PretikaGhost Storiesजिस रात मौत जागी

एपिसोड 17 — “फ़िरोज़ का बेटा”

firoj saifi · Ghost Stories · 12 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
जिस रात मौत जागी
Chapter
17 of 17
Category
Ghost Stories
Reading time
12 min
Words
2265
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

“तो अगला फ़िरोज़… तुम्हारा बेटा होगा।”

सलीम की यह बात सुनकर फ़िरोज़ कुछ सेकंड तक बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा।

उसके सामने वही पुराना घर था, जो हवेली के भीतर मौजूद था और फिर भी हवेली का हिस्सा नहीं था।

पीली रोशनी।

पुरानी लकड़ी की मेज़।

दीवार पर टंगी अनगिनत तस्वीरें।

और उन तस्वीरों में…

हर उम्र का फ़िरोज़।

बचपन का फ़िरोज़।

किशोर फ़िरोज़।

जवान फ़िरोज़।

बूढ़ा फ़िरोज़।

और कुछ तस्वीरों में…

ऐसे फ़िरोज़, जिन्हें उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी देखा ही नहीं था।

लेकिन इस वक्त उसकी नज़र सिर्फ़ एक तस्वीर पर थी।

एक आदमी अपनी गोद में बच्चे को लिए खड़ा था।

आदमी का चेहरा फ़िरोज़ का था।

बच्चे का चेहरा भी फ़िरोज़ का था।

तस्वीर के नीचे लिखा था—

“पिता और पुत्र — 8 सितंबर 2065।”

फ़िरोज़ ने तस्वीर दीवार से उतार ली।

“ये तारीख़…”

सलीम ने धीमे से कहा—

“भविष्य।”

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ़ देखा।

“और ये बच्चा?”

“तुम्हारा बेटा।”

“मेरा कोई बेटा नहीं है।”

“अभी नहीं।”

फ़िरोज़ ने तस्वीर फाड़ने के लिए दोनों हाथ लगाए।

लेकिन जैसे ही उसने तस्वीर को खींचा—

उसमें मौजूद बच्चे ने आँखें खोल दीं।

फ़िरोज़ के हाथ रुक गए।

तस्वीर के अंदर का बच्चा सीधे उसकी तरफ़ देख रहा था।

और फिर तस्वीर के अंदर ही उसके होंठ हिले।

“अब्बा।”

फ़िरोज़ ने तस्वीर हाथ से गिरा दी।

तस्वीर फ़र्श पर गिरी।

लेकिन बच्चा अब भी बोल रहा था।

“अब्बा…”

आवाज़ तस्वीर से नहीं आ रही थी।

आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी।

“अब्बा…”

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

“बंद करो।”

“अब्बा…”

“मैं तुम्हारा अब्बा नहीं हूँ।”

आवाज़ अचानक रुक गई।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

फिर सलीम ने कहा—

“यही गलती तुम्हारे हर जन्म ने की थी।”

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ़ देखा।

“हर जन्म?”

“हाँ।”

“कितने?”

सलीम ने जवाब नहीं दिया।

“कितने, अब्बा?”

सलीम का चेहरा बदल गया।

फ़िरोज़ को पहली बार उसके चेहरे पर डर दिखाई दिया।

“ग्यारह।”

फ़िरोज़ की साँस अटक गई।

“ग्यारह?”

“हाँ।”

“मेरे?”

सलीम ने सिर हिलाया।

“तुम्हारे ग्यारह शरीर।”

फ़िरोज़ ने कमरे की दीवारों पर तस्वीरें देखीं।

अब उसे समझ आ रहा था कि इतने चेहरे क्यों थे।

क्यों हर तस्वीर में वह अलग उम्र का था।

क्यों हर बार उसकी परछाईं अलग थी।

क्यों हर बार उसकी कहानी अधूरी थी।

“और ये सब…”

उसने तस्वीरों की तरफ़ इशारा किया।

“ये सब मैं था?”

सलीम ने कहा—

“नहीं।”

“तो?”

“ये सब तुम्हें बनाने की कोशिशें थीं।”

फ़िरोज़ के हाथ ठंडे पड़ गए।

“किसने?”

सलीम चुप रहा।

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ़ कदम बढ़ाया।

“किसने?”

“तुमने।”

“मैंने?”

“हाँ।”

फ़िरोज़ हँस पड़ा।

“मैंने अपने ही शरीर बनाए?”

“तुम्हें याद नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि हर बार यादें मिटा दी जाती थीं।”

“किसने मिटाईं?”

