाई पर घड़ी नहीं थी।

उसकी परछाईं भी नहीं थी।

फ़िरोज़ ने पूछा—

“ये कौन है?”

हामिद ने कहा—

“जिसे तुमने सबसे पहले मारा था।”

फ़िरोज़ की आँखों में डर उतर आया।

“मैंने?”

“हाँ।”

“कब?”

हामिद ने ऊपर देखते हुए कहा—

“अपने जन्म से पहले।”

अचानक बच्चे ने आँखें खोल दीं।

उसने सीधे फ़िरोज़ की तरफ देखा।

और कहा—

“मेरा नाम…”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

बच्चे ने मुस्कुराकर अपना नाम बताया—

“फ़िरोज़।”

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

“नहीं…”

बच्चे ने फिर कहा—

“मेरा नाम फ़िरोज़ है।”

फ़िरोज़ ने अपना सिर पकड़ लिया।

“तो मैं कौन हूँ?”

हामिद ने उत्तर दिया—

“तुम उसकी मौत हो।”

फ़िरोज़ के अंदर कुछ टूट गया।

उसने नीचे छलाँग लगाने की कोशिश की।

लेकिन सलीमा ने पीछे से उसे पकड़ लिया।

“नहीं!”

फ़िरोज़ चीखा—

“मुझे उसे बचाना है!”

सलीमा ने कहा—

“वो बच्चा तुम नहीं हो!”

“तो कौन है?”

सलीमा ने आँखें बंद कर लीं।

“वो तुम्हारा पहला शरीर है।”

“और मैं?”

“तुम उसकी जगह बनाए गए थे।”

फ़िरोज़ धीरे-धीरे शांत हो गया।

उसने सलीमा की तरफ देखा।

“तुमने मेरे असली शरीर को मार दिया।”

सलीमा की आँखों से आँसू बहने लगे।

“हाँ।”

“क्यों?”

“क्योंकि उसके अंदर हामिद की मौत थी।”

“और मेरे अंदर?”

सलीमा ने जवाब दिया—

“उसकी आत्मा।”

फ़िरोज़ ने कुएँ के अंदर देखा।

पहला बच्चा अब उठकर बैठ चुका था।

उसने काली घड़ी उतारी।

घड़ी फ़र्श पर गिरते ही पूरा भूमिगत कमरा काँपने लगा।

हामिद ने पहली बार डरकर कहा—

“इसे मत करने देना!”

बच्चे ने फ़िरोज़ की तरफ देखा।

“भैया…”

फ़िरोज़ की आँखों में आँसू आ गए।

“मुझे भैया मत कहो।”

बच्चा मुस्कुराया।

“तुम मेरे बड़े भाई हो।”

“तुम्हारा नाम क्या है?”

बच्चे ने कहा—

“तुम्हें याद है।”

फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

बच्चे ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“जब तुमने मुझे मारा था… तब तुमने मेरा नाम पुकारा था।”

फ़िरोज़ के दिमाग़ में बिजली-सी कौंधी।

एक शब्द…

एक आवाज़…

एक पुराना नाम…

उसकी ज़ुबान पर आने लगा।

सलीमा ने चीखकर कहा—

“फ़िरोज़, वो नाम मत लेना!”

लेकिन देर हो चुकी थी।

फ़िरोज़ ने बच्चे की तरफ देखकर कहा—

“अयान…”

कुएँ के अंदर सब कुछ रुक गया।

हामिद का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

नूर चीख उठी—

“नहीं!”

सलीमा ने फ़िरोज़ का मुँह बंद करने की कोशिश की।

लेकिन उसकी आवाज़ पूरे भूमिगत कमरे में गूँज चुकी थी—

“अयान!”

काली घड़ी टूट गई।

सभी पालने एक साथ हिलने लगे।

बच्चे रोने लगे।

दीवारों पर लिखे नाम जलने लगे।

और कुएँ के अंदर से एक विशाल काला चेहरा ऊपर उठा।

उस चेहरे की आँखें नहीं थीं।

सिर्फ़ एक गहरा खाली गड्ढा।

उसने फ़िरोज़ को देखा।

फिर कहा—

“तुमने मेरा असली नाम याद कर लिया।”

फ़िरोज़ ने काँपते हुए पूछा—

“तुम कौन हो?”

काला चेहरा झुक गया।

उसकी आवाज़ में पूरी हवेली काँप उठी।

“मैं मौत नहीं हूँ।”

एक पल का सन्नाटा।

“मैं वो हूँ… जिसने मौत को जन्म दिया।”

सलीमा ने फुसफुसाकर कहा—

“अयान…”

काले चेहरे ने उसकी तरफ देखा।

“नहीं, सलीमा।”

उसका चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।

पहले हामिद…

फिर सलीम…

फिर ज़ोया…

और आखिर में—

फ़िरोज़ का चेहरा।

“मेरा नाम फ़िरोज़ है।”

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

काला चेहरा मुस्कुराया।

“और तुम…”

उसने फ़िरोज़ की छाती की तरफ इशारा किया।

“तुम मेरे अंदर बंद आख़िरी आत्मा हो।”

अचानक फ़िरोज़ की छाती पर एक गहरा निशान उभरा।

निशान एक दरवाज़े जैसा था।

दरवाज़े पर लिखा था—

“असली फ़िरोज़ — प्रवेश निषिद्ध।”

काला चेहरा गरजा—

“दरवाज़ा खोलो!”

फ़िरोज़ ने दोनों हाथ अपनी छाती पर रख दिए।

“नहीं।”

“दरवाज़ा खोलो!”

“नहीं!”

“दरवाज़ा खोलो!”

फ़िरोज़ ने पूरी ताक़त से चीखकर कहा—

“मैं अपना नाम वापस लेने आया हूँ!”

उसकी आवाज़ के साथ सफ़ेद रोशनी फूट पड़ी।

कुआँ टूट गया।

हामिद पीछे जा गिरा।

नूर धुएँ में बदल गई।

सलीमा की चीख सुनाई दी।

और फ़िरोज़ के सीने पर बना दरवाज़ा—

धीरे-धीरे खुलने लगा।

अंदर से एक बच्चा बाहर आया।

वह बच्चा बिल्कुल फ़िरोज़ जैसा था।

लेकिन उसकी आँखें काली थीं।

उसने फ़िरोज़ को देखकर कहा—

“अब मेरी बारी है जीने की।”

फ़िरोज़ ने उसे घूरते हुए पूछा—

“और मेरी?”

बच्चे ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—

“तुम्हारी बारी… मरने की है।”

उसी पल ऊपर हवेली की घड़ी ने बारह बार घंटा बजाया।

लेकिन समय आधी रात का नहीं था।

घड़ी पर तारीख़ चमक रही थी—

17 सितंबर 2026

और नीचे लिखा था—

“आख़िरी रात शुरू।”

एपिसोड 12 समाप्त।

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार · सभी भाग →