PretikaGhost Storiesजिस रात मौत जागी

एपिसोड 10 — हामिद की वापसी

firoj saifi · Ghost Stories · 9 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
जिस रात मौत जागी
Chapter
10 of 11
Category
Ghost Stories
Reading time
9 min
Words
1727
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

कमरे में मौजूद हर घड़ी एक साथ बज उठी।

टिक… टिक… टिक…

फ़िरोज़ कमरे के बीचोंबीच खड़ा था।

उसकी आँखें सफ़ेद थीं।

चेहरा वही था…

लेकिन आवाज़—

आवाज़ हामिद की थी।

सलीमा दीवार से जा लगी।

उसके होंठ काँप रहे थे।

“नहीं… ये नहीं हो सकता…”

फ़िरोज़ ने गर्दन धीरे-धीरे उसकी तरफ घुमाई।

“तुमने कहा था… तुमने मुझे बनाया।”

सलीमा ने कोई जवाब नहीं दिया।

“तुमने कहा था… मेरे अंदर तीन चीज़ें बंद हैं।”

फ़िरोज़ के होंठों पर एक अजीब मुस्कान आई।

“लेकिन तुमने कभी नहीं बताया कि उनमें से एक चीज़ मैं खुद हूँ।”

कमरे की छत से धूल गिरने लगी।

नूर की आत्मा दरवाज़े के पास खड़ी थी।

उसकी आँखों में डर नहीं था।

सिर्फ़ इंतज़ार था।

फ़िरोज़ ने उसकी तरफ देखा।

“तुमने मुझे अपने अंदर रखा था…”

नूर ने धीरे से सिर हिलाया।

“हाँ, बेटा।”

“लेकिन मेरा शरीर हामिद का था?”

नूर की आँखों से आँसू बह निकले।

“तुम्हारा शरीर हामिद का नहीं था। हामिद की मौत तुम्हारे शरीर में डाली गई थी।”

फ़िरोज़ के चेहरे पर एक पल के लिए उलझन उभरी।

फिर उसकी आवाज़ बदल गई।

“झूठ।”

नूर ने कहा—

“मौत किसी शरीर की नहीं होती, फ़िरोज़। मौत एक भूख है। और हामिद ने उस भूख को अपने बेटे का चेहरा दे दिया था।”

फ़िरोज़ ने सलीमा की तरफ देखा।

“तो तुमने मुझे क्यों चुना?”

सलीमा ने धीरे-धीरे कहा—

“क्योंकि तुम अकेले ऐसे बच्चे थे… जो मौत को अपने अंदर बाँध सकता था।”

“मैं बच्चा नहीं था?”

“तुम थे।”

“फिर?”

सलीमा ने आँखें बंद कर लीं।

“फिर हमने तुम्हें बड़ा होने दिया… ताकि तुम्हारी आत्मा इतनी मज़बूत हो जाए कि हामिद की मौत तुम्हें पूरी तरह निगल न सके।”

फ़िरोज़ हँस पड़ा।

“तुमने मुझे बड़ा होने दिया?”

उसने अपनी छाती पर हाथ मारा।

“तुमने मुझे जिया नहीं… तुमने मुझे इस्तेमाल किया!”

उसकी चीख से कमरे की खिड़कियाँ टूट गईं।

बाहर बिजली चमकी।

और उसी रोशनी में फ़िरोज़ ने देखा—

हवेली के आँगन में दर्जनों लोग खड़े थे।

सभी के चेहरे एक जैसे थे।

सभी फ़िरोज़ के चेहरे वाले।

किसी की उम्र पाँच साल थी।

किसी की बीस।

किसी की साठ।

सब एक साथ उसकी तरफ देख रहे थे।

सबकी आँखें सफ़ेद थीं।

सलीमा ने डरकर कहा—

“वे पुराने शरीर हैं।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“किसके?”

सलीमा ने धीमे से उत्तर दिया—

“तुम्हारे।”

“मेरे?”