सलीम ने जवाब दिया—

“तुम्हारी माँ ने।”

फ़िरोज़ का चेहरा कठोर हो गया।

“कौन-सी माँ?”

सलीम ने आँखें झुका लीं।

“यही तो समस्या है।”

1939

हवा अचानक ठंडी हो गई।

कमरे की दीवारें धुँधली होने लगीं।

फ़िरोज़ के सामने दृश्य बदल गया।

अब वह उसी घर में था…

लेकिन 1939 में।

हवेली नई थी।

आँगन में लालटेन जल रही थीं।

बारिश हो रही थी।

और एक जवान औरत आँगन के बीच बैठी रो रही थी।

ज़ोया।

उसकी गोद में एक नवजात बच्चा था।

बच्चा बिल्कुल शांत था।

ज़ोया उसे लगातार हिला रही थी।

“रोओ…”

उसने बच्चे से कहा।

“रोओ बेटा…”

बच्चा नहीं रोया।

ज़ोया ने उसकी नाक के पास उँगली रखी।

साँस चल रही थी।

लेकिन बहुत धीमी।

तभी दरवाज़ा खुला।

एक जवान आदमी अंदर आया।

हामिद।

“ज़ोया।”

ज़ोया ने उसकी तरफ़ देखा।

“डॉक्टर ने क्या कहा?”

हामिद कुछ पल चुप रहा।

“बच्चा ज़िंदा है।”

ज़ोया की आँखों में उम्मीद आई।

“तो?”

“लेकिन…”

हामिद रुक गया।

“उसकी परछाईं नहीं है।”

ज़ोया का चेहरा सफ़ेद हो गया।

“परछाईं?”

हामिद ने बच्चे को देखा।

दीये की रोशनी बच्चे के चेहरे पर पड़ रही थी।

लेकिन ज़मीन पर…

कुछ नहीं था।

ज़ोया ने बच्चे को सीने से लगा लिया।

“तो क्या हुआ?”

हामिद ने कहा—

“हर इंसान की परछाईं होती है।”

“मेरा बच्चा इंसान है।”

“अभी नहीं।”

ज़ोया ने उसे घूरकर देखा।

“क्या मतलब?”

हामिद ने धीमे से कहा—

“वह या तो इंसान बनेगा…”

वह बच्चे से दूर हट गया।

“या फिर इंसानों की मौत।”

ज़ोया ने बच्चे को और कसकर पकड़ लिया।

“मैं उसे मरने नहीं दूँगी।”

हामिद बोला—

“उसे मारना नहीं है।”

“तो?”

“उसे किसी और के अंदर रखना होगा।”

तभी दरवाज़े के बाहर कदमों की आवाज़ आई।

जवान सलीमा अंदर आई।

उसने बच्चे को देखा।

फिर उसकी नज़र फ़र्श पर गई।

परछाईं नहीं थी।

सलीमा ने फुसफुसाकर कहा—

“ये वही है।”

हामिद ने पूछा—

“तुम इसे पहचानती हो?”

सलीमा ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“कहाँ से?”

सलीमा की आँखों में डर उतर आया।

“सपने में।”

“क्या देखा था?”

सलीमा ने बच्चे की तरफ़ देखा।

“मैंने इसे देखा था…”

उसने काँपते हुए कहा—

“जब ये पैदा भी नहीं हुआ था।”

दृश्य टूट गया।

फ़िरोज़ ने आँखें खोलीं।

उसका सिर दर्द से फट रहा था।

“ये सब मुझे क्यों दिखा रहे हो?”

सलीम ने कहा—

“क्योंकि अब समय कम है।”

“कितना?”

सलीम ने दीवार की घड़ी देखी।

2:32।

“अट्ठाईस मिनट।”

फ़िरोज़ चौंका।

“किसके लिए?”

“तुम्हारे बेटे के जन्म के लिए।”

“मेरा कोई बेटा नहीं है!”

“है।”

“कहाँ?”

सलीम ने फ़िरोज़ के सीने की तरफ़ देखा।

“तुम्हारे अंदर।”

फ़िरोज़ ने अपनी छाती पकड़ ली।

“नहीं…”

उसे अचानक अंदर से हल्की-सी हलचल महसूस हुई।

जैसे किसी बच्चे ने पेट के अंदर हाथ मारा हो।

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

“ये क्या है?”

नूर ने धीमे से कहा—

“वही जिसे तुम सालों से अपनी बेचैनी समझते रहे।”

“नूर?”

“हाँ।”

“तुम्हें पता था?”

नूर ने आँखें झुका लीं।

“मुझे सब पता था।”

“तो तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”

“क्योंकि अगर तुम जान जाते…”

“तो?”

