Pretika › Ghost Stories › जिस रात मौत जागी
एपिसोड 6 — वो बच्चा जो फ़िरोज़ नहीं था
firoj saifi · Ghost Stories · 14 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- जिस रात मौत जागी
- Chapter
- 6 of 6
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 14 min
- Words
- 2728
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
अँधेरा।
चारों तरफ़ सिर्फ़ अँधेरा।
फ़िरोज़ को ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी गहरे कुएँ में गिरता जा रहा है। उसके कानों में हवा की तेज़ आवाज़ थी, मगर शरीर पर हवा का कोई असर नहीं हो रहा था।
वह चीखना चाहता था—
लेकिन उसकी आवाज़ बाहर नहीं निकल रही थी।
उसने नीचे देखा।
नीचे कुछ भी नहीं था।
न ज़मीन। न आसमान। न कोई दीवार।
सिर्फ़ अँधेरा।
फिर अचानक उसके सामने एक छोटी-सी रोशनी जली।
उस रोशनी के बीच छह साल का एक बच्चा खड़ा था।
बच्चे के कपड़े खून से सने थे।
उसके हाथ में काली घड़ी थी।
और उसका चेहरा—
फ़िरोज़ जैसा था।
बच्चे ने सिर उठाकर पूछा—
“तुम मुझे लेने आए हो?”
फ़िरोज़ ने पीछे हटते हुए कहा—
“तू कौन है?”
बच्चा मुस्कुराया।
“तुमने मुझे बंद किया था।”
“मैंने किसी को बंद नहीं किया।”
“झूठ।”
बच्चे की मुस्कान गायब हो गई।
“तुमने मुझे अपनी यादों के पीछे छिपा दिया था। तुमने सबको भुला दिया—अब्बा को, अम्मी को, नूर को… और मुझे भी।”
फ़िरोज़ ने अपने कान बंद कर लिए।
“बस कर!”
बच्चा धीरे-धीरे उसके पास आया।
“तुम्हें सच चाहिए था न?”
“हाँ।”
“तो सच सुनो।”
उसने काली घड़ी फ़िरोज़ की ओर बढ़ाई।
“मैं तुम्हारा बचपन नहीं हूँ।”
फ़िरोज़ ने घड़ी की ओर देखा।
“तो फिर?”
बच्चे ने फुसफुसाकर कहा—
“मैं मालिक का पहला चेहरा हूँ।”
अचानक चारों तरफ़ रोशनी फैल गई।
फ़िरोज़ ने देखा कि वह एक पुराने कमरे में खड़ा है।
दीवारों पर तेल के दीये जल रहे थे। खिड़कियों से बारिश की आवाज़ आ रही थी। कमरे के बीच में एक गोल निशान बना था, जिसके चारों ओर काले धागे और लाल मोमबत्तियाँ रखी थीं।
कमरे के बीच छह साल का फ़िरोज़ बैठा था।
उसके सामने नूर खड़ी थी।
नूर की उम्र भी लगभग छह साल थी।
लेकिन उसकी आँखों में किसी बूढ़ी औरत जैसी गंभीरता थी।
“फ़िरोज़, मेरी बात ध्यान से सुनो,” नूर कह रही थी। “जब दरवाज़ा खुलेगा, तो तुम्हें मेरी तरफ़ नहीं देखना है।”
छोटा फ़िरोज़ रोते हुए बोला—
“मुझे डर लग रहा है।”
“डरना मत।”
“अब्बा कहाँ हैं?”
“वो बाहर हैं।”
“अम्मी?”
नूर ने कोई जवाब नहीं दिया।
फ़िरोज़ ने वर्तमान में खड़े होकर यह दृश्य देखा तो उसका सीना कस गया।
“ये सब सच में हुआ था?”
उसके पास खड़ा बच्चा बोला—
“हाँ। मगर तुम्हें पूरी बात नहीं दिखाई गई।”
“किसने छिपाई?”
“तुम्हारी अम्मी ने।”
फ़िरोज़ ने उसकी ओर गुस्से से देखा।
“मेरी अम्मी ने मुझे बचाया था!”
“या फिर तुम्हें इस्तेमाल किया था?”
“चुप!”
“तुम्हें लगता है वो तुमसे प्यार करती थीं?”
फ़िरोज़ ने बिना सोचे जवाब दिया—
“हाँ।”
बच्चा उसके सामने आकर खड़ा हो गया।
“तो उन्होंने तुम्हें अपनी गोद में क्यों नहीं रखा?”