“हर बार जब चक्र पूरा होता है… मौत एक नया शरीर खोजती है। पिछले शरीर को हवेली निगल लेती है।”

फ़िरोज़ ने बाहर खड़े चेहरों को देखा।

एक बूढ़ा फ़िरोज़ आगे आया।

उसके हाथ में टूटी हुई घड़ी थी।

उसने कहा—

“हम सबने भागने की कोशिश की थी।”

दूसरा चेहरा बोला—

“हम सबने अपनी माँ को पुकारा था।”

तीसरा बोला—

“लेकिन किसी ने हमें नहीं बचाया।”

फ़िरोज़ ने सलीमा की तरफ देखा।

“तुमने इन्हें भी बनाया था?”

सलीमा की आँखें झुक गईं।

“नहीं।”

“तो किसने?”

बूढ़े फ़िरोज़ ने उत्तर दिया—

“हामिद ने।”

कमरे में खड़ी परछाईं अचानक उठी।

उसने अपना चेहरा बदलकर हामिद का चेहरा बना लिया।

“मैंने सिर्फ़ शरीर बनाए,” वह बोली, “लेकिन आत्माएँ तुम लोगों की थीं।”

फ़िरोज़ ने उस परछाईं को घूरा।

“तुम कौन हो?”

परछाईं मुस्कुराई।

“मैं वो हूँ, जो तुम्हारे हर जन्म में तुम्हारे साथ रहा।”

“मौत?”

“नहीं।”

“हामिद?”

“नहीं।”

“तो फिर?”

परछाईं धीरे-धीरे फ़िरोज़ के बिल्कुल सामने आ गई।

“मैं तुम्हारा डर हूँ।”

फ़िरोज़ ने हाथ उठाकर उसे छूना चाहा।

लेकिन जैसे ही उसकी उँगलियाँ परछाईं से मिलीं, उसके दिमाग़ में एक और स्मृति खुल गई।

एक अँधेरा कमरा।

फ़िरोज़ अकेला बैठा था।

उसकी उम्र शायद दस साल थी।

सलीमा दरवाज़े पर खड़ी थी।

उसके हाथ में एक लाल कपड़ा था।

छोटा फ़िरोज़ रोते हुए कह रहा था—

“अम्मी, मुझे रोज़ एक ही सपना क्यों आता है?”

सलीमा ने पूछा—

“क्या सपना?”

“एक औरत मुझे बुलाती है।”

“कौन औरत?”

“वो कहती है… मैं तुम्हारी माँ हूँ।”

सलीमा के हाथ से लाल कपड़ा गिर गया।

छोटा फ़िरोज़ बोला—

“क्या वो सच कहती है?”

सलीमा ने उसके गाल पर थप्पड़ मार दिया।

“कभी उस आवाज़ का जवाब मत देना!”

छोटा फ़िरोज़ रोने लगा।

“लेकिन वो मुझे बेटा कहती है।”

सलीमा ने उसे बाँहों में भर लिया।

“वो तुम्हारी माँ नहीं है।”

“फिर कौन है?”

सलीमा ने उसके कान में फुसफुसाया—

“वो तुम्हारे अंदर की मौत है।”

स्मृति टूट गई।

फ़िरोज़ वर्तमान में लौट आया।

उसने सलीमा को देखा।

“तुमने मुझे बचपन से ही नूर से दूर रखा।”

सलीमा ने कहा—

“क्योंकि नूर तुम्हें वापस बुला रही थी।”

“वो मेरी माँ थी!”

“वो तुम्हारी माँ थी… लेकिन अब वो सिर्फ़ आत्मा है।”

“और तुम?”

सलीमा की आवाज़ टूट गई।

“मैं वो थी… जिसने तुम्हें ज़िंदा रखा।”

फ़िरोज़ ने धीरे से कहा—

“नहीं। तुम वो थीं जिसने मुझे सच से दूर रखा।”

सलीमा ने आगे बढ़कर उसका चेहरा पकड़ लिया।

“फ़िरोज़, मेरी बात सुनो। अगर हामिद पूरी तरह जाग गया, तो तुम्हारा शरीर उसका हो जाएगा। तुम्हारी आत्मा हमेशा के लिए बंद हो जाएगी।”

“और अगर मैं तुम्हारी बात मान लूँ?”

“तो शायद तुम बच जाओ।”

“शायद?”

सलीमा चुप रही।

फ़िरोज़ की आँखों में गुस्सा भर गया।

“तुम्हें खुद नहीं पता कि मुझे कैसे बचाना है!”

