PretikaGhost Storiesजिस रात मौत जागी

एपिसोड 1 — आधी रात की दस्तक

firoj saifi · Ghost Stories · 9 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
जिस रात मौत जागी
Chapter
1 of 3
Category
Ghost Stories
Reading time
9 min
Words
1670
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

कुछ कहानियाँ डराने के लिए नहीं होतीं...
कुछ कहानियाँ हमें यह बताने के लिए होती हैं कि अंधेरा हमेशा खाली नहीं होता।
कभी-कभी किसी सुनसान जगह पर बीती हुई एक रात, आने वाली कई रातों की किस्मत तय कर देती है।
कहते हैं, मौत के बाद इंसान चला जाता है...
लेकिन अगर मौत खुद जाने से इनकार कर दे तो?
अगर कोई ऐसी चीज़ हो, जो हर 39 साल बाद नींद से जागती हो...
अगर उसे जगाने वाला इंसान खुद न जानता हो कि उसने क्या कर दिया है...
और अगर उस रात जिस शख्स को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा राज़ पता चले...
वही राज़ उसकी मौत की वजह बन जाए?
8 सितंबर 2026 की रात, फ़िरोज़ सैफ़ी एक ऐसी जगह पहुँचा था, जहाँ उसे कभी नहीं जाना चाहिए था।
उसे नहीं पता था कि उस हवेली में उसका इंतज़ार कोई इंसान नहीं...
बल्कि उसका अतीत, उसका भविष्य और उसकी मौत कर रहे थे।
उस रात फ़िरोज़ ने जो देखा...
वह सिर्फ़ एक डरावनी घटना की शुरुआत थी।
क्योंकि उस रात...
मौत जाग चुकी थी।
रात के ठीक 2 बजकर 47 मिनट हुए थे।
बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी।
पुराने शहर की आख़िरी गली में बनी उस सुनसान हवेली के चारों तरफ़ अंधेरा ऐसे जमा था, जैसे रात ने वहाँ अपना घर बना लिया हो। बिजली के खंभे पर लगी पीली रोशनी बारिश की बूंदों से टूटकर ज़मीन पर गिर रही थी। हवा इतनी तेज़ थी कि हवेली के जंग लगे लोहे के गेट से बार-बार एक ही आवाज़ निकल रही थी—
कrrrr... कrrrr... कrrrr...
फ़िरोज़ सैफ़ी अपनी कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा सामने देख रहा था।
उसकी आँखें हवेली पर टिकी थीं।
हवेली तीन मंज़िल की थी।
काली, पुरानी और इतनी खामोश कि बारिश के शोर के बावजूद ऐसा लग रहा था जैसे उसके अंदर कोई साँस रोककर बैठा हो।
फ़िरोज़ ने घड़ी की तरफ़ देखा।
2:47 AM.
उसने मोबाइल उठाया।
स्क्रीन पर वही नंबर था जिसने पिछले बीस मिनट में उसे सात बार फोन किया था।
Unknown Number.
फ़िरोज़ ने सातवीं बार कॉल काट दी।
तभी मोबाइल फिर बज उठा।
इस बार कॉल नहीं थी।
एक मैसेज आया था।
फ़िरोज़ ने स्क्रीन खोली।
सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—
“तुम्हें अंदर नहीं आना चाहिए था।”
फ़िरोज़ के चेहरे पर हल्की शिकन आई।
उसने जवाब लिखा—
“तुम हो कौन?”
कुछ सेकंड तक कोई जवाब नहीं आया।
फिर स्क्रीन पर तीन शब्द उभरे—
“मैं तुम्हें देख रही हूँ।”
फ़िरोज़ ने तुरंत कार के शीशे में पीछे देखा।
खाली सड़क।
बारिश।
अंधेरा।
कुछ नहीं।
उसने धीरे से वापस सामने देखा।
और उसी पल—
धड़ाम!
हवेली का मुख्य दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
फ़िरोज़ का हाथ स्टीयरिंग पर जम गया।
दरवाज़ा पूरी तरह खुला था।
अंदर सिर्फ़ घना अंधेरा दिखाई दे रहा था।
उसने कार का इंजन बंद किया।
कुछ सेकंड तक वहीं बैठा रहा।
फिर उसकी नज़र अपनी घड़ी पर गई।
2:48 AM.
उसने गहरी साँस ली और कार से बाहर निकल आया।
बारिश उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
हवेली के गेट तक पहुँचते-पहुँचते उसके जूते पानी और कीचड़ से भर चुके थे।
गेट आधा खुला था।
फ़िरोज़ ने उसे धक्का दिया।
लोहे का गेट चीखते हुए खुला।
क्रीईईईईईक...
