Pretika › Ghost Stories › जिस रात मौत जागी
एपिसोड 9 — पहली क़ातिल
firoj saifi · Ghost Stories · 12 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- जिस रात मौत जागी
- Chapter
- 9 of 9
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 12 min
- Words
- 2337
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
इतना गहरा सन्नाटा कि फ़िरोज़ को अपनी धड़कनें भी किसी दूर के कमरे से आती हुई महसूस होने लगीं।
उसके सामने सलीमा खड़ी थी।
वही चेहरा…
जिसे फ़िरोज़ ने अपनी पूरी ज़िंदगी अम्मी कहकर पुकारा था।
वही आँखें…
जिनमें बचपन में उसे दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना दिखाई देता था।
लेकिन अभी उन्हीं आँखों में कुछ ऐसा था, जिसे देखकर फ़िरोज़ के अंदर का हर भरोसा टूट गया।
सलीमा ने धीमे से कहा—
“क्योंकि मैं तुम्हारी माँ नहीं हूँ…”
फ़िरोज़ के होंठ काँपे।
“तो… कौन हो तुम?”
सलीमा ने जवाब नहीं दिया।
उसकी निगाहें फ़िरोज़ के पीछे खड़ी उस काली परछाईं पर टिक गईं, जो अब इंसान की तरह सीधी खड़ी थी।
उसके हाथ में वही काली घड़ी थी।
घड़ी की सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं।
टिक… टिक… टिक…
फ़िरोज़ ने अपनी आवाज़ ऊँची कर दी—
“मैंने पूछा, कौन हो तुम?”
सलीमा ने आँखें बंद कर लीं।
“मैं वो हूँ… जिसने तुम्हें बनाया।”
फ़िरोज़ एक कदम पीछे हट गया।
“बनाया?”
उसकी आँखों में आँसू उतर आए।
“क्या मैं तुम्हारा बेटा नहीं हूँ?”
सलीमा ने उसकी तरफ देखा।
इस बार उसके चेहरे पर माँ की ममता नहीं थी।
सिर्फ़ थकान थी।
और एक ऐसा अपराधबोध, जो शायद चालीस साल से उसकी आत्मा को खा रहा था।
“तुम मेरे बेटे थे…”
वह रुकी।
“लेकिन जिस रात तुम पैदा हुए… उसी रात तुम मर भी गए थे।”
कमरे की दीवारों से अचानक ठंडी हवा टकराई।
कमरे में रखी सारी घड़ियाँ एक साथ रुक गईं।
2:48
फ़िरोज़ ने अपनी कलाई देखी।
उसकी त्वचा के नीचे काली नसें उभरने लगी थीं।
“नहीं…”
वह सिर हिलाने लगा।
“नहीं, ये झूठ है। तुम मुझे डराने की कोशिश कर रही हो। तुम मेरी अम्मी हो। तुमने मुझे पाला है। तुमने मेरे लिए रातें जागकर काटी हैं। जब मैं बीमार पड़ा था, तुमने मेरे सिर पर हाथ रखा था। जब अब्बा मरे थे, तुमने मुझे सीने से लगाया था…”
उसकी आवाज़ टूट गई।
“तुमने मुझे कभी झूठ नहीं बोला…”
सलीमा की आँखों से आँसू बह निकले।
“मैंने तुम्हें हर दिन झूठ बोला है, फ़िरोज़।”
फ़िरोज़ ने जैसे किसी थप्पड़ की तरह वह बात सुनी।
“क्यों?”
सलीमा चुप रही।
तभी कमरे के कोने में खड़ा बच्चा धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
वही बच्चा…
जिसका चेहरा फ़िरोज़ जैसा था।
जिसकी आँखों में उम्र से कहीं ज़्यादा अंधेरा था।
उसने फ़िरोज़ की तरफ देखते हुए कहा—
“क्योंकि अगर तुम्हें सच पता चल जाता… तो तुम मुझे पहचान लेते।”
फ़िरोज़ ने उसकी तरफ देखा।
“तुम कौन हो?”
बच्चा मुस्कुराया।
“तुम्हारा पहला चेहरा।”
“आरिफ़?”
बच्चे की मुस्कान गायब हो गई।
“नहीं।”
कमरे का तापमान अचानक गिर गया।
बच्चे ने धीरे से अपनी गर्दन घुमाई।
उसकी हड्डियों से चरमराने की आवाज़ आई।
“आरिफ़ वो नाम है… जो हामिद ने अपने मरे हुए बेटे के लिए रखा था।”
फ़िरोज़ के चेहरे का रंग उड़ गया।
“तो तुम आरिफ़ नहीं हो?”
