PretikaGhost Storiesनीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार

एपिसोड 10 — आख़िरी चिट्ठी

firoj saifi · Ghost Stories · 4 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
Chapter
10 of 10
Category
Ghost Stories
Reading time
4 min
Words
619
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

छह महीने बाद।

फिरोज आगरा लौट आया।

उसने शादी नहीं की।

उसने नीली हवेली की कोई बात किसी को नहीं बताई।

राघव के बारे में भी उसने किसी से कुछ नहीं कहा। गाँव वालों ने बताया कि आग लगने वाली रात के बाद राघव कभी दिखाई नहीं दिया।

फिरोज ने अपनी माँ की चिट्ठी एक लोहे के संदूक में बंद कर दी।

लेकिन एक रात…

उसके कमरे के दरवाज़े के नीचे एक लिफ़ाफ़ा आया।

उस पर लिखा था—

“फिरोज के लिए।”

उसने काँपते हाथों से खोला।

अंदर सिर्फ़ एक कागज़ था।

लिखावट उसकी माँ की थी।

“बेटा,

अगर तुम यह पढ़ रहे हो तो समझो नंदिनी आज़ाद नहीं हुई।

मैंने तुमसे झूठ बोला था।

नंदिनी पहली आत्मा नहीं थी।

जिस चीज़ ने उसे कैद किया था, वह आज भी ज़िंदा है।

और वह तुम्हारे घर तक पहुँच चुकी है।

आज रात आईने में अपना चेहरा मत देखना।

क्योंकि अगर तुम्हें आईने में अपने पीछे कोई दिखाई दे…

तो वह नंदिनी नहीं होगी।

वह तुम्हारे भीतर अपना घर बना चुकी होगी।

देवयानी को मत जगाना।

वह तुम्हारी बहन नहीं, उस दरवाज़े की चाबी है।

और अगर वह तुम्हें भैया कहकर पुकारे…

तो जवाब मत देना।”

फिरोज ने धीरे-धीरे पत्र नीचे किया।

कमरे में बिल्कुल सन्नाटा था।

उसने सामने पड़े आईने की तरफ़ देखा।

आईना धुँधला था।

फिर धीरे-धीरे साफ़ होने लगा।

फिरोज का चेहरा दिखाई दिया।

उसके पीछे…

एक आदमी खड़ा था।

काले कपड़े।

सफ़ेद बाल।

हाथ में खोपड़ी।

सोमेश्वर।

फिरोज ने झटके से पीछे देखा।

कमरा खाली था।

फिर आईने से आवाज़ आई—

“फिरोज…”

वह जम गया।

आईने में सोमेश्वर मुस्कुरा रहा था।

“तुमने समझा था कि तुमने मुझे मार दिया?”

आईने पर अंदर से किसी ने हाथ रखा।

फिर दूसरा।

फिर तीसरा।

सैकड़ों हाथ शीशे के पीछे उभर आए।

फिरोज पीछे हटने लगा।

और तभी उसके कान के पास किसी औरत की बहुत धीमी आवाज़ आई—

“भागो, फिरोज…”

वह नंदिनी की आवाज़ थी।

“इस बार हवेली नहीं…”

एक पल की ख़ामोशी।

“…तुम्हारा घर है।”

कमरे की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।

आईने में आख़िरी बार एक चेहरा दिखाई दिया।

वह फिरोज का चेहरा था।

लेकिन उसकी आँखें…

पूरी तरह काली थीं।

और नीचे आईने पर अपने-आप शब्द उभर आए—

“कहानी अभी शुरू हुई है…”

फिरोज ने आँखें बंद कर लीं।

उसे लगा जैसे कमरे में कोई बच्ची धीरे-धीरे चल रही है।

एक कदम।

फिर दूसरा।

फिर तीसरा।

उसके पैरों में पायल बँधी थी।

छन… छन… छन…

फिरोज ने माँ की चेतावनी याद की—

अगर वह तुम्हें भैया कहकर पुकारे, तो जवाब मत देना।

पायल की आवाज़ उसके बिल्कुल पीछे आकर रुक गई।

फिर एक बच्ची ने फुसफुसाकर कहा—

“भैया…”

फिरोज ने होंठ भींच लिए।

कमरे की दीवारों पर दरारें फैलने लगीं।

आईने के भीतर अब सिर्फ़ सोमेश्वर नहीं था।

नंदिनी भी थी।

राघव भी था।

उसकी माँ भी थी।

और सबसे पीछे एक विशाल काली आकृति खड़ी थी, जिसके चारों ओर अब नौ रेखाओं वाली आँख चमक रही थी।

बच्ची ने फिर पुकारा—

“भैया, मुझे बाहर निकालो।”

फिरोज ने अनजाने में आँखें खोल दीं।

आईने में देवयानी खड़ी थी।

उसके हाथ में नीला रिबन था।

वह मुस्कुरा रही थी।

फिरोज ने एक कदम उसकी ओर बढ़ाया।

तभी आईने पर उसकी माँ के शब्द उभरे—

“जवाब मत देना।”

फिरोज रुक गया।

देवयानी का चेहरा अचानक बदल गया।

उसकी आँखें काली हो गईं।

उसने अपना मुँह खोला।

लेकिन आवाज़ बच्ची की नहीं थी।

वह आवाज़ बहुत गहरी थी।

बहुत पुरानी।

और उसने कहा—

“तुमने जवाब दे दिया।”

फिरोज के पीछे कमरे का दरवाज़ा अपने-आप बंद हो गया।

आईना टूटकर हज़ारों टुकड़ों में बिखर गया।

हर टुकड़े में फिरोज का अलग चेहरा दिखाई दे रहा था।

किसी की आँखें लाल थीं।

किसी का चेहरा जला हुआ था।

किसी के गले में जंजीर थी।

और एक टुकड़े में फिरोज नहीं था।

वहाँ सिर्फ़ एक खाली कमरा था।

उस कमरे के बीचोंबीच एक नीली हवेली खड़ी थी।

फिरोज ने आख़िरी बार अपनी माँ की आवाज़ सुनी—

“अब हवेली तुम्हारे अंदर है।”

फिर अँधेरे में किसी ने धीरे से दरवाज़ा खोला।

बाहर कोई नहीं था।

सिर्फ़ फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

वे निशान कमरे से बाहर नहीं जा रहे थे।

वे फिरोज के बिस्तर तक आए थे…

और वहीं खत्म हो गए।

सुबह जब नौकर कमरे में पहुँचा, तो फिरोज वहाँ नहीं था।

कमरा खाली था।

आईना टूटा हुआ था।

दीवार पर एक नया निशान बना था—

एक आँख।

उसके चारों ओर नौ रेखाएँ।

और आईने के सबसे बड़े टुकड़े पर खून से लिखा था—

“नीली हवेली जल चुकी है… लेकिन उसका दरवाज़ा अब हर घर में है।”

समाप्त।

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