फ़िरोज़ चुप हो गया।
बच्चे ने फिर पूछा—
“जब तुम अस्पताल में अकेले रो रहे थे, वो कहाँ थीं?”
फ़िरोज़ की आँखों में अस्पताल का दृश्य चमक उठा।
सफ़ेद चादर। मशीन की आवाज़। अम्मी का ठंडा हाथ। डॉक्टर का झुका हुआ चेहरा।
उसने सिर झटक दिया।
“वो मर चुकी थीं।”
“नहीं।”
बच्चे की आवाज़ अचानक भारी हो गई।
“वो तुम्हें छोड़कर गई थीं।”
“झूठ!”
“वो जानती थीं कि तुम्हारे अंदर क्या है।”
“बस!”
“वो जानती थीं कि तुम कौन हो।”
फ़िरोज़ ने बच्चे को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया।
लेकिन बच्चा धुएँ में बदल गया।
उसकी आवाज़ चारों तरफ़ से गूँजी—
“तुम्हारी अम्मी ने तुम्हें बचाया नहीं था, फ़िरोज़… उन्होंने तुम्हें छिपाया था।”
1987 की रात
दृश्य बदल गया।
अब फ़िरोज़ हवेली के मुख्य हॉल में खड़ा था।
बाहर तूफ़ान था।
दीवार पर लगी घड़ी 2:47 पर अटकी हुई थी।
सलीम सैफ़ी दरवाज़े के पास खड़े थे। उनके हाथ में एक लोहे की छड़ी थी, जिस पर अजीब निशान बने हुए थे।
उनकी आँखों में डर था।
लेकिन वह डर अपने लिए नहीं था।
“सलीम!” फ़िरोज़ की अम्मी की आवाज़ आई। “वो आ गया है!”
सलीम ने पीछे मुड़कर देखा।
“फ़िरोज़ को कमरे में रखो।”
“अब बहुत देर हो चुकी है।”
“नहीं। अभी नहीं।”
अम्मी ने छोटे फ़िरोज़ को अपनी गोद में उठा लिया।
बच्चा लगातार रो रहा था।
“अब्बा को बुलाओ…”
सलीम उसके पास आए और उसके माथे को चूमा।
“बेटा, बहादुर बनना।”
“आप कहाँ जा रहे हो?”
“बस थोड़ी देर के लिए।”
“आप वापस आओगे?”
सलीम कुछ पल चुप रहे।
फिर उन्होंने कहा—
“अगर मैं वापस न आऊँ… तो अपनी अम्मी का ख़याल रखना।”
वर्तमान में खड़ा फ़िरोज़ यह देखकर टूटने लगा।
“अब्बा…”
उसने आगे बढ़कर सलीम को छूना चाहा, मगर उसके हाथ हवा में ही रुक गए।
सलीम उसे देख नहीं सकते थे।
फ़िरोज़ ने चीखकर कहा—
“अब्बा! मैं यहाँ हूँ!”
सलीम ने जैसे कुछ महसूस किया।
उन्होंने अचानक पीछे मुड़कर देखा।
कुछ पल के लिए उनकी नज़र सीधे फ़िरोज़ पर टिक गई।
फ़िरोज़ की साँस रुक गई।
क्या सलीम उसे देख सकते थे?
सलीम ने धीमे से कहा—
“बेटा… अगर तुम ये देख रहे हो, तो समझना कि तुम्हें सच तक पहुँचने दिया गया है।”
फ़िरोज़ के पैर काँपने लगे।
“अब्बा, मुझे बचा लीजिए…”
सलीम की आँखों में आँसू आ गए।
“मैंने कोशिश की थी।”
“तो फिर मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया?”
“क्योंकि मैं तुम्हें अपने साथ नहीं ले जा सकता था।”
“आपने मेरी यादें क्यों मिटाईं?”
सलीम ने अपनी मुट्ठी भींच ली।
“क्योंकि तुम्हारी यादों में मालिक छिपा था।”
“मेरे अंदर?”
“नहीं…”
सलीम ने अँधेरे दरवाज़े की ओर देखा।
“तुम्हारे अंदर मालिक नहीं था। तुम्हारे अंदर उसकी मौत थी।”
फ़िरोज़ ने हैरानी से पूछा—
“तो फिर ये बच्चा कौन है?”
