PretikaGhost Storiesअधूरी कहानी

दूसरा भाग — सरस्वती

Pretika · Ghost Stories · 11 मिनट

Writer
Pretika
Story
अधूरी कहानी
Chapter
2 of 2
Category
Ghost Stories
Reading time
11 min
Words
2176
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

सितंबर। नीचे वाले flat की aunty ने lift में मुझे रोका — "बेटा, रात में तुम्हारे घर कोई कहानी सुनाता है क्या? आवाज़ आती है ऊपर से। कोई औरत है… रोज़ थोड़ी सी सुनाती है और चुप हो जाती है। आवाज़ बड़ी अच्छी है वैसे।" मैंने कहा — "aunty, मैं तो अकेला रहता हूँ।" aunty हँस दीं — "अरे तो कोई video चलती होगी। जो भी है, उससे कहना पूरी सुनाया करे। अधूरी कहानी सुनकर मुझे नींद नहीं आती।"

अक्टूबर की वो रात मैं मरते दम तक नहीं भूलूँगा। माँ का phone आया था। रात के नौ बजे। माँ बोल रही थीं — "बेटा खाना खाया? कितना कमज़ोर लग रहा था कल video call पे…" और बोलते-बोलते… माँ की आवाज़ का सुर नहीं बदला। लय नहीं बदली। लेकिन शब्द… शब्द बदल गए। माँ की ही आवाज़ में वो कहानी आगे बढ़ने लगी — ठीक उसी शब्द से, जिस पर मैंने आख़िरी बार editing रोकी थी। मैं जम गया। साँस तक नहीं ले पाया। और सबसे ख़ौफ़नाक बात जानते हो क्या थी? … बीस second बाद माँ ने कहा — "अरे, सुन रहा है ना? चुप क्यों हो गया?" उन्हें कुछ याद नहीं था। कुछ पता नहीं था कि अभी उनके गले से क्या निकला है।

उस रात मैं समझ गया कि ये मामला मेरे बस का नहीं है। मैं एक जानकार के पास गया। बूढ़े पंडित जी — जिनके बारे में लोग कहते थे कि उन्होंने ज़िंदगी में बहुत कुछ देखा है, और वो पैसे लेकर झूठी तसल्ली नहीं देते। मैंने उन्हें सब बताया। वो 13:17 वाली clip भी सुनाई। पंडित जी ने पूरी clip सुनी… धीरे से headphone उतारा… बहुत देर मेरी तरफ़ देखते रहे… और फिर वो कहा, जो मैं आज तक भुला नहीं पाया।

"बेटा, ये चुड़ैल नहीं है। प्रेत भी नहीं है। इसीलिए इसका कोई उपाय नहीं, कोई पूजा नहीं, कोई ताबीज़ नहीं। ये कुछ और है… ये अधूरापन है। और अधूरेपन का इलाज दुनिया में सिर्फ़ एक चीज़ है।"

मैंने पूछा — "क्या?"

उन्होंने कहा — "अंत।"

नवंबर… दिसंबर… जनवरी… मैं भागता रहा। mic बेच दिया। laptop बंद करके रख दिया। कुछ हफ़्ते बहन के घर जाकर रहा। … वो साथ चली गई। नई जगह, नई आवाज़ें — लेकिन कहानी वही। ठीक उसी शब्द से आगे। train की पटरियों की खट-खट में। geyser की टिक-टिक में। और एक रात तो… बहन के दो साल के बेटे की नींद की बड़बड़ाहट में। दो साल का बच्चा… नींद में वो शब्द बोल रहा था, जो उसकी उम्र को आते भी नहीं थे। उसी रात मैंने अपना bag उठाया और बहन का घर छोड़ दिया। ये मेरी लड़ाई थी। मैं इसे किसी और के घर की दहलीज़ के अंदर नहीं ला सकता था।

मार्च में विक्रम का ख़त आया। हाँ, ख़त। काग़ज़ वाला। क्योंकि उसका number महीनों से बंद जा रहा था और email का कोई जवाब नहीं आ रहा था। ख़त में लिखा था — पिताजी नहीं रहे। जाते-जाते नियम निभा गए… कहानी विक्रम को सुना गए। अब उस अधूरी कहानी का बोझ विक्रम के कानों में था। लेकिन ख़त की आख़िरी lines… वो मेरे लिए थीं:

"अनुराग जी, मुझे माफ़ करना। मैंने आपको बिना बताए इस कहानी में खींच लिया। लेकिन अब आपके पास वो रास्ता है, जो मेरे ख़ानदान के पास तीन पीढ़ियों में कभी नहीं था। आपके पास लाखों कान हैं। कहानी को पूरा करो। सबके सामने करो। वो यही चाहती है — मैं अब समझ चुका हूँ। वो हमें डराने नहीं आती… वो सुनाने आती है। साठ साल से उसे बस एक ऐसा इंसान चाहिए, जो भागे नहीं। जो रुक जाए… और पूरा सुन ले।"

