Pretika › Ghost Stories › जिस रात मौत जागी
एपिसोड 5 — माँ की आख़िरी पुकार
firoj saifi · Ghost Stories · 11 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- जिस रात मौत जागी
- Chapter
- 5 of 6
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 11 min
- Words
- 2180
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
कमरे के कोने में खड़ा वह दूसरा फ़िरोज़ बिल्कुल स्थिर था।
उसके हाथ में काली घड़ी थी।
घड़ी की सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं।
टिक… टिक… टिक…
फ़िरोज़ ने उसे घूरते हुए पूछा—
“तू कौन है?”
दूसरा फ़िरोज़ मुस्कुराया।
“तुम्हें अब भी यही सवाल पूछना है?”
“मैंने पूछा, तू कौन है?”
“मैं वो हूँ जो तुम्हें इस कमरे से बाहर ले जा सकता है।”
फ़िरोज़ ने दरवाज़े की ओर देखा।
बाहर से उसकी अम्मी की आवाज़ अब भी आ रही थी।
“बेटा… दरवाज़ा खोल दो…”
आवाज़ में ऐसा दर्द था कि फ़िरोज़ का सीना फटने लगा।
बारह साल।
पूरे बारह साल हो चुके थे उसने अपनी अम्मी को खोए हुए।
उनकी आख़िरी रात उसे आज भी याद थी।
अस्पताल का सफ़ेद कमरा। मशीनों की धीमी आवाज़। अम्मी का ठंडा पड़ता हाथ। और उनकी आख़िरी बात—
“फ़िरोज़… कभी किसी पर आँख बंद करके भरोसा मत करना।”
तब वह समझ नहीं पाया था कि अम्मी ऐसा क्यों कह रही थीं।
उसे लगा था कि वह डर रही हैं।
लेकिन अब उसे लग रहा था—
वह उसे किसी आने वाली चीज़ से बचाने की कोशिश कर रही थीं।
बाहर से फिर दस्तक हुई।
ठक… ठक… ठक…
“फ़िरोज़…”
इस बार आवाज़ बहुत धीमी थी।
“बेटा, मैं हूँ…”
फ़िरोज़ की आँखें भर आईं।
“अगर आप सच में मेरी अम्मी हैं… तो बताइए, आपने मुझे आख़िरी बार क्या कहा था?”
कुछ पल तक बाहर ख़ामोशी रही।
फिर आवाज़ आई—
“मैंने कहा था… कि तुम हमेशा मेरे पास रहना।”
फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।
“नहीं…”
उसकी आवाज़ टूट गई।
“आपने कहा था… किसी पर आँख बंद करके भरोसा मत करना।”
कमरे में खड़ा दूसरा फ़िरोज़ धीरे से हँसा।
“देखा? तुम्हें अपनी अम्मी की आख़िरी बात तक याद है। फिर भी तुम उनकी आवाज़ पर भरोसा कर रहे हो।”
फ़िरोज़ ने उसकी ओर देखा।
“अगर तू सच में मेरी मदद करना चाहता है, तो बता—मेरी अम्मी कौन हैं?”
दूसरे फ़िरोज़ की मुस्कान गायब हो गई।
“ये सवाल तुमसे पहले भी पूछा गया था।”
“किसने?”
“तुम्हारी अम्मी ने।”
अचानक कमरे की दीवार पर एक तस्वीर चमकी।
तस्वीर में फ़िरोज़ की अम्मी एक छोटे बच्चे को गोद में लिए बैठी थीं।
बच्चा फ़िरोज़ जैसा दिख रहा था।
लेकिन तस्वीर के कोने में तारीख़ लिखी थी—
8 सितंबर 1987।
फ़िरोज़ का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
“ये… मैं हूँ?”
दूसरे फ़िरोज़ ने कहा—
“तुम्हें क्या लगता है?”
“मेरी अम्मी ने मुझे 1987 में जन्म दिया था?”
“शायद।”
“शायद नहीं। सच बता!”
“सच सुनने की हिम्मत है?”
