PretikaGhost Storiesनीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार

एपिसोड 11 — माँ का चेहरा

firoj saifi · Ghost Stories · 12 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
Chapter
11 of 15
Category
Ghost Stories
Reading time
12 min
Words
2321
Language
Hindi (हिंदी)
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Free to read

फ़िरोज़ के सीने से निकला चेहरा धीरे-धीरे हवा में तैरने लगा।

वह चेहरा—

सलीमा का था।

लेकिन सलीमा की आँखें बंद थीं।

चेहरे के होंठ हिल रहे थे।

“मुझे बाहर निकालो…”

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

“ये क्या है?”

सलीमा ने अपना चेहरा छूकर देखा।

उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।

“नहीं…”

हामिद दरवाज़े के पास खड़ा मुस्कुरा रहा था।

“अब इसे सब याद आएगा।”

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ देखा।

“तुमने कहा था कि मेरा शरीर मेरी माँ का था।”

हामिद ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“तो मेरे अंदर सलीमा का चेहरा क्यों है?”

हामिद ने कोई जवाब नहीं दिया।

फ़िरोज़ ने ज़ोर से चीखकर पूछा—

“बोलो!”

हामिद ने धीमी आवाज़ में कहा—

“क्योंकि तुम्हारी माँ ने मरने से पहले अपना चेहरा तुम्हारे अंदर छुपा दिया था।”

कमरे की दीवारें अचानक काली पड़ने लगीं।

फ़िरोज़ के सीने से निकला चेहरा और साफ़ होने लगा।

अब उसके साथ गर्दन भी दिखाई दे रही थी।

फिर कंधे।

फिर पूरा शरीर।

कुछ ही पलों में फ़िरोज़ के सामने सलीमा जैसी एक दूसरी औरत खड़ी थी।

लेकिन उसकी त्वचा पारदर्शी थी।

उसकी आँखों में गहरा अंधेरा था।

और उसके गले पर एक लंबा घाव था।

फ़िरोज़ ने फुसफुसाकर कहा—

“ये… सलीमा है?”

सलीमा पीछे हट गई।

“नहीं।”

दूसरी औरत ने उसकी तरफ देखा।

“तुमने मेरा चेहरा चुराया था।”

सलीमा ने दोनों हाथ जोड़ दिए।

“मैंने तुम्हें मारना नहीं चाहा था।”

“लेकिन तुमने मारा।”

“मैं मजबूर थी।”

“हर क़ातिल यही कहता है।”

फ़िरोज़ ने उस औरत की तरफ देखा।

“तुम कौन हो?”

औरत ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

उसकी उँगलियाँ फ़िरोज़ के चेहरे से कुछ इंच दूर रुक गईं।

“मैं तुम्हारी पहली माँ हूँ।”

फ़िरोज़ की साँस अटक गई।

“तुम्हारा नाम?”

औरत ने आँखें बंद कीं।

“मेरा नाम… ज़ोया था।”

सलीमा के चेहरे पर भय उतर आया।

“ज़ोया…”

फ़िरोज़ ने सलीमा की तरफ देखा।

“तुम इसे जानती हो?”

सलीमा ने सिर झुका लिया।

“हाँ।”

“कौन थी ये?”

“तुम्हारी माँ।”

फ़िरोज़ ने ज़ोया की तरफ देखा।

“तो नूर?”

ज़ोया की आँखों में दर्द भर आया।

“नूर तुम्हारी आत्मा की रखवाली थी।”

“और तुम?”

“मैंने तुम्हें जन्म दिया था।”

फ़िरोज़ की आवाज़ काँप गई।

“फिर तुम मर गईं?”

ज़ोया ने अपनी गर्दन के घाव की तरफ इशारा किया।

“मुझे मारा गया।”

फ़िरोज़ ने सलीमा की तरफ देखा।

सलीमा की आँखों से आँसू बहने लगे।

“मैंने तुम्हें मारने की कोशिश नहीं की थी…”

ज़ोया ने उसकी बात काट दी।

“तुमने मेरी गर्दन पर वही लोहे की छड़ रखी थी।”

फ़िरोज़ की आँखों के सामने एक नई स्मृति खुली।

वर्ष—

1939

एक छोटा-सा घर।

बाहर बारिश।

अंदर एक औरत दर्द से चीख रही थी।

वह ज़ोया थी।

उसकी गोद में नवजात बच्चा था।

बच्चा रो नहीं रहा था।

उसकी आँखें खुली थीं।

और उसकी परछाईं दीवार पर नहीं पड़ रही थी।

दरवाज़े पर एक जवान हामिद खड़ा था।

उसके पीछे सलीमा थी।

सलीमा के हाथ में काली घड़ी थी।

ज़ोया ने बच्चे को सीने से लगाया।

“इसे यहाँ से ले जाओ।”

हामिद ने कहा—

“अगर इसे नहीं ले गए, तो मौत इसे खोज लेगी।”

ज़ोया ने सिर हिलाया।

“मौत इसे नहीं खोजेगी।”

वह बच्चे के माथे को चूमते हुए बोली—

“मौत इसके अंदर पैदा होगी।”

सलीमा ने घबराकर पूछा—

“तुमने क्या किया है?”

