Pretika › Ghost Stories › जिस रात मौत जागी
एपिसोड 8 — जिसकी परछाईं ज़िंदा थी
firoj saifi · Ghost Stories · 16 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- जिस रात मौत जागी
- Chapter
- 8 of 9
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3004
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
फ़िरोज़ दीवार के सामने खड़ा था।
उसकी नज़र अपनी परछाईं पर जमी हुई थी।
कमरे में रोशनी बहुत कम थी, फिर भी परछाईं साफ़ दिखाई दे रही थी। वह दीवार पर खड़ी थी—फ़िरोज़ से अलग, अपने आप।
उसके हाथ में काली घड़ी थी।
फ़िरोज़ ने अपना दायाँ हाथ उठाया।
दीवार पर परछाईं ने हाथ नहीं उठाया।
फ़िरोज़ ने धीरे से अपना सिर घुमाया।
परछाईं ने उसकी तरफ़ देखा।
फ़िरोज़ का गला सूख गया।
“ये… कैसे हो सकता है?”
उसकी अम्मी, सलीमा, पीछे खड़ी काँप रही थीं।
“बेटा… उससे बात मत करना।”
फ़िरोज़ ने उनकी ओर देखा।
“वो मेरी परछाईं है।”
“नहीं।”
“तो फिर क्या है?”
सलीमा ने धीमे से कहा—
“वो तुम्हारी परछाईं नहीं… तुम्हारे अंदर बंद किसी चीज़ का रास्ता है।”
दीवार पर खड़ी परछाईं धीरे-धीरे मुस्कुराई।
उसकी मुस्कान फ़िरोज़ जैसी थी।
मगर आवाज़ किसी बूढ़े आदमी की थी—
“आख़िरकार… तुमने मुझे देख लिया।”
फ़िरोज़ एक कदम पीछे हटा।
“तू कौन है?”
परछाईं ने अपना सिर टेढ़ा किया।
“तुम्हें हर बार यही सवाल पूछना पसंद है।”
“मैंने पूछा, तू कौन है?”
“मैं वो हूँ जो तुम्हारे साथ पैदा हुआ था।”
सलीमा ने घबराकर कहा—
“फ़िरोज़, आँखें नीचे कर लो!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
फ़िरोज़ ने परछाईं की आँखों में देख लिया।
दीवार पर बनी काली आकृति की आँखें अब सफ़ेद थीं।
और उनके बीच एक लाल बिंदु जल रहा था।
अचानक फ़िरोज़ की कलाई में तेज़ दर्द उठा।
काली घड़ी का निशान, जिसे उसने कुछ देर पहले तोड़ दिया था, फिर से उभरने लगा।
इस बार निशान उसकी त्वचा पर नहीं था।
वह उसकी परछाईं की कलाई पर बना था।
परछाईं ने घड़ी को अपनी कलाई पर बाँध लिया।
टिक… टिक… टिक…
और उसी पल हवेली के सभी दरवाज़े एक साथ खुल गए।
परछाईं का पहला कदम
दीवार पर खड़ी परछाईं धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
पहले उसका हाथ दीवार से बाहर निकला।
फिर कंधा।
फिर सिर।
जैसे वह पत्थर की दीवार से नहीं, किसी गहरे पानी से बाहर आ रही हो।
सलीमा ने फ़िरोज़ को पीछे खींच लिया।
“भागो!”
“कहाँ?”
“नीचे वाले तहख़ाने में!”
“वहाँ क्यों?”
“क्योंकि ऊपर अब तुम्हारा नहीं रहा।”
परछाईं का आधा शरीर दीवार से बाहर आ चुका था।
उसने फ़िरोज़ की ओर हाथ बढ़ाया।
“तुम मुझसे भाग नहीं सकते।”
फ़िरोज़ ने लोहे की छड़ी उठा ली।
“मेरे पास मत आना!”
परछाईं हँसी।
“तुम्हें लगता है लोहे की छड़ी मुझे रोक सकती है?”
“मैं कोशिश करूँगा।”
“तुमने पिछली बार भी कोशिश की थी।”
फ़िरोज़ का चेहरा बदल गया।
“कब?”
