PretikaGhost Storiesजिस रात मौत जागी

एपिसोड 16 — “जिस घर में कोई पैदा नहीं हुआ”

firoj saifi · Ghost Stories · 8 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
जिस रात मौत जागी
Chapter
16 of 17
Category
Ghost Stories
Reading time
8 min
Words
1596
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

“अब्बा… अपने असली घर में आपका स्वागत है।”

आवाज़ इतनी धीमी थी कि फ़िरोज़ को लगा जैसे किसी ने उसके कान के अंदर बोल दिया हो।

वह तुरंत पीछे मुड़ा।

कोई नहीं था।

सिर्फ़ वही बंद दरवाज़ा।

वही कमरा।

वही टूटी हुई काली घड़ी।

और फ़र्श पर फैली सलीमा की राख।

फ़िरोज़ ने काँपते हाथ से अपने सीने को छुआ।

कुछ देर पहले वहाँ चार शब्द लिखे थे—

जन्म: 8 सितंबर 2026
पिता: सलीम सैफ़ी
माँ: मृत्यु

अब आख़िरी शब्द गायब था।

उसकी जगह सिर्फ़ एक काली लकीर थी।

और उस लकीर के नीचे एक नया शब्द उभर रहा था—

“घर।”

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

“नहीं…”

दीवार के दूसरी तरफ़ से किसी बच्चे की हँसी सुनाई दी।

“अब्बा…”

फ़िरोज़ ने आँखें बंद कर लीं।

“मैं तुम्हारा अब्बा नहीं हूँ।”

हँसी बंद हो गई।

फिर कुछ सेकंड तक पूरा कमरा शांत रहा।

और अचानक—

ठक।

दीवार पर दस्तक हुई।

फ़िरोज़ ने देखा।

जहाँ कुछ नहीं था, वहाँ अब एक दरवाज़ा बन चुका था।

काला।

बिल्कुल वैसा ही जैसा हवेली में पहली बार देखा था।

लेकिन इस दरवाज़े पर लाल आँख का निशान नहीं था।

उस पर एक छोटा-सा सफ़ेद हाथ बना था।

बच्चे का हाथ।

फ़िरोज़ ने दरवाज़े को छुआ।

दरवाज़ा खुद खुल गया।

अंदर एक लंबा गलियारा था।

दोनों तरफ़ पुराने दरवाज़े।

हर दरवाज़े पर एक तारीख़ लिखी थी।

1939

1978

1987

2026

और सबसे आख़िरी दरवाज़े पर—

204?

आख़िरी अंक मिटा हुआ था।

फ़िरोज़ धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

पहले दरवाज़े के पीछे से रोने की आवाज़ आई।

दूसरे से किसी औरत की प्रार्थना।

तीसरे से सलीम की आवाज़—

“फ़िरोज़, पीछे मत देखना।”

फ़िरोज़ रुक गया।

यह वही आवाज़ थी।

वही आवाज़ जो बचपन की उस रात उसने सुनी थी।

लेकिन इस बार आवाज़ दरवाज़े के पीछे से नहीं…

उसके ठीक पीछे से आई।

“पीछे मत देखना।”

फ़िरोज़ की आँखों में आँसू आ गए।

“अब्बा…”

उसने खुद को रोक लिया।

“नहीं।”

वह आगे बढ़ गया।

पीछे से सलीम की आवाज़ फिर आई।

“अच्छा किया।”

फ़िरोज़ रुक गया।

“क्या?”

“इस बार तुमने पीछे नहीं देखा।”

फ़िरोज़ धीरे से मुस्कुराया।

“क्योंकि अब मुझे पता है कि आप मेरे अब्बा नहीं हैं।”

कुछ पल सन्नाटा रहा।

फिर सलीम की आवाज़ आई—

“गलत।”

फ़िरोज़ की मुस्कान गायब हो गई।

“तुम्हें अब भी नहीं समझ आया।”

“क्या?”