और फिर सबसे आख़िरी line…

"वो अब आपकी तरफ़ आ रही है। इस बार दस्तक आपके दरवाज़े पर होगी। दरवाज़ा मत खोलना। बस… सुन लेना।"

तीस जून की रात। मुझे उस रात की हर detail याद है… क्योंकि ऐसी रातें भूलती नहीं हैं।

उस दिन पूरा दिन अजीब सा शांत था। वो आवाज़… पूरे दिन कहीं नहीं आई। महीनों में पहली बार। और यक़ीन मानो, उस ख़ामोशी से ज़्यादा डर मुझे किसी चीख़ से नहीं लगा। जैसे तूफ़ान से ठीक पहले हवा रुक जाती है… वैसे मेरी ज़िंदगी रुकी हुई थी।

रात के ठीक तीन बजकर सत्रह minute पर…

तीन दस्तक। धीमी। आराम से। जैसे दस्तक देने वाले को कोई जल्दी ना हो। जैसे उसे पता हो… ये दरवाज़ा आज नहीं तो कल, खुलेगा ज़रूर।

मैं दरवाज़े तक कैसे पहुँचा, मुझे याद नहीं। पैर ख़ुद चले गए। मैंने peephole से बाहर नहीं देखा। इतनी हिम्मत नहीं थी। मैं बस दरवाज़े से एक हाथ की दूरी पर खड़ा रहा। दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि लगा दरवाज़े के उस पार तक सुनाई देता होगा। और तब… उस पार से वो आवाज़ आई। वही आवाज़, जो पूरे एक साल से मेरी recordings में एक-एक शब्द जोड़ रही थी। लेकिन इस बार… पूरा वाक्य। वो वाक्य, जो उसने बारह महीनों में, शब्द-दर-शब्द, सिर्फ़ मेरे लिए पूरा किया था —

"सुनो… मेरी अधूरी कहानी… पूरी कर लो…"

ना धमकी थी उसमें। ना ग़ुस्सा। … विनती थी। साठ साल पुरानी विनती।

और फिर मैंने वो किया… जो शायद इस पूरी कहानी में आज तक किसी ने नहीं किया था। मैंने भागना बंद कर दिया। मैं वहीं, दरवाज़े के पास, ज़मीन पर बैठ गया। पीठ दरवाज़े से टिका ली। और काँपती हुई आवाज़ में कहा —

"सुनाओ। … मैं सुनूँगा। पूरी सुनूँगा। एक शब्द नहीं छोड़ूँगा। लेकिन मेरी भी एक शर्त है। … कल तुम्हारी कहानी सिर्फ़ मैं नहीं… लाखों लोग सुनेंगे। मैं सुनाऊँगा। पूरी सुनाऊँगा। वादा करता हूँ।"

दरवाज़े के उस पार… ख़ामोशी। इतनी लंबी ख़ामोशी कि एक पल को लगा, वो चली गई। और फिर… मुझे दरवाज़े की लकड़ी में से एक हल्का सा कंपन महसूस हुआ। कोई… उस पार भी दरवाज़े से पीठ टिकाकर बैठ गया था। बिल्कुल मेरी तरह। एक दरवाज़ा। दो पीठें। और बीच में… साठ साल का इंतज़ार।

और उसने सुनाना शुरू किया।

अब जो मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ, वो मैं वैसे ही सुना रहा हूँ जैसे उसने मुझे सुनाया। ये उसकी कहानी है। वो कहानी, जिसे साठ साल में किसी ने पूरा नहीं सुना। आज तुम सुनोगे।

उसका नाम सरस्वती था। सोचो… नाम ही आवाज़ की देवी का। साल था उन्नीस सौ चौंसठ के आस-पास। वही क़स्बा — जो उस ज़माने में एक गाँव हुआ करता था। और सरस्वती उस गाँव की सबसे प्यारी चीज़ थी। वजह — उसकी कहानियाँ। हर शाम चौपाल पर बच्चे जमा हो जाते, बड़े भी काम के बहाने आ बैठते, और सरस्वती कहानी सुनाती। लोग कहते थे, उसकी कहानी में ऐसा जादू था कि चूल्हे बुझ जाते थे और किसी घर को याद नहीं रहता था कि आज खाना भी बनाना है।