“तुम अपने ही बच्चे से डरने लगते।”

फ़िरोज़ ने कड़वी हँसी हँसी।

“अब डरना चाहिए?”

नूर ने उसकी तरफ़ देखा।

“हाँ।”

कमरा 13

अचानक घर के दूसरे हिस्से से तेज़ आवाज़ आई।

धड़ाम!

सलीम ने कहा—

“वह दरवाज़ा खुल गया।”

“कौन-सा?”

“कमरा 13।”

“वहाँ क्या है?”

सलीम ने कहा—

“तुम्हारी पहली गलती।”

फ़िरोज़ बिना कुछ कहे उस तरफ़ बढ़ गया।

सलीम ने उसे रोकने की कोशिश की।

“नहीं!”

फ़िरोज़ ने हाथ छुड़ा लिया।

“अब कोई मुझे नहीं रोकेगा।”

गलियारे के अंत में एक लोहे का दरवाज़ा था।

उस पर खरोंचों से लिखा था—

कमरा 13 में जाने वाला अपने बच्चे को देखेगा।

फ़िरोज़ ने दरवाज़ा खोला।

अंदर एक छोटा-सा कमरा था।

बीच में लकड़ी का पालना।

पालने के ऊपर एक मोबाइल लटका था।

उसमें छोटे-छोटे काले चाँद बने थे।

पालना धीरे-धीरे हिल रहा था।

फ़िरोज़ ने कदम बढ़ाया।

“कोई है?”

कोई जवाब नहीं।

वह पालने के पास पहुँचा।

अंदर एक बच्चा था।

बहुत छोटा।

नवजात।

फ़िरोज़ झुक गया।

बच्चे की आँखें बंद थीं।

फ़िरोज़ ने धीरे से उसका हाथ छुआ।

बच्चे ने उसकी उँगली पकड़ ली।

और उसी पल—

फ़िरोज़ के सामने पूरा दृश्य बदल गया।

2026 — कुछ मिनट बाद

एक अस्पताल का कमरा।

सफ़ेद दीवारें।

मशीनों की आवाज़।

एक औरत दर्द से कराह रही है।

फ़िरोज़ कमरे के बाहर खड़ा है।

अंदर डॉक्टर चिल्ला रहे हैं—

“जल्दी करो!”

एक नर्स बाहर आती है।

“आप पिता हैं?”

फ़िरोज़ कुछ बोल नहीं पाता।

नर्स मुस्कुराती है।

“बधाई हो।”

“बच्चा?”

“लड़का।”

फ़िरोज़ की आँखों से आँसू निकल आते हैं।

वह कमरे में जाता है।

बिस्तर पर कोई औरत पड़ी है।

उसका चेहरा दिखाई नहीं देता।

फ़िरोज़ बच्चे को देखता है।

बच्चा आँखें खोलता है।

काली आँखें।

फ़िरोज़ उसे गोद में उठाता है।

“मेरा बेटा…”

बच्चा मुस्कुराता है।

“अब्बा…”

फ़िरोज़ रो पड़ता है।

“हाँ…”

फिर उसे अचानक कुछ दिखाई देता है।

बच्चे की परछाईं नहीं है।

फ़िरोज़ का चेहरा बदल जाता है।

कमरे की सारी मशीनें बंद हो जाती हैं।

और बिस्तर पर पड़ी औरत धीरे-धीरे उठती है।

फ़िरोज़ पीछे हटता है।

“तुम…”

औरत अपना चेहरा उठाती है।

सलीमा।

लेकिन वह बूढ़ी नहीं है।

वह वैसी ही जवान है जैसी 1987 में थी।

वह मुस्कुराती है।

“बधाई हो, बेटा।”

फ़िरोज़ पीछे हटता है।

“तुम मर चुकी हो।”

“मौत मुझे नहीं ले सकती।”

“ये बच्चा कौन है?”

सलीमा ने बच्चे की तरफ़ देखा।

“तुम्हारा बेटा।”

“इसकी माँ कौन है?”

सलीमा मुस्कुराई।

“तुम।”

फ़िरोज़ चौंका।

“मैं?”

“हाँ।”

“ये कैसे?”

सलीमा ने धीरे से कहा—

“तुमने इसे अपने शरीर से नहीं…”

वह फ़िरोज़ के सीने की तरफ़ इशारा करती है।

“अपनी मौत से पैदा किया है।”

अचानक बच्चा रोने लगता है।

उसका रोना धीरे-धीरे एक चीख में बदल जाता है।

फ़िरोज़ बच्चे को नीचे रखना चाहता है।

लेकिन उसकी उँगलियाँ बच्चे के हाथ में फँस जाती हैं।

सलीमा पीछे हटती है।

“अब इसे मत छोड़ना।”

“क्यों?”