ज़ोया ने उसकी तरफ देखा।

“मैंने मौत को जन्म दिया है।”

अचानक बच्चे ने रोना शुरू कर दिया।

उसकी चीख इतनी तेज़ थी कि घर की खिड़कियाँ टूट गईं।

बाहर खड़ा हामिद घुटनों के बल गिर पड़ा।

उसकी आँखों से खून बहने लगा।

सलीमा ने बच्चे को ज़ोया की गोद से छीनना चाहा।

ज़ोया ने उसे रोक लिया।

“इसे मत छूना!”

सलीमा चीखी—

“ये बच्चा नहीं है!”

ज़ोया ने कहा—

“ये मेरा बेटा है!”

तभी बच्चे की परछाईं ज़मीन पर उभरी।

परछाईं ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।

और उसने ज़ोया की गर्दन पकड़ ली।

ज़ोया की आँखें फैल गईं।

सलीमा ने लोहे की छड़ उठाई।

हामिद चिल्लाया—

“सलीमा, रुक जाओ!”

लेकिन सलीमा ने वार कर दिया।

लोहे की छड़ ज़ोया की गर्दन में धँस गई।

ज़ोया फ़र्श पर गिर पड़ी।

बच्चा उसके सीने पर पड़ा रहा।

और उसकी परछाईं हँसने लगी।

स्मृति टूट गई।

फ़िरोज़ ज़मीन पर गिर पड़ा।

उसकी साँसें तेज़ थीं।

उसने सलीमा की तरफ देखा।

“तुमने मेरी माँ को मारा।”

सलीमा ने काँपते हुए कहा—

“मैंने तुम्हें बचाने के लिए…”

“बचाने के लिए?”

फ़िरोज़ ने अपनी छाती पर हाथ मारा।

“तुमने मेरी माँ को मार दिया… और उसकी आत्मा मेरे अंदर बंद कर दी!”

सलीमा रोते हुए बोली—

“अगर मैं ऐसा नहीं करती, तो तुम भी उसी रात मर जाते।”

“तो मर जाने देती!”

कमरे में अचानक सब कुछ शांत हो गया।

फ़िरोज़ ने खुद अपनी बात सुनी।

उसकी आँखों में पछतावा भर आया।

“मैंने… ये नहीं कहना चाहा…”

ज़ोया ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें सच में मरना नहीं था, बेटा।”

“मुझे बेटा मत कहो।”

ज़ोया की आँखों में आँसू आ गए।

“तुम चाहे मुझे माँ मानो या नहीं… तुम्हारी पहली साँस मेरी थी।”

फ़िरोज़ ने सिर झुका लिया।

लेकिन तभी हामिद हँसने लगा।

“पहली साँस?”

वह कमरे के अंदर आया।

“तुम्हें अभी भी लगता है कि ये तुम्हारा बेटा है?”

ज़ोया ने उसे घूरा।

“हामिद, चुप हो जाओ।”

हामिद ने कहा—

“तुमने इसे जन्म नहीं दिया था, ज़ोया।”

फ़िरोज़ ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

“क्या?”

हामिद ने सलीमा की तरफ देखा।

“इसे सलीमा ने बनाया था।”

सलीमा चीख उठी—

“झूठ!”

हामिद ने कहा—

“तुमने ज़ोया के गर्भ से निकली आत्मा को चुराया। तुमने उस आत्मा को अपने खून से बाँधा। तुमने उसके अंदर अपनी यादें डालीं। तुमने उसे अपना बेटा बनाया।”

फ़िरोज़ की आँखों में अविश्वास भर गया।

“तो मैं ज़ोया का बेटा नहीं हूँ?”

ज़ोया ने धीमे से कहा—

“तुम मेरे शरीर से जन्मे थे।”

हामिद ने तुरंत कहा—

“लेकिन उसकी आत्मा तुम्हारी नहीं थी।”

फ़िरोज़ ने दोनों को देखा।

“मेरी आत्मा किसकी थी?”