उसका पति था रामस्वरूप। सीधा-सादा, मेहनती किसान। और पूरे गाँव पर राज था ठाकुर का — हवेली वाले ठाकुर का। अकाल के दिन थे। ठाकुर के गोदामों में अनाज सड़ रहा था, और गाँव भूख से मर रहा था। रामस्वरूप ने वो हिम्मत की, जो किसी ने नहीं की थी। पंचायत में खड़े होकर बोला — "गोदाम खुलवाओ। नहीं तो मैं गवाही दूँगा। ऊपर तक जाऊँगा। कलेक्टर तक।"

तीसरी सुबह… रामस्वरूप गाँव के बरगद से लटका मिला। ठाकुर के आदमियों ने कहा — ख़ुदकुशी है। गाँव चुप। पंचायत चुप। और पुलिस… पुलिस ठाकुर की जेब में थी।

सरस्वती चीख़ी नहीं। लोगों के सामने रोई तक नहीं। उसने बस… वो किया, जो उसे दुनिया में सबसे अच्छा आता था।

उसी हफ़्ते, वो फिर चौपाल पर बैठी। लोगों ने सोचा, बेचारी ग़म भुलाने आई है। उसने कहा — "आज से एक नई कहानी सुनाऊँगी। एक राजा की कहानी।" कहानी में एक राजा था — जिसके गोदाम भरे हुए थे और प्रजा भूखी थी। एक किसान था — जो सच बोल बैठा। और एक बरगद था… जिस पर एक सुबह एक "ख़ुदकुशी" लटकी मिली।

पूरी चौपाल सन्न। किसी के मुँह से आवाज़ नहीं निकली। सब समझ रहे थे कि राजा कौन है। किसान कौन है। ठाकुर के आदमी भी वहीं पीछे खड़े सुन रहे थे।

उस दिन के बाद हर शाम कहानी थोड़ी आगे बढ़ती। और हर शाम भीड़ थोड़ी बड़ी होती। आस-पास के गाँवों से भी लोग आने लगे। सरस्वती की कहानी का राजा हर शाम थोड़ा और नंगा होता जाता — उसकी चालें, उसके पाप, उसके आदमियों के नाम से मिलते-जुलते नाम। और गाँव वालों ने हिसाब लगा लिया था — जिस रफ़्तार से कहानी चल रही है, अमावस की रात कहानी ख़त्म होगी। और सब जानते थे कि आख़िरी वाक्य में क्या आएगा। नाम। असली नाम। सबके सामने। क्योंकि एक बार नाम ज़ुबान से निकलकर सौ कानों में पड़ जाए… तो फिर वो बात कभी दबती नहीं। कहानी… गवाही बन जाती है।

ठाकुर भी ये जानता था।

इसीलिए अमावस से ठीक एक रात पहले… जब सरस्वती चौपाल से लौट रही थी… गली के मोड़ पर उसे उठा लिया गया।

गाँव को बताया गया — पागल हो गई थी बेचारी, पति के ग़म में। मायके भेज दिया। लेकिन उस रात… हवेली के पीछे, पुरानी बावड़ी की सीढ़ियों पर, मशालों की रोशनी हिलती देखी गई थी। और दबी ज़ुबान में लोग बताते हैं… बावड़ी के अंदर, पानी से ठीक ऊपर, एक पुरानी ताक़ थी। आदमक़द। ठाकुर के मिस्त्री उस रात वहाँ काम कर रहे थे। ईंट पर ईंट। गारे पर गारा।

और ईंटों के उस पार से… आवाज़ आ रही थी।

सरस्वती चीख़ नहीं रही थी। वो रो नहीं रही थी। वो… कहानी सुना रही थी। ऊँची, साफ़ आवाज़ में। ताकि मिस्त्री सुन लें। ताकि मशाल पकड़ने वाले सुन लें। ताकि कोई तो सुन ले। दीवार उठती रही… आवाज़ आती रही… और कहते हैं, आख़िरी ईंट रखे जाने से ठीक पहले, उस दीवार के पीछे से जो आख़िरी शब्द निकले, वो थे —

"…और उस राजा का असली नाम था… ठाकुर…"

बस।

आख़िरी ईंट। गीला गारा। और ख़ामोशी।

कहानी अधूरी रह गई। एक नाम पर। सिर्फ़ एक नाम पर।

और उसके ठीक एक महीने बाद, अगली अमावस से… दस्तकें शुरू हो गईं। "दरवाज़ा खोलो… मेरी कहानी सुन लो…" वो किसी को मारने नहीं आती थी। वो किसी से बदला लेने नहीं आती थी। वो सिर्फ़ अपनी कहानी का आख़िरी वाक्य कहने आती थी। वो वाक्य, जो गीले गारे में दबकर रह गया था। लेकिन गाँव डर गया। दरवाज़े बंद हो गए। नियम बन गए। और उन नियमों ने वो कर दिखाया… जो ठाकुर की ईंटें भी नहीं कर पाई थीं। साठ साल तक किसी ने उसे पूरा नहीं सुना। जो ग़लती से सुनना शुरू करते, वो डरकर बीच में भाग जाते… और अधूरी कहानी उनसे चिपक जाती। क्योंकि अब वो ख़ुद उस अधूरी कहानी का एक हिस्सा बन चुके होते थे।