बच्चे ने अपनी उँगली फ़िरोज़ की तरफ उठाई।
“और तुम भी फ़िरोज़ नहीं हो।”
यह सुनते ही फ़िरोज़ की साँस रुक गई।
पीछे खड़ी परछाईं ने अपना सिर उठाया।
उसके चेहरे पर धीरे-धीरे एक नया चेहरा बनने लगा।
पहले आँखें…
फिर नाक…
फिर होंठ…
और फिर—
सलीम सैफ़ी का चेहरा।
फ़िरोज़ चीख पड़ा—
“अब्बा!”
परछाईं ने होंठ खोले।
आवाज़ सलीम की थी।
“फ़िरोज़… अपनी अम्मी से पूछो कि उसने तुम्हें पहली बार कब मारा था।”
सलीमा काँप गई।
“चुप हो जाओ…”
परछाईं हँसने लगी।
“तुमने उसे बचाया नहीं था, सलीमा।”
उसने काली घड़ी फ़िरोज़ की तरफ बढ़ाई।
“तुमने उसे चुना था।”
फ़िरोज़ ने घड़ी की तरफ देखा।
घड़ी की पिछली सतह पर अब एक नया नाम उभर आया था—
फ़िरोज़ — पहला अंत
उसके नीचे तारीख़ थी—
8 सितंबर 1987
फ़िरोज़ के दिमाग़ में अचानक तेज़ दर्द उठा।
उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
और फिर…
एक दृश्य।
एक छोटा-सा कमरा।
दीवारों पर लाल धागे।
फ़र्श पर सफ़ेद चूने से बना एक गोल घेरा।
घेरे के बीच एक नवजात बच्चा।
बच्चे के चारों ओर चार मोमबत्तियाँ जल रही थीं।
सलीमा जवान थी।
उसके हाथ खून से सने थे।
सलीम उसके सामने खड़ा था।
और एक तीसरी औरत कमरे के कोने में रो रही थी।
फ़िरोज़ ने उस औरत का चेहरा देखने की कोशिश की।
लेकिन हर बार उसका चेहरा धुएँ में बदल जाता।
सलीम ने जवान सलीमा से कहा—
“अभी भी वक्त है। इसे छोड़ दो।”
सलीमा ने बच्चे को अपनी गोद में उठा लिया।
“अगर इसे नहीं बनाया… तो हामिद वापस आ जाएगा।”
“हामिद वापस आएगा तो आए,” सलीम ने कहा। “लेकिन इस बच्चे की जान लेकर हम किसे बचाएँगे?”
सलीमा की आँखों में पागलपन उतर आया।
“तुम नहीं समझते, सलीम। मौत उसके पीछे है। अगर यह शरीर नहीं बना, तो मौत पूरे शहर में फैल जाएगी।”
“ये शरीर नहीं है,” सलीम ने काँपते हुए कहा। “ये किसी की आत्मा का टुकड़ा है।”
सलीमा ने बच्चे के माथे पर काला निशान बनाया।
“और यही टुकड़ा हामिद को बाँध सकता है।”
फ़िरोज़ ने देखा—
बच्चे ने अचानक आँखें खोल दीं।
उसकी आँखें बिल्कुल सफ़ेद थीं।
फिर बच्चे ने रोने के बजाय एक भारी आवाज़ में कहा—
“मुझे वापस कर दो…”
सलीमा पीछे हट गई।
सलीम ने तलवार जैसी लोहे की छड़ उठाई।
“सलीमा, पीछे हटो!”
लेकिन सलीमा ने बच्चे को और कसकर पकड़ लिया।
“नहीं! यह मेरा बेटा है!”
बच्चे के चेहरे पर झुर्रियाँ उभरने लगीं।
उसकी त्वचा सिकुड़ने लगी।
और कुछ ही सेकंड में वह बच्चा एक बूढ़े आदमी के चेहरे में बदल गया।
हामिद।
हामिद ने आँखें खोलकर सलीमा को देखा।
“तुमने मुझे अपने घर में बुलाया…”
सलीमा चीख उठी।
“मैंने तुम्हें नहीं बुलाया!”
