Pretika › Ghost Stories › जिस रात मौत जागी
एपिसोड 7 — आरिफ़ कौन था?
firoj saifi · Ghost Stories · 13 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- जिस रात मौत जागी
- Chapter
- 7 of 9
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 13 min
- Words
- 2576
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
सुबह होने वाली थी।
हवेली के बाहर बारिश रुक चुकी थी, मगर आसमान अब भी काले बादलों से ढका हुआ था। पेड़ों की टहनियाँ हवा के बिना हिल रही थीं। दूर कहीं कोई पक्षी चीख रहा था, जैसे उसे आने वाले ख़तरे का पहले ही एहसास हो चुका हो।
फ़िरोज़ अपनी कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा था।
उसके हाथ स्टीयरिंग पर जमे हुए थे।
और पिछली सीट पर—
एक आदमी बैठा था।
वही चेहरा। वही आँखें। वही जबड़ा। वही आवाज़।
लेकिन वह फ़िरोज़ नहीं था।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
“मेरा नाम फ़िरोज़ नहीं है…” उसने कहा था।
फिर उसने सिर उठाकर सामने देखा।
“मेरा नाम आरिफ़ है।”
फ़िरोज़ ने रियर-व्यू मिरर में उसे देखा।
“तू… आरिफ़ है?”
पीछे बैठा आदमी चुप रहा।
“बोल!”
आदमी ने अपनी कलाई उठाई।
उस पर काली घड़ी बँधी थी।
घड़ी की सुइयाँ 2:47 पर अटकी थीं।
“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था,” आरिफ़ ने कहा।
फ़िरोज़ का चेहरा सख़्त हो गया।
“ये बात मुझे पहले भी कही जा चुकी है।”
“लेकिन तुमने किसी की बात नहीं मानी।”
“तुम मेरे जैसे क्यों दिखते हो?”
आरिफ़ ने धीमे से मुस्कुराने की कोशिश की, मगर उसकी आँखों में दर्द और गहरा हो गया।
“क्योंकि तुम मेरे जैसे दिखते हो।”
फ़िरोज़ ने कार स्टार्ट करने की कोशिश की।
इंजन ने आवाज़ नहीं की।
उसने दोबारा चाबी घुमाई।
इस बार इंजन चालू हो गया, लेकिन रेडियो अपने आप ऑन हो गया।
रेडियो पर कोई पुराना गाना नहीं, बल्कि एक रिकॉर्डिंग चल रही थी।
एक बच्चे की आवाज़।
“आरिफ़… आरिफ़… आरिफ़…”
फ़िरोज़ ने रेडियो बंद कर दिया।
आवाज़ बंद नहीं हुई।
अब वह कार के अंदर से आ रही थी।
डैशबोर्ड के नीचे से।
सीटों के बीच से।
और फिर—
फ़िरोज़ के अपने सीने के अंदर से।
“आरिफ़…”
उसने घबराकर अपनी छाती पकड़ ली।
“ये नाम मेरे अंदर क्यों गूँज रहा है?”
पीछे बैठा आदमी बोला—
“क्योंकि तुमने इसे बहुत सालों तक दबाकर रखा।”
“मैंने नहीं दबाया!”
“तुम्हें दबाने पर मजबूर किया गया था।”
“किसने?”
आरिफ़ ने खिड़की के बाहर देखा।
हवेली के मुख्य दरवाज़े पर एक आकृति खड़ी थी।
काले कपड़े। सफ़ेद आँखें। कलाई पर काली घड़ी।
मालिक।
वह दूर खड़ा होकर भी साफ़ दिखाई दे रहा था।
उसने अपना हाथ उठाया।
कार की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।
दरवाज़े लॉक हो गए।
फ़िरोज़ ने घबराकर हैंडल खींचा।
“दरवाज़ा क्यों नहीं खुल रहा?”
आरिफ़ ने कहा—
“क्योंकि उसने तुम्हें देख लिया है।”
“कौन?”
