Pretika › Ghost Stories › जिस रात मौत जागी
एपिसोड 3 — बचपन की वो रात
firoj saifi · Ghost Stories · 7 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- जिस रात मौत जागी
- Chapter
- 3 of 3
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 7 min
- Words
- 1308
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।
क्रीईईईक...
फ़िरोज़ सैफ़ी की उँगलियाँ कुंडी पर जमी हुई थीं।
उसके सामने अंधेरा था।
लेकिन यह अंधेरा बाकी हवेली के अंधेरे जैसा नहीं था।
यह कुछ और था।
ऐसा लग रहा था जैसे कमरे के अंदर रोशनी मौजूद ही न हो।
जैसे वहाँ अंधेरे ने खुद को जमा कर लिया हो।
फ़िरोज़ ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।
रोशनी अंदर गई।
और उसकी साँस अटक गई।
कमरे के बीच एक छोटी-सी लकड़ी की कुर्सी थी।
उस कुर्सी पर एक पुराना टेडी बियर रखा था।
उसकी एक आँख गायब थी।
दूसरी आँख सीधे फ़िरोज़ की तरफ़ देख रही थी।
दीवार पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।
पुरानी तस्वीरें।
काली-सफेद तस्वीरें।
कुछ में हवेली दिखाई दे रही थी।
कुछ में लोग।
कुछ में वही लड़की—नूर।
लेकिन कमरे की सबसे डरावनी चीज़ तस्वीरें नहीं थीं।
बल्कि दीवार के ठीक बीचोंबीच लगी एक बड़ी तस्वीर थी।
उसमें एक छोटा बच्चा खड़ा था।
लगभग छह साल का।
हाथ में खिलौना कार।
चेहरे पर मासूम मुस्कान।
फ़िरोज़ उस तस्वीर के पास गया।
उसका दिल बैठ गया।
वह बच्चा वही था।
छह साल का फ़िरोज़।
“ये यहाँ कैसे...?”
उसने तस्वीर को हाथ लगाया।
तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी—
8 सितंबर 1987।
फ़िरोज़ का सिर घूम गया।
“मैं तो...”
वह बुदबुदाया।
“मैं तो उस वक्त सिर्फ़ छह साल का था।”
अचानक कमरे में बच्चे की हँसी गूँजी।
ही... ही... ही...
फ़िरोज़ ने तेजी से पीछे देखा।
खाली कमरा।
फिर हँसी।
इस बार बिल्कुल उसके पीछे।
फ़िरोज़ घूमकर टॉर्च घुमाता है।
कुछ नहीं।
उसने खुद को संभालते हुए कहा—
“मैं डरूँगा नहीं।”
लेकिन उसकी आवाज़ में खुद उसे डर सुनाई दे रहा था।
वह तस्वीरों को देखने लगा।
एक तस्वीर में उसके अब्बा खड़े थे।
दूसरी में उसकी अम्मी।
तीसरी में नूर।
और चौथी तस्वीर देखकर फ़िरोज़ के हाथ काँपने लगे।
उसमें वह खुद था।
छह साल की उम्र में।
लेकिन उसके बगल में खड़ी थी—
नूर।
नूर ने उसके कंधे पर हाथ रखा हुआ था।
और दोनों कैमरे की तरफ़ देख रहे थे।
फ़िरोज़ ने तस्वीर को गौर से देखा।
उसकी आँखों में सवाल भर गए।
“मुझे नूर याद क्यों नहीं है?”
उसने तस्वीर नीचे रखी।
तभी उसके पीछे से धीमी आवाज़ आई—
“क्योंकि तुम्हारी यादें ले ली गई थीं।”
फ़िरोज़ पलटा।
कमरे के कोने में एक छोटी बच्ची खड़ी थी।
सफेद कपड़े।
भीगे बाल।
चेहरा नीचे।
फ़िरोज़ धीरे-धीरे उसके करीब गया।
“तुम नूर हो?”
