PretikaReal Experiencesज़ुल्फ़िक़ार

ज़ुल्फ़िक़ार - भाग दो

nik · Real Experiences · 15 मिनट

Writer
nik
Story
ज़ुल्फ़िक़ार
Chapter
2 of 2
Category
Real Experiences
Reading time
15 min
Words
2837
Language
Hindi (हिंदी)
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Free to read

आग और रूह के बीच

「 जो प्यार करता है — वो डरता नहीं। जो डरता है — उसे प्यार नहीं हुआ। 」
— ✦✦✦ —

भाग दो शुरू होने से पहले

मैंने भाग एक में बताया था — कि मैंने भरोसा किया।
अब जो आगे लिख रही हूँ — वो उस भरोसे की कहानी है।
कुछ रातें होती हैं जो ज़िंदगी को दो हिस्सों में काट देती हैं — पहले और बाद में।
मेरी ज़िंदगी में ऐसी तीन रातें आईं।
पहली — जब ज़ुल्फ़िक़ार ने पहली बार मेरा हाथ थामा।
दूसरी — जब उसके दुश्मन आए और मैंने रीमा की आँखों में मौत देखी।
तीसरी — जब मुझे चुनना पड़ा।
यह तीनों रातें इस भाग में हैं।
और अंत —
अंत के बारे में — पहले से नहीं बताऊँगी।
इसलिए नहीं कि dramatic हूँ।
इसलिए कि अभी तक — मैं खुद नहीं जानती — वो अंत था — या शुरुआत।
— ✦✦✦ —
अध्याय १५ : जब ज़ुल्फ़िक़ार ने process शुरू की
— अक्टूबर का पहला हफ़्ता —

उसने बताया — कुछ रस्में होती हैं।
जिन्न से इंसान बनने की।
और उन रस्मों में — मुझे हिस्सा लेना था।
'मुझे?' मैंने पूछा।
❝ यह process तब होती है जब — जब कोई इंसान किसी जिन्न को — अपनी ज़िंदगी में शामिल करना चाहे। अपनी मर्ज़ी से। ❞
'मर्ज़ी से मतलब?'
❝ कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं। कोई जादू नहीं। बस — तुम चाहो। ❞
'और अगर मैं — डर जाऊँ? बीच में?'
उसने मेरी आँखों में देखा।
❝ तो process रुक जाएगी। और मैं — वापस चला जाऊँगा। हमेशा के लिए। ❞
'हमेशा के लिए मतलब — तुम्हारी दुनिया?'
❝ हाँ। और इस दुनिया में — कभी नहीं आऊँगा। ❞
एक ख़ामोशी।
'और अगर process पूरी हो जाए?'
❝ तो — मैं यहाँ हूँ। इंसान की तरह। तुम्हारे साथ। ❞
'हमेशा?'
❝ जब तक तुम चाहो। ❞

पहली रस्म — वो बताई।
तीन रातें।
हर रात — एक काम।
पहली रात — मुझे उसके नाम की आग में हाथ डालना था।
'आग में?' मेरी आवाज़ काँपी।
❝ जिन्न की आग — जलाती नहीं। बस परखती है। ❞
'परखती है मतलब?'
❝ देखती है — डर है या नहीं। ❞
'और अगर डर हो?'
❝ आग बुझ जाती है। Process ख़त्म। ❞
दूसरी रात — उसका असली नाम बोलना था।
'ज़ुल्फ़िक़ार — यही नाम है ना?'
उसने एक पल रुककर देखा।
❝ यह नाम — जो मैंने बताया — यह नहीं है। ❞
'तो?'
❝ असली नाम — हमारी दुनिया में — एक रूह का सबसे कमज़ोर हिस्सा होता है। जो जानता है — उसके हाथ में — सब कुछ है। ❞
'और तुम मुझे बताओगे?'
उसने मेरी आँखों में देखा — लंबे वक़्त तक।
❝ हाँ। ❞
'तीसरी रात?'
❝ तीसरी रात — सबसे मुश्किल है। ❞
'क्यों?'
❝ तीसरी रात — वो आएंगे। मेरे दुश्मन। रोकने के लिए। और उस रात — तुम्हें अकेले उनसे लड़ना होगा। ❞
'मैं अकेले? जिन्नों से?'
❝ तुम्हारे पास एक चीज़ होगी। जो उनके पास नहीं है। ❞
'क्या?'
❝ इंसानी रूह का यक़ीन। वो सबसे बड़ी ताक़त है। ❞
— ✦✦✦ —
अध्याय १६ : पहली रस्म — आग
— रात १०:१५ —