“मालिक।”
फ़िरोज़ ने सामने देखा।
मालिक अब हवेली के दरवाज़े पर नहीं था।
वह कार के बोनट के सामने खड़ा था।
उसका चेहरा धीरे-धीरे बदल रहा था।
पहले सलीम सैफ़ी का चेहरा। फिर फ़िरोज़ की अम्मी का चेहरा। फिर नूर का चेहरा। और अंत में—
फ़िरोज़ का अपना चेहरा।
मालिक ने शीशे पर उँगली से लिखा—
“आरिफ़ को बाहर निकालो।”
फ़िरोज़ पीछे हट गया।
“वो तुझे क्यों चाहता है?”
आरिफ़ ने आँखें बंद कर लीं।
“क्योंकि मैं उसकी पहली गलती हूँ।”
“मतलब?”
“मैं पहला शरीर था जिसमें उसने प्रवेश करने की कोशिश की थी।”
फ़िरोज़ ने उसे घूरा।
“लेकिन तू तो मुझ जैसा है।”
आरिफ़ ने धीमे से कहा—
“क्योंकि मैं तुम्हारा पहला रूप हूँ।”
पहला चेहरा
कार के अंदर अचानक अँधेरा भर गया।
फ़िरोज़ को लगा जैसे कार सड़क पर नहीं, किसी गहरे पानी के अंदर खड़ी है। बाहर शीशों पर पानी बह रहा था, मगर बारिश ऊपर से नहीं हो रही थी।
पानी नीचे से ऊपर की तरफ़ बह रहा था।
आरिफ़ ने अपनी कलाई से काली घड़ी उतारी और फ़िरोज़ की ओर बढ़ाई।
“इसे पकड़ो।”
फ़िरोज़ पीछे हट गया।
“नहीं।”
“तुम्हें इसे पकड़ना ही होगा।”
“पिछली बार इसे छूने से मेरे अंदर काला खून बहने लगा था।”
“क्योंकि घड़ी ने तुम्हें पहचान लिया था।”
“मैं घड़ी नहीं पकड़ूँगा।”
आरिफ़ ने सख़्ती से कहा—
“अगर तुमने इसे नहीं पकड़ा, तो मालिक मुझे ले जाएगा।”
फ़िरोज़ कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने घड़ी ले ली।
जैसे ही घड़ी उसकी हथेली से लगी, उसकी आँखों के सामने एक दृश्य चमका।
एक बहुत पुराना कमरा।
कमरे के बीच एक लकड़ी का पालना था।
पालने में एक नवजात बच्चा सो रहा था।
बच्चे के माथे पर काला निशान था।
उसके चारों ओर सलीम, फ़िरोज़ की अम्मी और एक बूढ़ा आदमी खड़े थे।
बूढ़े आदमी की कलाई पर काली घड़ी थी।
वही आदमी जिसे फ़िरोज़ ने पहली तस्वीर में देखा था।
बूढ़े ने कहा—
“ये बच्चा समय का नहीं है।”
सलीम ने जवाब दिया—
“हमें इसकी ज़रूरत है।”
“तुम जानते हो, इसकी कीमत क्या होगी?”
अम्मी ने बच्चे को अपनी गोद में उठा लिया।
“जो भी कीमत होगी, हम देंगे।”
बूढ़ा आदमी हँसा।
“तुम दोनों सोचते हो कि तुम मौत को कैद कर सकते हो?”
सलीम ने कहा—
“हम मौत को कैद नहीं कर रहे।”
उन्होंने बच्चे की ओर देखा।
“हम उसे एक नाम दे रहे हैं।”
बूढ़े ने पूछा—
“कौन-सा नाम?”
सलीम और अम्मी ने एक-दूसरे की ओर देखा।
फिर अम्मी ने बच्चे के कान में फुसफुसाया—
“आरिफ़।”
दृश्य अचानक बदल गया।
अब वही बच्चा छह साल का था।
वह कमरे के बीच खड़ा था।
उसके सामने नूर थी।
नूर के हाथ में लाल धागा था।
“तुम्हें मेरा हाथ पकड़ना होगा,” नूर कह रही थी।
बच्चे ने पूछा—
“क्यों?”
“क्योंकि अगर तुमने मेरा हाथ नहीं पकड़ा, तो वो तुम्हारे अंदर आ जाएगा।”
“कौन?”
