PretikaGhost Storiesजिस रात मौत जागी

एपिसोड 2 — आईने में दूसरा फ़िरोज़

firoj saifi · Ghost Stories · 8 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
जिस रात मौत जागी
Chapter
2 of 3
Category
Ghost Stories
Reading time
8 min
Words
1471
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

रात के 3 बजकर 2 मिनट हो चुके थे।
हवेली के अंदर अंधेरा था।
इतना गहरा अंधेरा कि फ़िरोज़ सैफ़ी को अपनी उँगलियाँ तक दिखाई नहीं दे रही थीं।
उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं।
कुछ सेकंड पहले उसने अपने सामने उस आदमी को देखा था...
वही चेहरा।
वही आँखें।
वही आवाज़।
वही फ़िरोज़ सैफ़ी।
लेकिन लगभग उनतालीस साल बूढ़ा।
और अब...
वह आदमी गायब था।
कमरे के अंदर सिर्फ़ एक पुरानी कुर्सी पड़ी थी।
उसके सामने एक मेज़।
मेज़ पर वही डायरी।
और उसके बगल में एक पुराना आईना।
फ़िरोज़ ने मोबाइल दोबारा चालू करने की कोशिश की।
इस बार स्क्रीन जल उठी।
बैटरी—
47%
लेकिन स्क्रीन पर समय देखकर उसके माथे पर पसीना आ गया।
3:02 AM.
सिर्फ़ कुछ मिनट पहले घड़ी ने तीन बजाए थे।
फ़िरोज़ ने कमरे की तरफ़ देखा।
“वो आदमी कहाँ गया?”
कोई जवाब नहीं।
उसने डायरी उठाई।
पहला पन्ना वही था—
“अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि मौत जाग चुकी है।”
फ़िरोज़ ने तेजी से अगले पन्ने पलटे।
दूसरे पन्ने पर एक तारीख लिखी थी—
8 सितंबर 1987
उसके नीचे सिर्फ़ एक नाम था।
“सलीम सैफ़ी।”
फ़िरोज़ की उँगलियाँ पन्ने पर रुक गईं।
सलीम...
उसके अब्बा का नाम था।
लेकिन उसके अब्बा की मौत तो तब हुई थी जब फ़िरोज़ सिर्फ़ छह साल का था।
फ़िरोज़ की आँखों के सामने बचपन की कुछ धुंधली तस्वीरें घूमने लगीं।
एक आदमी...
सफेद कुर्ता...
कलाई पर काली घड़ी...
और एक आवाज़—
“फ़िरोज़, अगर कभी मैं तुम्हें उस हवेली का ज़िक्र करूँ, तो वहाँ मत जाना।”
उस समय फ़िरोज़ को लगा था कि ये सिर्फ़ उसके पिता की कोई अजीब सनक है।
लेकिन आज...
वही हवेली उसके सामने थी।
और उसके हाथ में उसके पिता का नाम लिखा हुआ था।
फ़िरोज़ ने डायरी आगे पढ़नी शुरू की।
पहली लाइन थी—
“आज हमने उसे जगाया।”
फ़िरोज़ की साँस रुक गई।
अगली लाइन—
“हमें लगा था कि हम उसे नियंत्रित कर सकते हैं।”
फिर—
“हम गलत थे।”
इसके बाद पूरा पन्ना खाली था।
अगले पन्ने पर लिखा था—
“उसकी पहली शर्त है—एक परिवार।”
फ़िरोज़ ने डायरी बंद कर दी।
“कौन है वो?”
उसी पल कमरे में कहीं से धीमी आवाज़ आई—
“तुम्हें पता है...”
फ़िरोज़ तेजी से पलटा।
कमरा खाली था।
आवाज़ फिर आई—
“तुम्हारे अब्बा ने बताया था।”
फ़िरोज़ ने टॉर्च जलाई।
रोशनी कमरे की दीवारों पर घूमी।
कुछ नहीं।
फिर उसकी रोशनी आईने पर पड़ी।
फ़िरोज़ आईने के सामने खड़ा था।
उसने अपने प्रतिबिंब को देखा।
सब सामान्य था।
लेकिन अगले ही पल...