फ़िरोज़ ने गुस्से में कहा—
“मेरे पास अब खोने के लिए कुछ नहीं है।”
दूसरा फ़िरोज़ उसके पास आया।
“यही तुम्हारी सबसे बड़ी ग़लती है। तुम्हारे पास अभी भी बहुत कुछ है—तुम्हारी यादें, तुम्हारा नाम, तुम्हारा चेहरा… और तुम्हारी आत्मा।”
उसने काली घड़ी फ़िरोज़ की ओर बढ़ाई।
“इनमें से एक चीज़ आज रात मालिक ले लेगा।”
फ़िरोज़ ने घड़ी लेने से इनकार कर दिया।
“मुझे रास्ता बता।”
दूसरे फ़िरोज़ ने कमरे की पिछली दीवार की ओर इशारा किया।
वहाँ एक छोटा-सा लकड़ी का दरवाज़ा था, जो पहले दिखाई नहीं दे रहा था।
“उसके पीछे तुम्हारी अम्मी का कमरा है।”
फ़िरोज़ ने दरवाज़े की ओर देखा।
“इस हवेली में मेरी अम्मी का कमरा?”
“वह यहाँ रहती थीं।”
फ़िरोज़ का चेहरा सख़्त हो गया।
“मेरी अम्मी इस हवेली में कभी नहीं आई थीं।”
“तुम्हें यही बताया गया था।”
“और असलियत?”
दूसरे फ़िरोज़ ने धीमे से कहा—
“तुम्हारी अम्मी इस हवेली से कभी गई ही नहीं थीं।”
उसी पल कमरे की सारी तस्वीरें एक साथ ज़मीन पर गिर पड़ीं।
बाहर से आवाज़ आई—
“फ़िरोज़… जल्दी करो…”
इस बार आवाज़ अम्मी की नहीं थी।
वह नूर की आवाज़ थी।
“मालिक जाग गया है।”
फ़िरोज़ ने तुरंत लकड़ी का दरवाज़ा खोला।
दरवाज़े के पीछे एक संकरा गलियारा था।
दीवारों पर पुराने दीये जल रहे थे, मगर उनमें आग नहीं थी।
नीली रोशनी दीवारों से निकल रही थी।
गलियारे के दोनों तरफ़ छोटे-छोटे शीशे लगे थे।
हर शीशे में फ़िरोज़ का अलग रूप दिखाई दे रहा था।
कहीं वह बच्चा था। कहीं बूढ़ा। कहीं उसके चेहरे पर गहरी चोटें थीं। कहीं उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
एक शीशे में वह अपनी अम्मी के साथ खड़ा था।
अम्मी मुस्कुरा रही थीं।
फ़िरोज़ उस शीशे के सामने रुक गया।
“अम्मी…”
शीशे के अंदर उसकी अम्मी ने अपना हाथ उठाया।
फ़िरोज़ ने भी हाथ उठाया।
दोनों की हथेलियाँ शीशे के आर-पार मिल गईं।
अम्मी की आँखों से आँसू बह रहे थे।
“बेटा… मुझे माफ़ कर देना।”
फ़िरोज़ का गला भर आया।
“आपने मुझसे झूठ क्यों बोला?”
शीशे में अम्मी ने होंठ हिलाए—
“क्योंकि अगर तुम सच जान जाते… तो तुम मुझे बचाने वापस आ जाते।”
“आपको किससे बचाना था?”
अम्मी ने पीछे देखा।
शीशे के पीछे अँधेरे में एक लंबी परछाईं खड़ी थी।
उसकी कलाई पर काली घड़ी थी।
अम्मी ने घबराकर कहा—
“फ़िरोज़, यहाँ से चले जाओ!”
शीशा अचानक टूट गया।
फ़िरोज़ पीछे जा गिरा।
उसकी हथेली कट गई।
खून की कुछ बूँदें फ़र्श पर गिरीं।
जैसे ही खून ज़मीन पर पड़ा, गलियारे की नीली रोशनी लाल हो गई।
दीवारों पर एक-एक करके शब्द उभरने लगे—
“खून पहचान लिया गया।”
“दरवाज़ा खुल सकता है।”
“वारिस लौट आया है।”
फ़िरोज़ ने अपने हाथ को देखा।
कटे हुए घाव से खून नहीं, काला धुआँ निकल रहा था।
“ये क्या हो रहा है?”