परछाईं ने दीवार पर एक दृश्य बना दिया।
1987 की रात।
छोटा फ़िरोज़ गोल निशान के बीच खड़ा था। उसके हाथ में लोहे की वही छड़ी थी। सामने नूर थी। पीछे सलीम और सलीमा खड़े थे।
छोटा फ़िरोज़ रो रहा था।
“मैं नहीं करूँगा!”
सलीम चिल्ला रहे थे—
“फ़िरोज़, उसे मत छूना!”
लेकिन छोटा फ़िरोज़ किसी और आवाज़ से प्रभावित था।
एक गहरी आवाज़—
“मुझे आज़ाद करो।”
छोटे फ़िरोज़ ने लोहे की छड़ी उठाई और गोल निशान के बीच रखी काली घड़ी पर वार कर दिया।
घड़ी टूट गई।
कमरे में काला धुआँ फैल गया।
नूर फ़िरोज़ के सामने आकर खड़ी हो गई।
धुआँ उसकी ओर बढ़ा।
नूर ने हाथ फैलाए।
“इसे मेरे अंदर आने दो!”
सलीमा चीख उठीं—
“नूर, नहीं!”
लेकिन नूर ने धुएँ को अपने अंदर खींच लिया।
उसका शरीर काँपने लगा।
छोटा फ़िरोज़ ज़मीन पर गिर गया।
और तभी उसकी परछाईं उससे अलग होकर दीवार पर चिपक गई।
फ़िरोज़ वर्तमान में यह दृश्य देखकर पीछे हट गया।
“ये मैंने किया था?”
परछाईं ने कहा—
“हाँ।”
“मैंने नूर को मारा?”
“नहीं।”
“तो फिर?”
“तुमने उसे मेरे हवाले किया।”
फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।
“नहीं… मैं बच्चा था।”
“बच्चे भी दरवाज़े खोलते हैं।”
सलीमा ने रोते हुए कहा—
“तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।”
फ़िरोज़ उनकी ओर मुड़ा।
“फिर मेरी परछाईं मुझे दोष क्यों दे रही है?”
सलीमा चुप रहीं।
फ़िरोज़ ने पहली बार उनकी आँखों में एक और डर देखा।
वह डर मालिक का नहीं था।
वह डर किसी ऐसे सच का था जिसे वह अब भी छिपा रही थीं।
तहख़ाने की सीढ़ियाँ
सलीमा ने फ़िरोज़ का हाथ पकड़ा और उसे हॉल के एक कोने की ओर खींचा।
वहाँ फर्श पर पत्थर की एक बड़ी पटिया थी।
सलीमा ने उस पर हाथ रखा।
पत्थर के नीचे से किसी ने तीन बार दस्तक दी।
ठक… ठक… ठक…
फ़िरोज़ ने घबराकर पूछा—
“नीचे कौन है?”
सलीमा ने कहा—
“जिसे तुम्हारे अब्बा ने आख़िरी बार बंद किया था।”
“कौन?”
“मुझे नहीं पता।”
“आपको नहीं पता या आप बताना नहीं चाहतीं?”
सलीमा ने उसकी ओर देखा।
“इस वक्त सवाल मत करो।”
“मैंने पूरी ज़िंदगी सवाल नहीं किए। अब करूँगा।”
उन्होंने पत्थर हटाया।
नीचे अँधेरी सीढ़ियाँ थीं।
सीढ़ियों से सड़ी हुई मिट्टी और गीले लोहे की गंध आ रही थी।
फ़िरोज़ नीचे उतरने लगा।
पीछे से परछाईं की आवाज़ आई—
“तुम नीचे जाकर भी मुझसे नहीं बचोगे।”
फ़िरोज़ ने मुड़कर देखा।
परछाईं अब दीवार से पूरी तरह बाहर आ चुकी थी।
वह फ़िरोज़ के शरीर जैसी थी, लेकिन उसके पैर ज़मीन को छू नहीं रहे थे।
वह हवा में तैरती हुई उनकी ओर बढ़ रही थी।
सलीमा ने पत्थर का ढक्कन बंद कर दिया।
अँधेरा छा गया।
कुछ पल तक सिर्फ़ उनकी साँसें सुनाई देती रहीं।
फिर ऊपर से किसी ने पत्थर पर हाथ मारा।
धड़ाम!