उसके प्रतिबिंब ने पलक नहीं झपकाई।
फ़िरोज़ स्थिर हो गया।
उसने धीरे से अपना हाथ उठाया।
आईने वाले फ़िरोज़ ने भी हाथ उठाया।
उसने सिर दाईं तरफ़ किया।
प्रतिबिंब ने भी किया।
फ़िरोज़ ने राहत की साँस ली।
“मैं डर रहा हूँ... बेवजह।”
वह मुड़ने ही वाला था कि आईने के अंदर वाला फ़िरोज़ मुस्कुरा दिया।
फ़िरोज़ नहीं मुस्कुराया था।
उसका चेहरा तुरंत सफेद पड़ गया।
आईने में उसका दूसरा रूप धीरे-धीरे उसके करीब आने लगा।
फ़िरोज़ पीछे हट गया।
लेकिन आईने वाला फ़िरोज़ वहीं खड़ा रहा।
फिर उसने अपने होंठ हिलाए।
आवाज़ आईने से बाहर नहीं आई।
लेकिन फ़िरोज़ साफ़ पढ़ सकता था—
“पीछे देखो।”
फ़िरोज़ ने तुरंत आँखें बंद कर लीं।
उसके कान के पास किसी की साँस महसूस हुई।
गर्म साँस।
बहुत करीब।
किसी ने फुसफुसाया—
“तुम्हें कितनी बार समझाऊँ?”
फ़िरोज़ ने आँखें नहीं खोलीं।
“कौन हो तुम?”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर आवाज़ आई—
“तुम्हारा डर।”
फ़िरोज़ ने आँखें खोलीं।
उसके पीछे कोई नहीं था।
लेकिन आईने में अब वह अकेला नहीं था।
उसके पीछे एक छोटी बच्ची खड़ी थी।
सफेद कपड़े।
गीले बाल।
और चेहरा नीचे झुका हुआ।
फ़िरोज़ धीरे-धीरे आईने के करीब गया।
“तुम कौन हो?”
बच्ची ने सिर उठाया।
उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
उसने आईने के अंदर से अपनी उँगली उठाई और पीछे की दीवार की ओर इशारा किया।
फ़िरोज़ ने पलटकर देखा।
दीवार पर कुछ नहीं था।
वह वापस आईने की तरफ़ मुड़ा।
बच्ची गायब थी।
लेकिन आईने पर अंदर से किसी ने उँगली से लिखा था—
“कमरा 7।”
फ़िरोज़ ने कमरे से बाहर निकलने का फैसला किया।
वह गलियारे में आया।
पहली मंज़िल पर सात दरवाज़े थे।
उसने गिनना शुरू किया।
एक...
दो...
तीन...
चार...
पाँच...
छह...
सात।
सातवाँ दरवाज़ा सबसे आखिर में था।
उस पर कोई ताला नहीं था।
बस लकड़ी पर गहरे नाखूनों से खरोंचकर एक शब्द लिखा था—
“सलीम।”
फ़िरोज़ का दिल तेज़ धड़कने लगा।
उसने दरवाज़ा खोला।
अंदर एक छोटा कमरा था।
धूल से भरा हुआ।
दीवारों पर पुराने अखबार चिपके थे।
एक कोने में लकड़ी की अलमारी।
बीच में एक मेज़।
और मेज़ पर...
एक टेप रिकॉर्डर।
फ़िरोज़ उसके पास गया।
उस पर एक छोटी पर्ची लगी थी—
“फ़िरोज़ के लिए।”
उसने रिकॉर्डर का बटन दबाया।
कुछ सेकंड तक सिर्फ़ खरखराहट सुनाई दी।
फिर एक आदमी की आवाज़ आई।
फ़िरोज़ का शरीर सुन्न हो गया।
वह आवाज़ उसके पिता की थी।
“अगर तुम ये रिकॉर्डिंग सुन रहे हो, तो शायद मैं मर चुका हूँ।”
फ़िरोज़ की आँखों में आँसू आ गए।
उसने रिकॉर्डर को दोनों हाथों से पकड़ लिया।
आवाज़ आगे बोली—
“फ़िरोज़, मैंने तुम्हें हमेशा इस जगह से दूर रखा। लेकिन मुझे डर था कि एक दिन तुम खुद यहाँ पहुँचोगे।”
कुछ सेकंड की खामोशी।
फिर—
“1987 में मैंने और तुम्हारी माँ ने एक गलती की थी।”
फ़िरोज़ की साँस रुक गई।
“अम्मी भी?”
रिकॉर्डिंग चलती रही।
“हमने एक लड़की को बचाने की कोशिश की थी।”
खरखराहट।
“उस लड़की का नाम था—नूर।”
फ़िरोज़ ने नाम दोहराया—
“नूर...”