तभी नूर की आत्मा ने कहा—

“उसे बचाने का एक ही रास्ता है।”

सलीमा ने पलटकर देखा।

“नूर…”

“उसे Room 0 के नीचे ले जाओ।”

सलीमा का चेहरा सख़्त हो गया।

“नहीं।”

नूर ने कहा—

“वहीं उसकी असली आत्मा बंद है।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“Room 0 के नीचे?”

नूर ने सिर हिलाया।

“हवेली के नीचे एक और कमरा है। ऐसा कमरा जिसका दरवाज़ा कभी नहीं खुला।”

सलीमा ने जल्दी से कहा—

“वहाँ जाना मौत को बुलाना है।”

नूर बोली—

“मौत पहले ही जाग चुकी है।”

फ़िरोज़ ने चारों तरफ देखा।

दीवारें अब साँस ले रही थीं।

उनके अंदर से धीमी धड़कनों की आवाज़ आ रही थी।

धक… धक… धक…

फ़िरोज़ ने पूछा—

“वहाँ क्या है?”

नूर ने कहा—

“तुम्हारा पहला जन्म।”

“मेरा पहला जन्म तो 1987 में हुआ था।”

“नहीं।”

नूर की आवाज़ भारी हो गई।

“1987 में तुम्हारा शरीर बनाया गया था।”

“तो मेरी आत्मा?”

नूर ने फ़िरोज़ की आँखों में देखा।

“तुम्हारी आत्मा उससे पहले मर चुकी थी।”

फ़िरोज़ पीछे हट गया।

“क्या?”

सलीमा ने सिर पकड़ लिया।

“नूर, बस करो…”

लेकिन नूर रुकने वाली नहीं थी।

“फ़िरोज़, तुम्हारी असली कहानी 1987 से शुरू नहीं होती।”

“फिर कब से?”

नूर ने कहा—

“1939 से।”

हवेली की सारी घड़ियाँ एक साथ उल्टी दिशा में घूमने लगीं।

फ़िरोज़ की आँखों के सामने एक पुरानी तस्वीर उभरी।

तस्वीर में एक छोटा गाँव था।

गाँव के बीच एक कुआँ।

कुएँ के पास एक बच्चा खड़ा था।

उस बच्चे का चेहरा—

फ़िरोज़ जैसा था।

उसके साथ एक आदमी खड़ा था।

वह आदमी जवान हामिद था।

और उसके पीछे एक औरत खड़ी थी।

वह औरत नूर जैसी दिखती थी।

फ़िरोज़ ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

तस्वीर के पीछे लिखा था—

“पहला बच्चा — 8 सितंबर 1939”

नीचे एक और वाक्य था—

“जिसे मौत ने जन्म दिया।”

फ़िरोज़ ने तस्वीर सलीमा की तरफ बढ़ाई।

“ये कौन है?”

सलीमा ने तस्वीर देखते ही मुँह फेर लिया।

“इसे मत देखो।”

“क्यों?”

“क्योंकि ये तुम्हारा पहला रूप है।”

फ़िरोज़ की उँगलियाँ काँपने लगीं।

“मेरा पहला रूप?”

सलीमा ने कहा—

“उस बच्चे का नाम भी फ़िरोज़ था।”

कमरे में अचानक किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।

ठक… ठक… ठक…

सलीमा जम गई।

नूर की आत्मा पीछे हट गई।

परछाईं ने सिर झुका लिया।

फ़िरोज़ ने दरवाज़े की तरफ देखा।

“कौन है?”

बाहर से आवाज़ आई—

“दरवाज़ा खोलो…”

फ़िरोज़ की साँस अटक गई।

वह आवाज़ उसके अब्बा सलीम की थी।

“फ़िरोज़… बेटा, दरवाज़ा खोलो।”

सलीमा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मत खोलना!”

बाहर से फिर आवाज़ आई—

“मैं तुम्हारा अब्बा हूँ।”

फ़िरोज़ की आँखों में आँसू आ गए।

“अब्बा…”

सलीमा चिल्लाई—

“वो सलीम नहीं है!”