नूर ने पीछे देखा।
कमरे के अँधेरे में एक लंबी परछाईं खड़ी थी।
“मौत।”
छोटे आरिफ़ ने नूर का हाथ पकड़ लिया।
तभी कमरे में चीख गूँजी।
काली परछाईं नूर की ओर झपटी।
नूर ने बच्चे को पीछे धकेल दिया।
“भागो!”
लेकिन बच्चा भागा नहीं।
उसने परछाईं की ओर देखा।
और उसके चेहरे पर एक अजीब मुस्कान आ गई।
वह मुस्कान बच्चे की नहीं थी।
मालिक की थी।
फ़िरोज़ ने घबराकर घड़ी छोड़ दी।
दृश्य टूट गया।
कार फिर सामान्य दिखाई देने लगी।
उसका माथा पसीने से भीग चुका था।
“मैंने क्या देखा?”
आरिफ़ ने कहा—
“तुम्हारा पहला जन्म।”
“वो बच्चा मैं था?”
“नहीं।”
“तो कौन था?”
आरिफ़ ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“मैं।”
फ़िरोज़ के होंठ सूख गए।
“तू छह साल का बच्चा था?”
“मैं उससे भी पहले था।”
“तो फिर तू ज़िंदा कैसे है?”
आरिफ़ ने बाहर खड़े मालिक की ओर देखा।
“मैं ज़िंदा नहीं हूँ।”
आरिफ़ की मौत
फ़िरोज़ के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“तू मर चुका है?”
“हाँ।”
“कब?”
“8 सितंबर 1987।”
“लेकिन उस रात तो नूर की मौत हुई थी।”
आरिफ़ ने सिर झुका लिया।
“नूर की मौत नहीं हुई थी। मेरी हुई थी।”
फ़िरोज़ ने गुस्से से कहा—
“ये सब झूठ है! मैंने अपनी आँखों से देखा था कि नूर ज़मीन पर पड़ी थी।”
“तुमने जो देखा, वह नूर की परछाईं थी।”
“तो असली नूर कहाँ थी?”
आरिफ़ ने जवाब दिया—
“तुम्हारे अंदर।”
फ़िरोज़ ने आँखें बंद कर लीं।
उसके भीतर जैसे हज़ारों आवाज़ें गूँजने लगीं।
तुम्हारी अम्मी ने तुम्हें बनाया था। नूर तुम्हारी यादों में बंद थी। मालिक तुम्हारा असली पिता है। तुम्हारा नाम आरिफ़ है।
वह चीख पड़ा—
“मैं कौन हूँ?”
आरिफ़ चुप रहा।
फ़िरोज़ ने स्टीयरिंग पर मुक्का मारा।
“मैं कौन हूँ? फ़िरोज़ या आरिफ़? इंसान या कोई प्रयोग? सलीम का बेटा या मालिक का चेहरा?”
आरिफ़ ने धीमे से कहा—
“तुम वो हो जिसे सबने अपनी ज़रूरत के हिसाब से नाम दिया।”
फ़िरोज़ ने उसकी ओर देखा।
“मतलब?”
“तुम्हारी अम्मी ने तुम्हें फ़िरोज़ कहा, ताकि तुम इंसान बन सको।”
“और मालिक ने?”
“उसने तुम्हें आरिफ़ कहा, ताकि तुम उसका वारिस बनो।”
“और सलीम?”
“उन्होंने तुम्हें बेटा कहा, ताकि तुम किसी के गुलाम न बनो।”
फ़िरोज़ की आँखों से आँसू निकल पड़े।
“तो मेरा अपना नाम क्या है?”
आरिफ़ ने कहा—
“तुम्हारा अपना नाम अभी पैदा ही नहीं हुआ।”
फ़िरोज़ ने कुछ नहीं कहा।
उसी समय कार का पिछला दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
आरिफ़ बाहर उतर गया।
फ़िरोज़ ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“कहाँ जा रहा है?”
“मालिक मुझे लेने आया है।”
“मैं तुझे जाने नहीं दूँगा।”
“तुम मुझे रोक नहीं सकते।”
“क्यों नहीं?”
आरिफ़ ने पहली बार उसकी आँखों में सीधा देखा।
“क्योंकि मैं तुमसे अलग नहीं हूँ।”
उसका शरीर धीरे-धीरे धुँधला होने लगा।
फ़िरोज़ ने उसे पकड़ने की कोशिश की।
“रुक!”