इस बार किसी ने जवाब नहीं दिया।

कमरे में खड़ी परछाईं धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

उसने फ़िरोज़ के कान में फुसफुसाया—

“तुम्हारी आत्मा… कभी पैदा ही नहीं हुई।”

फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।

“क्या?”

परछाईं ने कहा—

“तुम्हें सिर्फ़ शरीर मिला। नाम मिला। यादें मिलीं। लेकिन आत्मा…”

वह मुस्कुराई।

“आत्मा तुम्हें उधार दी गई थी।”

फ़िरोज़ ने अपना सीना पकड़ लिया।

“तो मैं ज़िंदा कैसे हूँ?”

परछाईं ने उत्तर दिया—

“क्योंकि तीन लोग तुम्हें ज़िंदा रख रहे हैं।”

“कौन?”

“ज़ोया की यादें…”

उसने पहली उँगली उठाई।

“नूर की आत्मा…”

दूसरी उँगली उठी।

“और हामिद की मौत।”

तीसरी उँगली उठते ही फ़िरोज़ की आँखें सफ़ेद हो गईं।

उसका शरीर हवा में उठ गया।

सलीमा चीख पड़ी—

“फ़िरोज़!”

फ़िरोज़ की गर्दन पीछे झुक गई।

उसके मुँह से एक भारी आवाज़ निकली—

“लेकिन चौथी चीज़ भी है।”

हामिद का चेहरा बदल गया।

“नहीं…”

फ़िरोज़ ने हवा में तैरते हुए कहा—

“वो चीज़… जिसे तुमने सबसे ज़्यादा छुपाया।”

ज़ोया ने घबराकर पूछा—

“क्या?”

फ़िरोज़ का शरीर अचानक नीचे गिरा।

वह ज़मीन पर आकर घुटनों के बल बैठ गया।

उसकी आँखों से काला धुआँ निकल रहा था।

“मेरी अपनी इच्छा।”

सलीमा पीछे हट गई।

“नहीं…”

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ देखा।

“तुम सबने मुझे बनाया। सबने मुझे बाँटा। सबने मेरे अंदर कुछ न कुछ बंद किया।”

उसकी आवाज़ अब फिर फ़िरोज़ की थी।

“लेकिन किसी ने ये नहीं पूछा कि मैं क्या चाहता हूँ।”

कमरे की दीवार पर एक दरवाज़ा उभर आया।

दरवाज़े पर लिखा था—

कमरा -1

फ़िरोज़ ने उसे देखा।

“ये कौन-सा कमरा है?”

सलीमा ने सिर हिलाया।

“इसे मत खोलना।”

“क्यों?”

“क्योंकि वहाँ तुम्हारी इच्छा बंद है।”

“मेरी इच्छा?”

“वहाँ वो सब है… जो तुमने कभी चाहा था।”

फ़िरोज़ ने दरवाज़े के पास जाकर हाथ रखा।

दरवाज़े के पीछे से आवाज़ें आने लगीं।

एक आवाज़ कह रही थी—

“मुझे घर जाना है…”

दूसरी—

“मुझे अपने अब्बा चाहिए…”

तीसरी—

“मुझे अपनी अम्मी चाहिए…”

और चौथी आवाज़—

“मुझे मरना है…”

फ़िरोज़ ने हाथ पीछे खींच लिया।

सलीमा ने कहा—

“अगर तुमने कमरा -1 खोला, तो तुम्हारी सारी इच्छाएँ शरीर बन जाएँगी।”

“और फिर?”

“फिर वो तुम्हें मारने लगेंगी।”

फ़िरोज़ ने कड़वी हँसी हँसी।

“मुझे मारने के लिए अब कमरे की ज़रूरत नहीं।”

उसने दरवाज़े पर हाथ रख दिया।

सलीमा दौड़कर उसकी तरफ बढ़ी।

“फ़िरोज़, रुक जाओ!”

लेकिन इस बार ज़ोया ने सलीमा को पकड़ लिया।

“उसे जाने दो।”

सलीमा ने चीखकर कहा—

“तुम नहीं समझती!”

ज़ोया बोली—

“मैं उसकी माँ हूँ।”

सलीमा ने तड़पकर कहा—

“तुम उसकी माँ नहीं हो!”