अंदर जाने के बाद उसने पीछे मुड़कर देखा।
सड़क पर उसकी कार खड़ी थी।
हेडलाइट बंद।
और उसके आगे—
कुछ भी नहीं।
फ़िरोज़ ने जेब से टॉर्च निकाली।
रोशनी की पतली किरण हवेली के दरवाज़े तक गई।
सीढ़ियों पर पुराने पत्थर थे।
दीवारों पर काई जमी हुई थी।
और सबसे अजीब बात—
मुख्य दरवाज़े के ठीक ऊपर एक पुरानी घड़ी लगी थी।
घड़ी बंद थी।
लेकिन उसकी सुइयाँ एक ही जगह अटकी थीं।
2:47.
फ़िरोज़ कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर उसने धीरे से हवेली के अंदर कदम रखा।
अंदर कदम रखते ही बारिश की आवाज़ अचानक बहुत दूर चली गई।
जैसे हवेली ने बाहर की पूरी दुनिया को अपने दरवाज़े पर ही रोक दिया हो।
फ़िरोज़ ने टॉर्च चारों तरफ़ घुमाई।
विशाल हॉल।
ऊँची छत।
पुराना झूमर।
दीवारों पर धूल से ढकी तस्वीरें।
एक तरफ़ टूटा हुआ पियानो।
दूसरी तरफ़ लकड़ी की लंबी सीढ़ियाँ, जो ऊपर अंधेरे में गायब हो रही थीं।
फ़िरोज़ धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
उसकी जूतों की आवाज़ पूरे हॉल में गूँज रही थी।
टक... टक... टक...
अचानक—
टक!
ऊपर कहीं से आवाज़ आई।
फ़िरोज़ रुक गया।
उसने टॉर्च ऊपर की।
कुछ नहीं।
फिर आवाज़ आई।
टक... टक... टक...
इस बार साफ़ था।
कोई ऊपर चल रहा था।
फ़िरोज़ ने आवाज़ लगाई—
“कौन है?”
कोई जवाब नहीं।
“मैं फ़िरोज़ हूँ।”
खामोशी।
फिर...
ऊपर से बहुत धीमी आवाज़ आई।
एक औरत की आवाज़।
“मुझे पता है...”
फ़िरोज़ का चेहरा सफेद पड़ गया।
आवाज़ सीढ़ियों के ऊपर से आई थी।
“कौन हो तुम?”
कुछ पल सन्नाटा रहा।
फिर वही आवाज़—
“इतनी देर क्यों कर दी, फ़िरोज़?”
फ़िरोज़ ने टॉर्च कसकर पकड़ ली।
“तुम मेरा नाम कैसे जानती हो?”
इस बार कोई जवाब नहीं आया।
फ़िरोज़ सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा।
एक कदम।
फिर दूसरा।
लकड़ी की सीढ़ियाँ उसके वजन से कराह रही थीं।
चर्र... चर्र...
जैसे-जैसे वह ऊपर जा रहा था, हवा ठंडी होती जा रही थी।
पहली मंज़िल पर पहुँचकर उसने टॉर्च आगे की।
लंबा गलियारा।
दोनों तरफ़ बंद कमरे।
दीवार पर पुराने चित्र।
और गलियारे के आख़िरी छोर पर एक बड़ा काला दरवाज़ा।
उस दरवाज़े पर लाल रंग से एक निशान बना था।
एक गोल घेरा।
और उसके बीच—
एक आँख।
फ़िरोज़ उस निशान के पास गया।
उसने उँगली से उसे छुआ।
अचानक—
पीछे से किसी ने फुसफुसाकर कहा—
“मत खोलना।”
फ़िरोज़ बिजली की तरह पीछे मुड़ा।
गलियारा खाली था।
“कौन है?”
खामोशी।
उसने फिर दरवाज़े की तरफ़ देखा।
इस बार उसके हाथ में पकड़ी टॉर्च की रोशनी काँप रही थी।
दरवाज़े के नीचे से हल्की-सी लाल रोशनी बाहर आ रही थी।
फ़िरोज़ पीछे हट गया।
तभी उसके मोबाइल में कंपन हुआ।
नया मैसेज।
उसने स्क्रीन देखी।
Unknown Number:
“तुमने पहली चेतावनी नहीं मानी।”
फ़िरोज़ ने टाइप किया—
“दरवाज़े के पीछे क्या है?”
कुछ सेकंड बाद जवाब आया—
“तुम्हारी मौत।”
फ़िरोज़ ने मोबाइल नीचे कर दिया।
उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
और तभी—
दरवाज़े के पीछे से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।
बहुत धीमी।
बहुत दर्द भरी।
“माँ...”
फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।
फिर आवाज़ आई—
“माँ... दरवाज़ा खोलो...”
फ़िरोज़ ने दरवाज़े की कुंडी पकड़ ली।
तभी उसके पीछे से किसी ने कहा—
“फ़िरोज़...”
वह जम गया।
आवाज़ बिल्कुल उसके कान के पास थी।
वह धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।
वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन—
उसकी गर्दन पर किसी बर्फ जैसे ठंडे हाथ की उँगलियों का निशान पड़ चुका था।
फ़िरोज़ घबराकर पीछे हटा।
उसका पैर किसी चीज़ से टकराया।
ठक!
नीचे देखा।
एक पुराना लकड़ी का बक्सा पड़ा था।
बक्से पर धूल के नीचे कुछ लिखा हुआ था।
फ़िरोज़ ने हाथ से धूल हटाई।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
बक्से पर लिखा था—
“फ़िरोज़ सैफ़ी के लिए।”
कुछ पल तक वह सिर्फ़ उस नाम को देखता रहा।
“ये... कैसे?”
उसने बक्सा खोला।
अंदर पुराने कागज़ थे।
एक जंग लगी चाबी।
कुछ तस्वीरें।
और सबसे नीचे एक डायरी।
डायरी के कवर पर तारीख लिखी थी—
17 अक्टूबर 1987
फ़िरोज़ ने डायरी खोली।
पहले पन्ने पर सिर्फ़ एक वाक्य था—
“अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि मौत जाग चुकी है।”
फ़िरोज़ की उँगलियाँ ठंडी पड़ गईं।
उसने अगला पन्ना पलटा।
लिखा था—
“इस हवेली में जो हुआ, उसे दुनिया से छुपा दिया गया था। लेकिन मौत चीज़ों को भूलती नहीं।”
अगले पन्ने पर—
“हर 39 साल बाद वह वापस आती है।”
फ़िरोज़ ने तारीख दोबारा देखी।
1987।
उसने तेजी से हिसाब लगाया।
1987 + 39 = 2026.
उसका दिल जोर से धड़कने लगा।
आज की तारीख—
8 सितंबर 2026।
अभी 39 साल पूरे होने में कुछ हफ्ते बाकी थे।
लेकिन डायरी के अगले पन्ने पर जो लिखा था, उसे देखकर उसके हाथ से डायरी लगभग गिर गई।
“वह इस बार समय से पहले जाग गई है।”
अचानक हवेली के अंदर सभी लाइटें एक साथ जल उठीं।
फ़िरोज़ पीछे हट गया।
झूमर चमकने लगा।
गलियारे की दीवारों पर लगी तस्वीरें अब साफ़ दिखाई दे रही थीं।
और उनमें से एक तस्वीर देखकर फ़िरोज़ की साँस रुक गई।
तस्वीर में लगभग दस लोग खड़े थे।
बीच में एक बूढ़ा आदमी।
उसके बगल में एक छोटी बच्ची।
और सबसे पीछे—
एक जवान लड़का।
फ़िरोज़ ने टॉर्च तस्वीर पर डाली।
उस लड़के का चेहरा...
फ़िरोज़ जैसा था।
बिल्कुल वैसा।
एक ही आँखें।
एक ही चेहरा।
एक ही निशान।
फ़िरोज़ तस्वीर के बिल्कुल पास चला गया।
तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी—
8 सितंबर 1987.
“ये... मैं नहीं हो सकता।”
उसने तस्वीर को छुआ।
और उसी पल तस्वीर के अंदर खड़ा वह लड़का—
मुस्कुरा दिया।
फ़िरोज़ चीखते हुए पीछे गिरा।
तस्वीर ज़मीन पर गिर गई।
उसने काँपते हुए उसे उठाया।
लड़के का चेहरा अब सामान्य था।
लेकिन तस्वीर में एक चीज़ बदल चुकी थी।
अब उस लड़के के पीछे एक औरत खड़ी थी।
काले कपड़ों में।
चेहरा लंबे बालों से ढका हुआ।
फ़िरोज़ ने तस्वीर को आँखों के करीब किया।
उसके नीचे किसी ने पेंसिल से लिखा था—
“इसे मत देखने देना।”
फ़िरोज़ ने जैसे ही सिर उठाया—
गलियारे के आख़िरी छोर पर वही औरत खड़ी थी।
काले कपड़े।
चेहरा बालों से ढका हुआ।
बिल्कुल स्थिर।
फ़िरोज़ का शरीर सुन्न हो गया।
“तुम... कौन हो?”
औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने सिर्फ़ अपना हाथ उठाया।
और उस काले दरवाज़े की तरफ़ इशारा किया।
दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
कड़ाआआआक...