आरिफ़ ने आख़िरी बार कहा—
“जब तुम्हें अपना असली नाम मिल जाए… तो उसे बोलना मत।”
“क्यों?”
“क्योंकि नाम बोलते ही मालिक तुम्हारा शरीर नहीं… तुम्हारी आत्मा लेगा।”
आरिफ़ धुएँ में बदल गया।
वह धुआँ कार की छत से ऊपर उठा और सीधे हवेली की ओर चला गया।
मालिक ने अपना हाथ उठाया।
काला धुआँ उसके शरीर में समा गया।
फिर मालिक ने फ़िरोज़ की ओर देखा।
उसके चेहरे पर अब आरिफ़ का चेहरा था।
“एक चेहरा वापस आ गया,” उसने कहा।
“अब दूसरा भी लौटेगा।”
फ़िरोज़ ने कार से बाहर निकलकर चीखा—
“आरिफ़!”
मालिक मुस्कुराया।
“तुमने उसका नाम बोल दिया।”
आसमान में अचानक बिजली चमकी।
और फ़िरोज़ की कलाई पर काली घड़ी का निशान उभर आया।
हवेली का आख़िरी दरवाज़ा
फ़िरोज़ हवेली की ओर भागा।
मुख्य दरवाज़ा खुला था।
अंदर कोई आवाज़ नहीं थी।
न बारिश। न हवा। न दीयों की लौ।
पूरा हॉल मृत जैसा शांत था।
दीवार पर लगी तस्वीरों में अब सभी चेहरे गायब थे।
सलीम का चेहरा नहीं था। अम्मी का चेहरा नहीं था। नूर का चेहरा नहीं था।
हर तस्वीर में सिर्फ़ एक खाली सफ़ेद जगह थी।
फ़िरोज़ ने एक तस्वीर उठाई।
पीछे लिखा था—
“जिसका चेहरा मिट जाए, उसकी आत्मा मालिक की हो जाती है।”
उसने तस्वीर ज़मीन पर फेंक दी।
“मालिक!”
उसकी आवाज़ पूरे हॉल में गूँज गई।
ऊपर की मंज़िल से कदमों की आवाज़ आई।
कोई सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था।
धीरे-धीरे।
एक… दो… तीन…
फ़िरोज़ ने ऊपर देखा।
सीढ़ियों पर उसकी अम्मी खड़ी थीं।
सफ़ेद कपड़ों में।
उनके हाथ में चाँदी की डिबिया थी।
“बेटा…”
फ़िरोज़ की आँखें भर आईं।
“अम्मी?”
“मेरे पास आओ।”
फ़िरोज़ एक कदम आगे बढ़ा।
फिर रुक गया।
“आप सच में मेरी अम्मी हैं?”
अम्मी ने कहा—
“हाँ।”
“तो मेरा असली नाम क्या है?”
अम्मी का चेहरा बदल गया।
एक पल के लिए उनकी आँखें काली हुईं।
फिर वह मुस्कुराईं।
“तुम्हारा नाम फ़िरोज़ है।”
फ़िरोज़ पीछे हट गया।
“आप झूठ बोल रही हैं।”
“मैं तुम्हारी माँ हूँ।”
“आपने कहा था मेरा जन्म 1987 में हुआ था।”
“हाँ।”
“आपने कहा था आपने मुझे बनाया था।”
“हाँ।”
“तो मेरा असली नाम क्या है?”
अम्मी चुप रहीं।
फ़िरोज़ ने चीखकर कहा—
“बताइए!”
अम्मी की आँखों से आँसू बहने लगे।
“तुम्हारा असली नाम… आरिफ़ नहीं है।”
फ़िरोज़ का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
“तो क्या है?”
अम्मी ने सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए कहा—
“आरिफ़ उस बच्चे का नाम था जो तुम्हारे जन्म से पहले मर गया था।”
फ़िरोज़ की आँखें फैल गईं।
“क्या?”
“मालिक ने उसी बच्चे का चेहरा पहनकर तुम्हें बनाया।”
“तो मैं कौन हूँ?”
