PretikaGhost Storiesनीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार

एपिसोड 3 — बंद कमरा

firoj saifi · Ghost Stories · 3 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
Chapter
3 of 8
Category
Ghost Stories
Reading time
3 min
Words
485
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

फिरोज ने उसी रात हवेली में रहने का फैसला किया।
उसे विश्वास नहीं था कि कोई आत्मा या श्राप जैसी चीज़ होती है। उसके लिए हर रहस्य के पीछे कोई न कोई इंसानी वजह ज़रूर होती थी।
हवेली के पुराने नौकर गोपाल ने उसके लिए ऊपर वाला कमरा तैयार किया।
कमरे में एक पुराना आईना था, लकड़ी की अलमारी और दीवार पर फिरोज के पिता का चित्र।
चित्र पर धूल जमी थी, लेकिन आँखें साफ़ दिखाई दे रही थीं। फिरोज को हमेशा लगता था कि उसके पिता चित्र से उसे देखते रहते हैं।
उसे बचपन की एक बात याद आई।
उसके पिता हमेशा हवेली की ऊपरी मंज़िल पर जाने से मना करते थे।
खासकर—
कमरा नंबर 7।
रात के लगभग बारह बजे फिरोज ने किताब बंद की।
तभी ऊपर से किसी के चलने की आवाज़ आई।
ठक…
कुछ पल बाद—
ठक…
फिर—
ठक…
आवाज़ उसके कमरे की छत के ठीक ऊपर से आ रही थी।
फिरोज ने लालटेन उठाई और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा।
ऊपर एक लंबा गलियारा था। दीवारों पर पुराने पारिवारिक चित्र टँगे थे। हर चित्र में लोगों के चेहरे खुरचे हुए थे, जैसे किसी ने नाखूनों से उन्हें मिटाने की कोशिश की हो।
गलियारे के अंत में एक नीला दरवाज़ा था।
उस पर पीतल की पट्टी लगी थी—

फिरोज ने जेब से चाबी निकाली।
चाबी उसके हाथ में आते ही गर्म हो गई।
उसने उसे ताले में लगाया।
ताला बिना किसी प्रतिरोध के खुल गया।
फिरोज ने हैंडल घुमाया।
दरवाज़ा बंद था।
अंदर से किसी औरत की धीमी आवाज़ आई—
“फिरोज…”
उसका दिल तेज़ धड़कने लगा।
“कौन है?”
“दरवाज़ा खोलो।”
“तुम कौन हो?”
कुछ पल सन्नाटा रहा।
फिर आवाज़ आई—
“जिसे तुम्हारे पिता ने ज़िंदा दफ़न किया था।”
फिरोज का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
अचानक पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
वह चीखते हुए पलटा।
गोपाल खड़ा था।
“साहब! मैंने कहा था ऊपर मत आइए!”
“कमरे के अंदर कौन है?”
गोपाल काँप रहा था।
“कोई नहीं।”
अंदर से फिर आवाज़ आई—
“गोपाल…”
बूढ़ा नौकर वहीं घुटनों के बल बैठ गया।
उसके मुँह से निकला—
“मालकिन…”
फिरोज ने दरवाज़े की ओर देखा।
अब अंदर से रोने की आवाज़ आ रही थी।
फिर—
धड़ाम!
दरवाज़ा अपने-आप खुल गया।
कमरा खाली था।
लेकिन बीच में एक लकड़ी की कुर्सी रखी थी।
कुर्सी पर एक पुरानी लाल साड़ी पड़ी थी।
उस साड़ी पर ताज़ा खून लगा था।
फिरोज ने काँपते हाथों से साड़ी को छुआ।
खून अभी गीला था।
तभी कमरे की दीवार पर नाखूनों से लिखे शब्द उभरने लगे—
“तुम्हारी माँ ने मुझे नहीं बचाया।”
गोपाल ने फिरोज का हाथ पकड़कर उसे बाहर खींच लिया।
“साहब, अब यहाँ से चलिए!”
फिरोज ने पूछा—
“मेरी माँ यहाँ आई थीं?”
गोपाल ने सिर झुका लिया।
“वह सिर्फ़ आई नहीं थीं…”
वह रुक गया।
“वह इसी कमरे में आख़िरी बार ज़िंदा देखी गई थीं।”
फिरोज ने कमरे में फिर देखा। दीवार के कोने में एक छोटा-सा लकड़ी का पालना पड़ा था। पालने के भीतर धूल नहीं थी। उसमें नीला रिबन रखा था—ठीक वैसा ही जैसा उसे डाकगाड़ी में मिला था।
पालना अपने-आप धीरे-धीरे झूलने लगा।
चीं… चीं…
गोपाल ने आँखें बंद कर लीं।
“यह कमरा तुम्हें पहचान गया है।”
“इसका क्या मतलब है?”
गोपाल ने उत्तर नहीं दिया।
तभी पालने के नीचे से एक बच्चे की धीमी आवाज़ आई—
“भैया…”
फिरोज का खून जम गया।
उसकी कोई बहन नहीं थी।
कमरे का दरवाज़ा अचानक बंद हो गया।
और बाहर गलियारे में किसी ने सात बार दस्तक दी।

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