हामिद मुस्कुराया।
“तुमने मेरे बेटे की आत्मा चुराई। तुमने मेरे लिए दरवाज़ा बनाया। तुमने मुझे शरीर दिया।”
सलीम ने लोहे की छड़ बच्चे के सीने में घोंप दी।
एक भयानक चीख कमरे में गूँज उठी।
बच्चे का शरीर राख में बदल गया।
लेकिन राख के बीच से एक काली परछाईं निकली।
वह परछाईं सलीमा की तरफ बढ़ी।
सलीम ने सलीमा को पीछे धकेल दिया।
परछाईं ने सलीम के चेहरे को छुआ।
और उसी पल सलीम की आँखें सफ़ेद हो गईं।
दृश्य टूट गया।
फ़िरोज़ चीखते हुए वर्तमान में लौट आया।
वह घुटनों के बल फ़र्श पर गिर पड़ा।
उसके मुँह से खून की पतली धार निकल रही थी।
सलीमा उसकी तरफ दौड़ी।
“फ़िरोज़!”
फ़िरोज़ ने उसका हाथ झटक दिया।
“मुझे मत छुओ!”
सलीमा वहीं रुक गई।
फ़िरोज़ ने काँपते हुए पूछा—
“तुमने… मुझे बनाया था?”
सलीमा ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
“किससे?”
“आरिफ़ की आत्मा के टुकड़े से…”
“और मेरी अपनी आत्मा?”
सलीमा ने जवाब नहीं दिया।
फ़िरोज़ उठ खड़ा हुआ।
“मेरी अपनी आत्मा कहाँ है?”
कमरे की दीवार पर एक लंबी दरार उभर आई।
दरार के अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आने लगी।
सलीमा ने डरकर दीवार की तरफ देखा।
“वो अभी सो रही है।”
फ़िरोज़ का चेहरा पत्थर हो गया।
“कहाँ?”
सलीमा ने अपनी छाती पर हाथ रखा।
“तुम्हारे अंदर।”
“तो फिर मैं कौन हूँ?”
सलीमा ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“तुम एक शरीर हो…”
फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।
“सिर्फ़ शरीर?”
“एक ऐसा शरीर जिसमें तीन चीज़ें बंद हैं।”
“कौन-सी तीन चीज़ें?”
सलीमा ने उँगलियाँ गिनाईं।
“आरिफ़ की अधूरी आत्मा…”
दूसरी उँगली उठी।
“हामिद की मौत…”
तीसरी उँगली उठाने से पहले ही उसकी आवाज़ रुक गई।
फ़िरोज़ ने चीखकर कहा—
“तीसरी क्या है?”
सलीमा ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम्हारी माँ की आख़िरी दुआ।”
फ़िरोज़ हँस पड़ा।
वह हँसी नहीं थी।
वह टूटे हुए आदमी की आवाज़ थी।
“मेरी माँ?”
उसने दीवार पर मुक्का मारा।
“तुम मेरी माँ नहीं हो। तो मेरी माँ कौन है?”
सलीमा ने आँखें फेर लीं।
“तुम उसे जानते हो।”
“कहाँ है वो?”
“तुम्हारे साथ।”
“कहाँ?”
सलीमा ने काली घड़ी की तरफ देखा।
घड़ी अब फ़िरोज़ की कलाई पर अपने आप बँध चुकी थी।
काली धातु उसकी त्वचा में धँस रही थी।
फ़िरोज़ दर्द से चीख उठा।
उसी पल कमरे में एक औरत की आवाज़ गूँजी।
बहुत धीमी…
बहुत दूर से आती हुई…
लेकिन फ़िरोज़ के लिए वह आवाज़ अजनबी नहीं थी।
“फ़िरोज़…”
वह जम गया।
“अम्मी?”
आवाज़ फिर आई—
“बेटा… मेरी बात सुनो…”
सलीमा पीछे हट गई।
उसका चेहरा डर से सफ़ेद पड़ गया।
फ़िरोज़ ने चारों तरफ देखा।
“कौन है?”
आवाज़ काली घड़ी के अंदर से आ रही थी।
“मैंने तुम्हें छोड़ा नहीं था…”
फ़िरोज़ ने घड़ी को कान से लगाया।
आवाज़ और साफ़ हो गई।
“मुझे तुमसे अलग किया गया था…”
फ़िरोज़ की साँसें तेज़ हो गईं।
“आप कौन हैं?”
घड़ी के भीतर से एक धीमी सिसकी सुनाई दी।
“मैं तुम्हारी असली माँ हूँ।”
सलीमा चीख उठी—
“नहीं!”
कमरे की सारी मोमबत्तियाँ एक साथ बुझ गईं।
अँधेरे में सिर्फ़ घड़ी की काली सुइयाँ चमक रही थीं।
फ़िरोज़ ने सलीमा की तरफ देखा।
“तुमने कहा था कि तुम मेरी पहली क़ातिल हो।”
सलीमा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“हाँ…”
“तुमने किसे मारा था?”