फ़िरोज़ ने घबराकर पूछा—
“वो नीचे आ सकती है?”
सलीमा ने कहा—
“अगर उसे तुम्हारा नाम मिल गया, तो वह कहीं भी आ सकती है।”
“मेरा नाम फ़िरोज़ है।”
“मैं उस नाम की बात नहीं कर रही।”
फ़िरोज़ ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।
सीढ़ियाँ नीचे एक विशाल तहख़ाने में खुलती थीं।
दीवारों पर सैकड़ों काली घड़ियाँ टँगी थीं।
कुछ टूटी हुई थीं। कुछ उल्टी चल रही थीं। कुछ में सुइयाँ ही नहीं थीं।
हर घड़ी के नीचे एक नाम लिखा था।
सलीम। नूर। आरिफ़। सलीमा। और सबसे नीचे—
फ़िरोज़।
फ़िरोज़ उस घड़ी के सामने रुक गया।
उसके नीचे दो तारीख़ें थीं—
8 सितंबर 1987 8 सितंबर 2026
लेकिन दोनों तारीख़ों के बीच एक तीसरी लाइन थी।
वह अभी-अभी उभरी थी—
“अगली मृत्यु — आज।”
फ़िरोज़ ने सलीमा की ओर देखा।
“ये क्या है?”
सलीमा ने कोई जवाब नहीं दिया।
“अम्मी!”
“मुझे नहीं पता।”
“आपको सब पता है!”
फ़िरोज़ की आवाज़ तहख़ाने में गूँज गई।
“आपने मुझे बनाया। मेरी यादें मिटाईं। अब्बा को झूठा मरवाया। नूर को मेरी यादों में कैद किया। और अब आप कह रही हैं कि आपको कुछ नहीं पता?”
सलीमा ने आँखें बंद कर लीं।
“मैंने तुम्हें बचाने के लिए सब किया।”
“मुझसे पूछकर?”
“तुम बच्चे थे।”
“तो अब मैं बच्चा नहीं हूँ!”
“इसीलिए तो डर रही हूँ।”
फ़िरोज़ चुप हो गया।
सलीमा ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हें लगता है कि मालिक तुम्हारा दुश्मन है। लेकिन असली ख़तरा वो नहीं है।”
“तो कौन है?”
सलीमा ने तहख़ाने के बीचोंबीच रखे एक पत्थर के संदूक की ओर इशारा किया।
“वो।”
पत्थर का संदूक
संदूक पर कोई ताला नहीं था।
उसके ऊपर लाल धागों से एक निशान बनाया गया था।
वही लाल आँख।
फ़िरोज़ ने धीरे से पूछा—
“इसके अंदर क्या है?”
“तुम्हारे जन्म से पहले की चीज़।”
“क्या मेरी कोई चीज़ जन्म से पहले भी थी?”
सलीमा ने कहा—
“तुम्हारा शरीर नहीं। तुम्हारी आवाज़।”
फ़िरोज़ ने संदूक को देखा।
“मेरी आवाज़?”
“तुम्हारे पैदा होने से पहले ही तुमने पहली बार रोया था।”
“ये कैसे संभव है?”
“क्योंकि तुम समय से पैदा नहीं हुए थे।”
सलीमा ने संदूक पर हाथ रखा।
“तुम्हारा पहला रोना 1987 में नहीं, उससे बहुत पहले सुना गया था।”
“कब?”
सलीमा ने धीरे से कहा—
“जब मालिक इंसान था।”
फ़िरोज़ ने महसूस किया कि तहख़ाने की हवा और ठंडी हो गई है।
“मालिक कभी इंसान था… ये बात आपने पहले भी कही थी। लेकिन वो था कौन?”
सलीमा ने जवाब देने से पहले संदूक खोल दिया।
अंदर एक पुराना टेप रिकॉर्डर रखा था।
उस पर धूल जमी थी।
और उसके ऊपर एक काग़ज़ चिपका था—
“जिसने पहली बार मौत को आवाज़ दी।”
फ़िरोज़ ने टेप रिकॉर्डर उठाया।
“ये किसकी रिकॉर्डिंग है?”
सलीमा ने कहा—
“मालिक की।”
“जब वह इंसान था?”