उस रात — उसके घर में थी। पहली बार।
घर — अंदर से अलग था।
बाहर से जो टूटा-फूटा लगता था — अंदर वो था जो शायद किसी ने उम्मीद नहीं की होगी।
ऊँचे कमरे। दीवारों पर लिपाई नहीं — बल्कि नक्काशी। पुरानी, गहरी, ऐसी जो दीवार नहीं थी — पूरी दुनिया थी।
फ़र्श पर एक बड़ा गोल घेरा था — काली लकीरों से।
उसके बीच में — एक लौ।
नीली।
ज़मीन पर रखी। किसी चराग़ में नहीं।
बस — जल रही थी। अपने आप।
'यह —'
❝ यह मेरी है। मेरी आग। ❞
'जिन्न की आग नीली होती है?'
❝ हर जिन्न की आग का रंग — उसकी रूह का रंग होता है। ❞
'और तुम्हारी रूह नीली है?'
वो मुस्कुराया।
❝ तुम क्या सोचती हो? ❞
मैंने उस लौ को देखा।
नीली — लेकिन उसमें एक धारी थी। सुनहरी।
'वो सुनहरी लकीर?'
उसकी साँस रुकी।
वो एक पल के लिए — असहज हुआ।
❝ वो — तुम्हारी वजह से है। ❞
'मेरी?'
❝ जब से — जब से मैंने तुम्हें पहली बार देखा — वो आई। ❞
ख़ामोशी।
आग की आवाज़।
मेरे दिल की धड़कन।

'ठीक है।' मैंने कहा।
मैं उस घेरे के पास गई।
ज़ुल्फ़िक़ार ने कहा:
❝ हाथ डालो — धीरे। डरो मत। ❞
मैंने हाथ बढ़ाया।
लौ के पास — गर्मी थी।
लेकिन normal आग जैसी नहीं।
यह — यह एक एहसास था।
जैसे कोई तुम्हें परख रहा हो।
जैसे कोई तुम्हारी आँखों के पीछे झाँक रहा हो।
'डर लग रहा है।' मैंने सच बोला।
आग काँपी।
❝ मुझे पता है। लेकिन हाथ डालो। ❞
मैंने आँखें बंद कीं।
और हाथ लौ में डाला।
एक पल।
ठंडक।
गर्मी नहीं — ठंडक।
जैसे किसी ने हथेली पर बर्फ़ रखी हो।
फिर — एक झटका।
आँखें खोलीं।
आग — और ज़्यादा नीली हो गई थी।
और सुनहरी लकीर — और चौड़ी।
ज़ुल्फ़िक़ार की साँस तेज़ हुई।
❝ पहली रस्म — पूरी। ❞
'यह इतना आसान था?'
उसने मेरी तरफ देखा।
❝ डर था — लेकिन हाथ नहीं रुका। इसीलिए पूरी हुई। ❞
मेरी हथेली पर — एक निशान था।
हलका। नीला।
एक अक्षर। अरबी।
'यह?'
❝ ज़ाद। मेरे असली नाम का पहला हर्फ़। ❞
— ✦✦✦ —