ज़ोया ने उसकी आँखों में देखा।

“और तुम उसकी क़ातिल हो।”

सलीमा का चेहरा टूट गया।

फ़िरोज़ ने दरवाज़ा खोल दिया।

अंदर कोई कमरा नहीं था।

अंदर एक पूरा शहर था।

सड़कें…

घर…

स्कूल…

एक पुरानी मस्जिद…

एक अस्पताल…

और एक छोटा-सा घर, जिसके बाहर नाम लिखा था—

फ़िरोज़ सैफ़ी

फ़िरोज़ धीरे-धीरे उस घर की तरफ बढ़ा।

दरवाज़ा खुला हुआ था।

अंदर एक परिवार बैठा था।

एक आदमी अख़बार पढ़ रहा था।

एक औरत खाना बना रही थी।

एक बच्चा फ़र्श पर खिलौनों से खेल रहा था।

फ़िरोज़ दरवाज़े पर खड़ा रह गया।

वह आदमी सलीम था।

औरत नूर थी।

बच्चा—

फ़िरोज़ खुद था।

लेकिन इस दृश्य में सलीमा नहीं थी।

फ़िरोज़ की आँखों से आँसू बहने लगे।

“ये मेरा घर है?”

नूर ने बच्चे को गोद में उठाया।

“हाँ।”

सलीम ने मुस्कुराकर कहा—

“आज हमारा बेटा छह साल का हो गया।”

फ़िरोज़ ने काँपते हुए पूछा—

“ये किस साल की याद है?”

दीवार पर कैलेंडर टँगा था।

8 सितंबर 1987

फ़िरोज़ ने आगे बढ़कर बच्चे को छूना चाहा।

लेकिन जैसे ही उसकी उँगली बच्चे के कंधे से लगी—

बच्चे ने सिर उठाया।

उसकी आँखें सफ़ेद थीं।

उसने फ़िरोज़ से कहा—

“तुम देर से आए।”

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

बच्चा धीरे-धीरे बड़ा होने लगा।

छह साल…

दस साल…

बीस साल…

तीस साल…

और फिर वह बिल्कुल फ़िरोज़ जैसा बन गया।

उसने कहा—

“मैं तुम्हारी असली ज़िंदगी हूँ।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“तो जो मैंने अब तक जिया… वो क्या था?”

उस चेहरे ने मुस्कुराकर कहा—

“वो तुम्हारी सज़ा थी।”

अचानक घर में आग लग गई।

नूर चीखने लगी।

सलीम दरवाज़ा बंद करने लगा।

फ़िरोज़ ने उन्हें बचाने के लिए दौड़ लगाई।

लेकिन दरवाज़े के सामने सलीमा खड़ी थी।

उसके हाथ में लोहे की छड़ थी।

फ़िरोज़ चीखा—

“हटो!”

सलीमा ने उसकी तरफ देखा।

“अगर तुम इस घर में गए… तो तुम्हें सच में मरना पड़ेगा।”

“ये मेरा परिवार है!”

“नहीं।”

सलीमा ने छड़ उठाई।

“ये तुम्हारी आख़िरी इच्छा है।”

उसने वार किया।

फ़िरोज़ ने हाथ आगे कर दिया।

लोहे की छड़ उसकी हथेली में धँस गई।

खून बहने लगा।

लेकिन खून ज़मीन पर गिरने के बजाय हवा में ठहर गया।

हर बूँद एक शब्द में बदल गई—

माँ…

अब्बा…

नूर…

सलीमा…

हामिद…

फिर आख़िरी बूँद ने आकार लिया—

फ़िरोज़

और उसके नीचे लिखा था—

“जिसे कोई नाम नहीं दिया गया।”

फ़िरोज़ ने छड़ निकालकर फेंक दी।

“मैं अपना नाम खुद चुनूँगा।”

सलीमा पीछे हट गई।

“तुम नहीं चुन सकते।”

“क्यों?”

“क्योंकि तुम्हारा नाम पहले ही लिखा जा चुका है।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“कहाँ?”

सलीमा ने काँपते हुए ऊपर देखा।

कमरे की छत पर एक विशाल काली किताब लटक रही थी।

किताब अपने आप खुली।

उसके पन्ने पर लिखा था—

“आख़िरी शरीर — फ़िरोज़ सैफ़ी”

नीचे एक तारीख़ थी—

17 सितंबर 2026

फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।

“आज की तारीख़…”

सलीमा ने फुसफुसाकर कहा—

“हाँ।”

“लेकिन चक्र तो 8 सितंबर को पूरा होना था।”

हामिद की आवाज़ चारों तरफ गूँजी—

“चक्र पूरा हो चुका है।”

फ़िरोज़ ने ऊपर देखा।

“तो आज क्या है?”