“हाँ।”
फ़िरोज़ ने प्ले बटन दबाया।
पहले कुछ सेकंड ख़ामोशी रही।
फिर एक आदमी की आवाज़ सुनाई दी।
आवाज़ थकी हुई थी, मगर उसमें अजीब ताक़त थी।
“मेरा नाम हामिद था।”
फ़िरोज़ ने सलीमा की ओर देखा।
सलीमा ने सिर झुका लिया।
रिकॉर्डिंग जारी रही—
“मेरी पत्नी मर चुकी थी। मेरा बेटा आरिफ़ भी मर चुका था। मैंने मौत को पुकारा। मैंने उससे कहा कि अगर वह मेरे बेटे को वापस ला सकती है, तो मैं अपनी पूरी ज़िंदगी उसके नाम कर दूँगा।”
फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।
“आरिफ़… उसका बेटा था।”
“हाँ,” सलीमा ने कहा।
रिकॉर्डिंग में हामिद की आवाज़ काँपने लगी—
“उस रात एक आवाज़ आई। उसने कहा—मैं तुम्हारे बेटे को वापस ला सकती हूँ। लेकिन उसके बदले मुझे एक ऐसा चेहरा चाहिए जो समय से बाहर हो।”
कुछ पल ख़ामोशी रही।
फिर आवाज़ आई—
“मैंने अपना चेहरा दे दिया।”
फ़िरोज़ की साँस रुक गई।
“उसने अपना चेहरा दे दिया?”
“हाँ,” सलीमा बोलीं। “और मौत ने उसका चेहरा पहन लिया।”
रिकॉर्डिंग में हामिद कह रहा था—
“जब मेरा बेटा वापस आया, वह मेरा बेटा नहीं था। वह एक खाली शरीर था। उसके अंदर कुछ और था। मैंने उसे आरिफ़ कहा, मगर वह मुझे पिता नहीं कहता था। वह सिर्फ़ एक शब्द बोलता था…”
टेप में एक बच्चे की आवाज़ सुनाई दी—
“दरवाज़ा।”
फ़िरोज़ के हाथ काँपने लगे।
टेप में हामिद की आवाज़ फिर आई—
“मुझे समझ आ गया कि मैंने अपने बेटे को वापस नहीं बुलाया था। मैंने मौत को घर बुलाया था।”
अचानक टेप में चीख सुनाई दी।
फिर एक वाक्य—
“मौत को मारने के लिए उसका अपना चेहरा चाहिए।”
टेप बंद हो गया।
तहख़ाने में सन्नाटा छा गया।
फ़िरोज़ ने धीरे से पूछा—
“हामिद ही मालिक है?”
सलीमा ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“और आरिफ़?”
“उसका बेटा।”
“तो फिर मैं कौन हूँ?”
सलीमा ने उसकी ओर देखा।
“तुम उस सौदे का आख़िरी हिस्सा हो।”
फ़िरोज़ ने गुस्से से कहा—
“सीधे जवाब दीजिए!”
सलीमा की आवाज़ टूट गई।
“तुम्हें हामिद के बेटे आरिफ़ की आत्मा से बनाया गया था।”
फ़िरोज़ पीछे हट गया।
“क्या?”
“आरिफ़ की आत्मा मरने के बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। उसका एक हिस्सा मालिक के अंदर था। दूसरा हिस्सा समय में फँसा हुआ था। तुम्हारे अब्बा ने उसी हिस्से को तुम्हारे शरीर में बाँधा।”
फ़िरोज़ की आँखों में आँसू आ गए।
“तो मेरे अंदर आरिफ़ है?”
“उसका एक हिस्सा।”
“और मेरी परछाईं?”
“आरिफ़ का दूसरा हिस्सा।”
“तो मैं… पूरा इंसान नहीं हूँ?”
सलीमा उसके पास आईं।
“तुम्हारे अंदर अपनी आत्मा भी है।”
“मेरी अपनी?”
“हाँ।”
“वो कहाँ है?”
सलीमा ने उसके सीने पर हाथ रखा।
“यहीं।”
फ़िरोज़ ने उनका हाथ झटक दिया।
“आप हर बार मेरे शरीर की तरफ़ इशारा करती हैं। लेकिन मुझे कुछ महसूस नहीं होता!”
