PretikaGhost Storiesजिस रात मौत जागी

एपिसोड 4 — काली घड़ी का राज़

firoj saifi · Ghost Stories · 9 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
जिस रात मौत जागी
Chapter
4 of 4
Category
Ghost Stories
Reading time
9 min
Words
1634
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

कब्र के सामने खड़ा फ़िरोज़ कुछ पल तक अपनी साँसों की आवाज़ भी नहीं सुन पाया।

उसकी आँखें पत्थर पर जमी थीं।

“फ़िरोज़ सैफ़ी — 1987–2026”

नाम वही था। चेहरा वही था। और सबसे डरावनी बात—

कब्र पर खुदी हुई मौत की तारीख़ अभी आई ही नहीं थी।

फ़िरोज़ ने काँपते हाथों से अपनी जेब टटोली। मोबाइल स्क्रीन पर तारीख़ चमक रही थी—

8 सितंबर 2026।

“नहीं…” उसके होंठों से मुश्किल से आवाज़ निकली। “ये झूठ है… ये सब झूठ है…”

उसने कब्र के पत्थर पर हाथ रखा।

पत्थर बर्फ़ जैसा ठंडा था।

तभी उसके पीछे खड़े दूसरे फ़िरोज़ ने धीमे से कहा—

“तुम्हें अभी भी लगता है कि तुम ज़िंदा हो?”

फ़िरोज़ ने झटके से पीछे देखा।

वह आदमी बिल्कुल उसी की तरह दिखता था। वही चेहरा, वही आँखें, वही दाढ़ी की हल्की रेखा। मगर उसकी मुस्कान में कुछ ऐसा था जो इंसानी नहीं था।

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

“तू कौन है?”

दूसरा फ़िरोज़ हँसा।

“मैं वही हूँ जो तुम बनोगे… अगर तुमने सच जानने की कोशिश जारी रखी।”

“मेरे सामने से हट!”

“तुम्हें अपने अब्बा का सच चाहिए था न?”

यह सुनकर फ़िरोज़ के चेहरे का रंग उड़ गया।

“मेरे अब्बा को बीच में मत ला।”

“क्यों?” दूसरा फ़िरोज़ धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ा। “उन्होंने तुम्हें बचाने के लिए खुद को खो दिया… या तुम्हें बचाने के नाम पर तुम्हें इस खेल का हिस्सा बना दिया?”

फ़िरोज़ ने उसकी गर्दन पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, मगर उसकी उँगलियाँ उस शरीर से आर-पार निकल गईं।

सामने खड़ा फ़िरोज़ धुएँ की तरह काँपने लगा।

“तुम्हें लगता है तुम्हारे अब्बा की मौत एक हादसा थी?”

फ़िरोज़ की आँखों में गुस्सा भर आया।

“चुप!”

“तुम्हारी अम्मी ने भी यही कहा था।”

“चुप!”

“उन्होंने तुम्हारी यादें मिटाईं।”

“मैंने कहा चुप!”

फ़िरोज़ ने चीखकर आँखें बंद कर लीं।

अचानक पूरे कमरे में तीन बार दस्तक हुई।

ठक… ठक… ठक…

जब उसने आँखें खोलीं तो दूसरा फ़िरोज़ गायब था।

कब्र भी गायब थी।

अब वह फिर उसी पुराने कमरे में खड़ा था। चारों ओर धूल, टूटे हुए शीशे और दीवारों पर लटकी तस्वीरें थीं।

लेकिन इस बार कमरे की दीवार पर एक नया दरवाज़ा था।

काले रंग का।

दरवाज़े पर वही लाल आँख बनी थी।

और उसके नीचे खून जैसे लाल अक्षरों में लिखा था—

“कमरा 9 — जहाँ सच मरता नहीं, बस चेहरा बदलता है।”

फ़िरोज़ ने दरवाज़े की ओर देखा।

उसका दिल कह रहा था कि उसे वहाँ नहीं जाना चाहिए।

मगर उसके भीतर एक और आवाज़ उठ रही थी—

अगर अब पीछे हट गया, तो अब्बा की मौत हमेशा झूठ बनी रहेगी।

उसने दरवाज़े का हैंडल पकड़ा।

हैंडल बर्फ़ जैसा ठंडा था।

दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

कमरे के अंदर एक लंबी मेज़ रखी थी।

मेज़ पर छह चीज़ें थीं—

एक पुरानी तस्वीर। एक टूटा हुआ चश्मा। एक चाँदी की अंगूठी। एक खून से सना कपड़ा। एक पुराना टेप रिकॉर्डर। और बीच में—