बाहर की आवाज़ अचानक बदल गई।

अब वह आवाज़ फ़िरोज़ की अपनी थी।

“अगर तुमने दरवाज़ा नहीं खोला… तो तुम्हें कभी पता नहीं चलेगा कि तुम्हारी पहली मौत किसने लिखी थी।”

दरवाज़े के नीचे से काला पानी अंदर आने लगा।

उस पानी में छोटे-छोटे चेहरे तैर रहे थे।

हर चेहरा फ़िरोज़ का था।

एक चेहरा पानी से बाहर आया।

वह छह साल के बच्चे का चेहरा था।

बच्चे ने दरवाज़े की तरफ देखकर कहा—

“उसे अंदर आने दो।”

फ़िरोज़ ने पूछा—

“किसे?”

बच्चे ने उसकी तरफ देखा।

“जिसने तुम्हें पहली बार मारा था।”

सलीमा काँप उठी।

“नहीं…”

दरवाज़ा धीरे-धीरे खुलने लगा।

अँधेरे के बीच एक आदमी खड़ा था।

उसका चेहरा सलीम का था।

लेकिन उसके हाथ में एक पुरानी लोहे की छड़ थी।

छड़ पर सूखा हुआ खून लगा था।

फ़िरोज़ ने पीछे हटते हुए पूछा—

“तुम कौन हो?”

आदमी ने मुस्कुराकर कहा—

“मैं सलीम नहीं हूँ।”

उसने लोहे की छड़ ज़मीन पर टिकाई।

“मैं वो हूँ… जिसने तुम्हें पहली बार मरते हुए देखा था।”

फ़िरोज़ ने सलीमा की तरफ देखा।

“ये कौन है?”

सलीमा की आँखों में आतंक भर गया।

वह फुसफुसाई—

“तुम्हारा पहला पिता।”

आदमी ने धीरे से अपना चेहरा बदला।

सलीम का चेहरा पिघल गया।

उसके नीचे एक बूढ़ा चेहरा उभरा।

हामिद।

लेकिन यह हामिद उस हामिद से अलग था जिसे फ़िरोज़ अब तक जानता था।

यह हामिद कहीं ज़्यादा पुराना था।

उसकी आँखों में इंसानी दर्द था।

उसने फ़िरोज़ से कहा—

“बेटा… मुझे पहचानो।”

फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।

“तुम मेरे पिता नहीं हो।”

हामिद की आँखों में आँसू आ गए।

“मैंने तुम्हें जन्म नहीं दिया…”

वह एक कदम आगे बढ़ा।

“लेकिन मैंने तुम्हारी पहली मौत देखी थी।”

उसने लोहे की छड़ उठाई।

“और तुम्हारी पहली मौत…”

उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई।

“तुम्हारी अपनी माँ ने लिखी थी।”

फ़िरोज़ ने सलीमा की तरफ देखा।

सलीमा अब रो नहीं रही थी।

वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।

जैसे उसे पता था कि यह पल एक दिन आएगा।

हामिद ने कहा—

“सलीमा ने तुम्हें नहीं बनाया था।”

फ़िरोज़ की साँस रुक गई।

“तो?”

हामिद ने कहा—

“उसने सिर्फ़ तुम्हारे मरे हुए शरीर में दूसरी आत्मा डाली थी।”

फ़िरोज़ ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“मेरा शरीर… पहले किसका था?”

हामिद ने उसकी तरफ देखा।

और बहुत धीमे से कहा—

“तुम्हारी माँ का।”

कमरे में एक भयानक चीख गूँजी।

दीवारें फटने लगीं।

नूर की आत्मा धुएँ में बदल गई।

सलीमा घुटनों के बल गिर पड़ी।

फ़िरोज़ की आँखें फिर सफ़ेद हो गईं।

उसके मुँह से एक साथ तीन आवाज़ें निकलीं—

“मैं कौन हूँ?”

“मैं किसका बेटा हूँ?”

“और मेरी माँ… कौन थी?”

हामिद ने लोहे की छड़ फ़र्श पर रख दी।

फिर उसने फ़िरोज़ की तरफ झुककर कहा—

“तुम्हारी माँ…”

एक लंबा सन्नाटा।

“तुम खुद हो।”

और उसी पल फ़िरोज़ के सीने से एक और चेहरा बाहर निकल आया।

वह चेहरा फ़िरोज़ का नहीं था।

वह नूर का भी नहीं था।

वह सलीमा का था।

एपिसोड 10 समाप्त।

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