काली किताब के अगले पन्ने पर शब्द उभरे—

“आख़िरी चुनाव।”

अचानक घर में बैठे सलीम और नूर गायब हो गए।

बच्चा भी गायब हो गया।

पूरा शहर अँधेरे में डूब गया।

फ़िरोज़ अकेला खड़ा था।

उसके सामने तीन दरवाज़े थे।

पहले पर लिखा था—

माँ को बचाओ

दूसरे पर—

अब्बा को वापस लाओ

तीसरे पर—

खुद को मार दो

पीछे से सलीमा की आवाज़ आई—

“सही दरवाज़ा चुनो, फ़िरोज़।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“अगर मैंने गलत चुना?”

सलीमा ने कहा—

“तो मौत जाग जाएगी।”

फ़िरोज़ ने तीनों दरवाज़ों को देखा।

फिर उसने चौथी दीवार की तरफ देखा।

वहाँ कोई दरवाज़ा नहीं था।

सिर्फ़ एक आईना था।

आईने में फ़िरोज़ का चेहरा नहीं था।

आईने में एक लड़की खड़ी थी।

उसकी उम्र लगभग छह साल थी।

उसने सफ़ेद कपड़े पहन रखे थे।

फ़िरोज़ ने उसे पहचान लिया।

वह नूर थी।

लेकिन इस बार नूर बच्ची थी।

बच्ची नूर ने आईने के अंदर से कहा—

“तीनों दरवाज़े झूठ हैं।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“तो सच कहाँ है?”

नूर ने अपनी उँगली आईने पर रखी।

“आईने के पीछे।”

फ़िरोज़ ने आईने को छुआ।

आईना टूट गया।

उसके पीछे एक छोटा-सा कमरा था।

कमरे में एक लकड़ी का पालना रखा था।

पालने में एक नवजात बच्चा सो रहा था।

उस बच्चे की कलाई पर काली घड़ी बँधी थी।

और पालने के ऊपर लिखा था—

“फ़िरोज़ सैफ़ी — जन्म से पहले की रात।”

फ़िरोज़ धीरे-धीरे पालने के पास गया।

बच्चे ने आँखें खोल दीं।

उसकी आँखें सफ़ेद थीं।

बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—

“अब्बा आ गए?”

फ़िरोज़ जम गया।

“अब्बा?”

बच्चे ने हाथ बढ़ाया।

“मुझे गोद में लो।”

फ़िरोज़ ने बच्चे को उठाया।

जैसे ही उसने बच्चे को अपनी छाती से लगाया—

उसके अंदर से एक और आवाज़ आई।

बहुत धीमी।

बहुत पुरानी।

“बेटा… इसे मत उठाना।”

फ़िरोज़ ने पीछे देखा।

ज़ोया खड़ी थी।

उसके पीछे सलीमा।

और उनके पीछे—

नूर।

तीनों औरतें एक साथ उसे देख रही थीं।

ज़ोया ने कहा—

“वो बच्चा तुम्हारा अतीत है।”

सलीमा ने कहा—

“वो तुम्हारा वर्तमान है।”

नूर ने कहा—

“और अगर तुमने उसे जगाया…”

तीनों की आवाज़ एक साथ गूँजी—

“तो वो तुम्हारा भविष्य बन जाएगा।”

बच्चा अचानक फ़िरोज़ की छाती से चिपक गया।

उसकी उँगलियाँ फ़िरोज़ की त्वचा में धँस गईं।

और उसने भारी आवाज़ में कहा—

“अब मेरी बारी है।”

फ़िरोज़ की आँखें सफ़ेद हो गईं।

उसके पीछे खड़ी परछाईं ने सिर उठाया।

फिर परछाईं ने पहली बार फ़िरोज़ के सामने घुटने टेक दिए।

और बोली—

“मालिक… आपका जन्म पूरा हो गया।”

फ़िरोज़ ने बच्चे की तरफ देखा।

बच्चे का चेहरा बदल रहा था।

पहले हामिद…

फिर सलीम…

फिर फ़िरोज़…

और आख़िर में—

एक ऐसा चेहरा, जिसे फ़िरोज़ ने कभी नहीं देखा था।

बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—

“अब तुम मेरे अंदर बंद हो जाओ।”

अचानक पालना टूट गया।

कमरा अँधेरे में डूब गया।

और फ़िरोज़ की चीख पूरी हवेली में गूँज उठी—

“मैं किसी का शरीर नहीं हूँ!”

लेकिन उसकी आवाज़ के साथ एक दूसरी आवाज़ भी निकली—

“तुम मेरा शरीर हो।”

एपिसोड 11 समाप्त।

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