PretikaGhost Storiesनीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार

एपिसोड 1 — आख़िरी चिट्ठी

firoj saifi · Ghost Stories · 4 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
नीली हवेली 2.0 — आईने के उस पार
Chapter
1 of 8
Category
Ghost Stories
Reading time
4 min
Words
607
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

सन् 1926 की बात है।
आधी रात का समय था।
आगरा से दूर, यमुना के किनारे बसे छोटे-से कस्बे चंद्रगढ़ में घना कोहरा छाया हुआ था। सड़कें सुनसान थीं और दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ बार-बार सन्नाटे को चीर रही थी।
एक पुरानी डाकगाड़ी कच्ची सड़क पर तेज़ी से दौड़ रही थी।
गाड़ी के अंदर बैठे फिरोज सैफी बार-बार अपनी जेब टटोल रहे थे। जेब में एक चिट्ठी थी—वही चिट्ठी जिसने उन्हें पंद्रह वर्षों बाद अपने पैतृक गाँव लौटने पर मजबूर किया था।
चिट्ठी सिर्फ़ तीन पंक्तियों की थी—
“फिरोज,
अगर तुम्हें यह चिट्ठी मिले तो चंद्रगढ़ वापस मत आना।
लेकिन अगर आ गए हो… तो नीली हवेली में रात मत बिताना।
— तुम्हारी माँ”
समस्या यह थी कि फिरोज की माँ को मरे हुए पंद्रह साल हो चुके थे।
चिट्ठी पर तारीख़ थी—
17 अगस्त 1926।
आज की ही तारीख़।
फिरोज ने चिट्ठी कई बार पढ़ी थी। कागज़ पुराना था, किनारे पीले पड़ चुके थे, लेकिन स्याही बिल्कुल ताज़ा लग रही थी। सबसे अजीब बात यह थी कि चिट्ठी से हल्की-सी चंदन और गीली मिट्टी की गंध आ रही थी—ठीक वैसी, जैसी उसकी माँ के कमरे में आया करती थी।
उसने चिट्ठी को मोड़कर जेब में रखा ही था कि कागज़ के पीछे कुछ उभरा हुआ महसूस हुआ। उसने उसे फिर खोला। पीछे कोई शब्द नहीं थे, केवल एक छोटा-सा गोल निशान बना था—एक आँख, जिसके चारों ओर सात रेखाएँ थीं।
फिरोज ने उस निशान को उँगली से छुआ।
उसी क्षण चिट्ठी बर्फ़ जैसी ठंडी हो गई।
अचानक गाड़ी ज़ोर से झटके के साथ रुक गई।
घोड़ा बुरी तरह हिनहिनाया।
फिरोज ने पर्दा हटाकर बाहर देखा।
ड्राइवर कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।
“रामदीन?”
कोई जवाब नहीं आया।
फिरोज ने दरवाज़ा खोला और नीचे उतर गया। चारों तरफ़ इतना घना कोहरा था कि गाड़ी के आगे का रास्ता भी दिखाई नहीं दे रहा था।
“रामदीन!” उसने फिर पुकारा।
इस बार कोहरे के भीतर से किसी औरत के रोने की आवाज़ आई।
फिरोज का शरीर सिहर उठा।
फिर कोहरे के बीच एक औरत दिखाई दी।
सफ़ेद साड़ी।
लंबे खुले बाल।
वह सड़क के बीचोंबीच खड़ी थी।
फिरोज ने आवाज़ लगाई—
“कौन हैं आप?”
औरत ने धीरे-धीरे सिर उठाया।
उसका चेहरा बालों से ढका हुआ था।
फिर वह फुसफुसाई—
“तुम बहुत देर से आए हो, फिरोज।”
फिरोज जम गया।
उसने अपना नाम किसी को नहीं बताया था।
औरत धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगी। उसके कदमों की आवाज़ नहीं आ रही थी, लेकिन कीचड़ में हर कदम का निशान बन रहा था।
फिरोज पीछे हटने लगा।
तभी घोड़ा बुरी तरह चीखा।
फिरोज ने एक पल के लिए घोड़े की तरफ़ देखा।
और जब वापस सड़क की ओर देखा—
औरत गायब थी।
सिर्फ़ कीचड़ में उसके पैरों के निशान थे।
नंगे पैर।
वे निशान फिरोज के पैरों तक आए थे…
और वहीं खत्म हो गए।
उसी क्षण गाड़ी के भीतर से किसी ने धीरे से खाँसा।
फिरोज ने पलटकर देखा।
गाड़ी खाली थी।
लेकिन सीट पर एक नीला रेशमी रिबन पड़ा था।
वही रिबन, जो उसकी माँ बचपन में उसके हाथ पर बाँधा करती थी।
फिरोज ने रिबन उठाया ही था कि पीछे से किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाया—
“हवेली तुम्हारा इंतज़ार कर रही है…”
वह झटके से पलटा।
कोहरा फिर से खाली था।
तभी उसे गाड़ी के पहिए के नीचे कुछ चमकता दिखाई दिया। उसने झुककर उठाया। वह एक पुरानी पीतल की चाबी थी। चाबी के सिर पर वही आँख वाला निशान खुदा था।
फिरोज ने चाबी मुट्ठी में बंद कर ली।
दूर कहीं मुर्गे ने बाँग दी।
कोहरा थोड़ा छँटा तो उसे सड़क के किनारे एक टूटा हुआ पत्थर दिखाई दिया। उस पर धुँधले अक्षरों में लिखा था—
“चंद्रगढ़ — दो कोस।”
रामदीन का कोई पता नहीं था।
फिरोज ने अकेले ही गाड़ी संभाली और सुबह होने तक चंद्रगढ़ की ओर बढ़ता रहा। लेकिन रास्ते भर उसे ऐसा लगता रहा जैसे कोई अदृश्य यात्री गाड़ी के पीछे बैठा है।
हर मोड़ पर रिबन हल्का-सा हिलता।
हर बार चाबी उसकी हथेली में गर्म हो जाती।
और कभी-कभी, घोड़े की टापों के बीच उसे किसी बच्चे की हँसी सुनाई देती।
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