Pretika › Ghost Stories › नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
एपिसोड 6 — असली सच्चाई
firoj saifi · Ghost Stories · 3 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
- Chapter
- 6 of 8
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 3 min
- Words
- 442
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
फिरोज सुबह होते ही राघव के पास गया।
“नंदिनी कौन है?”
राघव चुप रहा।
“मुझे सच चाहिए।”
राघव ने दरवाज़ा बंद किया और खिड़की पर पर्दा डाल दिया।
फिर धीमी आवाज़ में बोला—
“नंदिनी इस हवेली की पहली मालकिन थी।”
“पहली?”
“तुम्हारे परदादा ने उससे शादी की थी।”
“फिर?”
“एक रात वह गायब हो गई।”
फिरोज ने पूछा—
“कैसे?”
“कहा गया कि उसने आत्महत्या की।”
“लेकिन?”
राघव ने धीमी आवाज़ में कहा—
“उसकी लाश कभी नहीं मिली।”
फिरोज को डायरी याद आई।
“क्या मेरे पिता उसके बारे में जानते थे?”
राघव ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हारे पिता ही नहीं, तुम्हारी माँ भी जानती थीं।”
फिरोज का चेहरा कठोर हो गया।
“मेरी माँ?”
“तुम्हारी माँ हर साल 17 अगस्त को हवेली आती थीं।”
“क्यों?”
“किसी से मिलने।”
“किससे?”
राघव ने जवाब नहीं दिया।
उस रात फिरोज ने अपने पिता के कागज़ात फिर खोजे।
उसे एक पुराना नक्शा मिला। नक्शे में हवेली के नीचे एक गुप्त तहखाना बना था।
फिरोज और राघव वहाँ पहुँचे।
तहखाने की दीवार पर वही सात रेखाओं वाली आँख बनी थी।
बीच में एक पत्थर पर लिखा था—
“जिसे प्रेम से बाँधा गया, उसे रक्त से मुक्त करना होगा।”
नीचे एक सूची थी।
हर पीढ़ी का नाम।
हर नाम के आगे एक तारीख़।
सबसे नीचे—
फिरोज सैफी — 17 अगस्त 1926।
आज की तारीख़।
राघव पीछे हट गया।
“तुम्हारे परिवार ने हर पच्चीस साल में किसी एक व्यक्ति की बलि दी।”
फिरोज ने काँपते हुए पूछा—
“किसके लिए?”
तहखाने की दीवार के पीछे से आवाज़ आई—
“मेरे लिए।”
दीवार में दरार पड़ी।
और नंदिनी बाहर आ गई।
लेकिन इस बार वह इंसान नहीं दिख रही थी।
उसका शरीर धुएँ से बना था।
उसकी आँखें जल रही थीं।
उसने कहा—
“तुम्हारे परिवार ने मुझे मारा नहीं था, फिरोज।”
वह उसके पास आई।
“उन्होंने मुझे इस घर से बाँध दिया था।”
फिरोज ने पूछा—
“तो बलि किसकी दी जाती थी?”
नंदिनी ने सूची की ओर देखा।
“हर पच्चीस साल में राय परिवार का एक सदस्य मरता था, ताकि मैं जाग न सकूँ।”
“और अगर मैं मर गया तो?”
“तुम्हारी आत्मा भी इसी हवेली में बँध जाएगी।”
राघव ने बंदूक निकाल ली।
“यही होना चाहिए।”
फिरोज ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हें पहले से सब पता था?”
राघव की आँखों में आँसू थे।
“मेरे पिता भी इस सूची में थे। तुम्हारे परिवार ने उन्हें बलि के लिए चुना था, लेकिन वह भाग गए। उसके बाद हमारा परिवार इस श्राप का रखवाला बना।”
नंदिनी ने अचानक अँधेरे की ओर देखा।
उसका चेहरा भय से भर गया।
“वह जाग गया है।”
फिरोज ने पूछा—
“कौन?”
तहखाने की गहराई से किसी ने धीरे-धीरे ताली बजाई।
ठक… ठक… ठक…
दीवार पर बनी आँख की सातों रेखाएँ लाल चमकने लगीं।
फिर आठवीं रेखा अपने-आप उभर आई।
राघव ने फुसफुसाकर कहा—
“यह पहले कभी नहीं हुआ।”
नंदिनी ने फिरोज की ओर देखा।
“क्योंकि इस बार बलि के लिए सिर्फ़ तुम्हारा शरीर नहीं चुना गया।”
“तो क्या?”
“तुम्हारी यादें।”
तहखाने की छत से राख गिरने लगी।
फिरोज को अचानक अपनी माँ की आवाज़ सुनाई दी—
“देवयानी को बचाना…”
उसने आँखें बंद कर लीं।
जब खोलीं, तो तहखाने की दीवार पर एक बच्ची खड़ी थी।
वह देवयानी थी।
उसका चेहरा फिरोज जैसा था।
और उसकी गर्दन पर नीला रिबन बँधा था।