सलीम का चेहरा अचानक डर से भर गया।
उन्होंने फ़िरोज़ के पीछे देखा।
वही छह साल का बच्चा खड़ा था।
उसकी आँखें अब पूरी तरह काली थीं।
सलीम ने काँपते हुए कहा—
“वो बच्चा फ़िरोज़ नहीं है।”
बच्चे ने सिर उठाया।
उसके होंठों पर एक अजीब मुस्कान फैल गई।
“अब्बा…”
सलीम पीछे हटे।
“तुमने उसे छू लिया था?”
बच्चे ने जवाब नहीं दिया।
सलीम ने अम्मी की ओर देखा।
“तुमने इसे कमरे में अकेला क्यों छोड़ा?”
अम्मी रोते हुए बोलीं—
“मैंने नहीं छोड़ा था। वो खुद बाहर आ गया।”
“तुमने वादा किया था!”
“मैंने वादा निभाया, सलीम!”
“नहीं! तुमने दरवाज़ा खोला!”
अचानक हॉल के बीच रखी सारी मोमबत्तियाँ बुझ गईं।
बाहर बिजली चमकी।
दरवाज़े पर एक लंबी परछाईं दिखाई दी।
मालिक आ चुका था।
उसकी आवाज़ पूरे हॉल में गूँजी—
“तुम दोनों ने मुझे बुलाया था।”
सलीम ने लोहे की छड़ी उठाई।
“हमने तुम्हें बुलाया नहीं था।”
“तुमने नूर को जगाया।”
“नूर तुम्हारी नहीं है।”
मालिक की हँसी गूँजी।
“नूर कभी मेरी थी ही नहीं।”
फ़िरोज़ ने नूर की ओर देखा।
वह कमरे के कोने में खड़ी थी।
उसका चेहरा पीला था।
“तो नूर किसकी थी?” फ़िरोज़ ने पूछा।
नूर ने उसकी ओर देखा।
“मैं तुम्हारी थी।”
फ़िरोज़ कुछ समझ नहीं पाया।
“क्या?”
“मैं तुम्हारी रक्षा के लिए पैदा हुई थी।”
“फिर तुम मरी कैसे?”
नूर की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मैं मरी नहीं थी।”
मालिक की परछाईं नूर के पीछे आ खड़ी हुई।
“उसे बताओ।”
नूर काँप गई।
“मैंने तुम्हारी जगह खुद को दे दिया था।”
फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।
“नहीं… नहीं, ये सच नहीं हो सकता।”
नूर ने कहा—
“उस रात मालिक तुम्हारे अंदर प्रवेश करने वाला था। मैंने उसका रास्ता रोक लिया। उसने मेरी आत्मा को तुम्हारे शरीर से बाँध दिया। तुम्हारे अब्बा ने मुझे अलग करने की कोशिश की।”
“और?”
“और उन्होंने तुम्हें बचाने के लिए मेरी आत्मा को तुम्हारी यादों में बंद कर दिया।”
फ़िरोज़ की आँखें भर आईं।
“तो तुम इतने सालों से मेरी यादों में कैद थीं?”
नूर ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
“तुमने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”
“क्योंकि अगर तुम्हें याद आ जाता… तो मालिक भी जाग जाता।”
मालिक ने धीमे से ताली बजाई।
“बहुत अच्छा। अब सबको सब याद आ रहा है।”
सलीम ने चिल्लाकर कहा—
“फ़िरोज़! उस बच्चे से दूर रहना!”
फ़िरोज़ ने बच्चे की ओर देखा।
बच्चा अब हॉल के बीच खड़ा था।
उसके हाथों से काला धुआँ उठ रहा था।
“वो बच्चा मालिक का पहला चेहरा है,” सलीम बोले। “जब मालिक पहली बार इस दुनिया में आया था, उसने एक बच्चे का रूप लिया था। लेकिन वह शरीर टिक नहीं सका। इसलिए उसने तुम्हारा चेहरा चुना।”
“मेरा चेहरा क्यों?”
सलीम ने जवाब दिया—
“क्योंकि तुम उसके लिए बनाए गए थे।”
फ़िरोज़ के भीतर जैसे कुछ टूट गया।
“किसने बनाया था मुझे?”
सलीम चुप रहे।
अम्मी ने सिर झुका लिया।
फ़िरोज़ ने उनकी ओर देखा।
“अम्मी… किसने बनाया था मुझे?”