अम्मी उसके सामने आ गईं।
उन्होंने उसकी कलाई पकड़ी।
“तुम फ़िरोज़ हो।”
“सच?”
“हाँ।”
“तो फिर मालिक मुझे आरिफ़ क्यों कहता है?”
अम्मी ने धीरे से कहा—
“क्योंकि वह तुम्हें अपने मरे हुए बेटे की जगह देखता है।”
हॉल में अचानक ठंडी हवा फैल गई।
फ़िरोज़ ने काँपते हुए पूछा—
“मालिक का बेटा?”
अम्मी ने सिर झुका लिया।
“मालिक कभी इंसान था।”
“उसका बेटा कौन था?”
अम्मी ने फ़िरोज़ की ओर देखा।
“आरिफ़।”
फ़िरोज़ के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई।
“तो आरिफ़… मालिक का बेटा था?”
“हाँ।”
“और मैं?”
अम्मी ने जवाब नहीं दिया।
तभी हॉल के बीच एक काली परछाईं उभरी।
मालिक।
उसके साथ आरिफ़ का धुँधला चेहरा था।
मालिक ने कहा—
“अब उसे पूरी बात बता दो, सलीमा।”
अम्मी ने फ़िरोज़ का हाथ कसकर पकड़ लिया।
“भागो!”
मालिक हँसा।
“कहाँ जाएगा? इस बार हवेली के बाहर भी वही है जो अंदर है।”
फ़िरोज़ ने चारों ओर देखा।
मुख्य दरवाज़े की जगह अब एक दीवार थी।
खिड़कियाँ बंद थीं।
सीढ़ियाँ गायब हो चुकी थीं।
हॉल बदलकर एक गोल कमरे में बदल गया।
मालिक धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
“फ़िरोज़, तुमने मेरा नाम सुना। तुमने आरिफ़ का नाम सुना। अब तुम्हें अपना नाम भी सुनना होगा।”
फ़िरोज़ ने अम्मी की ओर देखा।
“मुझे बचाइए।”
अम्मी रोते हुए बोलीं—
“मैंने कोशिश की थी।”
“अब भी कोशिश कीजिए!”
मालिक ने हाथ उठाया।
अम्मी हवा में उठ गईं।
फ़िरोज़ चीख पड़ा—
“उन्हें छोड़!”
“तुम्हारी माँ को बचाने के लिए एक ही रास्ता है।”
“क्या?”
“अपना असली नाम बोलो।”
फ़िरोज़ ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तुम्हें अपनी माँ से प्यार नहीं?”
“है!”
“तो फिर बोलो।”
मालिक ने अम्मी का गला दबाया।
अम्मी की साँस रुकने लगी।
फ़िरोज़ टूट गया।
“रुक जाओ!”
मालिक ने मुस्कुराकर कहा—
“बस एक नाम।”
फ़िरोज़ के कानों में अजीब आवाज़ें आने लगीं।
किसी बच्चे की हँसी। किसी औरत का रोना। सलीम की पुकार। नूर की चीख।
और फिर—
एक ऐसी आवाज़, जो उसके भीतर से उठ रही थी।
“मेरा नाम…”
फ़िरोज़ ने आँखें बंद कर लीं।
मालिक ने फुसफुसाकर कहा—
“हाँ… बोलो…”
फ़िरोज़ के होंठ काँपे।
“मेरा नाम…”
तभी उसकी कलाई पर बनी काली घड़ी का निशान चमक उठा।
कमरे की दीवार पर एक नया वाक्य उभरा—
“नाम बोलने वाला मर जाएगा।”
फ़िरोज़ ने आँखें खोल दीं।
उसने मालिक की ओर देखा।
“तू चाहता है कि मैं अपना नाम बोलूँ?”
मालिक मुस्कुराया।
“हाँ।”
“तो मैं नहीं बोलूँगा।”
मालिक का चेहरा पहली बार बदल गया।
“क्या?”
फ़िरोज़ ने अम्मी की ओर देखा।
“मैं अपना नाम खुद तय करूँगा।”
मालिक गरजा—
“तुम्हारा नाम पहले से लिखा जा चुका है!”
“तो मैं उसे मिटा दूँगा!”
