Pretika › Ghost Stories › अधूरी कहानी
पहला भाग — तेरह मिनट, सत्रह सेकंड
Pretika · Ghost Stories · 11 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- अधूरी कहानी
- Chapter
- 1 of 2
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 11 min
- Words
- 2175
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
बात आज से ठीक एक साल पहले की है। जुलाई का महीना था। बाहर बारिश हो रही थी, और मैं वही कर रहा था जो हर रात करता था — आपके भेजे हुए messages और emails पढ़ना। आप में से बहुत लोग जानते हैं, मेरी आधी कहानियाँ आप ही की भेजी हुई होती हैं। कोई अपने गाँव का क़िस्सा भेजता है, कोई अपने hostel की घटना, कोई अपनी दादी की सुनाई हुई बात।
उस रात क़रीब दो बजे मेरी नज़र एक email पर पड़ी। भेजने वाले का नाम था — विक्रम। और subject में सिर्फ़ चार शब्द लिखे थे — "आप आख़िरी उम्मीद हो।"
अब देखो, ऐसे dramatic subject तो रोज़ आते हैं। "भैया ये सौ प्रतिशत सच्ची घटना है", "भैया मेरी कहानी ज़रूर सुनाना"। मैं आदी हो चुका था। लेकिन इस email में कुछ… अलग था। शुरुआत ही ऐसी थी:
"अनुराग जी, नमस्कार। मैं आपको ये email भेजने से पहले तीन महीने तक सोचता रहा। क्योंकि ये email भेजकर मैं आपके साथ ठीक नहीं कर रहा हूँ। मुझे माफ़ कर दीजिएगा। लेकिन मेरे पास कोई और रास्ता नहीं है। मेरे पिताजी मर रहे हैं… और उनके बाद नंबर मेरा है।"
मैंने सोचा, शायद किसी ख़ानदानी बीमारी की बात कर रहा है। मैं आगे पढ़ता गया।
"मैं जो कहानी आपको भेज रहा हूँ, वो मेरे परिवार की है। मध्य प्रदेश के एक छोटे से क़स्बे की। क़स्बे का नाम मैं नहीं लिखूँगा — क्योंकि नाम लिखने से रास्ता बनता है, और मैं नहीं चाहता कि कोई वहाँ जाए। आपसे सिर्फ़ एक request है। अगर आप इस कहानी को record करना शुरू करें… तो पूरा करिएगा। बीच में मत छोड़िएगा। चाहे कुछ भी हो जाए। अधूरा छोड़ने वालों के साथ क्या होता है… यही तो पूरी कहानी है।"
email के साथ दो attachment थे। एक Word की file — जिसमें पूरी कहानी लिखी थी। और एक audio file। जिसका नाम था — "recording_final_2.mp3"। और लंबाई थी… तेरह minute, सत्रह second।
मैंने पहले audio चलाई। … विक्रम की अपनी आवाज़ थी। साफ़ पता चल रहा था कि वो ख़ुद ये कहानी record करने की कोशिश कर रहा था। आवाज़ काँप रही थी। पीछे किसी गाँव की रात की आवाज़ें थीं — झींगुर, कहीं दूर भौंकते कुत्ते। वो कहानी सुनाता जा रहा था… सुनाता जा रहा था… और फिर, तेरहवें minute पर…
…उसकी recording में एक आवाज़ आई। दरवाज़े पर दस्तक। तीन बार। ठक… ठक… ठक। विक्रम की आवाज़ रुक गई। कुछ second की ख़ामोशी… और फिर उसने फुसफुसाकर सिर्फ़ तीन शब्द कहे — "वो… आ गई…"
और recording वहीं ख़त्म हो गई। तेरह minute, सत्रह second पर।
मैं मानता हूँ — उस वक़्त मेरे हाथ ठंडे पड़ गए थे। लेकिन साथ ही, मेरे अंदर का storyteller जाग गया था। मैंने सोचा — क्या presentation है यार! बंदे ने ख़ुद अधूरी recording भेजी है ताकि मैं डर जाऊँ। मानना पड़ेगा, कहानी बेचने का तरीक़ा आता है इसे।
