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एपिसोड 8 — अंतिम दरवाज़ा

firoj saifi · Haunted Places · 2 मिनट

सुबह तक हवेली शांत हो चुकी थी।

माही, अरमान और रीवा बाहर आ चुके थे।

काला दरवाज़ा बंद था।

लेकिन अब उस पर बना प्रतीक बदल चुका था।

रामदीन ने देखते ही कहा,

"यह पहले ऐसा नहीं था।"

अरमान ने टॉर्च की रोशनी डाली।

प्रतीक के नीचे एक नया निशान था।

एक तिथि।

1999

माही ने देखते ही कहा,

"यह मेरी जन्मतिथि है।"

सभी मौन हो गए।

तभी काले दरवाज़े के पीछे से हल्की दस्तक हुई।

ठक।

सबने एक-दूसरे की ओर देखा।

फिर—

ठक।

माही धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गई।

रीवा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

"नहीं।"

माही ने माँ की ओर देखा।

"इस बार मैं इसे नहीं खोलूँगी।"

उसने दीया उठाया और दरवाज़े के सामने रख दिया।

"मैं केवल यह याद रखना चाहती हूँ कि भय को बंद नहीं किया जा सकता। उसे समझना पड़ता है।"

रामदीन ने उसकी ओर देखा।

"मालकिन..."

अचानक पीछे से एक आवाज़ आई।

बहुत धीमी।

एक बच्चे की आवाज़।

"माही..."

माही ने मुड़कर देखा।

गलियारा खाली था।

फिर वही आवाज़ आई—

"मैं अभी भी अंदर हूँ।"

काले दरवाज़े की दरार से धुआँ बाहर आने लगा।

दीये की लौ अचानक बुझ गई।

और अंधेरे में...

किसी ने दरवाज़े के दूसरी ओर से धीरे से हँसना शुरू कर दिया।

माही पीछे हट गई।

अरमान ने उसका हाथ पकड़ लिया।

हवेली के बाहर सूरज उग रहा था।

लेकिन काले दरवाज़े के पीछे...

रात अभी भी शेष थी।

सीज़न 2 समाप्त।

लेकिन काले दरवाज़े के पीछे जो दुनिया थी, वह अब सिर्फ एक कैद नहीं रही… बल्कि वह धीरे-धीरे असल दुनिया में रिसने लगी है। और ये कहानी अभी बाकी हैं|

Writer
firoj saifi
Story
दरवाज़े के उस पार — Season 2
Chapter
8 of 8
Category
Haunted Places
Reading time
2 min
Words
263
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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