काली घड़ी।

वही घड़ी जो फ़िरोज़ को पिछले कमरों में मिलती आ रही थी।

लेकिन इस बार घड़ी चल रही थी।

उसकी सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं।

टिक… टिक… टिक…

फ़िरोज़ धीरे-धीरे मेज़ के पास गया।

तस्वीर उठाते ही उसका हाथ काँप गया।

तस्वीर में उसके अब्बा सलीम सैफ़ी खड़े थे। उनके साथ फ़िरोज़ की अम्मी थीं। दोनों के बीच एक छोटी बच्ची खड़ी थी—

नूर।

लेकिन तस्वीर के पीछे एक और आदमी था।

लंबा, दुबला, काले कपड़ों में।

उसका चेहरा तस्वीर में धुँधला कर दिया गया था।

सिर्फ उसकी कलाई साफ़ दिखाई दे रही थी।

उसकी कलाई पर वही काली घड़ी थी।

तस्वीर के पीछे लिखा था—

“पहला वादा — 8 सितंबर 1987।”

फ़िरोज़ ने तस्वीर पलटी।

नीचे एक और लाइन थी—

“दूसरा वादा — 8 सितंबर 2026।”

उसकी साँस रुक गई।

“आज…”

तभी टेप रिकॉर्डर अपने आप चल पड़ा।

पहले कुछ सेकंड सिर्फ़ खरखराहट सुनाई दी।

फिर सलीम की आवाज़ आई।

“फ़िरोज़… अगर तुम ये सुन रहे हो, तो इसका मतलब है कि कमरा 9 खुल चुका है।”

फ़िरोज़ की आँखें भर आईं।

कितने साल हो गए थे उसने अपने अब्बा की आवाज़ सुने हुए?

उसे अब्बा का चेहरा धुँधला याद था। आवाज़ तो लगभग भूल ही चुका था।

लेकिन आज वही आवाज़ इस मनहूस हवेली में ज़िंदा थी।

“अब्बा…”

रिकॉर्डिंग में सलीम आगे बोल रहे थे—

“बेटा, मैं जानता हूँ तुम मुझसे नफ़रत करते होगे। तुम्हें लगता होगा कि मैं तुम्हें छोड़कर चला गया। तुम्हारी अम्मी ने तुम्हें बताया होगा कि मेरा एक्सीडेंट हुआ था…”

फ़िरोज़ ने मुट्ठियाँ भींच लीं।

“तो झूठ बोला था…”

“लेकिन सच्चाई ये है कि मैं मरा नहीं था।”

कमरे की हवा अचानक भारी हो गई।

फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।

रिकॉर्डिंग में कुछ पल ख़ामोशी रही।

फिर सलीम की आवाज़ काँपी—

“मैंने अपनी मौत खुद चुनी थी।”

फ़िरोज़ का सिर घूम गया।

“क्या?”

“मुझे उस रात पता चल चुका था कि मालिक तुम्हें अपना अगला चेहरा बनाना चाहता है। नूर सिर्फ़ एक दरवाज़ा थी। असली निशाना तुम थे। तुम्हारा जन्म उसी रात हुआ था जब पहली बार मौत जागी थी।”

फ़िरोज़ ने टेप रिकॉर्डर को घूरा।

“मेरा जन्म… 1987 में?”

रिकॉर्डिंग में सलीम बोला—

“तुम्हें दुनिया ने 1990 में जन्मा हुआ माना। लेकिन तुम्हारी असली कहानी उससे तीन साल पहले शुरू हो चुकी थी।”

फ़िरोज़ की साँसें तेज़ हो गईं।

उसे बचपन की कुछ टूटी हुई तस्वीरें याद आने लगीं।

बारिश। लाल आँख। नूर का चेहरा। अब्बा का काँपता हुआ हाथ। और एक आवाज़—

पीछे मत देखना।

सलीम की रिकॉर्डिंग जारी थी—

“मालिक समय के साथ नहीं चलता, फ़िरोज़। समय उसके आसपास टूटता है। वह लोगों को मारता नहीं… वह उनकी ज़िंदगी छीनकर उनके चेहरे पहनता है। उसने तुम्हारे जन्म से पहले तुम्हारी मौत लिख दी थी।”