काश… काश मैं उसी रात समझ जाता कि वो presentation नहीं थी। वो चेतावनी थी।
अब मैं आपको वो कहानी सुनाता हूँ जो उस Word file में लिखी थी। विक्रम के ही शब्दों में, बस थोड़ा सँवारकर। ध्यान से सुनना… क्योंकि यही वो कहानी है, जो अधूरी नहीं छोड़ी जाती।
विक्रम का क़स्बा — छोटा सा, पुराना सा। एक तरफ़ सूखती हुई नदी, दूसरी तरफ़ खंडहर होती एक हवेली, और हवेली के पीछे… एक पुरानी बावड़ी। बावड़ी समझते हो ना? ज़मीन के अंदर उतरती सीढ़ियों वाला कुआँ। सैकड़ों साल पुरानी। क़स्बे के लोग दिन में भी उस तरफ़ नहीं जाते थे। और रात में… रात में तो पूरे क़स्बे का बस एक ही नियम था।
आधी रात के बाद कोई दरवाज़ा खटखटाए… तो खोलना मत।
ये नियम विक्रम ने होश सँभालते ही सुना था। जैसे हमें बचपन में सिखाया जाता है — गरम चीज़ मत छूना, अँधेरे में पीपल के नीचे मत जाना — वैसे उस क़स्बे के बच्चों को सिखाया जाता था: रात की दस्तक का जवाब मत देना। कोई पूछे "कौन हो?", तो भी चुप रहना। आवाज़ पहचानी हुई लगे — माँ की, बहन की, दोस्त की — तो भी चुप रहना।
और अगर… अगर ग़लती से भी दरवाज़े के उस पार से आती हुई कहानी सुनना शुरू कर दो… तो फिर पूरी सुनना। बीच में मत छोड़ना।
क्योंकि वो सिर्फ़ एक चीज़ माँगने आती है। वो पैसे नहीं माँगती। जान नहीं माँगती। अंदर आने की इजाज़त भी नहीं माँगती। वो बस बंद दरवाज़े के बाहर खड़ी होकर, बहुत आराम से, बहुत नरमी से कहती है —
"दरवाज़ा खोलो… मेरी कहानी सुन लो…"
साल उन्नीस सौ चौहत्तर। विक्रम के दादाजी तब जवान थे। गर्मी की एक रात थी, बिजली गुल थी, और दादाजी ऊपर वाले कमरे में खिड़की खोलकर लेटे थे। रात के कोई ढाई-तीन बजे… गली में पायल की आवाज़ आई। छन… छन… छन। फिर बग़ल वाले घर के दरवाज़े पर दस्तक — ठक… ठक… ठक।
दादाजी नियम जानते थे। उन्होंने आँखें बंद कर लीं। लेकिन खिड़की खुली थी… और आवाज़ें दीवारें नहीं मानतीं।
बग़ल वाले घर से कोई जवाब नहीं आया। दस्तक देने वाली कुछ देर वहीं खड़ी रही… और फिर उसने वहीं, बंद दरवाज़े के बाहर खड़े-खड़े… कहानी सुनानी शुरू कर दी।
दादाजी बताते थे — वो आवाज़ ऐसी थी कि सुनते ही लगता था जैसे कोई बहुत अपना, बहुत दूर से, बहुत थककर लौटा हो। ना डरावनी, ना तेज़। बस… ऐसी आवाज़ जिसे सुनना बंद करने का मन ही ना करे। और कहानी? कहानी ऐसी कि पहले ही वाक्य में बाँध ले।
"एक गाँव था। गाँव में एक कुआँ था। और कुएँ के अंदर… एक आवाज़ रहती थी…"
दादाजी सुनते रहे। आधा घंटा। पौना घंटा। कहानी अपने सबसे डरावने मोड़ पर पहुँच रही थी… और तभी दादाजी को अचानक होश आया कि वो कर क्या रहे हैं। नियम याद आया। घबराकर उन्होंने खिड़की बंद कर दी, कानों में उँगलियाँ डाल लीं, और किसी तरह सो गए।
बस। यही एक ग़लती।
अगली शाम दादाजी कुएँ से पानी खींच रहे थे। बाल्टी नीचे गई… रस्सी की चरचराहट… और कुएँ की गहराई से आती गूँज में… उन्हें एक आवाज़ सुनाई दी। वही आवाज़।
और कहानी ठीक वहीं से शुरू हुई… जहाँ दादाजी ने खिड़की बंद की थी। ठीक उसी शब्द से। एक शब्द भी पीछे नहीं। एक शब्द भी आगे नहीं।
