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एपिसोड 8 — हवेली का असली मालिक
firoj saifi · Ghost Stories · 4 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
- Chapter
- 8 of 8
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 4 min
- Words
- 715
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
फिरोज सीढ़ियों पर चढ़ने ही वाला था कि उसके सामने की दीवार अचानक काँपने लगी। पत्थरों के बीच से नीली रोशनी रिसने लगी और अगले ही पल पूरी दीवार भीतर की ओर धँस गई।
उसके पीछे एक लंबा अँधेरा रास्ता था।
रास्ते की दीवारों पर पुराने हाथों के निशान बने थे। कुछ निशान छोटे थे, जैसे बच्चों के हों, और कुछ इतने बड़े कि किसी इंसान के नहीं लगते थे। हर कुछ कदम पर फर्श में लोहे की कीलें जड़ी थीं, जिन पर सूखा हुआ काला पदार्थ चिपका था।
राघव की काली आँखें अब भी फिरोज पर टिकी थीं।
“आगे जाओ,” उसने धीमे स्वर में कहा।
“तुम मेरे साथ क्यों आ रहे हो?”
“क्योंकि अब मैं अकेला नहीं हूँ।”
उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।
“वह मेरे भीतर भी आ चुका है।”
नंदिनी जंजीर से जूझ रही थी। उसकी उँगलियों से धुआँ निकल रहा था, लेकिन जंजीर हर बार और कस जाती।
“फिरोज, सोमेश्वर के कमरे तक पहुँचो!” उसने चीखकर कहा। “वहीं से इस रास्ते का अंत होगा।”
फिरोज अँधेरे गलियारे में दौड़ पड़ा। पीछे से राघव के कदमों की आवाज़ आ रही थी। कभी वह आवाज़ इंसानी लगती, कभी किसी भारी जानवर की तरह।
रास्ते के अंत में एक कमरा था।
कमरे में सैकड़ों पुराने दीये जल रहे थे और बीच में एक आदमी बैठा था।
काले वस्त्र।
सफ़ेद बाल।
हाथ में खोपड़ी।
पंडित सोमेश्वर।
लेकिन वह पचास साल पहले मर चुका था।
फिरोज ने उसे देखते ही कदम रोक दिए।
सोमेश्वर मुस्कुराया।
“तुम आ ही गए।”
“तुम मर चुके हो।”
“मृत्यु उन लोगों के लिए होती है जिनका शरीर उनका अपना हो।”
उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।
“मैंने अपना शरीर बहुत पहले दे दिया था।”
नंदिनी पीछे से कमरे में पहुँची। उसकी गर्दन में जंजीर अब भी लिपटी थी और जंजीर का दूसरा सिरा अँधेरे में गायब था।
सोमेश्वर ने उसकी ओर देखकर कहा—
“तुम्हें लगता है यह आत्मा तुम्हारे परिवार को सज़ा दे रही है?”
उसने नंदिनी की ओर इशारा किया।
“नहीं।”
“यह भी मेरी कैद में है।”
फिरोज स्तब्ध रह गया।
सोमेश्वर ने बताया कि वर्षों पहले उसने अमर होने के लिए एक तांत्रिक अनुष्ठान किया था। लेकिन अनुष्ठान अधूरा रह गया। उसे एक जीवित आत्मा की आवश्यकता थी—ऐसी आत्मा, जिसमें प्रेम, क्रोध और विश्वासघात तीनों मौजूद हों।
नंदिनी उसके लिए सबसे उपयुक्त थी।
उसने नंदिनी की आत्मा को आईने और हवेली की नींव से बाँधकर अपनी शक्ति का स्रोत बना लिया। राय परिवार हर पच्चीस साल में एक बलि देता रहा, ताकि नंदिनी की चेतना कमजोर रहे और सोमेश्वर का नियंत्रण बना रहे।
फिरोज ने पूछा—
“तुम्हें किसने शक्ति दी?”
सोमेश्वर ने कमरे के पीछे बने काले दरवाज़े की ओर देखा।
“जिसका नाम लेने से पहले ही इंसान अपनी आत्मा खो देता है।”
दरवाज़े के पीछे से भारी साँसों की आवाज़ आने लगी।
नंदिनी ने फिरोज की ओर देखा।
“मुझे तुम्हारी मदद चाहिए।”
फिरोज ने पूछा—
“कैसे?”
“उसका ताबीज़ तोड़ दो।”
सोमेश्वर के गले में एक काला ताबीज़ लटक रहा था। उस पर वही आँख बनी थी, लेकिन उसके चारों ओर नौ रेखाएँ थीं।
फिरोज ने अपनी गर्दन से ताबीज़ निकाला।
लेकिन जैसे ही उसने उसे पत्थर पर मारा—
सोमेश्वर हँस पड़ा।
“बहुत देर हो चुकी है।”
दीये एक-एक करके बुझने लगे।
“तुम्हारे खून की आख़िरी बूंद इस अनुष्ठान को पूरा कर चुकी है।”
फिरोज के हाथ पर एक कट था।
उससे खून की एक बूंद ज़मीन पर गिरी।
और पूरा तहखाना लाल रोशनी से भर गया।
काले दरवाज़े पर दरारें पड़ने लगीं।
अंदर से किसी ने फुसफुसाया—
“फिरोज…”
वह आवाज़ उसकी माँ की थी।
फिरोज दरवाज़े की ओर बढ़ा।
नंदिनी ने उसे रोक लिया।
“वह तुम्हारी माँ नहीं है।”
“लेकिन आवाज़ तो उनकी है।”
“यह चीज़ आवाज़ें चुरा लेती है।”
दरवाज़े के पीछे से फिर आवाज़ आई—
“बेटा, मुझे बाहर निकालो…”
फिरोज की आँखों में आँसू आ गए।
सोमेश्वर मुस्कुराया।
“तुम्हारी माँ ने भी यही गलती की थी।”
फिरोज ने उसकी ओर देखा।
“मेरी माँ के साथ क्या हुआ?”
सोमेश्वर ने उत्तर दिया—
“वह तुम्हें बचाने आई थी।”
फिर उसने धीरे से कहा—
“लेकिन उसने अपनी जगह तुम्हारा नाम लिख दिया।”
फिरोज ने काँपते हुए पूछा—
“कहाँ?”
सोमेश्वर ने कमरे के फर्श की ओर इशारा किया।
वहाँ राख से बना एक वृत्त था। उसके बीच में फिरोज का नाम लिखा था। नाम के नीचे एक और नाम आधा मिटा हुआ था—
देवयानी।
“मेरी बहन?”
सोमेश्वर ने सिर झुकाया।
“तुम्हारी बहन नहीं। तुम्हारा पहला चेहरा।”
फिरोज समझ नहीं पाया।
सोमेश्वर ने कहा—
“जब तुम पैदा हुए, तुम्हारी बहन पहले से इस हवेली के श्राप में बँधी थी। तुम्हारी माँ ने उसे बचाने के लिए उसकी आत्मा को तुम्हारे भीतर छिपा दिया।”
“तो देवयानी मेरे अंदर है?”
“थी।”
सोमेश्वर की मुस्कान गहरी हो गई।
“अब वह जाग चुकी है।”
फिरोज के भीतर अचानक किसी बच्ची की आवाज़ गूँजी—
“भैया, मुझे बाहर निकालो।”
उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया।
जब उसने फिर देखा, तो उसके हाथों पर किसी और के नाखूनों के निशान थे।