“मैं तुम्हारा अब्बा हूँ।”

“और फिर भी तुम मेरे अब्बा नहीं हो।”

आवाज़ चुप हो गई।

फ़िरोज़ आगे बढ़ता रहा।

तभी उसे महसूस हुआ कि गलियारा छोटा नहीं हो रहा था।

बल्कि…

लंबा होता जा रहा था।

जितना वह चलता, उतना ही रास्ता आगे बढ़ता।

उसने पीछे देखा।

गलियारा अब दिखाई ही नहीं दे रहा था।

सिर्फ़ सफ़ेद धुंध।

फ़िरोज़ ने अपनी जेब टटोली।

उसे वही पुरानी चाबी मिली।

जो उसे हवेली में पहली रात लकड़ी के बक्से में मिली थी।

चाबी पर अब नया निशान बना था।

कमरा 0

फ़िरोज़ ने सामने देखा।

एक दरवाज़े पर लिखा था—

ROOM 0

उसने चाबी लगाई।

ताला खुल गया।

दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

अंदर…

एक कमरा नहीं था।

एक पूरा घर था।

एक ऐसा घर जो हवेली के अंदर होना ही नहीं चाहिए था।

छोटा-सा आँगन।

रसोई।

बैठक।

सीढ़ियाँ।

दीवारों पर तस्वीरें।

और हर तस्वीर में—

फ़िरोज़।

लेकिन अलग-अलग उम्र में।

कहीं वह पाँच साल का था।

कहीं दस।

कहीं बीस।

कहीं चालीस।

कहीं बूढ़ा।

एक तस्वीर में वह अपनी गोद में एक बच्चा लिए खड़ा था।

फ़िरोज़ तस्वीर के सामने जाकर रुक गया।

बच्चे का चेहरा साफ़ नहीं था।

उसके चेहरे पर काली परछाईं थी।

तस्वीर के नीचे लिखा था—

“पहला पिता।”

फ़िरोज़ ने तस्वीर उतार ली।

पीछे एक तारीख़ थी—

8 सितंबर 1939।

उसके हाथ काँपने लगे।

“1939…”

वही साल।

जिस साल ज़ोया की कहानी शुरू हुई थी।

तभी ऊपर से किसी के कदमों की आवाज़ आई।

कोई सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था।

एक कदम।

फिर दूसरा।

फिर तीसरा।

फ़िरोज़ ने कमरे के बीच में खड़े होकर इंतज़ार किया।

सीढ़ियों से एक आदमी नीचे आया।

सफ़ेद कुर्ता।

काली पगड़ी।

चेहरा झुका हुआ।

फ़िरोज़ की साँस रुक गई।

“हामिद?”

आदमी ने सिर उठाया।

चेहरा हामिद का नहीं था।

सलीम का था।

लेकिन इस बार उसकी आँखें इंसानी थीं।

सलीम ने कहा—

“तुम बहुत देर से आए हो।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“ये जगह क्या है?”

“तुम्हारा घर।”

“मैं यहाँ कभी नहीं रहा।”

“तुम रहे हो।”

“कब?”

सलीम ने दीवार की तस्वीरों की तरफ़ देखा।

“हर बार।”

फ़िरोज़ चौंक गया।

“हर बार?”

“हर 39 साल में।”

सलीम ने एक तस्वीर की तरफ़ इशारा किया।

“1939।”

दूसरी।

“1978।”

तीसरी।

“1987।”

फिर चौथी।

“2026।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“लेकिन 1978 में मैं कहाँ था?”

सलीम ने कहा—

“तुम थे।”

“नहीं।”

“तुम्हारा शरीर था।”

“तो मेरा नाम?”

सलीम चुप हो गया।

फ़िरोज़ आगे बढ़ा।

“मेरा नाम क्या था?”

सलीम ने उसकी आँखों में देखा।

“हर बार अलग।”

“और इस बार?”

सलीम ने जवाब दिया—

“इस बार नाम तय नहीं हुआ।”

फ़िरोज़ के चेहरे पर डर उतर आया।

“क्यों?”