बच्ची ने सिर उठाया।
इस बार उसका चेहरा डरावना नहीं था।
वह सिर्फ़ एक डरी हुई बच्ची लग रही थी।
उसकी आँखों में आँसू थे।
“तुम मुझे जानती हो?”
बच्ची ने सिर हिलाया।
फ़िरोज़ की आवाज़ नरम हो गई।
“हम पहले मिले थे?”
बच्ची ने फिर सिर हिलाया।
“कहाँ?”
उसने कमरे की दीवार की तरफ़ इशारा किया।
फ़िरोज़ ने देखा।
दीवार पर एक छोटा लकड़ी का दरवाज़ा था।
उसने उसे पहले नहीं देखा था।
दरवाज़े पर लिखा था—
“यादों का कमरा।”
फ़िरोज़ ने हाथ बढ़ाया।
बच्ची ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था।
उसने सिर हिलाया।
नहीं।
फ़िरोज़ ने पूछा—
“क्यों?”
बच्ची ने धीरे से कहा—
“क्योंकि तुम्हें सब याद आ जाएगा।”
फ़िरोज़ की साँस थम गई।
“और अगर याद आ गया तो?”
बच्ची ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम टूट जाओगे।”
फ़िरोज़ कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने बच्ची का हाथ छोड़ दिया।
“मैं पहले ही टूट चुका हूँ।”
उसकी आँखों में आँसू थे।
“मेरे अब्बा मुझसे झूठ बोलते रहे।”
“मेरी अम्मी ने मुझसे कुछ छुपाया।”
“और अब मुझे अपनी ही जिंदगी की यादों पर भरोसा नहीं।”
उसने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
“अब चाहे जो हो... मुझे सच जानना है।”
बच्ची धीरे-धीरे पीछे हट गई।
दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
अंदर एक छोटा कमरा था।
दीवारों पर पुराने शीशे लगे थे।
हर शीशे में फ़िरोज़ का अलग-अलग रूप दिखाई दे रहा था।
कहीं वह बच्चा था।
कहीं जवान।
कहीं बूढ़ा।
कहीं उसके चेहरे पर खून था।
और एक आईने में...
वह रो रहा था।
फ़िरोज़ धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
अचानक उसकी आँखों के सामने सब कुछ धुंधला होने लगा।
उसके कानों में एक आवाज़ आई—
“फ़िरोज़...”
यह उसकी अम्मी की आवाज़ थी।
फिर एक दूसरी आवाज़—
“बेटा, मेरी बात ध्यान से सुनो।”
अब्बा की आवाज़।
फ़िरोज़ ने आँखें बंद कर लीं।
और अचानक...
उसे एक पुरानी रात याद आ गई।
वह छह साल का था।
बारिश हो रही थी।
बिल्कुल आज जैसी।
वह अपने कमरे में सो रहा था।
अचानक उसकी नींद खुली।
नीचे हॉल से आवाज़ें आ रही थीं।
उसने दरवाज़ा खोला।
सीढ़ियों के पास उसके अब्बा खड़े थे।
उनके हाथ में वही काली घड़ी थी।
सामने उसकी अम्मी खड़ी थीं।
दोनों बहुत डरे हुए थे।
फ़िरोज़ चुपचाप सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।
अम्मी ने कहा—
“सलीम, हमें यहाँ से जाना होगा।”
अब्बा ने सिर हिलाया।
“अब देर हो चुकी है।”
“लेकिन फ़िरोज़?”
“उसे लेकर जाना होगा।”
अचानक पीछे से किसी लड़की के रोने की आवाज़ आई।
“अम्मी...”
फ़िरोज़ ने मुड़कर देखा।
नूर खड़ी थी।
लेकिन वह इस बार बच्ची नहीं लग रही थी।
उसके चेहरे पर डर था।
वह भागकर फ़िरोज़ के पास आई और उसका हाथ पकड़ लिया।
“मुझे बचा लो।”
छोटा फ़िरोज़ कुछ समझ नहीं पा रहा था।
“तुम कौन हो?”