अध्याय १७ : दूसरी रस्म — असली नाम
— अगली रात —

दूसरी रात — वो पहले से ज़्यादा तनावग्रस्त था।
छत पर था। जब मैं ऊपर आई — वो घंटों से वहाँ था।
उसे देखकर मुझे एहसास हुआ — वो डरा हुआ था।
हज़ार साल पुरानी रूह — डरी हुई।
'क्या हुआ?'
❝ असली नाम देना — आसान नहीं है। ❞
'क्यों?'
❝ क्योंकि — अगर तुमने वो नाम किसी दुश्मन को बताया — या वो सुन लिया — तो मैं ख़तरे में हूँ। ❞
'मैं नहीं बताऊँगी।'
❝ मुझे पता है। लेकिन — डर लगता है। ❞
वो यह कह रहा था।
मुझे — डर लगता है।
मैंने उसे देखा।
'ज़ुल्फ़िक़ार — या जो भी तुम्हारा नाम है — मैं समझती हूँ। अगर नहीं बताना तो मत बताओ।'
उसने मेरी तरफ देखा।
एक लंबी ख़ामोशी।
फिर उसने कहा — इतने धीरे कि हवा ने भी नहीं सुना होगा:
❝ ज़ुनैर। ❞
मेरी साँस रुकी।
'ज़ुनैर।'
उसने आँखें बंद कीं।
जैसे किसी ने उसे अंदर से छुआ हो।
जैसे दर्द हुआ हो।
जैसे — राहत मिली हो।
❝ तुमने सही बोला। ❞
'ज़ुनैर।' मैंने फिर कहा।
उसकी आँखें खुलीं।
उनमें — नीली रोशनी नहीं थी।
भूरी आँखें थीं।
गहरी भूरी।
इंसानी।
❝ दूसरी रस्म — पूरी। ❞
'कल — तीसरी?'
❝ कल। ❞
'वो दुश्मन — कितने हैं?'
वो रुका।
❝ तीन। ❞
'तीन जिन्न।'
❝ नहीं। वो जिन्न नहीं हैं। ❞
'तो क्या हैं?'
उसने आसमान देखा।
❝ पुराने। बहुत पुराने। मेरे बनने से भी पहले के। ❞
'और मैं उनसे — अकेले —'
❝ तुम्हारे पास ज़ुनैर का नाम है। जो जान ले उसका असली नाम — उसे hurt नहीं किया जा सकता। यह उनका नियम है। ❞
'उनका नियम?'
❝ पुरानी दुनिया के नियम। जो सबसे पहले बने — वो सब मानते हैं। मेरे दुश्मन भी। ❞
मैंने हथेली देखी। वो नीला अक्षर।
'ठीक है।'
वो मेरी तरफ मुड़ा।
❝ ज़ारा — अगर कल — ❞
'मत कहो।'
वो चुप हो गया।
मैंने उसकी आँखों में देखा।
'कल रात — सब ठीक होगा।'
उसने एक पल के लिए — मेरा हाथ थामा।
बस एक पल।
और छोड़ दिया।
❝ हाँ। ❞
— ✦✦✦ —

अध्याय १८ : रीमा ने जो देखा
यह मैंने बाद में जाना — रीमा ने उस रात क्या देखा।
वो बताती नहीं — अब भी कम बात करती है उस बारे में।
लेकिन जो बताया — वो यह था:

उस रात — जब मैं ज़ुल्फ़िक़ार के घर में पहली रस्म कर रही थी — रीमा अपने कमरे में थी।
उसने देखा — बाहर, गली में, तीन साये।
लंबे। बहुत लंबे।
चलते नहीं। बस — खड़े थे। हमारे घर की तरफ मुँह किए।
रीमा ने खिड़की बंद की।
और तब — बाहर से एक आवाज़ आई।
एक बच्चे की।
बिल्कुल छोटे बच्चे की।
'आपा! आपा!'
मेरी आवाज़ में।
'आपा — अंदर आ जाओ! डर लग रहा है!'
रीमा ने दरवाज़ा नहीं खोला।
वो ग्यारह साल की थी — लेकिन उसे पता था।
'वो तुम नहीं थीं।' उसने मुझे बाद में बताया।
'कैसे पता?'
'आपा — आप कभी 'डर लग रहा है' नहीं बोलतीं। आप बोलती हैं — 'मुझे डर लग रहा है।'
छोटी-सी बात।
उस छोटी-सी बात ने उसे बचाया।
वो आवाज़ — बाहर रही। एक घंटे।
फिर बंद हो गई।
और रीमा ने — सुबह तक — अपने कमरे का दरवाज़ा नहीं खोला।
वो रात — मुझे उसकी बात सुनकर — शर्म आई।
शर्म इसलिए कि उसे — उस उम्र में — अकेले इससे लड़ना पड़ा।
और मुझे पता नहीं था।
— ✦✦✦ —