अम्मी के होंठ काँपे।
“मैंने।”
फ़िरोज़ पीछे हट गया।
“आपने?”
“तुम्हारा जन्म सामान्य नहीं था।”
“तो क्या था?”
“तुम्हारे अब्बा और मैंने नूर को बचाने के लिए एक अनुष्ठान किया था। हमें एक ऐसा शरीर चाहिए था जिसमें मालिक की मौत को बंद किया जा सके।”
फ़िरोज़ ने अपने सीने पर हाथ रखा।
“और वो शरीर मैं था?”
अम्मी ने रोते हुए सिर हिलाया।
“हमने तुम्हें पैदा नहीं किया था, फ़िरोज़… हमने तुम्हें बनाया था।”
हॉल में सन्नाटा छा गया।
फ़िरोज़ की आँखें खाली हो गईं।
उसने अपनी अम्मी को देखा।
“तो मैं आपका बेटा नहीं हूँ?”
अम्मी उसके पास बढ़ीं।
“तुम मेरे बेटे हो।”
“नहीं!”
फ़िरोज़ चीख पड़ा।
“अगर मैं आपका बेटा होता तो आप मुझे सच बतातीं! अगर मैं आपका बेटा होता तो मेरी यादें नहीं मिटातीं! अगर मैं आपका बेटा होता तो मुझे किसी ताबीज़, किसी घड़ी, किसी श्राप की तरह इस्तेमाल नहीं करतीं!”
अम्मी रोते हुए बोलीं—
“मैंने तुम्हें इस्तेमाल नहीं किया…”
“तो क्या किया?”
“तुम्हें बचाया।”
“किससे?”
अम्मी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“तुम्हारे असली पिता से।”
फ़िरोज़ जम गया।
“मेरे… असली पिता?”
सलीम ने आँखें बंद कर लीं।
मालिक की हँसी धीमी हो गई।
अम्मी ने काँपती आवाज़ में कहा—
“सलीम तुम्हारे पालने वाले पिता थे।”
फ़िरोज़ ने सलीम की ओर देखा।
“तो मेरे असली पिता कौन हैं?”
हॉल के अँधेरे दरवाज़े से एक आदमी बाहर आया।
लंबा कद। काले कपड़े। सफ़ेद आँखें। कलाई पर काली घड़ी।
उसका चेहरा धीरे-धीरे साफ़ हुआ।
फ़िरोज़ ने उसे देखा—
और उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वह आदमी बिल्कुल फ़िरोज़ जैसा दिखता था।
मगर उसकी आँखों में कोई इंसानी चमक नहीं थी।
मालिक ने कहा—
“तुम्हारे असली पिता…”
वह आदमी आगे बढ़ा।
“मैं हूँ।”
फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।
“नहीं…”
“तुम्हारा चेहरा मेरा है।”
“नहीं!”
“तुम्हारा खून मेरा है।”
“नहीं!”
“और तुम्हारी मौत…”
मालिक ने काली घड़ी फ़िरोज़ की ओर उठाई।
“मेरे हाथ में है।”
फ़िरोज़ पीछे हटते-हटते दीवार से जा लगा।
उसके सामने उसकी अम्मी थीं। एक तरफ़ सलीम। दूसरी तरफ़ नूर। और सामने खड़ा था वह चेहरा, जिसे देखकर उसे पहली बार अपने ही अस्तित्व से डर लगा।
मालिक ने हाथ बढ़ाया।
“मेरे पास आओ, फ़िरोज़।”
फ़िरोज़ ने गुस्से में कहा—
“तू मेरा पिता नहीं है।”
मालिक की मुस्कान गहरी हो गई।
“तो फिर अपनी नसों में दौड़ते खून से पूछ लेना।”
उसने अपनी उँगली से फ़िरोज़ की कलाई पर हल्की खरोंच लगा दी।
खून की एक बूँद बाहर आई।
लेकिन वह लाल नहीं थी।
वह काली थी।
जैसे ही काला खून ज़मीन पर गिरा, पूरा हॉल काँपने लगा।
दीवारों पर दरारें पड़ गईं।
नूर चीख उठी—
“नहीं! इसे खून मत बहाने देना!”
सलीम ने लोहे की छड़ी मालिक पर फेंकी।
छड़ी मालिक के शरीर से टकराई और आग की तरह जल उठी।
मालिक पीछे नहीं हटा।
उसने सलीम की ओर देखा।
“तुमने मुझे धोखा दिया था।”
सलीम ने कहा—
“मैंने अपने बेटे को बचाया था।”
“वह तुम्हारा बेटा नहीं था।”
“वह मेरा बेटा है!”
