Pretika › Ghost Stories › नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
एपिसोड 4 — शापित डायरी
firoj saifi · Ghost Stories · 3 मिनट
अगली सुबह फिरोज ने हवेली की पुरानी लाइब्रेरी खंगालनी शुरू की।
कमरे में धूल से ढकी किताबें, टूटे हुए नक्शे और पुराने दस्तावेज़ बिखरे पड़े थे। खिड़कियों से आती धूप भी भीतर के अँधेरे को पूरी तरह दूर नहीं कर पा रही थी।
उसे एक लोहे का संदूक मिला।
संदूक पर वही निशान बना था—एक आँख और उसके चारों ओर सात रेखाएँ।
ताला जंग लगा हुआ था, लेकिन फिरोज ने जैसे ही उसे छुआ, ताला अपने-आप खुल गया।
संदूक के अंदर उसके पिता की डायरी थी।
पहले कई पन्ने सामान्य थे।
खेती।
जायदाद।
व्यापार।
फिर अचानक लिखावट बदल गई।
एक पन्ने पर लिखा था—
“आज मैंने उसे पहली बार देखा।”
अगला पन्ना—
“वह कहती है कि वह इस घर की मालकिन है।”
फिर—
“वह मर चुकी है, लेकिन हर रात मेरे कमरे में आती है।”
फिरोज के हाथ काँपने लगे।
एक और पन्ने पर लिखा था—
“नंदिनी को तहखाने में बाँध दिया गया है। वह मरना चाहती है, लेकिन मर नहीं सकती।”
फिरोज ने नाम पढ़ते ही डायरी बंद कर दी।
नंदिनी।
यह नाम उसने पहले कभी नहीं सुना था।
आख़िरी पन्ने पर लिखा था—
“मैंने पंडित सोमेश्वर को बुलाया है। उन्होंने कहा है कि आत्मा को बाँधा जा सकता है। लेकिन कीमत देनी होगी।”
नीचे एक और वाक्य था—
“कीमत मेरी बेटी होगी।”
फिरोज की साँस अटक गई।
उसकी कोई बहन नहीं थी।
कम से कम उसे यही बताया गया था।
डायरी के अगले पन्ने पर स्याही फैली हुई थी। बहुत ध्यान से देखने पर कुछ शब्द पढ़े जा सकते थे—
“बेटी का नाम… देवयानी…”
फिरोज ने माथे पर हाथ रख लिया।
उसे बचपन से बताया गया था कि वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान है।
अचानक पीछे से आवाज़ आई—
“तुम्हें यह नहीं पढ़ना चाहिए था।”
फिरोज पलटा।
एक युवती खड़ी थी।
साधारण सफ़ेद साड़ी।
शांत चेहरा।
बड़ी आँखें।
उसने कहा—
“मेरा नाम नंदिनी है।”
फिरोज ने पूछा—
“आप कौन हैं?”
“मैं इस हवेली में रहती हूँ।”
“लेकिन यहाँ तो कोई नहीं रहता।”
नंदिनी मुस्कुराई।
“मैं रहती हूँ।”
फिरोज ने उसकी ओर देखा।
“कब से?”
नंदिनी ने धीरे से जवाब दिया—
“तुम्हारे जन्म से पहले से।”
फिरोज ने डायरी उसकी ओर बढ़ाई।
“इसमें तुम्हारा नाम लिखा है।”
नंदिनी की आँखों में अचानक गहरी उदासी उतर आई।
“तुम्हारे पिता ने मेरा नाम मिटाने की बहुत कोशिश की थी।”
“तुम्हारे साथ क्या हुआ?”
नंदिनी ने उत्तर देने के बजाय लाइब्रेरी की दीवार की ओर देखा।
दीवार पर टँगे एक पुराने चित्र में एक युवती बनी थी।
उसका चेहरा खुरचा हुआ था।
नंदिनी ने कहा—
“जिस दिन मेरा चेहरा इस चित्र से मिटाया गया, उसी दिन मैं इस हवेली से बाहर निकलना भूल गई।”
फिरोज ने चित्र के नीचे जमी धूल हटाई। वहाँ एक तारीख़ खुदी थी—
17 अगस्त 1876।
“यह तारीख़ क्या है?”
नंदिनी ने उसकी ओर देखा।
“जिस दिन पहली बार इस हवेली में आईना लगाया गया था।”
“आईना?”
“वह आईना जिसमें चेहरा नहीं, आत्मा दिखाई देती है।”
फिरोज ने कमरे के कोने में रखे कपड़े से ढके बड़े आईने की ओर देखा।
“क्या वह यही है?”
नंदिनी ने सिर हिलाया।
“उसे मत खोलना।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसमें जो दिखाई देता है, वह हमेशा तुम्हारे पीछे नहीं होता।”
फिरोज ने कपड़ा हटाने के लिए हाथ बढ़ाया।
नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
उसकी उँगलियाँ बर्फ़ जैसी ठंडी थीं।
“तुम्हारी माँ ने भी यही गलती की थी।”
- Writer
- firoj saifi
- Story
- नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
- Chapter
- 4 of 15
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 3 min
- Words
- 546
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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