“क्योंकि पहली बार…”

सलीम की आवाज़ काँप गई।

“मौत ने अपना नाम खुद चुनने से इंकार कर दिया।”

अचानक ऊपर से एक बच्चा दौड़ता हुआ नीचे आया।

वही बच्चा।

काली आँखें।

फ़िरोज़ जैसा चेहरा।

बच्चा सीधे फ़िरोज़ के सामने आकर खड़ा हो गया।

“तुम फिर आ गए।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“तुम कौन हो?”

बच्चे ने कहा—

“तुम।”

“मेरा नाम?”

बच्चा मुस्कुराया।

“यही तो तुम्हें पता करना है।”

“और तुम मुझे अब्बा क्यों कहते हो?”

बच्चे की मुस्कान गायब हो गई।

“क्योंकि तुमने मुझे पैदा किया था।”

“मैंने?”

“हाँ।”

“कब?”

बच्चे ने नीचे फ़र्श की तरफ़ देखा।

“जिस रात तुमने पहली बार मरना सीखा था।”

फ़िरोज़ के दिमाग़ में एक ज़ोरदार आवाज़ हुई।

जैसे कोई पुराना ताला टूट गया हो।

उसकी आँखों के सामने दृश्य आने लगे।

एक छोटा बच्चा।

अँधेरा कमरा।

सलीमा रो रही है।

सलीम दरवाज़े पर खड़ा है।

और बीच में…

फ़िरोज़ का एक पुराना शरीर।

वह शरीर मर चुका है।

लेकिन उसकी परछाईं ज़िंदा है।

छोटी परछाईं धीरे-धीरे उठती है।

और छह साल का फ़िरोज़ उसे देखकर कहता है—

“तुम कौन हो?”

परछाईं जवाब देती है—

“मैं तुम्हारी मौत हूँ।”

फिर बच्चा पूछता है—

“और अगर मैं तुम्हें मार दूँ?”

परछाईं हँसती है।

“तो तुम पैदा हो जाओगे।”

दृश्य टूट गया।

फ़िरोज़ ज़मीन पर गिर पड़ा।

सलीम उसके पास आया।

“अब याद आया?”

फ़िरोज़ ने सिर उठाया।

“मैंने…”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“मैंने अपनी मौत को मारा था?”

सलीम ने कहा—

“नहीं।”

“तो?”

“तुमने उसे अपने अंदर रख लिया था।”

फ़िरोज़ ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

अंदर से धड़कन सुनाई दी।

लेकिन इस बार वह अकेली नहीं थी।

दो धड़कनें।

एक साथ।

धक… धक…

धक… धक…

बच्चा उसके पास आया।

उसने फ़िरोज़ का हाथ पकड़ा।

“अब मुझे बाहर आने दो।”

फ़िरोज़ ने हाथ झटक दिया।

“नहीं!”

बच्चे की आँखें काली हो गईं।

“अगर मैं बाहर नहीं आया…”

उसने मुस्कुराकर कहा—

“तो तुम अंदर चले जाओगे।”

अचानक पूरा घर काँप उठा।

दीवारों पर लगी सारी तस्वीरें गिर गईं।

सलीम ने घबराकर ऊपर देखा।

“वह आ गया।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“कौन?”

सलीम ने जवाब नहीं दिया।

घर की सारी बत्तियाँ एक साथ बुझ गईं।

अँधेरे में किसी औरत की आवाज़ आई—

“फ़िरोज़…”

फ़िरोज़ ने पहचान लिया।

नूर।

“नूर?”

“तुम्हें घर याद है?”

“कौन-सा घर?”

“वही… जहाँ तुमने मुझे पहली बार छोड़ा था।”

फ़िरोज़ के चेहरे पर उलझन थी।

“मैंने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”

नूर की आवाज़ काँप गई।

“तुमने छोड़ा था।”

“कब?”