मालिक ने हाथ उठाया।
सलीम हवा में उठ गए।
फ़िरोज़ चीख पड़ा—
“अब्बा!”
मालिक ने सलीम को दीवार से दे मारा।
उनका सिर पत्थर से टकराया।
खून बहने लगा।
फ़िरोज़ उनकी ओर दौड़ा, मगर अम्मी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं!”
“मुझे छोड़िए!”
“अगर तुम उसके पास गए तो मालिक तुम्हारे अंदर आ जाएगा!”
“वो मेरे अब्बा हैं!”
“और तुम उनके बेटे नहीं हो!”
फ़िरोज़ ने अम्मी को धक्का दे दिया।
“आपने मुझे जन्म नहीं दिया, तो कम से कम मुझे उनसे मिलने तो दीजिए!”
अम्मी ज़मीन पर गिर पड़ीं।
उनके चेहरे पर दर्द था।
“फ़िरोज़…”
तभी सलीम ने मुश्किल से आँखें खोलीं।
“बेटा…”
फ़िरोज़ उनके पास घुटनों के बल बैठ गया।
“अब्बा, मुझे छोड़कर मत जाना।”
सलीम ने उसका चेहरा छुआ।
“मैंने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”
“आपने झूठ बोला था।”
“हाँ।”
“अम्मी ने भी झूठ बोला।”
“हाँ।”
“तो मैं किस पर भरोसा करूँ?”
सलीम ने उसकी कलाई पकड़ी।
उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
“अपने डर पर भरोसा मत करना।”
“फिर किस पर?”
“अपने दिल पर।”
सलीम ने उसकी हथेली में कुछ रखा।
एक छोटी लोहे की चाबी।
फ़िरोज़ ने उसे देखा।
“ये क्या है?”
“हवेली का आख़िरी दरवाज़ा।”
“कहाँ है?”
सलीम ने मालिक की ओर देखा।
“जहाँ तुम्हारा असली जन्म हुआ था।”
मालिक धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रहा था।
सलीम ने जल्दी से कहा—
“वहाँ जाकर आईने के सामने अपना नाम बोलना।”
“कौन-सा नाम?”
सलीम की आँखों में डर उतर आया।
“तुम्हारा असली नाम।”
फ़िरोज़ ने पूछा—
“मेरा असली नाम क्या है?”
सलीम ने होंठ खोले।
लेकिन आवाज़ नहीं निकली।
मालिक ने उनका गला पकड़ लिया।
“अब ये सच कभी नहीं जान पाएगा।”
फ़िरोज़ ने पूरी ताक़त से मालिक पर हमला किया।
मालिक कुछ कदम पीछे हटा।
उसी पल नूर ने फ़िरोज़ का हाथ पकड़ा।
“चलो!”
“अब्बा को छोड़कर नहीं जाऊँगा!”
“अगर तुम रुके तो वो बेकार मरे होंगे!”
“वो मरेंगे नहीं!”
नूर की आँखों में आँसू आ गए।
“फ़िरोज़… वो पहले ही मर चुके हैं।”
फ़िरोज़ ने सलीम की ओर देखा।
सलीम मुस्कुरा रहे थे।
उनके होंठों से आख़िरी शब्द निकले—
“भागो… बेटा…”
अगले ही पल मालिक ने हाथ उठाया।
काली आग पूरे हॉल में फैल गई।
नूर ने फ़िरोज़ को खींचकर एक दरवाज़े के अंदर धकेल दिया।
दरवाज़ा बंद होते ही फ़िरोज़ ने बाहर से सलीम की चीख सुनी।
फिर—
एक भयानक ख़ामोशी।
फ़िरोज़ ने आँखें खोलीं।
वह फिर वर्तमान में था।
कमरा 9।
उसके सामने नूर खड़ी थी।
उसका चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था।
“तुमने देखा?” उसने पूछा।
फ़िरोज़ कुछ नहीं बोला।
उसके हाथ अब भी काँप रहे थे।
“तुम्हारे अब्बा ने तुम्हें बचाने के लिए खुद को दे दिया था।”
फ़िरोज़ ने धीमे से कहा—
“लेकिन मेरी अम्मी…”
“उन्होंने भी तुम्हें बचाने की कोशिश की।”
“उन्होंने मुझे बनाया था।”
“हाँ।”
“तो मैं इंसान नहीं हूँ?”