नूर ने उसकी तरफ़ देखा।
उसकी आँखों से आँसू गिर रहे थे।
“तुम भूल जाओगे...”
“क्या?”
“सब कुछ।”
अचानक हवेली के मुख्य दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हुई।
ठक।
सभी चुप।
ठक।
अम्मी ने फ़िरोज़ को अपनी तरफ़ खींच लिया।
ठक।
अब्बा का चेहरा सफेद पड़ गया।
उन्होंने काली घड़ी देखी।
उसकी सुइयाँ—
3:17 AM.
अब्बा ने फुसफुसाकर कहा—
“वो आ गया।”
दरवाज़े के बाहर से एक आदमी की आवाज़ आई—
“सलीम...”
फ़िरोज़ के अब्बा पीछे हट गए।
आवाज़ फिर आई—
“तुमने वादा किया था।”
अम्मी रोने लगीं।
“हमें छोड़ दो...”
बाहर से हँसी सुनाई दी।
फिर दरवाज़े की कुंडी अपने आप घूमने लगी।
क्लिक...
क्लिक...
क्लिक...
अब्बा ने फ़िरोज़ को उठाया।
“बेटा, मेरी बात सुनो।”
छोटा फ़िरोज़ रो रहा था।
“अब्बा, क्या हुआ?”
“जो भी हो... पीछे मत देखना।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर तुमने उसे देख लिया... तो वह तुम्हें पहचान लेगा।”
फ़िरोज़ रोते हुए बोला—
“कौन?”
अब्बा ने उसकी आँखों में देखा।
उनकी आँखों में आँसू थे।
“मौत।”
अचानक दरवाज़ा टूटकर खुल गया।
एक काली परछाईं अंदर आई।
फ़िरोज़ चीख पड़ा।
उसकी अम्मी ने उसके चेहरे को अपनी छाती से लगा लिया।
“आँखें बंद करो!”
लेकिन छोटे फ़िरोज़ ने एक पल के लिए आँखें खोल दीं।
उसने उस परछाईं को देखा।
एक लंबा आदमी।
काली घड़ी।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
लेकिन उसकी आँखें...
पूरी तरह सफेद थीं।
वह धीरे-धीरे फ़िरोज़ की तरफ़ बढ़ा।
फिर बोला—
“तुम्हें 39 साल बाद याद आएगा।”
अचानक सब कुछ काला हो गया।
फ़िरोज़ ने झटके से आँखें खोल दीं।
वह अभी भी “यादों के कमरे” में खड़ा था।
उसकी साँसें तेज़ थीं।
आँखों से आँसू बह रहे थे।
वह फर्श पर बैठ गया।
“मुझे याद था...”
उसने अपने सिर को दोनों हाथों से पकड़ लिया।
“मुझे सब याद था...”
लेकिन अचानक एक और याद सामने आई।
उस रात...
अब्बा ने सिर्फ़ एक चीज़ उसे दी थी।
काली घड़ी।
फ़िरोज़ ने अपनी जेब टटोली।
घड़ी वहाँ नहीं थी।
उसने चारों तरफ़ देखा।
घड़ी कमरे के बीच पड़ी थी।
फ़िरोज़ ने उसे उठाया।
पीछे खुदा था—
सलीम — 1987
लेकिन अब उसके नीचे एक तीसरी लाइन दिखाई दे रही थी।
“नूर — 1987”
और उसके नीचे...
धीरे-धीरे नए अक्षर उभर रहे थे।
“फ़िरोज़ — आज।”
फ़िरोज़ की साँस रुक गई।
अचानक कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया।
धड़ाम!
