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एपिसोड 5 — नंदिनी का रहस्य

firoj saifi · Ghost Stories · 3 मिनट

नंदिनी ने फिरोज को हवेली की पिछली ओर बने पुराने मंदिर में बुलाया।
मंदिर की दीवारों पर काले धब्बे थे। फर्श पर सूखे फूल और राख बिखरी हुई थी। मूर्ति का चेहरा काले कपड़े से ढका था।
फिरोज ने पूछा—
“इसे ढका क्यों है?”
नंदिनी ने कहा—
“क्योंकि इसे देखने वाला अपना चेहरा भूल जाता है।”
फिरोज हँसना चाहता था, लेकिन नंदिनी गंभीर थी।
उसने एक पुराना ताबीज़ फिरोज को दिया।
“इसे अपने पास रखना।”
“क्यों?”
“आज रात तुम्हें अपने पिता दिखाई देंगे।”
फिरोज ने चौंककर उसकी ओर देखा।
“मेरे पिता?”
“हाँ।”
“लेकिन उनकी मृत्यु हो चुकी है।”
नंदिनी ने कहा—
“मृत लोग हमेशा मृत नहीं रहते।”
फिरोज ने ताबीज़ अपनी गर्दन में डाल लिया।
मंदिर के पीछे एक पत्थर की दीवार थी। उस पर कई नाम खुदे हुए थे। कुछ नामों पर लाल निशान बने थे, कुछ आधे मिटे हुए थे।
फिरोज ने लालटेन उठाकर पढ़ा।
सबसे ऊपर लिखा था—
नंदिनी।
उसके नीचे—
देवयानी।
और सबसे नीचे—
फिरोज।
“देवयानी कौन है?”
नंदिनी ने उत्तर नहीं दिया।
“मेरी बहन?”
नंदिनी की आँखें झुक गईं।
“तुम्हें अपनी बहन की याद क्यों नहीं?”
फिरोज ने सिर पकड़ लिया। अचानक उसके भीतर एक धुँधली तस्वीर उभरी—एक छोटी लड़की, जिसके हाथ में नीला रिबन था। वह उसे “भैया” कहकर पुकार रही थी।
फिर आग।
चीखें।
और किसी ने उसे गोद में उठाकर हवेली से बाहर भागते हुए कहा था—
“इसे कुछ याद नहीं रहना चाहिए।”
फिरोज ने आँखें खोल दीं।
“वह ज़िंदा थी?”
नंदिनी ने कहा—
“तुम्हारी बहन इस हवेली की पहली बलि थी।”
उस रात वह अपने कमरे में सो गया।
ठीक 2:17 बजे उसकी आँख खुली।
सामने कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।
उसका पिता।
चेहरा जला हुआ।
आँखें पूरी तरह काली।
फिरोज की आवाज़ नहीं निकली।
पिता ने कहा—
“बेटा… नंदिनी से दूर रहना।”
फिरोज पीछे हट गया।
“आप…?”
“वह वही है जिसने हमें बर्बाद किया।”
“आपने उसके साथ क्या किया था?”
पिता ने कोई जवाब नहीं दिया।
उनके जले हुए चेहरे पर दरारें पड़ने लगीं।
“वह तुम्हें भी अपने जैसा बना देगी।”
अचानक कमरे का आईना टूट गया।
टूटे हुए शीशे में फिरोज ने देखा—
नंदिनी उसके पीछे खड़ी थी।
उसका चेहरा बदल रहा था।
आँखें लाल।
मुँह से काला धुआँ निकल रहा था।
फिरोज पलटा।
वहाँ कोई नहीं था।
आईने में भी कुछ नहीं था।
सिर्फ़ उसके पिता।
और इस बार पिता मुस्कुरा रहे थे।
फिरोज ने ताबीज़ को कसकर पकड़ लिया।
ताबीज़ गर्म हो रहा था।
उस पर बनी आँख की आकृति धीरे-धीरे खुलने लगी।
फिर कमरे की दीवार पर एक परछाईं उभरी।
वह परछाईं फिरोज की थी, लेकिन उसका सिर उल्टी दिशा में मुड़ा हुआ था।
परछाईं ने हाथ उठाया और दीवार पर लिखा—
“तुम्हारे पिता झूठ बोल रहे हैं।”
फिरोज ने पीछे हटते हुए पूछा—
“तो सच क्या है?”
आईने के टूटे हुए टुकड़ों में नंदिनी का चेहरा दिखाई दिया।
उसने बहुत धीमे स्वर में कहा—
“तुम्हारे पिता ने मुझे नहीं बाँधा था, फिरोज…”
वह रुकी।
“उन्होंने तुम्हें बाँधा था।”
फिरोज ने ताबीज़ को ज़मीन पर पटक दिया।
ताबीज़ टूटते ही कमरे में तेज़ हवा भर गई। दीवारों पर टँगे चित्र एक साथ हिलने लगे। हर चित्र में चेहरों की जगह अब फिरोज का चेहरा दिखाई दे रहा था।
फिर एक चित्र में छोटी देवयानी दिखाई दी।
उसके पीछे उसकी माँ खड़ी थी।
माँ के हाथ में वही नीला रिबन था।
चित्र के नीचे शब्द उभरे—
“जिसे बचाया गया, वही अब दरवाज़ा है।”

Writer
firoj saifi
Story
नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
Chapter
5 of 15
Category
Ghost Stories
Reading time
3 min
Words
557
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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