सलीमा ने होंठ खोले, लेकिन आवाज़ नहीं निकली।
परछाईं धीरे-धीरे फ़िरोज़ के पीछे आकर खड़ी हो गई।
उसने फ़िरोज़ के कान के पास फुसफुसाया—
“उसने तुम्हें नहीं मारा था…”
फ़िरोज़ ने पलटकर देखा।
परछाईं अब सलीम के चेहरे में नहीं थी।
अब उसका चेहरा फ़िरोज़ की तरह था।
लेकिन उसकी आँखें खाली थीं।
“उसने तुम्हारी माँ को मारा था।”
फ़िरोज़ का दिल जैसे रुक गया।
“क्या?”
परछाईं ने काली घड़ी की तरफ इशारा किया।
“तुम्हारी असली माँ…”
घड़ी के शीशे में एक चेहरा उभरा।
एक औरत का चेहरा।
चेहरा धुँधला था, मगर उसकी आँखें साफ़ थीं।
वही आँखें…
जो फ़िरोज़ ने बचपन के हर सपने में देखी थीं।
वही आवाज़…
जो उसे अँधेरे में लोरी सुनाती थी।
फ़िरोज़ ने काँपते हुए कहा—
“ये… कौन है?”
सलीमा ने सिर झुका लिया।
“तुम्हारी माँ।”
“नाम?”
सलीमा ने आँखें बंद कर लीं।
“नूर।”
कमरे में अचानक ज़ोरदार धमाका हुआ।
दीवार के पीछे से किसी भारी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।
बच्चा, जो अब तक चुप खड़ा था, धीरे-धीरे मुस्कुराने लगा।
“अब तुम्हें याद आएगा…”
फ़िरोज़ ने उसकी तरफ देखा।
“क्या?”
बच्चे ने अपने सीने पर हाथ रखा।
“तुमने नूर को नहीं मारा था।”
वह एक कदम आगे आया।
“तुमने नूर को अपने अंदर बंद किया था।”
फ़िरोज़ ने सिर पकड़ लिया।
उसके भीतर हज़ारों आवाज़ें गूँजने लगीं।
नूर की चीख…
सलीम की पुकार…
सलीमा की प्रार्थना…
और एक बच्चे की आवाज़—
“मुझे बाहर निकालो…”
फ़िरोज़ की आँखों के सामने फिर एक दृश्य उभरा।
8 सितंबर 1987।
वही हवेली।
वही कमरा।
नूर फ़र्श पर पड़ी थी।
उसके सीने में लोहे की छड़ धँसी हुई थी।
सलीमा उसके ऊपर झुकी हुई थी।
सलीम दरवाज़े पर खड़ा था।
और फ़िरोज़—
छह साल का फ़िरोज़—
नूर के पास बैठा रो रहा था।
नूर ने अपना हाथ फ़िरोज़ के गाल पर रखा।
“डरो मत…”
फिर उसने अपनी आख़िरी साँसों में कहा—
“मेरी आत्मा को अपने अंदर रख लो…”
छोटे फ़िरोज़ ने रोते हुए पूछा—
“क्यों?”
नूर ने मुस्कुराने की कोशिश की।
“क्योंकि बाहर मौत खड़ी है।”
अचानक कमरे का दरवाज़ा खुला।
हामिद अंदर आया।
उसके पीछे अँधेरा था।
सलीमा ने बच्चे फ़िरोज़ को पकड़कर पीछे खींच लिया।
सलीम ने नूर के शरीर पर काला कपड़ा डाल दिया।
और नूर की आत्मा—
एक सफ़ेद रोशनी बनकर—
छोटे फ़िरोज़ के सीने में समा गई।
दृश्य अचानक बदल गया।
छोटा फ़िरोज़ चीखने लगा।
उसकी परछाईं शरीर से अलग हो गई।
सलीमा ने लोहे की छड़ उठाई।
सलीम चिल्लाया—
“सलीमा! नहीं!”
लेकिन सलीमा ने परछाईं पर वार कर दिया।
छोटा फ़िरोज़ फ़र्श पर गिर पड़ा।
और उसकी परछाईं दो हिस्सों में बँट गई।
एक हिस्सा काली घड़ी में चला गया।
दूसरा हिस्सा फ़िरोज़ के भीतर।
दृश्य समाप्त हो गया।
फ़िरोज़ वर्तमान में खड़ा काँप रहा था।
उसने सलीमा की तरफ देखा।
“तुमने नूर को नहीं मारा…”
सलीमा की आँखों से आँसू बह रहे थे।
“नहीं।”
“तुमने उसकी आत्मा मुझमें बंद की।”
“हाँ।”
“और फिर मेरी यादें मिटा दीं।”
सलीमा ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
“क्यों?”