फ़िरोज़ ने ज़मीन पर पड़ी लोहे की छड़ी उठा ली।
उसने अपनी कलाई पर बने काले निशान पर पूरी ताक़त से वार किया।
कलाई से काला धुआँ फूटा।
मालिक चीख उठा।
अम्मी नीचे गिर पड़ीं।
नूर की आवाज़ पूरे कमरे में गूँजी—
“फ़िरोज़! निशान मत तोड़ना!”
लेकिन फ़िरोज़ ने दूसरा वार कर दिया।
काली घड़ी का निशान टूट गया।
और उसी पल फ़िरोज़ के सीने से एक भयानक चीख निकली।
उसके शरीर से दो परछाइयाँ अलग हुईं—
एक फ़िरोज़ की।
दूसरी आरिफ़ की।
दोनों परछाइयाँ उसके सामने खड़ी थीं।
आरिफ़ ने फ़िरोज़ की ओर देखा।
“तुमने हमें अलग कर दिया।”
फ़िरोज़ ने काँपते हुए पूछा—
“अब क्या होगा?”
आरिफ़ ने मालिक की ओर देखा।
“अब मालिक को चुनना होगा।”
मालिक की आँखें लाल हो गईं।
“मैं अपने बेटे को चुनता हूँ।”
वह आरिफ़ की ओर बढ़ा।
लेकिन आरिफ़ पीछे हट गया।
“मैं तुम्हारा बेटा नहीं हूँ।”
मालिक रुक गया।
आरिफ़ ने कहा—
“मैं तुम्हारी गलती हूँ।”
फिर उसने फ़िरोज़ की ओर देखा।
“और तुम… उसकी सज़ा।”
अचानक आरिफ़ की परछाईं आग की तरह जलने लगी।
मालिक चीखता हुआ उसकी ओर झपटा।
दोनों परछाइयाँ एक-दूसरे में समा गईं।
हॉल में काली आँधी उठी।
फ़िरोज़ ने अम्मी को उठाया।
“अम्मी, चलिए!”
अम्मी ने मुश्किल से आँखें खोलीं।
“बेटा… अभी नहीं…”
“क्यों?”
उन्होंने हॉल के बीच देखा।
वहाँ अब मालिक नहीं था।
सिर्फ़ काली घड़ी पड़ी थी।
और उसके नीचे खून से लिखा था—
“आरिफ़ मर चुका है।”
फ़िरोज़ ने राहत की साँस ली।
लेकिन तभी काली घड़ी फिर चलने लगी।
टिक… टिक… टिक…
उसकी सुइयाँ 2:47 से आगे बढ़ीं।
पहली बार।
2:48।
अम्मी का चेहरा डर से सफ़ेद पड़ गया।
“नहीं…”
फ़िरोज़ ने पूछा—
“क्या हुआ?”
अम्मी ने काँपते हुए कहा—
“समय आगे बढ़ गया है।”
“तो?”
“अब 39 साल का चक्र पूरा हो चुका है।”
हॉल की दीवारें टूटने लगीं।
हवेली के नीचे से किसी विशाल चीज़ के जागने की आवाज़ आई।
धरती काँपने लगी।
दूर कहीं घंटियाँ बजने लगीं।
और फिर—
हवेली के हर दरवाज़े पर एक ही शब्द उभर आया—
“मालिक नहीं जागा…”
कुछ पल बाद दूसरा वाक्य दिखाई दिया—
“मालिक को जगाने वाला जाग गया।”
फ़िरोज़ ने अम्मी की ओर देखा।
“कौन?”
अम्मी ने उसकी आँखों में देखा।
उनके चेहरे पर डर नहीं, मातम था।
“तुम।”
फ़िरोज़ के पीछे अँधेरे में किसी ने धीरे से फुसफुसाया—
“फ़िरोज़…”
वह मुड़ा।
वहाँ कोई नहीं था।
फिर वही आवाज़ आई—
“या फिर… आरिफ़?”
फ़िरोज़ ने देखा—
उसकी अपनी परछाईं अब उसके साथ नहीं थी।
वह दीवार पर अलग खड़ी थी।
और उसकी परछाईं के हाथ में—
काली घड़ी थी।
एपिसोड 7 समाप्त।