अध्याय १९ : तीसरी रस्म — वो रात
— यह अध्याय अँधेरे में मत पढ़ो —

तीसरी रात — ज़ुल्फ़िक़ार ने कहा:
❝ घर में रहना। घेरा खींचूँगा — ज़मीन पर। उससे बाहर मत जाना। चाहे जो हो। ❞
'और तुम?'
❝ मैं — process में हूँगा। बीच की अवस्था में। न पूरा जिन्न, न पूरा इंसान। ❞
'यानी?'
❝ यानी — उस वक़्त — मैं कमज़ोर हूँगा। और वो आएंगे। ❞
उसने ज़मीन पर घेरा खींचा — नमक से और कुछ और से।
मुझे उस घेरे में बैठाया।
'तुम कहाँ रहोगे?'
❝ बाहर। ❞
'बाहर? तुम — कमज़ोर अवस्था में — बाहर?'
उसने मेरी आँखों में देखा।
❝ यह मेरी लड़ाई है। तुम्हारा काम — घेरे में रहना है। ❞
'और अगर —'
❝ अगर वो अंदर घुसने की कोशिश करें — ज़ुनैर का नाम बोलो। बस। ❞
'बस?'
❝ बस। ❞
वो मुड़ा।
'ज़ुल्फ़िक़ार —'
वो रुका।
'वापस आना।'
एक पल।
❝ हाँ। ❞

रात के ग्यारह बजे — शुरू हुआ।
पहले — घर के बाहर की बत्तियाँ गईं।
सब एक साथ।
पूरी गली।
फिर — मेरे घर की बिजली।
अँधेरा।
मेरे हाथ में एक मोमबत्ती थी।
रीमा — अम्मी — उनके कमरे में थीं। मैंने कहा था — दरवाज़ा बंद, आँखें बंद, जो भी सुनो — ना देखो।
मैं नीचे थी। घेरे में।
बाहर — आवाज़ें शुरू हुईं।
पहले — दूर। जैसे हवा।
फिर — पास।
फिर —
दरवाज़े पर।
धमाकेदार। एक बार।
दो बार।
तीन बार।
दरवाज़ा हिला — लेकिन टूटा नहीं।
ख़ामोशी।
फिर — खिड़की।
शीशा — अंदर की तरफ आया। बिना टूटे।
जैसे लहरें।
मोमबत्ती काँपी।
और तब — एक आवाज़।
पहले वाली नहीं। नई।
धीमी। गहरी। ऐसी जो हड्डियों में उतरती थी।
❝ लड़की। ❞
मेरी साँस रुकी।
'कौन हो?'
❝ हम वो हैं जो थे जब यह दुनिया नहीं थी। ❞
'क्या चाहते हो?'
❝ ज़ुनैर को। उसे अपनी दुनिया में वापस आना है। ❞
'वो अपनी मर्ज़ी से नहीं आएगा।'
❝ तो — उसकी मर्ज़ी — तुम हो। ❞
मैं समझी।
वो मुझे लेना चाहते थे — ज़ुनैर को खींचने के लिए।
अगर मैं उनके साथ जाऊँ — वो वापस आएगा।
मेरे पाँव उठे।
घेरे से बाहर जाने को।
रुको।
खुद को रोका।
ज़ुनैर ने कहा था — घेरे से बाहर मत जाना। चाहे जो हो।
मैं बैठी रही।
आवाज़ — ज़्यादा करीब आई।
❝ आओ। ❞
'नहीं।'
❝ वो तुम्हें कभी पूरा नहीं दे सकता। आधा इंसान बनेगा — तुम्हारे लिए। और तुम — उसके लिए — पूरी ज़िंदगी दे दोगी। ❞
'वो मेरा फ़ैसला है।'
ख़ामोशी।
और तब — दरवाज़ा।
खुला।
धीरे।
बिना आवाज़ के।
अँधेरे में — एक शक्ल।
लंबी।
अनगिनत आँखें।
मेरी तरफ आती।
ज़ुनैर!!
मैं चीख़ी।
और रुक गई वो शक्ल।
बस एक क़दम पर।
उसकी आँखें — सब की सब — मुझ पर।
नाम काम किया।
लेकिन रुकी — बस।
चली नहीं गई।
धीरे-धीरे — घेरे की तरफ आने लगी।
'ज़ुनैर!' फिर चीख़ी।
वो रुकी।
फिर चली।
घेरे के ऊपर —
बाहर से एक रोशनी आई।
नीली।
पूरे कमरे में भर गई।
वो शक्ल — जल गई।
आवाज़ — एक चीख़।
और ख़ामोशी।
पूरी।