सलीमा ने उत्तर दिया—
“क्योंकि नूर तुम्हारी माँ थी…”
वह रुकी।
“लेकिन हामिद की मौत तुम्हारे अंदर जाग चुकी थी।”
फ़िरोज़ ने काली घड़ी को देखा।
घड़ी की सुइयाँ अब तेज़ी से घूम रही थीं।
2:48… 2:49… 2:50…
सलीमा चीख उठी—
“घड़ी उतार दो!”
फ़िरोज़ ने उसे खींचने की कोशिश की।
लेकिन घड़ी उसकी त्वचा में और गहराई तक धँस गई।
काली परछाईं उसके पीछे खड़ी होकर फुसफुसाई—
“अब समय पूरा हो गया।”
कमरे की दीवारें काँपने लगीं।
बेसमेंट के सभी दरवाज़े एक साथ खुल गए।
हर दरवाज़े के पीछे एक फ़िरोज़ खड़ा था।
कहीं बच्चा फ़िरोज़…
कहीं बूढ़ा फ़िरोज़…
कहीं खून से लथपथ फ़िरोज़…
और सबसे आख़िरी दरवाज़े के पीछे—
एक औरत खड़ी थी।
नूर।
उसने हाथ बढ़ाया।
“बेटा… मेरे पास आओ।”
फ़िरोज़ उसकी तरफ बढ़ा।
सलीमा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं! अगर तुम उसके पास गए… तो तुम्हारी असली आत्मा जाग जाएगी।”
फ़िरोज़ ने उसकी तरफ देखा।
“और अगर जाग गई तो?”
सलीमा की आवाज़ काँप रही थी।
“तो तुम मुझे पहचान लोगे।”
“मैं अभी भी तुम्हें पहचानता हूँ।”
“नहीं…”
सलीमा पीछे हट गई।
“तुम मुझे माँ समझते हो।”
उसने काँपते हुए कहा—
“लेकिन जब तुम्हारी असली आत्मा जागेगी… तो तुम्हें याद आएगा कि मैंने तुम्हें पहली बार कब मारा था।”
फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।
“कब?”
सलीमा ने उसकी तरफ देखा।
और फिर उसके होंठों से निकला—
“तुम्हारे जन्म से पहले।”
अचानक नूर की आवाज़ कमरे में गूँजी—
“फ़िरोज़… उससे पूछो कि तुम्हारा जन्म किसके शरीर से हुआ था।”
सलीमा ने चीखकर कहा—
“नूर, चुप हो जाओ!”
नूर की परछाईं दरवाज़े से बाहर निकली।
उसका चेहरा अब साफ़ दिखाई दे रहा था।
वह फ़िरोज़ की तरफ देखकर मुस्कुराई।
“बेटा… तुम्हारा शरीर मेरा नहीं था।”
फ़िरोज़ पीछे हट गया।
नूर ने अपनी छाती पर हाथ रखा।
“तुम्हारा शरीर…”
उसकी आवाज़ अचानक भारी हो गई।
“हामिद का था।”
कमरे में बिजली जैसी चमक हुई।
फ़िरोज़ की कलाई पर बँधी काली घड़ी टूट गई।
उसके अंदर से काला धुआँ निकला।
धुआँ फ़िरोज़ के सीने में समा गया।
और उसी क्षण फ़िरोज़ की आँखें सफ़ेद हो गईं।
सलीमा चीख उठी—
“फ़िरोज़!”
फ़िरोज़ ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।
उसके चेहरे पर अब फ़िरोज़ की मासूमियत नहीं थी।
वह मुस्कुराया।
लेकिन आवाज़ किसी और की थी—
“मेरा नाम फ़िरोज़ नहीं…”
सलीमा पीछे हटती गई।
“नहीं…”
फ़िरोज़ ने उसकी तरफ देखा।
“मेरा नाम आरिफ़ भी नहीं…”
कमरे की सारी घड़ियाँ एक साथ बज उठीं।
टिक… टिक… टिक…
फ़िरोज़ की आवाज़ गूँजी—
“मैं हामिद हूँ।”
और उसके पीछे खड़ी परछाईं ने पहली बार घुटनों के बल बैठकर सिर झुका दिया।
एपिसोड 9 समाप्त।