अंदर घना अंधेरा था।
और उसी अंधेरे से बच्चे की आवाज़ आई—
“फ़िरोज़... मुझे बाहर निकालो...”
फ़िरोज़ ने औरत की तरफ़ देखा।
एक पल के लिए हवा थम गई।
फिर उसके बाल धीरे-धीरे ऊपर उठने लगे।
चेहरा दिखाई दिया।
फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।
वह चेहरा...
फ़िरोज़ की माँ का था।
उसकी माँ, जिनकी मौत को बारह साल हो चुके थे।
फ़िरोज़ के मुँह से सिर्फ़ एक शब्द निकला—
“अम्मी...?”
औरत मुस्कुराई।
फिर उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“बेटा... तू बहुत देर से आया।”
अचानक पूरी हवेली अंधेरे में डूब गई।
फ़िरोज़ ने मोबाइल की टॉर्च जलाने की कोशिश की।
मोबाइल बंद।
उसने दूसरी बार बटन दबाया।
कुछ नहीं।
अंधेरे में उसे सिर्फ़ अपनी साँस सुनाई दे रही थी।
फिर...
किसी के पैरों की आवाज़ आई।
छप... छप... छप...
जैसे कोई पानी में चल रहा हो।
आवाज़ धीरे-धीरे उसकी तरफ़ आ रही थी।
फ़िरोज़ पीछे हटता गया।
छप... छप... छप...
फिर आवाज़ बिल्कुल उसके सामने आकर रुक गई।
खामोशी।
फ़िरोज़ ने आँखें बंद कर लीं।
और तभी उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—
“अब पीछे मत देखना...”
फ़िरोज़ ने डर के मारे आँखें खोल दीं।
सामने कोई नहीं था।
लेकिन गलियारे के आख़िरी छोर पर दीवार पर लगी घड़ी चलने लगी थी।
टिक...
टिक...
टिक...
उसकी सुइयाँ तेजी से घूमीं।
2:48...
2:49...
2:50...
और अचानक—
3:00 AM.
हवेली के अंदर किसी ने जोरदार चीख मारी।
इतनी भयानक कि पूरी इमारत काँप उठी।
फ़िरोज़ ने दोनों कान बंद कर लिए।
चीख के बीच उसे कई आवाज़ें सुनाई दीं।
औरतें।
बच्चे।
बूढ़े।
सब एक साथ चिल्ला रहे थे—
“वो जाग गई...”
फिर सब शांत हो गया।
फ़िरोज़ ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
सामने वही काला दरवाज़ा खुला था।
लेकिन अब उसके अंदर अंधेरा नहीं था।
वहाँ एक लंबा कमरा था।
कमरे के बीच एक पुरानी कुर्सी।
और कुर्सी पर—
एक आदमी बैठा था।
उसकी पीठ फ़िरोज़ की तरफ़ थी।
फ़िरोज़ ने काँपती आवाज़ में पूछा—
“कौन हो तुम?”
कुर्सी पर बैठा आदमी धीरे-धीरे खड़ा हुआ।
उसने सिर घुमाया।
और फ़िरोज़ की आँखें डर से जम गईं।
वह आदमी भी—
फ़िरोज़ सैफ़ी ही था।
लेकिन उससे लगभग 39 साल बड़ा।
उसके चेहरे पर गहरे घाव थे।
आँखें पूरी तरह काली थीं।
और उसके हाथ में वही पुरानी डायरी थी।
उसने डायरी फ़िरोज़ की तरफ़ बढ़ाई और कहा—
“अगर तुम यहाँ तक पहुँच गए हो... तो अब मेरी मौत को कोई नहीं रोक सकता।”
फ़िरोज़ पीछे हटने लगा।
“तुम कौन हो?”
वह आदमी मुस्कुराया।
“मैं?”
उसने अपने चेहरे पर हाथ फेरा।
त्वचा के नीचे कुछ हिलने लगा।
उसकी आवाज़ अचानक बदल गई।
औरत जैसी।
फिर बच्चे जैसी।
फिर बूढ़े जैसी।
और अंत में वही आवाज़ बनी—
फ़िरोज़ की अपनी आवाज़।
“मैं वो हूँ... जो तुम्हारे मरने के बाद पैदा होगा।”
अचानक दरवाज़ा ज़ोर से बंद हुआ।
धड़ाम!
और हवेली के बाहर खड़ी फ़िरोज़ की कार की हेडलाइट अपने आप जल उठी।
लेकिन कार के अंदर—
कोई और बैठा था।
एक और फ़िरोज़।
जो शीशे के पीछे से हवेली की तरफ़ देख रहा था।
और मुस्कुरा रहा था।
एपिसोड 1 समाप्त।

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