फ़िरोज़ की नज़र फिर काली घड़ी पर गई।

घड़ी की सुइयाँ अब उल्टी घूमना बंद कर चुकी थीं।

अब वह सीधे चल रही थी।

2:47।

वही समय।

वही रात।

वही दस्तक।

“मैंने तुम्हें बचाने के लिए एक सौदा किया था,” सलीम की आवाज़ आई। “मैंने मालिक से कहा कि अगर उसे फ़िरोज़ चाहिए, तो पहले उसे मेरा चेहरा लेना होगा।”

फ़िरोज़ की आँखों से आँसू गिरने लगे।

“अब्बा…”

“उसने मेरा चेहरा पहन लिया। लेकिन वह मेरी आत्मा नहीं ले सका। मैंने अपनी आत्मा इस घड़ी में बाँध दी।”

फ़िरोज़ ने घड़ी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया।

जैसे ही उसकी उँगलियाँ घड़ी से छुईं, कमरे की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।

अँधेरे में सलीम की आवाज़ गूँजी—

“इसे मत छूना!”

लेकिन देर हो चुकी थी।

घड़ी की पिछली सतह पर एक छोटी सी दरार खुल गई।

उस दरार से काला धुआँ निकला।

धुआँ धीरे-धीरे एक इंसानी आकृति में बदलने लगा।

पहले पैर बने। फिर लंबा शरीर। फिर गर्दन। फिर चेहरा।

और जब चेहरा पूरा हुआ—

फ़िरोज़ के सामने उसके अब्बा खड़े थे।

सलीम सैफ़ी।

वही चेहरा जिसे फ़िरोज़ ने बरसों से यादों में खोजा था।

वही आँखें। वही माथा। वही हल्की मुस्कान।

फ़िरोज़ की टाँगों में जैसे जान नहीं रही।

“अब्बा…”

सलीम ने हाथ फैलाए।

“मेरे बेटे…”

फ़िरोज़ दौड़कर उनसे लिपट गया।

उसका शरीर काँप रहा था।

“आप कहाँ चले गए थे? आपने मुझे क्यों छोड़ दिया? मैं हर रात सोचता था कि मेरी क्या गलती थी… मैंने क्या किया था कि आप मुझे छोड़कर चले गए?”

सलीम ने उसके सिर पर हाथ रखा।

“तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।”

“तो फिर मुझे सच क्यों नहीं बताया? अम्मी ने क्यों झूठ बोला? आपने मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया?”

सलीम की आँखों में दर्द उतर आया।

“क्योंकि अगर तुम सच जान जाते… तो मालिक तुम्हें बहुत पहले पहचान लेता।”

फ़िरोज़ ने उनका चेहरा पकड़ लिया।

“आप ज़िंदा हैं?”

सलीम ने जवाब नहीं दिया।

फ़िरोज़ ने फिर पूछा—

“आप ज़िंदा हैं न?”

सलीम ने धीरे से कहा—

“मैं उतना ही ज़िंदा हूँ जितनी तुम्हारी यादें।”

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

उसने गौर किया—

सलीम के पैरों की परछाईं नहीं थी।

उनकी आँखों में हल्की लाल चमक थी।

और उनकी कलाई पर—

काली घड़ी।

फ़िरोज़ का चेहरा सख़्त हो गया।

“आप… अब्बा नहीं हैं।”

सलीम जैसी दिखने वाली आकृति मुस्कुराई।

“बहुत देर से समझे।”

उसका चेहरा धीरे-धीरे पिघलने लगा।

त्वचा के नीचे काली नसें फैल गईं। आँखें सफ़ेद हो गईं। होंठों के बीच से एक गहरी, सूखी हँसी निकली।

“तुम्हारे अब्बा ने मुझे अपना चेहरा दिया था।”

फ़िरोज़ पीछे हटते हुए दीवार से जा लगा।

“मालिक…”

“आख़िर तुमने मेरा नाम ले ही लिया।”

मालिक ने हाथ उठाया।

कमरे की दीवारों पर टंगी सभी तस्वीरें ज़िंदा हो गईं।

एक तस्वीर में फ़िरोज़ की अम्मी रो रही थीं।

दूसरी में सलीम किसी अँधेरे कमरे में जंजीरों से बँधे थे।

तीसरी में नूर एक कुएँ के सामने खड़ी थी।

चौथी तस्वीर में छह साल का फ़िरोज़ एक छोटे बिस्तर पर सो रहा था।

और पाँचवीं तस्वीर में—

फ़िरोज़ की अम्मी उसके सिर पर हाथ रखकर कुछ पढ़ रही थीं।

मालिक ने कहा—

“तुम्हारी अम्मी ने तुम्हारी यादें मिटाईं। तुम्हारे अब्बा ने अपनी जान दी। नूर ने तुम्हें इस हवेली तक पहुँचाया। और तुम…”

वह फ़िरोज़ के बिल्कुल पास आ गया।

“तुमने सबको धोखा दिया।”

“मैंने किसी को धोखा नहीं दिया!”