“1987 में।”

“लेकिन तुम…”

फ़िरोज़ रुक गया।

उसे याद आया—

नूर मरी नहीं थी।

या शायद…

नूर कभी इंसान थी ही नहीं।

अँधेरे में नूर ने कहा—

“तुम्हें लगता है मैंने तुम्हें बचाया था?”

फ़िरोज़ ने धीरे से कहा—

“हाँ।”

“नहीं।”

कमरे की छत से काला पानी टपकने लगा।

“मैंने तुम्हें बचाया नहीं था…”

नूर की आवाज़ अब उसके बिल्कुल पास थी।

“मैंने तुम्हें चुना था।”

फ़िरोज़ ने पलटकर देखा।

नूर उसके सामने खड़ी थी।

चेहरा शांत।

आँखों में आँसू।

और उसके हाथ में…

फ़िरोज़ की बचपन वाली तस्वीर।

नूर ने तस्वीर उसकी तरफ़ बढ़ाई।

“देखो।”

फ़िरोज़ ने तस्वीर ली।

तस्वीर में छोटा फ़िरोज़ खड़ा था।

उसके बगल में सलीम।

सलीमा।

और नूर।

लेकिन इस बार तस्वीर में एक चीज़ अलग थी।

फ़िरोज़ की परछाईं नहीं थी।

नूर की भी परछाईं नहीं थी।

सिर्फ़ सलीम की परछाईं थी।

और वह परछाईं…

फ़िरोज़ की तरफ़ हाथ बढ़ा रही थी।

नूर ने कहा—

“अब समझे?”

फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

नूर रो पड़ी।

“तुम्हारे अब्बा सलीम नहीं थे।”

“तो कौन थे?”

नूर ने धीरे से जवाब दिया—

“तुम्हारे अब्बा… तुम खुद थे।”

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

“ये कैसे हो सकता है?”

नूर ने उसकी तरफ़ देखा।

“क्योंकि तुम समय में पैदा नहीं हुए।”

वह एक कदम आगे आई।

“तुम समय से पहले पैदा हुए थे।”

सलीम अचानक चिल्लाया—

“नूर! बस करो!”

नूर ने उसकी तरफ़ देखा।

“अब सच छुपाने से क्या होगा, सलीम?”

सलीम ने आँखें बंद कर लीं।

नूर ने फ़िरोज़ से कहा—

“तुम्हारा पहला जन्म 1939 में हुआ था।”

फ़िरोज़ की साँस अटक गई।

“और तुम्हारा आख़िरी जन्म…”

उसने काली घड़ी की तरफ़ देखा।

घड़ी अपने आप चलने लगी।

2:47

2:48

2:49

नूर ने कहा—

“आज रात होना है।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“और उसके बाद?”

नूर ने उसकी आँखों में देखा।

“उसके बाद…”

एक पल के लिए वह मुस्कुराई।

“तुम्हारा बेटा पैदा होगा।”

फ़िरोज़ का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

पीछे खड़ा काला बच्चा धीरे-धीरे मुस्कुराने लगा।

और पहली बार…

उसने फ़िरोज़ को “अब्बा” नहीं कहा।

उसने कहा—

“अब मेरी बारी है।”

उसी क्षण घर की दीवार पर एक नया दरवाज़ा उभरा।

दरवाज़े पर सिर्फ़ एक तारीख़ लिखी थी—

8 सितंबर 2065

फ़िरोज़ ने काँपते हुए पूछा—

“ये तारीख़ क्यों?”

सलीम ने उसकी तरफ़ देखा।

उसकी आँखों में पहली बार असली डर था।

“क्योंकि…”

वह पीछे हट गया।

“अगर तुम आज रात मर गए…”

काली घड़ी की सुई रुक गई।

2:50।

और घर के अंदर सैकड़ों बच्चों की आवाज़ एक साथ गूँजी—

“तो अगला फ़िरोज़… तुम्हारा बेटा होगा।”

एपिसोड 16 समाप्त।

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