सभी आईने एक साथ काँपने लगे।
फिर हर आईने में फ़िरोज़ के अलग-अलग रूप दिखाई देने लगे।
एक बच्चा।
एक जवान।
एक बूढ़ा।
खून से लथपथ।
रोता हुआ।
चिल्लाता हुआ।
और आखिर में—
एक ऐसा फ़िरोज़ जो मुस्कुरा रहा था।
उसने आईने के अंदर से कहा—
“अब तुम्हें याद आ गया है।”
फ़िरोज़ ने काँपते हुए पूछा—
“तुम कौन हो?”
आईने वाला फ़िरोज़ आगे झुका।
“मैं वो हिस्सा हूँ... जिसे तुम्हारे अब्बा ने तुमसे छुपा दिया था।”
“क्या मतलब?”
आईने वाला फ़िरोज़ मुस्कुराया।
“तुम्हारी मौत उस रात नहीं हुई थी...”
फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।
“तो?”
“उस रात सिर्फ़ तुम्हारी यादें मरी थीं।”
फ़िरोज़ कुछ समझ नहीं पाया।
फिर आईने वाला फ़िरोज़ बोला—
“और अब मौत तुम्हारी बाकी जिंदगी लेने वापस आई है।”
अचानक पीछे से नूर की आवाज़ आई—
“भागो!”
फ़िरोज़ ने पीछे देखा।
कमरे की दीवार पर एक नया दरवाज़ा खुल चुका था।
उसके पीछे लंबा गलियारा था।
गलियारे के अंत में कोई खड़ा था।
एक आदमी।
काली घड़ी पहने हुए।
फ़िरोज़ उसे पहचान गया।
वही आदमी...
जिसे उसने अपनी बचपन की याद में देखा था।
वही आदमी जो कार में उसके बूढ़े रूप के साथ बैठा था।
वही आदमी जिसे नूर ने कहा था—
“मालिक।”
वह धीरे-धीरे फ़िरोज़ की तरफ़ बढ़ रहा था।
हर कदम के साथ उसकी काली घड़ी की आवाज़ सुनाई दे रही थी—
टिक...
टिक...
टिक...
फ़िरोज़ पीछे हटता गया।
“तुम कौन हो?”
वह आदमी रुक गया।
उसने पहली बार अपना चेहरा उठाया।
फ़िरोज़ की आँखों से आँसू निकल पड़े।
क्योंकि उस चेहरे को देखकर उसे अपने अब्बा की एक पुरानी बात याद आ गई—
“बेटा, अगर कभी मेरी शक्ल का कोई आदमी तुम्हारे सामने आए... तो उसे अपना बाप मत समझना।”
फ़िरोज़ का शरीर सुन्न पड़ गया।
सामने खड़ा आदमी...
बिल्कुल उसके अब्बा जैसा दिखता था।
लेकिन वह उसके अब्बा नहीं था।
उसने मुस्कुराकर कहा—
“तुम्हारे अब्बा ने तुमसे एक और झूठ बोला था, फ़िरोज़।”
फ़िरोज़ ने काँपते हुए पूछा—
“क्या?”
वह आदमी धीरे-धीरे आगे आया।
“मैं तुम्हारे अब्बा का चेहरा नहीं हूँ...”
वह रुक गया।
उसकी आँखें सफेद चमकने लगीं।
“तुम्हारे अब्बा मेरा चेहरा पहनते थे।”
फ़िरोज़ की साँस रुक गई।
और उसी पल पीछे से नूर की चीख गूँजी—
“फ़िरोज़! उसकी आँखों में मत देखना!”
लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।
फ़िरोज़ उसकी आँखों में देख चुका था।
और उन सफेद आँखों के अंदर...
उसे अपना पूरा भविष्य दिखाई दे रहा था।
एक कब्र।
उस पर नाम लिखा था—
फ़िरोज़ सैफ़ी
1987 — 2026
और कब्र के पीछे...
एक और फ़िरोज़ खड़ा था।
वह मुस्कुरा रहा था।
एपिसोड 3 समाप्त।