“तुमने जन्म लिया।”

फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।

“क्या?”

मालिक ने उसके सीने पर उँगली रखी।

“तुम्हारा जन्म ही इस चक्र की सबसे बड़ी गलती था। तुम इंसान नहीं थे, फ़िरोज़। तुम एक दरवाज़ा थे।”

फ़िरोज़ ने पूरी ताक़त से मालिक को धक्का दिया।

इस बार मालिक पीछे जा गिरा।

उसका शरीर धुएँ में बदल गया।

लेकिन अगले ही पल वह फ़िरोज़ के पीछे खड़ा था।

“तुम्हें सच चाहिए था न?”

उसने फ़िरोज़ के कान के पास झुककर फुसफुसाया—

“तो अपनी अम्मी से पूछना… कि तुम्हारा असली जन्मदिन कौन-सा है।”

अचानक कमरे का दरवाज़ा ज़ोर से बंद हो गया।

मालिक गायब था।

मेज़ पर रखी काली घड़ी भी गायब थी।

सिर्फ़ टेप रिकॉर्डर बचा था।

उसमें अब सलीम की आख़िरी आवाज़ चल रही थी—

“फ़िरोज़… अगर मालिक तुम्हें अपना असली चेहरा दिखा दे, तो समझना कि अब तुम्हारे पास सिर्फ़ एक रात बची है।”

टेप बंद हो गया।

फ़िरोज़ ने घबराकर मोबाइल निकाला।

स्क्रीन पर कई मिस्ड कॉल थीं।

सभी एक ही नंबर से।

अम्मी।

लेकिन उसकी अम्मी को मरे हुए बारह साल हो चुके थे।

फ़िरोज़ की उँगलियाँ काँपने लगीं।

तभी मोबाइल पर एक नया मैसेज आया—

“बेटा, घर वापस आ जाओ। मुझे तुमसे तुम्हारे जन्म की सच्चाई बतानी है।”

मैसेज के नीचे लोकेशन भेजी गई थी।

फ़िरोज़ ने लोकेशन खोली।

उसका दिल बैठ गया।

लोकेशन उसी हवेली की थी।

लेकिन मैसेज भेजने वाला नंबर—

उसकी अम्मी का नहीं था।

वह नंबर उसके अपने नाम पर सेव था।

फ़िरोज़ सैफ़ी।

और तभी कमरे के बाहर से उसकी अम्मी की आवाज़ आई—

“फ़िरोज़… दरवाज़ा खोलो बेटा।”

फ़िरोज़ की आँखों से आँसू बहने लगे।

वह दरवाज़े के पास गया।

बाहर से फिर आवाज़ आई—

“मैं तुम्हारी अम्मी हूँ…”

फ़िरोज़ ने दरवाज़े पर हाथ रखा।

अचानक अंदर टेप रिकॉर्डर अपने आप फिर चल पड़ा।

सलीम की आवाज़ आई—

“फ़िरोज़… किसी भी हालत में दरवाज़ा मत खोलना।”

बाहर से अम्मी रोने लगीं।

“बेटा… मुझे बहुत ठंड लग रही है…”

फ़िरोज़ का दिल टूटने लगा।

वह जानता था कि बाहर जो भी था, वह उसकी अम्मी नहीं थी।

लेकिन आवाज़ बिल्कुल वही थी।

वही लहजा। वही दर्द। वही पुकार।

“अम्मी…”

बाहर से तुरंत जवाब आया—

“हाँ बेटा… मैं यहीं हूँ।”

फ़िरोज़ ने आँखें बंद कर लीं।

तभी बाहर से एक और आवाज़ आई।

इस बार वह उसकी अपनी आवाज़ थी—

“दरवाज़ा खोल दो, फ़िरोज़। बाहर मैं हूँ… और अंदर जो है, वो मालिक है।”

फ़िरोज़ ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

कमरे के अँधेरे कोने में कोई खड़ा था।

उसके हाथ में काली घड़ी थी।

और उसके चेहरे पर—

फ़िरोज़ की मुस्कान।

एपिसोड 4 समाप्त।

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