पीछे से नूर की आवाज़ आई—
“तुम्हारे अंदर उसका खून है।”
फ़िरोज़ ने मुड़कर देखा।
नूर गलियारे के अंत में खड़ी थी।
वह पहले से कहीं ज़्यादा साफ़ दिखाई दे रही थी। उसके चेहरे पर बचपन की मासूमियत थी, मगर आँखों में सदियों की थकान।
“तुमने मुझे यहाँ बुलाया?” फ़िरोज़ ने पूछा।
नूर ने सिर हिलाया।
“मैंने तुम्हें नहीं बुलाया। तुम्हारे अब्बा ने बुलाया था।”
“मेरे अब्बा तो मर चुके हैं।”
“नहीं। उनका शरीर मरा था।”
फ़िरोज़ की आवाज़ काँप गई।
“तो उनकी आत्मा कहाँ है?”
नूर ने काली घड़ी की ओर देखा।
“मालिक के पास।”
“तुमने कहा था कि उनकी आत्मा घड़ी में है।”
“मैंने कहा था कि वह घड़ी में बँधी है। लेकिन मालिक के पास उसकी चाबी है।”
फ़िरोज़ ने बेचैनी से पूछा—
“चाबी कहाँ है?”
नूर ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हारे अंदर।”
फ़िरोज़ कुछ पल तक उसे देखता रहा।
“मेरे अंदर क्या है?”
नूर ने जवाब देने से पहले आँखें बंद कर लीं।
“तुम्हारी अम्मी ने तुम्हारे जन्म के समय एक चीज़ तुम्हारे अंदर छिपा दी थी।”
“क्या?”
“मालिक की असली मौत।”
गलियारे में अचानक ठंडी हवा चली।
दीयों की नीली लौ काँपने लगी।
फ़िरोज़ ने धीमे से कहा—
“मालिक मर सकता है?”
“हर चीज़ मर सकती है।”
“तो फिर उसे मारा क्यों नहीं गया?”
नूर की आँखों में डर उतर आया।
“क्योंकि उसे मारने के लिए उस इंसान को मरना होगा जिसके अंदर उसकी मौत छिपी है।”
फ़िरोज़ की साँस अटक गई।
“मैं?”
नूर ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसकी ख़ामोशी ही जवाब थी।
गलियारे के अंत में एक लोहे का दरवाज़ा था।
दरवाज़े पर खरोंचों से लिखा था—
“माँ का कमरा।”
फ़िरोज़ ने हैंडल पकड़ा।
अंदर से किसी के रोने की आवाज़ आ रही थी।
“फ़िरोज़…”
उसकी अम्मी।
इस बार आवाज़ बहुत कमज़ोर थी।
“बेटा… मुझे बाहर निकालो…”
फ़िरोज़ ने दरवाज़ा खोल दिया।
कमरे में एक पुराना बिस्तर था।
दीवार पर कुरान की आयतें, कुछ सूखे फूल और एक टूटा हुआ आईना लगा था।
बिस्तर पर उसकी अम्मी बैठी थीं।
सफ़ेद कपड़े। कमज़ोर चेहरा। आँखों के नीचे काले घेरे।
फ़िरोज़ वहीं जम गया।
“अम्मी…”
अम्मी ने सिर उठाया।
उनकी आँखों में पहचान थी।
“फ़िरोज़…”
वह दौड़कर उनके पास गया और घुटनों के बल बैठ गया।
“आप ज़िंदा हैं?”
अम्मी ने उसके चेहरे को छुआ।
उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, मगर इस बार उनमें गर्मी भी थी।
“मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी।”
फ़िरोज़ उनके सीने से लग गया।
वर्षों का गुस्सा, दर्द, अकेलापन और डर एक साथ आँसुओं में बदल गया।
“आपने मुझे क्यों छोड़ दिया? मैं हर दिन आपको याद करता था। मुझे लगता था कि मैं आपको बचा सकता था। मुझे लगता था कि अगर मैं उस रात अस्पताल में थोड़ा और रुक जाता तो…”
अम्मी ने उसके होंठ पर उँगली रख दी।
“उस रात अस्पताल में मैं थी ही नहीं।”
फ़िरोज़ धीरे-धीरे उनसे अलग हुआ।
“क्या?”