समझ रहे हो? साठ सालों में उसने जितने दरवाज़े खटखटाए… उसे तो बस चालीस minute चाहिए थे। सिर्फ़ चालीस minute… जो साठ साल में उसे किसी इंसान ने नहीं दिए।

उस रात, अपने दरवाज़े के इस पार बैठकर, मैंने उसे वो चालीस minute दिए। उसने अपनी कहानी सुनाई — शुरू से। रामस्वरूप की हँसी से लेकर बरगद तक। चौपाल की भीड़ से लेकर बावड़ी की आख़िरी ईंट तक। और फिर… पहली बार… साठ साल में पहली बार… उसने अपनी कहानी का वो आख़िरी वाक्य पूरा कहा। उस नाम के साथ।

"…और उस राजा का असली नाम था — ठाकुर भैरव प्रताप सिंह। उसी ने मेरे रामस्वरूप को मारा। उसी ने मुझे ज़िंदा चुनवा दिया। ये मेरी कहानी है… और अब… ये पूरी हुई।"

जब मैंने आँखें खोलीं, तो बाहर सुबह हो रही थी। पहली bus की आवाज़। दूर किसी मंदिर की घंटी। मैं पूरी रात दरवाज़े से पीठ लगाए बैठा रहा था। आँखें भीगी हुई थीं, बदन टूट रहा था… लेकिन अंदर से मैं हल्का था। महीनों में पहली बार… हल्का। मैंने हिम्मत जुटाकर दरवाज़ा खोला।

बाहर कोई नहीं था। सिर्फ़ सीढ़ियों पर… थोड़ी सी गीली मिट्टी के निशान थे। जैसे कोई बहुत पुरानी, बहुत गहरी, बहुत ठंडी जगह से चलकर आया हो… और अब लौट गया हो।

और मेरे कमरे में… मेरे recorder में… एक नई file पड़ी थी। जो मैंने कभी नहीं बनाई थी। लंबाई — पूरे चालीस minute। मैंने काँपते हाथों से play का button दबाया। उसमें उसकी पूरी कहानी थी। पहले शब्द से आख़िरी नाम तक। लेकिन आवाज़…

…आवाज़ मेरी थी।

उस रात मैंने उससे कहा था — लाखों लोग सुनेंगे। … आज सुन लिया ना तुमने? ठाकुर भैरव प्रताप सिंह। ये नाम अब सिर्फ़ ईंटों के पीछे दबी एक आवाज़ नहीं जानती। तुम जानते हो। हम सब जानते हैं। हवेली आज खंडहर है। ठाकुर का ख़ानदान कब का बिखर चुका है। उस नाम से आज किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता… सिवाय एक के। इसे इंसाफ़ तो नहीं कह सकते। लेकिन… अंत कह सकते हैं। और कभी-कभी, साठ साल लंबी रात के बाद… अंत ही इंसाफ़ होता है।

विक्रम का आख़िरी ख़त पिछले हफ़्ते आया। उसने लिखा — जिस हफ़्ते से मैंने ये video बनानी शुरू की… उनके क़स्बे में दस्तकें बंद हो गई हैं। पिछली अमावस… ख़ामोश गुज़री। साठ साल में पहली बार।

और मैं? उस रात के बाद मेरी recordings बिल्कुल साफ़ हैं। कोई फुसफुसाहट नहीं। कोई अपने आप बनती file नहीं। कोई 13:17 नहीं। वो चली गई। क्योंकि पूरी कहानियाँ पीछा नहीं करतीं। पीछा सिर्फ़… अधूरी कहानियाँ करती हैं।

ये थी वो कहानी, जिसने मुझसे मेरा एक साल ले लिया… और बदले में एक बात सिखा दी। दुनिया की सबसे डरावनी चीज़ चुड़ैल नहीं होती। प्रेत नहीं होता। दुनिया की सबसे डरावनी चीज़ होती है — अधूरापन। अधूरी कहानी। अधूरी बात। अधूरा इंसाफ़। इसलिए ज़िंदगी में जो भी शुरू करो, उसे पूरा करना। और किसी की बात कभी बीच में मत काटना। … क्या पता, वो अपनी कहानी का आख़िरी वाक्य कहने ही वाला हो।

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