“क्योंकि तुम्हारी आत्मा सो रही है।”
“उसे जगाइए!”
सलीमा की आँखों में डर भर गया।
“अगर तुम्हारी आत्मा जाग गई, तो आरिफ़ का हिस्सा मर जाएगा।”
“और अगर नहीं जागी?”
“तो मालिक तुम्हारे शरीर को अपना घर बना लेगा।”
फ़िरोज़ ने आँखें बंद कर लीं।
उसके सामने दो रास्ते थे।
एक तरफ़ वह खुद था—फ़िरोज़। दूसरी तरफ़ आरिफ़—जिसे उसने कभी जाना ही नहीं। और तीसरी तरफ़ मालिक—जो उसके चेहरे, खून और नाम पर दावा कर रहा था।
उसने धीमे से पूछा—
“मेरी आत्मा को जगाने का तरीका क्या है?”
सलीमा ने कहा—
“तुम्हें अपनी पहली याद वापस लानी होगी।”
“कौन-सी?”
“जिस रात तुमने पहली बार रोया था।”
फ़िरोज़ ने कहा—
“मुझे कुछ याद नहीं।”
“याद नहीं… क्योंकि वो याद तुम्हारी नहीं है।”
“तो किसकी है?”
सलीमा ने तहख़ाने की सबसे पिछली दीवार की ओर देखा।
वहाँ एक बंद लोहे का दरवाज़ा था।
दरवाज़े पर लिखा था—
“कमरा 0।”
फ़िरोज़ ने उस दरवाज़े को देखा।
“कमरा 0?”
सलीमा ने धीरे से कहा—
“हवेली के सारे कमरे तुम्हारी यादों के लिए थे।”
“और कमरा 0?”
“तुम्हारे जन्म से पहले की मौत के लिए।”
कमरा 0
फ़िरोज़ दरवाज़े के पास पहुँचा।
उस पर कोई हैंडल नहीं था।
सिर्फ़ बीच में एक गोल छेद था।
सलीमा ने अपनी उँगली से खून की एक बूँद निकाली और छेद पर लगा दी।
दरवाज़े के अंदर से भारी आवाज़ आई।
“पहचान बताओ।”
सलीमा ने कहा—
“सलीमा सैफ़ी।”
दरवाज़ा नहीं खुला।
आवाज़ फिर आई—
“पहचान बताओ।”
सलीमा ने फ़िरोज़ की ओर देखा।
“अब तुम।”
फ़िरोज़ ने कहा—
“फ़िरोज़ सैफ़ी।”
दरवाज़ा नहीं खुला।
आवाज़ तीसरी बार आई—
“पहचान बताओ।”
फ़िरोज़ के माथे पर पसीना आ गया।
उसे समझ आ गया कि दरवाज़ा उसके नाम को स्वीकार नहीं कर रहा।
सलीमा ने फुसफुसाकर कहा—
“अपना दूसरा नाम बोलो।”
फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“बेटा, दरवाज़ा नहीं खुलेगा।”
“मैं आरिफ़ नहीं हूँ।”
“तुम्हें आरिफ़ बोलना नहीं है। तुम्हें अपना असली नाम बोलना है।”
फ़िरोज़ ने आँखें बंद कर लीं।
उसके भीतर वही आवाज़ गूँजी—
आरिफ़… आरिफ़… आरिफ़…
उसने दाँत भींच लिए।
“मेरा नाम…”
दरवाज़े के पीछे से किसी बच्चे की हँसी सुनाई दी।
सलीमा ने कहा—
“बोलो!”
फ़िरोज़ ने धीरे से कहा—
“मेरा नाम…”
उसी पल ऊपर से ज़ोरदार धमाका हुआ।
तहख़ाने की छत काँपने लगी।
दीवार पर टँगी सारी घड़ियाँ एक साथ टूट गईं।
और अँधेरे में किसी ने कहा—
“नाम मत बोलना।”
फ़िरोज़ ने पीछे देखा।
वहाँ उसकी परछाईं खड़ी थी।
लेकिन अब वह दीवार पर नहीं थी।
वह सचमुच तहख़ाने में आ चुकी थी।
उसके हाथ में काली घड़ी थी।
परछाईं ने कहा—
“अगर तुमने अपना असली नाम बोल दिया, तो तुम्हारी आत्मा जागेगी नहीं…”
वह धीरे-धीरे मुस्कुराई।
“वह मर जाएगी।”
सलीमा ने चिल्लाकर कहा—
“फ़िरोज़, मेरी बात मत सुनना!”