रिकॉर्डिंग में उसके पिता की आवाज़ काँपने लगी।
“नूर मर चुकी थी... लेकिन उसकी मौत सामान्य नहीं थी।”
फिर कुछ सेकंड के लिए रिकॉर्डिंग बंद जैसी हो गई।
अचानक आवाज़ वापस आई।
लेकिन इस बार उसके पिता की आवाज़ नहीं थी।
एक महिला की आवाज़ थी।
बहुत धीमी।
“सलीम...”
फ़िरोज़ के हाथ से रिकॉर्डर लगभग गिर गया।
आवाज़ दोबारा आई—
“तुमने वादा किया था...”
फिर रिकॉर्डिंग बंद।
फ़िरोज़ ने घबराकर रिकॉर्डर के सारे बटन दबा दिए।
कुछ नहीं हुआ।
अचानक कमरे की अलमारी का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
अंदर पुराने कपड़े और कागज़ रखे थे।
सबसे नीचे एक लाल कपड़े में लिपटी चीज़ थी।
फ़िरोज़ ने उसे बाहर निकाला।
कपड़ा हटाया।
अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।
तस्वीर में चार लोग खड़े थे।
सलीम सैफ़ी।
फ़िरोज़ की माँ।
एक अजनबी बूढ़ा आदमी।
और...
एक छोटी लड़की।
नूर।
फ़िरोज़ तस्वीर को घूरता रहा।
उसने तस्वीर पलटी।
पीछे लिखा था—
“जिसे हमने दफनाया था, वह तीसरी रात वापस आ गई।”
फ़िरोज़ के हाथ काँपने लगे।
तभी कमरे के बाहर किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।
धड़... धड़... धड़...
कोई गलियारे में भाग रहा था।
फ़िरोज़ ने दरवाज़ा खोला।
गलियारा खाली था।
लेकिन फर्श पर पानी के छोटे-छोटे निशान थे।
नंगे पैरों के निशान।
एक बच्चे के।
वे निशान धीरे-धीरे गलियारे से होते हुए सीढ़ियों की तरफ़ जा रहे थे।
फ़िरोज़ उनके पीछे चल पड़ा।
नीचे पहुँचा।
हॉल में वही पुराना झूमर जल रहा था।
और उसके ठीक नीचे...
एक छोटी बच्ची खड़ी थी।
पीठ फ़िरोज़ की तरफ़।
फ़िरोज़ रुक गया।
“नूर?”
बच्ची ने धीरे-धीरे सिर घुमाया।
चेहरा दिखाई नहीं दिया।
सिर्फ़ बाल।
फ़िरोज़ ने एक कदम आगे बढ़ाया।
“तुमने मेरे अब्बा को देखा था?”
बच्ची ने सिर हिलाया।
“क्या हुआ था 1987 में?”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर बच्ची ने धीरे से हाथ उठाया।
हॉल की दीवार पर एक जगह इशारा किया।
फ़िरोज़ ने टॉर्च वहाँ डाली।
वहाँ एक बड़ा पारिवारिक चित्र टंगा था।
बच्ची धीरे-धीरे उस चित्र के पास गई।
उसने अपनी उँगली तस्वीर में एक व्यक्ति पर रखी।
वह व्यक्ति था—
फ़िरोज़ का पिता।
फिर बच्ची ने तस्वीर में एक और व्यक्ति की ओर इशारा किया।
वह वही बूढ़ा आदमी था जो तस्वीर में नूर के साथ खड़ा था।
फ़िरोज़ ने तस्वीर को गौर से देखा।
उस बूढ़े आदमी की कलाई पर एक काली घड़ी थी।
ठीक वैसी ही घड़ी...
जो फ़िरोज़ को अपने बचपन की याद में दिखाई देती थी।
फ़िरोज़ ने धीरे से कहा—
“ये कौन है?”
बच्ची ने पहली बार अपना चेहरा ऊपर किया।
उसकी काली आँखों में अचानक आँसू भर आए।
उसने होंठ खोले।
लेकिन आवाज़ बच्ची की नहीं थी।
आवाज़ थी—
फ़िरोज़ की माँ की।
“जिससे तुम्हारे अब्बा ने मुझे बचाने की कोशिश की थी।”
फ़िरोज़ पीछे हट गया।
“कौन?”