नूर ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हारे अंदर इंसान से ज़्यादा दर्द है। और कभी-कभी दर्द ही इंसान होने का सबसे बड़ा सबूत होता है।”
फ़िरोज़ ने अपनी कलाई देखी।
काला खून अब सूख चुका था।
“मेरा असली नाम क्या है?”
नूर ने जवाब नहीं दिया।
“बताओ!”
“मैं नहीं बता सकती।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम्हारा नाम बोलते ही मालिक तुम्हें पूरी तरह पहचान लेगा।”
“तो मैं हमेशा फ़िरोज़ ही रहूँगा।”
नूर ने कहा—
“फ़िरोज़ तुम्हारा नाम नहीं… तुम्हारी पहचान है।”
अचानक कमरे की दीवार पर एक आईना चमका।
आईने में फ़िरोज़ का चेहरा दिखाई दिया।
मगर उसके पीछे एक और आदमी खड़ा था।
वही चेहरा। वही आँखें। वही मुस्कान।
मालिक।
आईने के अंदर मालिक ने कहा—
“तुम्हारे पास सिर्फ़ एक रास्ता बचा है।”
फ़िरोज़ ने आईने को घूरा।
“क्या?”
“अपना असली नाम बोलो।”
“और अगर नहीं बोला?”
“तो तुम्हारी अम्मी हमेशा के लिए मेरी हो जाएगी।”
आईने में अम्मी दिखाई दीं।
वह जंजीरों से बँधी थीं।
उनके पीछे काला धुआँ फैल रहा था।
फ़िरोज़ का दिल टूटने लगा।
“अम्मी!”
अम्मी ने सिर उठाया।
“बेटा… मेरी तरफ़ मत देखना!”
मालिक ने उनकी गर्दन पर हाथ रख दिया।
“तुम्हारी माँ को बचाने के लिए तुम्हें अपना नाम याद करना होगा।”
नूर ने फ़िरोज़ का हाथ पकड़ लिया।
“ये जाल है।”
“अगर ये जाल है तो अम्मी वहाँ क्यों हैं?”
“क्योंकि मालिक तुम्हारे दर्द से ताक़त लेता है।”
फ़िरोज़ ने आईने की ओर देखा।
अम्मी रो रही थीं।
“बेटा… मुझे बचा लो…”
फ़िरोज़ की आँखों में आँसू आ गए।
“मैं आपको फिर नहीं खो सकता।”
मालिक मुस्कुराया।
“तो बोलो।”
फ़िरोज़ ने होंठ खोले।
उसके भीतर कोई पुरानी आवाज़ जागने लगी।
एक नाम।
बहुत पुराना नाम।
जैसे वह उसके जन्म से पहले भी उसे पुकारता रहा हो।
उसके कानों में फुसफुसाहट गूँजी—
“आरिफ़…”
फ़िरोज़ का चेहरा बदल गया।
“आरिफ़…”
नूर चीख उठी—
“नहीं! मत बोलो!”
लेकिन फ़िरोज़ ने पूरा नाम बोल दिया—
“आरिफ़ सैफ़ी।”
आईना अचानक टूट गया।
मालिक की चीख पूरे कमरे में गूँज उठी।
अम्मी की परछाईं गायब हो गई।
फ़िरोज़ के सीने में तेज़ दर्द उठा।
उसकी आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा।
और आख़िरी बार उसने नूर की आवाज़ सुनी—
“फ़िरोज़… तुमने अपना नाम नहीं बताया…”
“तुमने उसे जगा दिया है।”
जब फ़िरोज़ ने आँखें खोलीं—
वह हवेली के बाहर अपनी कार में बैठा था।
बारिश रुक चुकी थी।
सुबह होने वाली थी।
उसने घबराकर पीछे देखा।
कार की पिछली सीट पर कोई बैठा था।
एक आदमी।
उसका चेहरा फ़िरोज़ जैसा था।
लेकिन वह आदमी मुस्कुरा नहीं रहा था।
वह रो रहा था।
और उसकी कलाई पर काली घड़ी थी।
उसने धीमे से कहा—
“मेरा नाम फ़िरोज़ नहीं है…”
फिर उसने फ़िरोज़ की ओर देखा।
“मेरा नाम आरिफ़ है।”
एपिसोड 6 समाप्त।