परछाईं ने उसकी ओर देखा।
“तुमने इसे बहुत सालों तक झूठ में रखा है, सलीमा। अब इसे सच सुनने दो।”
फ़िरोज़ ने पूछा—
“मेरा असली नाम क्या है?”
परछाईं ने कहा—
“तुम्हारा नाम…”
तभी लोहे का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
दरवाज़े के अंदर पूर्ण अँधेरा था।
उस अँधेरे से एक बच्चे की आवाज़ आई—
“माँ…”
सलीमा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
फ़िरोज़ ने उनकी ओर देखा।
“ये किसकी आवाज़ है?”
सलीमा पीछे हटने लगीं।
“हमें यहाँ से जाना होगा।”
“नहीं।”
फ़िरोज़ ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“अब नहीं।”
अँधेरे के अंदर से वही आवाज़ फिर आई—
“माँ… आपने मुझे क्यों मारा?”
सलीमा की आँखों से आँसू बह निकले।
फ़िरोज़ ने उन्हें घूरा।
“आपने किसे मारा था?”
सलीमा ने सिर झुका लिया।
“आरिफ़ को।”
तहख़ाने की सारी रोशनी बुझ गई।
परछाईं ने काली घड़ी ऊपर उठाई।
और फ़िरोज़ के सामने एक आख़िरी दृश्य खुला—
1987 की रात।
सलीमा एक छोटे बच्चे के सामने खड़ी थीं।
बच्चा आरिफ़ था।
उसकी आँखें काली थीं।
वह मालिक की आवाज़ में बोल रहा था—
“माँ… मुझे अंदर आने दो।”
सलीमा के हाथ में वही लोहे की छड़ी थी।
वह रो रही थीं।
“तुम मेरे बेटे नहीं हो।”
बच्चा मुस्कुराया।
“लेकिन तुम्हारे बेटे का चेहरा मेरा है।”
सलीमा ने आँखें बंद कीं।
फिर उन्होंने लोहे की छड़ी बच्चे के सीने में घोंप दी।
आरिफ़ की चीख पूरे कमरे में गूँज उठी।
वर्तमान में फ़िरोज़ ने अपनी अम्मी को देखा।
“आपने उसे मारा था…”
सलीमा रोते हुए बोलीं—
“मैंने अपने बेटे को नहीं मारा था।”
“तो किसे?”
उन्होंने काँपते हुए कहा—
“उसके अंदर छिपे मालिक को।”
फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।
“लेकिन अगर मालिक उसके अंदर था…”
सलीमा ने उसकी ओर देखा।
“तो आरिफ़ की आत्मा कहाँ गई?”
कमरा 0 के अँधेरे से एक आवाज़ आई—
“यहीं।”
फ़िरोज़ ने धीरे-धीरे अंदर देखा।
अँधेरे में एक बच्चा खड़ा था।
छह साल का।
उसके हाथ साफ़ थे।
चेहरा मासूम था।
आँखों में आँसू थे।
वह फ़िरोज़ की ओर बढ़ा।
“मुझे याद है तुमने मुझे मारा था।”
फ़िरोज़ ने पीछे हटते हुए कहा—
“मैंने नहीं…”
बच्चे ने सिर हिलाया।
“तुमने नहीं। तुम्हारी परछाईं ने।”
परछाईं फ़िरोज़ के पीछे आ खड़ी हुई।
बच्चे ने उसकी ओर इशारा किया।
“वही मालिक का असली वारिस है।”
फ़िरोज़ ने धीरे-धीरे अपनी परछाईं की ओर देखा।
परछाईं मुस्कुरा रही थी।
बच्चे ने फ़िरोज़ से कहा—
“उसे मुझसे अलग करना होगा।”
“कैसे?”
बच्चे ने अपनी छाती पर हाथ रखा।
“मुझे मारकर।”
फ़िरोज़ के चेहरे पर डर छा गया।
“क्या?”