ज़ुनैर दरवाज़े में था।
थका हुआ।
उसके हाथ काँप रहे थे।
उसके कपड़े — जले हुए।
उसकी आँखें — भूरी।
पूरी भूरी।
नीली रोशनी — गई।
मैं घेरे से उठी।
उसके पास गई।
'तुम ठीक हो?'
उसने मुझे देखा।
उसकी आँखों में — पहली बार — आँसू थे।
और वो — बस — एक जगह बैठ गया।
ज़मीन पर।
थककर।
मैं उसके पास बैठी।
उसका हाथ थामा।
इस बार — गर्म था।
पूरी तरह।
इंसान की तरह।
— ✦✦✦ —

अध्याय २० : भोर में
— सुबह के ४:३० —

भोर से पहले वाला वक़्त — जब आसमान काला नहीं रहता, लेकिन नीला भी नहीं होता।
एक ऐसा रंग जो बीच का है।
हम दोनों ज़मीन पर बैठे थे।
ज़ुनैर ने एक घंटे में कुछ नहीं बोला था।
मैंने भी नहीं।
फिर उसने कहा:
❝ तीसरी रस्म — पूरी। ❞
'मतलब —'
❝ मतलब — process — complete। ❞
मैंने उसे देखा।
'तुम — अब?'
❝ अभी नहीं। कुछ दिन लगेंगे। धीरे-धीरे। लेकिन — हाँ। ❞
मेरी आँखें भरीं।
'और तुम्हारी दुनिया?'
❝ गई। ❞
एक शब्द।
उसने इसे इतनी शांति से कहा।
'तुम्हें — दुख नहीं है?'
उसने मेरी तरफ देखा।
उसकी भूरी आँखों में — एक पल — वो पुरानापन आया।
हज़ार साल का।
फिर — गया।
❝ हज़ार साल में — एक भी पल ऐसा नहीं था जो — इस पल जैसा हो। ❞
बाहर — पहली चिड़िया बोली।
फिर दूसरी।
आसमान — नीला होने लगा।
मैंने सोचा — यह ख़्वाब है।
मेरी हथेली पर वो नीला अक्षर था।
ज़ाद।
ज़ुनैर के नाम का पहला हर्फ़।
नहीं — ख़्वाब नहीं था।
— ✦✦✦ —

अध्याय २१ : जो हफ़्ते बाद हुआ
— और रीमा की बात —

हफ़्ते भर — ज़ुनैर बदलता रहा।
पहले दिन — उसके हाथ कभी-कभी ठंडे हो जाते।
दूसरे दिन — उसे धूप से असुविधा होती थी।
तीसरे दिन — उसने पहली बार खाना खाया।
उसने एक कौर लिया।
चबाया।
और अपनी आँखें बंद कर लीं।
'क्या हुआ?'
❝ यह — यह क्या है? ❞
'दाल-चावल।'
उसने फिर खाया।
और उसके चेहरे पर — एक expression आया जो मैंने describe नहीं किया जा सकता।
एक जिन्न — जो हज़ार साल जिया — पहली बार दाल खा रहा था।
मैं हँसी।
पहली बार — उन दिनों में — सच में हँसी।
और वो — उसने भी हँसा।
इंसान की हँसी।

रीमा ने उसे एक दिन देखा।
वो आई — चाय लेकर।
हम छत पर थे।
वो रुकी।
ज़ुनैर ने उसे देखा।
वो एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर रीमा ने कहा:
'आपा — यह वही है ना?'
'हाँ।'
रीमा ने ज़ुनैर को देखा।
'तुमने उस रात बाहर खड़े होने से रोका था? उन्हें?'
ज़ुनैर — एक पल रुका।
❝ हाँ। ❞
रीमा ने चाय रखी।
और वापस जाते हुए कहा:
'शुक्रिया।'
ज़ुनैर ने उसे जाते देखा।
उसके चेहरे पर — कुछ था।
मुझे नहीं पता — उसे क्या लगा।
लेकिन उसकी आँखें — भरी थीं।
— ✦✦✦ —