“जिस औरत को तुमने अस्पताल में मरते देखा… वह मेरी परछाईं थी।”
फ़िरोज़ का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“तो आप…?”
“मैं उस रात यहाँ वापस आ गई थी।”
“क्यों?”
अम्मी की आँखों से आँसू बहने लगे।
“क्योंकि मालिक ने तुम्हें ढूँढ लिया था।”
“और अब्बा?”
“तुम्हारे अब्बा ने तुम्हें बचाने के लिए खुद को उसके हवाले कर दिया।”
“आपने मेरी यादें क्यों मिटाईं?”
अम्मी ने टूटे आईने की ओर देखा।
“क्योंकि तुम्हारी यादों में एक दरवाज़ा था।”
“कौन-सा दरवाज़ा?”
“वही दरवाज़ा जिससे मालिक तुम्हारे अंदर आ सकता था।”
फ़िरोज़ ने सिर पकड़ लिया।
“मैं कुछ समझ नहीं पा रहा…”
अम्मी ने उसका चेहरा अपनी हथेलियों में लिया।
“तुम्हारा जन्म 1990 में नहीं हुआ था, फ़िरोज़।”
कमरे की हवा अचानक जम गई।
“तुम पैदा हुए थे…”
उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा—
“8 सितंबर 1987 को।”
फ़िरोज़ की आँखों में अविश्वास भर गया।
“लेकिन मेरी सारी पहचान… मेरे काग़ज़…”
“सब झूठ थे।”
“मेरी उम्र?”
“तुम्हें तीन साल तक समय से छिपाकर रखा गया था।”
“किससे?”
अम्मी ने धीरे से कहा—
“मौत से।”
अचानक कमरे की दीवार पर लगी घड़ी रुक गई।
समय था—
2:47।
अम्मी ने फ़िरोज़ का हाथ कसकर पकड़ लिया।
“वह आ गया।”
कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई दी।
धीरे-धीरे।
भारी।
एक… दो… तीन…
फिर दरवाज़े के बाहर किसी ने कहा—
“सलीमा…”
फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।
यह उसकी अम्मी का नाम था।
आवाज़ उसके अब्बा की थी।
“सलीमा, वादा पूरा करने का समय आ गया है।”
अम्मी ने फ़िरोज़ को अपने पीछे कर लिया।
“दरवाज़े की तरफ़ मत देखना।”
फ़िरोज़ ने काँपते हुए पूछा—
“वो कौन है?”
अम्मी ने फुसफुसाकर कहा—
“तुम्हारे अब्बा का चेहरा पहनकर आया हुआ मालिक।”
बाहर से हँसी सुनाई दी।
“सलीमा… तुमने फिर वही ग़लती की। तुमने उसे सच बता दिया।”
दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हुई।
ठक… ठक… ठक…
अम्मी ने फ़िरोज़ को एक छोटी चाँदी की डिबिया दी।
“इसे खोलना मत।”
“इसमें क्या है?”
“तुम्हारी असली याद।”
“और अगर मैंने खोल दिया?”
अम्मी ने उसकी आँखों में देखा।
“तो तुम्हें याद आ जाएगा कि तुमने 1987 में किसे मारा था।”
फ़िरोज़ के हाथ से डिबिया लगभग गिर गई।
“मैंने… किसे मारा था?”
बाहर से मालिक की आवाज़ आई—
“उसे बताओ, सलीमा।”
अम्मी चुप रहीं।
मालिक फिर बोला—
“उसे बताओ कि नूर की मौत के पीछे कौन था।”
फ़िरोज़ ने अम्मी की ओर देखा।
“अम्मी… नूर को किसने मारा था?”
अम्मी की आँखों से आँसू गिरने लगे।
उन्होंने धीरे से कहा—
“नूर को किसी ने नहीं मारा था, बेटा…”
“तो फिर?”