“मैं आरिफ़ हूँ।”
वह आगे बढ़ा।
“और जब तक मैं ज़िंदा हूँ… तुम्हारी परछाईं कभी नहीं मरेगी।”
फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।
“नहीं। मैं किसी बच्चे को नहीं मारूँगा।”
आरिफ़ ने आँसुओं के बीच मुस्कुराकर कहा—
“तुमने पहली बार भी यही कहा था।”
पीछे से परछाईं की आवाज़ आई—
“इस बार भी तुम वही करोगे।”
अचानक फ़िरोज़ के हाथ में लोहे की छड़ी आ गई।
वह छड़ी अपने आप उठने लगी।
फ़िरोज़ उसे रोकने की कोशिश कर रहा था।
“नहीं!”
उसके हाथ काँप रहे थे।
आरिफ़ उसके सामने खड़ा था।
“फ़िरोज़… मुझे आज़ाद कर दो।”
“मैं नहीं कर सकता!”
“करना होगा।”
परछाईं फ़िरोज़ के पीछे से उसके शरीर में घुसने लगी।
काला धुआँ उसकी गर्दन से नीचे उतरने लगा।
सलीमा चीखीं—
“फ़िरोज़! छड़ी नीचे फेंको!”
लेकिन फ़िरोज़ का हाथ उसके काबू में नहीं था।
लोहे की छड़ी धीरे-धीरे आरिफ़ की छाती की ओर बढ़ी।
आरिफ़ ने आँखें बंद कर लीं।
“मुझे माफ़ करना।”
फ़िरोज़ चीख पड़ा—
“आरिफ़!”
छड़ी आरिफ़ के सीने से कुछ इंच दूर रुक गई।
फ़िरोज़ ने पूरी ताक़त से उसे रोक लिया।
उसकी नसें तन गईं।
काला धुआँ उसके चेहरे पर फैल गया।
परछाईं उसके कान में फुसफुसाई—
“तुम उसे नहीं मार सकते।”
“नहीं!”
“क्योंकि वह तुम हो।”
फ़िरोज़ ने दाँत भींचे।
“मैं फ़िरोज़ हूँ!”
परछाईं हँसी।
“तो अपना नाम साबित करो।”
फ़िरोज़ ने लोहे की छड़ी ज़मीन पर दे मारी।
एक तेज़ रोशनी फूटी।
आरिफ़ पीछे जा गिरा।
परछाईं फ़िरोज़ के शरीर से अलग होकर चीखने लगी।
उसका चेहरा बदलने लगा।
पहले आरिफ़। फिर मालिक। फिर सलीम। फिर फ़िरोज़।
और अंत में—
एक ऐसा चेहरा सामने आया जिसे फ़िरोज़ ने कभी नहीं देखा था।
वह चेहरा बूढ़ा था।
आँखें गहरी थीं।
मगर माथे पर वही काला निशान था।
सलीमा ने उसे देखते ही फुसफुसाया—
“हामिद…”
परछाईं ने मुस्कुराकर कहा—
“बहुत देर कर दी, सलीमा।”
फ़िरोज़ ने पूछा—
“हामिद?”
परछाईं ने उसकी ओर देखा।
“अब तुम मुझे मालिक कहते हो।”
उसने काली घड़ी फ़िरोज़ की ओर फेंकी।
घड़ी हवा में घूमती हुई फ़िरोज़ के सीने से जा टकराई।
फ़िरोज़ ज़मीन पर गिर पड़ा।
उसकी आँखों के सामने सब धुँधला होने लगा।
आख़िरी चीज़ जो उसने देखी—
वह उसकी अम्मी थीं।
सलीमा उसके ऊपर झुकी हुई थीं।
वह रोते हुए कह रही थीं—
“बेटा… अगर तुम जागे, तो मुझे माँ मत कहना।”
फ़िरोज़ ने मुश्किल से पूछा—
“क्यों?”
सलीमा की आँखों से आँसू गिरते रहे।
“क्योंकि मैं तुम्हारी माँ नहीं हूँ…”
कमरा अँधेरे में डूब गया।
और फिर उनकी आख़िरी आवाज़ सुनाई दी—
“मैं तुम्हारी पहली क़ातिल हूँ।”
एपिसोड 8 समाप्त।