अध्याय २२ : अम्मी को बताना

यह — यह सबसे मुश्किल था।
अम्मी को बताना।
मैंने दो हफ़्ते टाला।
फिर एक शाम — ज़ुनैर ने कहा:
❝ उन्हें बताओ। ❞
'वो — वो मानेंगी नहीं।'
❝ शायद। लेकिन छुपाना ज़्यादा मुश्किल है। ❞
उस शाम — अम्मी रसोई में थीं।
मैं उनके पास गई।
'अम्मी — एक बात बतानी थी।'
उन्होंने देखा।
'बगल वाला — वो जो आया है — वो...।'
मैं रुकी।
कैसे कहूँ?
'वो — अजीब है।'
अम्मी ने हाथ रोका।
'कितना अजीब?'
'बहुत।'
वो चुप रहीं।
फिर:
'तुम उससे बात करती हो।'
'हाँ।'
'तुम उसके घर गई हो।'
'हाँ।'
लंबी ख़ामोशी।
'बेटी — मैं बूढ़ी हूँ। लेकिन अंधी नहीं।'
मैंने उनकी तरफ देखा।
उनकी आँखों में — एक थकान थी। एक माँ की थकान जो जानती है लेकिन बोलती नहीं।
'उसे लाओ। एक बार।'
'अम्मी —'
'लाओ।'

वो आया।
अम्मी ने उसे देखा — पूरे वक़्त तक।
ज़ुनैर — चुप रहा। सिर झुकाए।
अम्मी ने कहा:
'तुम जिन्न हो।'
ज़ुनैर ने सिर उठाया।
उसकी आँखों में — हैरानी।
❝ आपको कैसे पता? ❞
अम्मी ने लंबी साँस ली।
'मेरी नानी बताती थीं। उनकी दादी ने देखे थे।' वो उठीं। 'चाय पियोगे?'
ज़ुनैर ने मेरी तरफ देखा।
मैंने कंधे उचकाए।
❝ हाँ। ❞
वो शाम — अम्मी ने उससे घंटों बात की।
पुरानी दुनिया की। पुराने क़िस्सों की।
और ज़ुनैर ने — धीरे-धीरे — खुल कर बात की।
जो मैंने नहीं सुना था — वो सब।
रात को जाते हुए अम्मी ने उसका हाथ पकड़ा।
'ख़याल रखना उसका।'
❝ रखूँगा। ❞
वो गया।
मैंने अम्मी को देखा।
'आप नाराज़ नहीं हैं?'
वो मुस्कुराईं।
'नाराज़ होने से क्या होगा? जो है — है। बस — उसे जानती थी बेटी।' वो रुकीं। 'वो तुम्हें प्यार करता है। यह दिखता है।'
मेरे दिल में — कुछ पिघला।
— ✦✦✦ —

अध्याय २३ : एक रात की बात — जो अब तक है
— अक्टूबर का आखिर —

ज़ुनैर — इंसान बनने की process में — एक दिन छत पर बैठा था।
आसमान देख रहा था।
मैं उसके पास आई।
'क्या सोच रहे हो?'
उसने मुझे देखा।
❝ कि — अगर मैं इंसान होता — तो यह ज़िंदगी कैसी होती। ❞
'यह ज़िंदगी — अभी कैसी है?'
वो मुस्कुराया।
❝ अजीब। अच्छी। डरावनी। ❞
'डरावनी क्यों?'
❝ क्योंकि — जो कभी नहीं था — वो है अब। ❞
'क्या?'
उसने आसमान देखा।
❝ गँवाने का डर। ❞
ख़ामोशी।
'ज़ुनैर।'
'हाँ।'
'मुझे भी डर लगता है।'
उसने मेरी तरफ देखा।
'कि यह सब — ख़त्म हो जाएगा। कि — तुम एक दिन जाओगे। या मैं जाऊँगी। या कुछ और होगा।'
उसने कुछ नहीं कहा।
बस — मेरे पास आया।
और मेरा हाथ थामा।
'यह डर — यह इंसानी है।' उसने कहा — normal आवाज़ में।
पहली बार।
उर्दू की शायरी के बिना।
'हाँ।'
'तो अच्छा है।' वो बोला। 'मुझे भी यही सीखना है।'
मैं हँसी।
वो भी।
और उस पल में — हवा थी। नीम के पत्ते थे। दूर कोई अज़ान दे रहा था।
और हम दोनों — एक छत पर — हाथ थामे।
बस।
— ✦✦✦ —

