Pretika › Ghost Stories › नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
एपिसोड 2 — नीली हवेली
firoj saifi · Ghost Stories · 3 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
- Chapter
- 2 of 8
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 3 min
- Words
- 447
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
सुबह फिरोज चंद्रगढ़ पहुँचा।
गाँव बिल्कुल वैसा नहीं था जैसा उसकी यादों में था।
पुरानी गलियाँ।
बंद खिड़कियाँ।
दरवाज़ों पर लटके नींबू-मिर्च के गुच्छे।
और लोगों की डरी हुई आँखें, जो उसे देखते ही खिड़कियों के पीछे छिप जाती थीं।
गाँव के बाहर एक ऊँची पहाड़ी पर खड़ी थी—
नीली हवेली।
कभी वह फिरोज के परिवार की सबसे शानदार संपत्ति हुआ करती थी। अब उसकी दीवारों पर नीली काई जम चुकी थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और छत के कई हिस्से ढह चुके थे।
मुख्य दरवाज़े के ऊपर एक पत्थर पर अजीब निशान बना था—
एक आँख, जिसके चारों ओर सात रेखाएँ थीं।
फिरोज के बचपन के दोस्त राघव ने उसे देखते ही गले लगा लिया।
“तुम सच में आ गए?”
फिरोज ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“माँ की चिट्ठी मिली थी।”
राघव का चेहरा अचानक उतर गया।
“तुम्हें वह चिट्ठी नहीं मिलनी चाहिए थी।”
“क्यों?”
राघव ने हवेली की ओर देखा।
“क्योंकि तुम्हारी माँ ने आख़िरी बार इसी हवेली में वह चिट्ठी लिखी थी।”
फिरोज चौंक गया।
“मेरी माँ तो पंद्रह साल पहले मर गई थीं।”
“हाँ।”
“तो फिर चिट्ठी अभी कैसे आई?”
राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।
फिरोज ने हवेली के दरवाज़े की ओर देखा। दरवाज़े पर मोटी जंग लगी जंजीर बँधी थी। फिर भी वह धीरे-धीरे अपने-आप हिलने लगी।
छन्न… छन्न…
अगले ही पल जंजीर ज़मीन पर गिर गई।
दरवाज़ा अपने-आप खुल गया।
क्रीईईईक…
अंदर से ठंडी हवा का झोंका आया। उस हवा में गीली मिट्टी, पुराने धुएँ और किसी सड़े हुए फूल की गंध मिली हुई थी।
कहीं बहुत दूर से किसी औरत के रोने की आवाज़ सुनाई दी।
राघव ने फिरोज का हाथ पकड़ लिया।
“आज रात यहाँ मत रुकना।”
फिरोज ने पूछा—
“क्यों?”
राघव ने हवेली की अँधेरी खिड़कियों की ओर देखते हुए कहा—
“क्योंकि इस हवेली में रात को किसी की मौत नहीं होती…”
वह रुका।
“लोग सुबह उठते ही मर चुके होते हैं।”
फिरोज ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया।
“तुम अब भी बचपन वाली कहानियों पर भरोसा करते हो?”
राघव ने गंभीर होकर कहा—
“यह कहानी नहीं है। पिछले पच्चीस सालों में गाँव के सात लोग इस हवेली में रात बिताने गए। सुबह उनके शरीर मिले, लेकिन उनके चेहरे नहीं।”
फिरोज ने सोचा कि राघव उसे डराने की कोशिश कर रहा है।
तभी हवेली की ऊपरी मंज़िल की एक खिड़की में किसी का चेहरा दिखाई दिया।
सफ़ेद चेहरा।
काले बाल।
फिरोज ने पलक झपकाई।
चेहरा गायब था।
राघव ने धीमे स्वर में कहा—
“उसने तुम्हें देख लिया है।”
फिरोज ने जेब से पीतल की चाबी निकाली।
“यह मुझे रास्ते में मिली।”
चाबी देखते ही राघव का चेहरा पीला पड़ गया।
“इसे कहाँ से पाया?”
“डाकगाड़ी के पास।”
राघव ने चाबी छूने से इनकार कर दिया।
“यह हवेली की कोई साधारण चाबी नहीं है।”
“तो किसकी है?”
राघव ने बहुत धीमे स्वर में कहा—
“कमरा नंबर सात की।”
हवेली के भीतर से अचानक किसी भारी वस्तु के गिरने की आवाज़ आई।
दोनों ने एक साथ ऊपर देखा।
ऊपरी मंज़िल की वही खिड़की अब खुली थी।
और उसके शीशे पर अंदर से किसी ने उँगली से लिखा था—
“वापस मत जाओ।”