“क्योंकि अगर तुमने इसे छोड़ दिया…”

सलीमा की आँखों में डर उतर आता है।

“तो ये तुम्हें छोड़ देगा।”

दृश्य टूट गया।

फ़िरोज़ ज़मीन पर गिर पड़ा।

नूर उसके पास आई।

“फ़िरोज़!”

उसने आँखें खोलीं।

“वो बच्चा…”

नूर ने कहा—

“क्या देखा?”

“मेरा बेटा।”

सलीम ने पूछा—

“कैसा था?”

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ़ देखा।

“उसकी परछाईं नहीं थी।”

सलीम ने आँखें बंद कर लीं।

“तो समय शुरू हो चुका है।”

“कौन-सा समय?”

“जिसे हम रोक नहीं पाए।”

2:40

घड़ी की सुई आगे बढ़ी।

फ़िरोज़ का शरीर काँपने लगा।

उसके सीने के अंदर से बच्चे के रोने की आवाज़ आने लगी।

धीरे-धीरे।

फिर तेज़।

फिर बहुत तेज़।

“इसे रोकिए!”

फ़िरोज़ चिल्लाया।

सलीम ने कहा—

“मैं नहीं रोक सकता।”

“नूर!”

“मैं भी नहीं।”

“तो कौन रोक सकता है?”

दोनों चुप रहे।

फ़िरोज़ समझ गया।

“मैं।”

सलीम ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“कैसे?”

“उसे जन्म मत लेने दो।”

फ़िरोज़ के चेहरे पर डर उतर आया।

“वो मेरा बच्चा है।”

“वही समस्या है।”

“मैं अपने बच्चे को नहीं मारूँगा।”

सलीम ने कहा—

“मैंने भी यही कहा था।”

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ़ देखा।

“फिर?”

“फिर मैंने तुम्हें बचाने के लिए…”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“तुम्हारे दूसरे शरीर को मार दिया।”

फ़िरोज़ कुछ बोल नहीं पाया।

सलीम की आँखों से आँसू बह निकले।

“उस रात मैं तुम्हारा पिता नहीं रहा।”

“तो क्या बने?”

“तुम्हारी मौत।”

2:44

घर की दीवारें हिलने लगीं।

सभी तस्वीरें अपने आप गिरने लगीं।

एक तस्वीर फ़िरोज़ के पैरों के पास आकर रुकी।

उसने उसे उठाया।

तस्वीर में सलीम था।

उसकी गोद में एक बच्चा था।

पीछे सलीमा खड़ी थी।

लेकिन बच्चे के चेहरे पर काला धब्बा था।

फ़िरोज़ ने तस्वीर पलटी।

पीछे सिर्फ़ चार शब्द लिखे थे—

“पिता ने बेटा चुना।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“इसका मतलब?”

नूर ने कहा—

“तुम्हारे अब्बा को एक चुनाव करना पड़ा था।”

“क्या?”

“तुम्हें बचाना…”

वह रुक गई।

“या तुम्हें पैदा होने देना।”

फ़िरोज़ ने सलीम की तरफ़ देखा।

“आपने क्या चुना?”

सलीम ने कहा—

“तुम्हें।”

“और उसके बदले?”

सलीम की आँखें बंद हो गईं।

“तुम्हारी जगह मैंने अपनी मौत दे दी।”

“लेकिन मैं तो ज़िंदा हूँ।”

“यही तो कीमत थी।”

फ़िरोज़ समझ नहीं पाया।

सलीम ने धीरे से कहा—

“तुम्हें ज़िंदा रखने के लिए…”

उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“मैंने तुम्हारी मौत अपने अंदर ले ली।”

फ़िरोज़ की आँखें भर आईं।

“तो फिर आप मेरे अब्बा थे।”

सलीम मुस्कुराया।

“हाँ।”

“और आपने मुझे क्यों छोड़ा?”

सलीम ने कहा—

“क्योंकि अगर मैं तुम्हारे पास रहता…”

वह रो पड़ा।

“तो वह तुम्हें ढूँढ लेता।”

“कौन?”

सलीम ने ऊपर देखा।

छत के अँधेरे में एक विशाल परछाईं बन रही थी।

“मौत।”

2:47

काली घड़ी फिर रुक गई।

लेकिन इस बार…

सिर्फ़ हवेली की घड़ी नहीं।

फ़िरोज़ की धड़कन भी रुक गई।

एक सेकंड।

दो सेकंड।

तीन सेकंड।

नूर चिल्लाई—

“फ़िरोज़!”