अध्याय २४ : वो बात जो मैंने नहीं बताई
— यह आखिरी अध्याय है। इसे ध्यान से पढ़ो। —

मैंने शुरू में कहा था — यह diary नहीं, confession है।
अब confession का वक़्त है।

ज़ुनैर — इंसान नहीं बना।
process complete नहीं हुई।
वो — अभी भी — वही है। आधा जिन्न, आधा नहीं।
लेकिन वो यहाँ है।
इस गली में।
उसी घर में।
और वो दिन में आता है। रात को जाता है।
कभी-कभी रात को भी रुकता है — छत पर।
अम्मी उसके लिए खाना बनाती हैं।
रीमा उससे अजीब-अजीब सवाल पूछती है — 'सबसे पुरानी ज़बान कौन सी है?' 'क्या मछलियाँ सोती हैं?'
और वो — धैर्य से जवाब देता है।

confession यह है:

वो दुश्मन — जो तीसरी रात आए थे — वो गए नहीं।
एक गया।
दो — अभी भी हैं।
कहाँ — ज़ुनैर को पता है।
मुझे — कभी-कभी — पता चलता है।
जब रात को — कोई आहट होती है।
जब बिना वजह बत्ती जाती है।
जब नीम का पेड़ बिना हवा के हिलता है।
ज़ुनैर कहता है — 'घबराओ मत।'
मैं घबराती नहीं।
अब।
पहले घबराती थी।
लेकिन — जो उस आग से गुज़री — उसके बाद —
थोड़ा-थोड़ा — डर कम हो जाता है।
हर बार।

और confession का दूसरा हिस्सा:

वो अँगूठी — जो ज़ुनैर ने दी थी — जो मैंने नहीं ली थी —
एक दिन वो मेरी drawer में थी।
मैंने उसे उठाया।
उसे देखा।
काली धातु। पुरानी नक्काशी।
और मैंने — पहन ली।
उस रात ज़ुनैर आया। छत पर।
उसने मेरा हाथ देखा।
उसकी आँखें — भरीं।
'तुमने —'
'हाँ।'
'लेकिन — यह बंधन है।'
'मुझे पता है।'
'तुम — हमेशा के लिए —'
'मुझे पता है।'
वो चुप रहा।
फिर उसने कहा — इतने धीरे:
❝ तुम — पागल हो। ❞
मैंने मुस्कुराया।
'तुमने भी यही कहा था। पहली बार।'
उसने भी मुस्कुराया।
उसने मेरी वो उँगली थामी जिसमें अँगूठी थी।
उसका हाथ — ठंडा।
मेरा — गर्म।
बीच में — एक temperature था।
न ठंडा। न गर्म।
बस — सही।

यह confession — इसलिए लिखी — कि जो कोई इस जैसी जगह आए।
जो कोई किसी ऐसे से मिले जो इंसान की शक्ल में हो — लेकिन इंसान न हो।
वो जाने — कि कभी-कभी — जो इंसान नहीं है — वो इंसान से ज़्यादा इंसानी हो सकता है।
और कभी-कभी — जो आग से बना है — उसमें भी — रोशनी होती है।

— ✦✦✦ —

— ज़ारा —
लखनऊ।
— ✦✦✦ —

「 ज़ुनैर — इंसान बनने की राह पर है। 」
「 और ज़ारा — हर रात — छत पर है। 」
「 दो दुनियाओं के बीच — एक प्यार। 」
「 अधूरा। लेकिन — असली। 」

— समाप्त —
— ✦✦✦ —

रात को अकेले पढ़ा? खिड़की बंद है ना?

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