“नूर… तुम ही थे।”
कमरे की सारी खिड़कियाँ एक साथ टूट गईं।
काली हवा अंदर घुस आई।
फ़िरोज़ के कानों में चीखें गूँजने लगीं।
उसे एक दृश्य दिखाई दिया—
1987 की वही हवेली।
छह साल का फ़िरोज़ खून से सने हाथों के साथ खड़ा था।
उसके सामने नूर ज़मीन पर पड़ी थी।
और फ़िरोज़ के हाथ में—
काली घड़ी।
अम्मी चीख रही थीं।
अब्बा किसी को रोकने की कोशिश कर रहे थे।
और छह साल का फ़िरोज़ रोते हुए कह रहा था—
“मैंने नहीं किया… मेरे हाथ अपने आप चल रहे थे…”
दृश्य अचानक टूट गया।
फ़िरोज़ वर्तमान में लौट आया।
उसके सामने अम्मी थीं।
दरवाज़े के बाहर मालिक खड़ा था।
और उसके पीछे—
एक बच्ची की परछाईं।
नूर।
लेकिन इस बार नूर मुस्कुरा नहीं रही थी।
वह फ़िरोज़ को घूर रही थी।
उसकी आँखों में नफ़रत थी।
मालिक ने दरवाज़ा तोड़ते हुए कहा—
“अब तुम्हें सब याद आएगा, फ़िरोज़।”
फ़िरोज़ ने चाँदी की डिबिया को देखा।
उसके अंदर से धीमी धड़कन की आवाज़ आ रही थी।
धक… धक… धक…
जैसे उसके अंदर किसी का दिल धड़क रहा हो।
अम्मी ने आख़िरी बार उसका हाथ पकड़ा।
“बेटा… अगर तुमने डिबिया खोली, तो तुम्हें अपना सच मिल जाएगा।”
“और अगर नहीं खोली?”
“तो मालिक तुम्हारी जगह तुम्हारी अम्मी को ले जाएगा।”
दरवाज़ा टूट गया।
काले धुएँ के बीच मालिक दिखाई दिया।
उसके चेहरे पर सलीम सैफ़ी का चेहरा था।
उसने फ़िरोज़ की ओर हाथ बढ़ाया।
“आओ, मेरे बेटे…”
फ़िरोज़ ने डिबिया को कसकर पकड़ लिया।
मालिक की आँखें लाल हो गईं।
“तुम्हें अपनी माँ चाहिए… या अपनी यादें?”
फ़िरोज़ ने अम्मी की ओर देखा।
फिर डिबिया की ओर।
उसके हाथ काँप रहे थे।
और तभी डिबिया के अंदर से एक बच्चे की आवाज़ आई—
“फ़िरोज़… मुझे बाहर निकालो…”
फ़िरोज़ ने डरकर डिबिया ज़मीन पर गिरा दी।
डिबिया खुल गई।
अंदर से काला धुआँ निकला।
उस धुएँ ने धीरे-धीरे एक छोटे बच्चे का रूप ले लिया।
छह साल का फ़िरोज़।
उसके हाथ खून से सने थे।
उसने फ़िरोज़ की ओर देखकर कहा—
“तुमने मुझे क्यों छोड़ दिया?”
फ़िरोज़ पीछे हट गया।
“तू… मैं है?”
बच्चे ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
फिर उसने मुस्कुराकर कहा—
“मैं वो हूँ… जिसे तुमने नूर की मौत वाली रात अपने अंदर बंद कर दिया था।”
मालिक ज़ोर से हँसा।
“अब खेल शुरू होगा।”
बच्चे ने फ़िरोज़ की ओर हाथ बढ़ाया।
“चलो… उस रात वापस चलते हैं।”
कमरे की दीवारें घूमने लगीं।
अम्मी की चीख गूँजी—
“फ़िरोज़! उसका हाथ मत पकड़ना!”
लेकिन फ़िरोज़ पहले ही बच्चे का हाथ पकड़ चुका था।
और अगले ही पल—
पूरा कमरा अँधेरे में डूब गया।
दूर कहीं वही तीन दस्तकें सुनाई दीं।
ठक… ठक… ठक…
फिर एक आवाज़ आई—
“8 सितंबर 1987 की रात दोबारा शुरू हो चुकी है।”