बच्ची की आँखों से काला पानी बहने लगा।
उसने सिर्फ़ एक शब्द कहा—
“मालिक।”
उसी पल हवेली का मुख्य दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
बाहर बारिश और तेज़ हो चुकी थी।
फ़िरोज़ ने देखा—
गेट के बाहर उसकी कार खड़ी थी।
और कार के अंदर वही दूसरा फ़िरोज़ बैठा था।
इस बार वह अकेला नहीं था।
उसके बगल में एक बूढ़ा आदमी बैठा था।
काली घड़ी पहने हुए।
फ़िरोज़ का दिल जैसे रुक गया।
बूढ़े आदमी ने कार की खिड़की नीचे की।
उसने फ़िरोज़ की तरफ़ देखा।
फिर अपनी कलाई की घड़ी पर नज़र डाली।
3:17 AM.
उसने मुस्कुराकर कहा—
“बहुत देर कर दी, बेटे।”
फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।
“तुम... मेरे अब्बा हो?”
बूढ़े आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने सिर्फ़ कार की पिछली सीट की तरफ़ इशारा किया।
फ़िरोज़ ने देखा—
पिछली सीट पर एक पुराना लकड़ी का बक्सा रखा था।
उस पर वही निशान था—
एक आँख।
बूढ़े आदमी ने धीरे से कहा—
“अगर सच जानना है, तो बक्सा खोलो।”
फ़िरोज़ ने कार की तरफ़ कदम बढ़ाया।
लेकिन तभी उसके पीछे से बच्ची की चीख सुनाई दी—
“नहीं!”
फ़िरोज़ पलटा।
बच्ची हॉल के बीच खड़ी थी।
उसका चेहरा अब बदल चुका था।
वह बच्ची नहीं थी।
वह एक जवान औरत थी।
लंबे काले बाल।
सफेद कपड़े।
और चेहरा...
फ़िरोज़ की माँ का।
उसने चीखकर कहा—
“फ़िरोज़! अगर उसने बक्सा खोल दिया... तो तुम कभी वापस नहीं आओगे!”
फ़िरोज़ वहीं रुक गया।
उसकी नज़र कार में बैठे बूढ़े आदमी पर गई।
बूढ़ा मुस्कुरा रहा था।
फिर उसने कार का दरवाज़ा बंद किया।
कार स्टार्ट हुई।
और कुछ ही सेकंड में बारिश के बीच गायब हो गई।
फ़िरोज़ ने दौड़कर गेट तक जाने की कोशिश की।
लेकिन सड़क खाली थी।
कार गायब।
बूढ़ा गायब।
दूसरा फ़िरोज़ गायब।
सिर्फ़ बारिश।
और उसके पीछे हवेली।
फ़िरोज़ धीरे-धीरे वापस मुड़ा।
हॉल में कोई नहीं था।
न बच्ची।
न उसकी माँ।
न कोई और।
बस फर्श पर एक चीज़ पड़ी थी।
एक पुरानी काली घड़ी।
फ़िरोज़ ने उसे उठाया।
घड़ी की सुइयाँ चल रही थीं।
3:17...
3:18...
3:19...
फ़िरोज़ ने घड़ी को पलटा।
पीछे खुदा हुआ था—
“सलीम — 1987”
और उसके नीचे एक दूसरी लाइन थी।
जो पहले वहाँ नहीं थी।
“फ़िरोज़ — 2026”
फ़िरोज़ ने घड़ी हाथ से गिरा दी।
उसी समय ऊपर की मंज़िल से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।
धड़... धड़... धड़...
फिर एक जोरदार चीख—
“फ़िरोज़!”
उसने सिर उठाकर ऊपर देखा।
सीढ़ियों के सबसे ऊपर...
वही दूसरा फ़िरोज़ खड़ा था।
लेकिन इस बार उसका चेहरा खून से सना हुआ था।
उसने नीचे देखते हुए कहा—
“अगला कमरा मत खोलना।”
फ़िरोज़ ने पूछा—
“कौन-सा कमरा?”
दूसरे फ़िरोज़ ने धीरे से अपनी उँगली उठाई।
सीढ़ियों के पीछे एक ऐसा दरवाज़ा था...
जो फ़िरोज़ ने पहले कभी नहीं देखा था।
उस दरवाज़े पर लिखा था—
कमरा नंबर 8
और दरवाज़े के नीचे से...
खून की एक पतली धारा बाहर आ रही थी।
एपिसोड 2 समाप्त।

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