फिर उसका दिल अचानक ज़ोर से धड़का।

धक!

और उसी के साथ…

उसके सीने पर एक छोटी-सी हथेली की आकृति उभर आई।

अंदर से बच्चे की आवाज़ आई—

“अब्बा…”

फ़िरोज़ ने आँखें खोल दीं।

उसके सामने सलीम खड़ा था।

लेकिन अब सलीम का चेहरा बदल चुका था।

वह बूढ़ा नहीं था।

वह जवान था।

ठीक वैसा…

जैसा फ़िरोज़ ने उसे अपनी बचपन की तस्वीरों में देखा था।

सलीम ने मुस्कुराकर कहा—

“बेटा…”

फ़िरोज़ की आँखों में आँसू आ गए।

“अब्बा…”

सलीम ने हाथ बढ़ाया।

“घर चलो।”

फ़िरोज़ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

लेकिन जैसे ही उसने हाथ पकड़ा—

सलीम का शरीर धुएँ में बदलने लगा।

फ़िरोज़ चिल्लाया—

“अब्बा!”

सलीम की आवाज़ दूर होती गई।

“याद रखना…”

“क्या?”

“जिसे तुम अपना बेटा समझ रहे हो…”

आवाज़ टूट गई।

“वह तुम्हारा बेटा नहीं है।”

फ़िरोज़ जम गया।

“तो कौन है?”

अँधेरे से जवाब आया—

“वह तुम्हारा पिता है।”

फ़िरोज़ ने पीछे देखा।

पालना अपने आप हिल रहा था।

बच्चा उसमें बैठा था।

लेकिन अब वह नवजात नहीं था।

वह पाँच साल का हो चुका था।

उसने फ़िरोज़ की तरफ़ देखा।

“अब्बा…”

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

बच्चा मुस्कुराया।

“मैं तुम्हें लेने आया हूँ।”

“कहाँ?”

बच्चे ने दरवाज़े की तरफ़ इशारा किया।

वहाँ एक नया दरवाज़ा बन चुका था।

उस पर लिखा था—

“पहला घर — 1939”

फ़िरोज़ ने दरवाज़ा देखा।

फिर बच्चे को।

फिर नूर को।

नूर ने सिर हिलाया।

“मत जाना।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“क्यों?”

नूर की आँखों से आँसू निकल आए।

“क्योंकि उस दरवाज़े के पीछे…”

वह रुक गई।

“तुम्हारे असली पिता इंतज़ार कर रहे हैं।”

फ़िरोज़ ने धीरे से पूछा—

“कौन?”

नूर ने जवाब दिया—

“जिसने मौत को पहली बार जन्म दिया था।”

दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

अंदर से एक बूढ़ी आवाज़ आई—

“फ़िरोज़…”

फिर वही आवाज़ हँसी।

“या मुझे तुम्हें किसी और नाम से बुलाना चाहिए?”

फ़िरोज़ ने कदम आगे बढ़ाया।

अंदर अँधेरा था।

फिर अँधेरे में दो आँखें खुलीं।

और एक चेहरा दिखाई दिया।

फ़िरोज़ के हाथ से तस्वीर गिर गई।

क्योंकि सामने खड़ा आदमी…

सलीम नहीं था।

हामिद नहीं था।

अरिफ़ नहीं था।

वह…

खुद फ़िरोज़ था।

लेकिन बूढ़ा।

बहुत बूढ़ा।

उसने मुस्कुराकर कहा—

“आख़िर तुम अपने पिता से मिलने आ ही गए।”

और उसी पल पीछे से दरवाज़ा बंद हो गया।

धड़ाम!

बाहर नूर चीख रही थी—

“फ़िरोज़!”

अंदर बूढ़ा फ़िरोज़ धीरे-धीरे उसके पास आया।

“डरो मत…”

उसने कहा।

“मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूँ।”

फ़िरोज़ ने काँपते हुए पूछा—

“तो आप कौन हैं?”

बूढ़ा फ़िरोज़ मुस्कुराया।

“मैं…”

उसने अपनी कलाई दिखाई।

वहीं वही काली घड़ी बंधी थी।

“मैं तुम्हारा…”

घड़ी ने टिक करना शुरू किया।

टिक…

टिक…

टिक…

और बूढ़े फ़िरोज़ ने कहा—

“पहला पिता हूँ।”

एपिसोड 17 समाप्त।

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