समझ रहे हो इसका मतलब? वो दोहराती नहीं है। वो… वहीं से आगे सुनाती है। तुम जहाँ छोड़ोगे, दुनिया की कोई भी आवाज़ वहीं से कहानी उठा लेगी। radio की घरघराहट में। पंखे की डगमगाहट में। रात को गुज़रती train की खटर-पटर में। और यहाँ तक कि… अपनों की आवाज़ में भी।
एक शाम दादाजी की माँ रसोई में गुनगुना रही थीं। कोई पुराना सा भजन। दादाजी पास ही बैठे थे। और गुनगुनाहट के बीच… सुर वही रहा, धुन वही रही… लेकिन शब्द बदल गए। माँ गा रही थीं… और कहानी आगे बढ़ रही थी। माँ को ख़ुद कुछ पता नहीं था। दादाजी चीख़ पड़े। माँ हैरान — "क्या हुआ रे? मैं तो भजन गा रही थी।"
दादाजी की नींद चली गई। भूख चली गई। कानों में रुई डालकर घूमते, तो आवाज़ हड्डियों में महसूस होती। तीन महीने में आदमी आधा रह गया। तब क़स्बे के सबसे बूढ़े आदमी ने — जो ख़ुद जवानी में ये सब देख चुका था — दादाजी को बिठाकर सच बताया।
"तूने उसकी कहानी बीच में छोड़ी है। अब दो ही रास्ते हैं। या तो पूरी सुन ले… लेकिन पूरी कहानी उसके सिवा किसी को आती ही नहीं। या फिर… जितनी तूने सुनी है, उतनी किसी और को सुना दे। जो तेरे आगे सुनेगा, कहानी उसके पास चली जाएगी। तू छूट जाएगा… वो बँध जाएगा।"
और यहीं से शुरू हुआ विक्रम के परिवार का सिलसिला। दादाजी ने वो अधूरी कहानी अपने बड़े बेटे को सुना दी — यानी विक्रम के पिताजी को। बेटे ने बाप का बोझ अपने कानों में ले लिया। दादाजी उस रात, महीनों बाद, पूरी नींद सोए। और विक्रम के पिताजी… इकतीस साल तक उस कहानी को ढोते रहे।
इकतीस साल। सोचो ज़रा। इकतीस साल तक हर रात ये डर कि कहीं पंखा, कहीं pressure cooker की सीटी, कहीं पत्नी की लोरी… कहानी को आगे ना बढ़ा दे। क्योंकि एक नियम ये भी था — कहानी जितनी आगे बढ़ती जाएगी, वो उतनी क़रीब आती जाएगी। और जिस रात कहानी का आख़िरी शब्द पूरा हो जाएगा… उस रात वो सुनने वाले के दरवाज़े पर नहीं… सुनने वाले के सिरहाने खड़ी मिलेगी।
विक्रम ने लिखा था — उन्होंने सब कुछ try किया। एक बार पिताजी ने वो पूरी अधूरी कहानी काग़ज़ पर लिखनी चाही, ताकि किसी को पढ़ा दें और छुटकारा पा लें। अगली सुबह काग़ज़ ख़ाली मिला। स्याही… ग़ायब। जैसे काग़ज़ ने पी ली हो। दूसरी बार tape recorder पर बोलकर भरने की कोशिश की। tape में उनकी आवाज़ की जगह सिर्फ़ साँसें recorded मिलीं। और वो साँसें… किसी और की थीं।
तब समझ आया — ये कहानी लिखी नहीं जा सकती। ये सिर्फ़ सुनी जा सकती है। कान से कान। आवाज़ से आवाज़। ज़िंदा इंसान से ज़िंदा इंसान तक।
और अब विक्रम के पिताजी hospital में आख़िरी साँसें गिन रहे थे। नियम के हिसाब से, मरने से पहले उन्हें वो कहानी विक्रम को सुनानी थी। वरना… वरना अधूरी कहानी लेकर मरने वालों के घर वो ख़ुद आती है। और फिर वो दरवाज़े के बाहर से नहीं सुनाती।
विक्रम नहीं चाहता था कि उसकी ज़िंदगी भी इकतीस साल की क़ैद बन जाए। इसलिए उसने वो सोचा, जो उस परिवार में तीन पीढ़ियों में किसी ने नहीं सोचा था।
उसने सोचा — ये कहानी एक इंसान से दूसरे इंसान के पास जाती है। एक कान से दूसरे कान। तो… अगर एक साथ लाखों कान सुन लें तो? अगर ये कहानी किसी एक की ना रहे… सबकी हो जाए? बँटते-बँटते इतनी बँट जाए कि किसी एक अकेले के पीछे आने लायक़ ही ना बचे?
