Pretika › Ghost Stories › नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
एपिसोड 7 — सबसे बड़ा धोखा
firoj saifi · Ghost Stories · 4 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
- Chapter
- 7 of 8
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 4 min
- Words
- 604
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
फिरोज ने देवयानी की ओर देखते हुए पूछा—
“तुम मुझसे क्या चाहती हो?”
बच्ची ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह दीवार से अलग होकर धीरे-धीरे तहखाने के फर्श पर उतर आई। उसके पैरों के नीचे धूल नहीं हिली। वह जैसे ज़मीन पर चल नहीं रही थी, बल्कि अँधेरे के ऊपर तैर रही थी।
नंदिनी ने तुरंत फिरोज का हाथ पकड़ लिया।
“उससे बात मत करो।”
“यह मेरी बहन है।”
“नहीं,” नंदिनी ने कठोर स्वर में कहा, “यह उसकी आवाज़ और तुम्हारी यादों से बना हुआ चेहरा है।”
देवयानी ने सिर टेढ़ा किया।
“भैया, आपको मेरी याद नहीं आती?”
फिरोज के भीतर अचानक बचपन की एक तस्वीर कौंधी। वह और एक छोटी लड़की हवेली के आँगन में खेल रहे थे। लड़की के हाथ में नीला रिबन था। वह हँसते हुए उसे कुएँ के पास बुला रही थी।
फिर तस्वीर बदल गई।
कुएँ के भीतर आग जल रही थी।
किसी ने लड़की को नीचे धकेल दिया था।
फिरोज ने सिर पकड़ लिया।
“मुझे सब याद क्यों नहीं?”
नंदिनी ने कहा—
“क्योंकि तुम्हारी माँ ने तुम्हारी यादों पर मुहर लगा दी थी।”
तभी पीछे से राघव ने बंदूक तान दी।
“माफ़ करना।”
फिरोज स्तब्ध रह गया।
“राघव?”
राघव की आँखों में आँसू थे।
“मेरे परिवार को तुम्हारे परिवार ने बरबाद किया था।”
“तो?”
“यह श्राप तभी खत्म होगा जब राय परिवार का आख़िरी आदमी मरेगा।”
फिरोज पीछे हटने लगा।
“तुम मुझे मारना चाहते हो?”
“मैं नहीं चाहता।”
राघव की उँगली ट्रिगर पर कस गई।
“लेकिन अगर मैंने ऐसा नहीं किया तो मेरा पूरा परिवार मर जाएगा।”
नंदिनी ने राघव की ओर देखा।
“तुम्हें किसने यह बताया?”
राघव ने काँपते हुए कहा—
“मेरे पिता की डायरी में लिखा था। हर पच्चीस साल में एक नाम मिटता है। इस बार तुम्हारा नाम है।”
फिरोज ने धीरे से पूछा—
“और अगर मैं मर गया तो?”
“तुम्हारी आत्मा हवेली में बँध जाएगी,” नंदिनी ने कहा, “और वह चीज़ तुम्हारे शरीर का इस्तेमाल करके गाँव से बाहर निकल जाएगी।”
राघव की बंदूक नीचे हो गई।
“तुमने मुझे यह पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि तुम अपने परिवार की तरह ही डर से चल रहे हो,” नंदिनी ने उत्तर दिया।
तभी फिरोज को अपनी माँ की चिट्ठी याद आई।
“अगर आ गए हो…”
“तो नीली हवेली में रात मत बिताना।”
वह चेतावनी नहीं थी।
वह बुलावा था।
फिरोज ने नंदिनी की ओर देखा।
“तुमने मेरी माँ से चिट्ठी लिखवाई?”
नंदिनी चुप रही।
फिरोज ने फिर पूछा—
“या मेरी माँ भी तुम्हारे साथ है?”
नंदिनी की मुस्कान गायब हो गई।
उसने पहली बार डरते हुए पीछे देखा।
तहखाने की दीवार से एक और आवाज़ आई—
“नंदिनी…”
वह आवाज़ सुनते ही नंदिनी पीछे हट गई।
फिरोज ने पूछा—
“यह कौन है?”
नंदिनी ने फुसफुसाया—
“जिससे मैं भी डरती हूँ।”
अँधेरे से एक लंबी परछाईं बाहर आई।
उसके हाथ में लोहे की जंजीर थी।
जंजीर के हर छल्ले पर किसी इंसान का नाम खुदा हुआ था।
सबसे आख़िरी छल्ले पर लिखा था—
फिरोज सैफी।
परछाईं ने राघव की ओर देखा।
“गोली चलाओ।”
राघव काँप गया।
“तुम कौन हो?”
परछाईं ने अपना चेहरा उठाया।
चेहरा नहीं था।
सिर्फ़ एक गहरा काला खालीपन।
“मैं वह हूँ, जिसे तुम्हारे पूर्वजों ने भगवान समझकर बुलाया था।”
नंदिनी ने फिरोज को पीछे खींच लिया।
“यह सोमेश्वर नहीं है।”
फिरोज ने पूछा—
“तो फिर कौन है?”
नंदिनी ने कहा—
“सोमेश्वर इसका पहला सेवक था।”
परछाईं ने हाथ उठाया।
राघव की बंदूक उसके हाथ से छूटकर हवा में जा अटकी।
“तुम सबने मुझे नाम दिए,” वह बोली, “कभी देवता, कभी श्राप, कभी आत्मा। लेकिन मैं किसी नाम में नहीं बँधता।”
फिरोज ने पूछा—
“तुम्हें क्या चाहिए?”
परछाईं ने उसकी ओर देखा।
“एक चेहरा।”
तहखाने की दीवार पर फिरोज का चेहरा उभर आया।
फिर वह चेहरा धीरे-धीरे नंदिनी का बन गया।
फिर देवयानी का।
परछाईं ने कहा—
“जिसका चेहरा मैं पहन लूँ, उसके घर के सारे दरवाज़े मेरे हो जाते हैं।”
नंदिनी ने फिरोज को एक पत्थर की सीढ़ी की ओर धकेला।
“भागो! सोमेश्वर के कमरे तक पहुँचो। वहाँ उसका ताबीज़ है।”
“और तुम?”
“मैं इसे रोकूँगी।”
परछाईं ने नंदिनी की गर्दन में जंजीर डाल दी।
नंदिनी चीखी।
फिरोज सीढ़ियों की ओर भागा, लेकिन पीछे से राघव की आवाज़ आई—
“फिरोज, मत जाओ!”
वह पलटा।
राघव अब अपनी बंदूक उठाए खड़ा था।
लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
“तुम्हें यहाँ से कोई नहीं जाने देगा।”