और लाखों कानों तक पहुँचने का उसके पास बस एक रास्ता था।
मैं।
अब तुम सोच रहे होगे — इतना सब पढ़ने के बाद भी मैंने वो कहानी record की? हाँ। की। क्योंकि मैं भी तुम्हारी तरह था। सुनने वाला। मज़े लेने वाला। मुझे लगा ये सब कहानी को बेचने का तरीक़ा है। एक ज़बरदस्त backstory। और सच कहूँ… storyteller को ऐसी ही चीज़ें तो खींचती हैं।
इक्कीस जुलाई की रात। बाहर वैसी ही बारिश। रात के दो बजकर सैंतालीस minute पर मैंने recording शुरू की। वही mic, वही कुर्सी, वही कमरा — जहाँ से मैंने आपको सैकड़ों कहानियाँ सुनाई हैं।
पहली अजीब बात recording के दौरान ही हुई। तुमने कभी महसूस किया है… जब कमरे में तुम्हारे अलावा कोई और होता है, तो कमरे की ख़ामोशी बदल जाती है? ख़ाली कमरे की चुप्पी अलग होती है… और भरे कमरे की चुप्पी अलग। उस रात, कहानी के बीचों-बीच, मेरे कमरे की ख़ामोशी… भर गई। मैंने पीछे मुड़कर देखा। कोई नहीं था। लेकिन गला सूख चुका था। मैंने पानी पिया, अपने आप पर हँसा, और कहानी पूरी की।
हाँ — पूरी। जितनी विक्रम ने भेजी थी, उतनी पूरी। और यहीं वो बात थी… जो मुझे बहुत बाद में समझ आई। विक्रम के पास ख़ुद पूरी कहानी थी ही नहीं। उसके पास तो वही अधूरा हिस्सा था, जो तीन पीढ़ियों से उसके परिवार में चला आ रहा था। यानी मैंने उस रात जो record किया… वो शुरू होने से पहले ही अधूरा था।
सुबह चार बजे मैं editing पर बैठा। headphones लगाए। screen पर waveform चल रही थी। मेरी आवाज़, बारिश की हल्की आवाज़, सब normal। और फिर तेरहवें minute पर… ठीक तेरह minute सत्रह second पर…
"सुनो…"
एक औरत की फुसफुसाहट। मेरी आवाज़ के ठीक नीचे। इतनी साफ़, जैसे किसी ने mic के बिल्कुल पास होंठ लाकर कहा हो। मैंने वो हिस्सा दस बार rewind किया। हर बार वही। "सुनो…"
फिर मैंने raw file खोली — original, बिना काट-छाँट वाली। वहाँ… कुछ नहीं था। सिर्फ़ मेरी आवाज़। मैंने दोबारा edit वाली file चलाई — "सुनो…"। फिर raw file — ख़ामोशी। समझ रहे हो क्या कह रहा हूँ? वो आवाज़ file में नहीं थी। वो आवाज़… सुनने में थी।
मैं डर गया था, लेकिन पूरा नहीं। दिमाग़ अब भी बहाने बना रहा था — interference होगा, किसी पड़ोसी का TV होगा, नींद पूरी नहीं हुई होगी। मैंने पूरी recording delete कर दी। सोचा, कल दोबारा कर लूँगा।
अगली रात दोबारा record किया। दोबारा editing पर बैठा। और इस बार, तेरह minute सत्रह second पर —
"सुनो… मेरी…"
दो शब्द। ठीक एक शब्द ज़्यादा।
तीसरी रात मैंने सिर्फ़ ये देखने के लिए फिर record किया। और तीन शब्द मिले — "सुनो… मेरी… अधूरी…"
वो हर recording के साथ अपना एक वाक्य पूरा कर रही थी। एक-एक शब्द करके। जैसे… जैसे वो भी कोई कहानी सुना रही हो। दुनिया की सबसे धीमी रफ़्तार में। दुनिया के सबसे बड़े सब्र के साथ। और उसका सब्र… वही तो सबसे डरावनी चीज़ थी। जो चीख़ता है, उससे उतना डर नहीं लगता। डर उससे लगता है… जो साठ साल इंतज़ार कर सकता हो।
मैंने recording बंद कर दी। channel का comeback रोक दिया। सोचा — मैं ये कहानी सुनाऊँगा ही नहीं, तो पूरी करने की नौबत ही नहीं आएगी। यही मेरी दूसरी ग़लती थी। क्योंकि मैं शुरुआत कर चुका था। और शुरू की हुई कहानी अधूरी छोड़ चुका था। नियम याद है ना?… अधूरा छोड़ने वालों के साथ क्या होता है।
अगस्त आया। मेरे phone के voice recorder में अपने आप files बनने लगीं। मैं सुबह उठता, और recording app में एक नई file पड़ी होती। बनने का वक़्त — हमेशा रात के तीन बजकर सत्रह minute। लंबाई — हमेशा तेरह minute सत्रह second। play करता… तो पूरी file ख़ामोश। बिल्कुल ख़ामोश। बस आख़िरी second में… एक साँस। लंबी… रुकी हुई… जैसे कोई बहुत देर से बोलने का इंतज़ार कर रहा हो।