PretikaReal Experiencesज़ुल्फ़िक़ार

ज़ुल्फ़िक़ार - भाग — एक

nik · Real Experiences · 22 मिनट

Writer
nik
Story
ज़ुल्फ़िक़ार
Chapter
1 of 2
Category
Real Experiences
Reading time
22 min
Words
4280
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

「 जो रात को अकेले पढ़े, वो पहले एक बार दरवाज़ा बंद कर ले 」
— ✦✦✦ —

शुरुआत से पहले

मेरा नाम ज़ारा है।
और जो मैं लिख रही हूँ — यह मेरी diary नहीं है।
यह confession है।
इसलिए नहीं कि मुझे कोई सज़ा हुई। इसलिए कि जो हुआ — वो किसी के साथ दोबारा हो, इससे पहले कि वो जाने — कि प्यार हमेशा इंसानों से नहीं होता।
कभी-कभी जो आता है — वो इंसान की शक्ल में होता है।
मखमली आवाज़। गहरी आँखें। हाथ जो थामे तो लगे जैसे पूरी दुनिया थम गई।
और तब — बहुत देर हो चुकी होती है।
मेरे साथ जो हुआ, उसे मैं शुरू से लिखूँगी।
जिस रात उससे पहली बार मिली थी — उस रात से।
उस रात से जब मेरी पड़ोसन रोते हुए मेरे दरवाज़े पर आई थी और कह गई थी:
❝ वो घर खाली है, ज़ारा। लेकिन उसमें कुछ है। ❞
मैंने हँस कर उसे टाल दिया था।
काश — मैंने उस रात उसकी बात मान ली होती।
— ✦✦✦ —

अध्याय १ : वो घर
— सितम्बर, लखनऊ —

लखनऊ के पुराने इलाक़े में, हज़रतगंज से थोड़ा आगे, एक गली थी — अमीनाबाद की तरफ जाने वाली सड़क से बाईं तरफ मुड़ो, दो-तीन पुराने मकानों के बाद एक नीम का पेड़। उसके ठीक बाद।
उस गली में हमारा मकान था। किराए का। मैं, अम्मी और छोटी बहन रीमा।
अब्बा — वो बहुत साल पहले चले गए थे। किसी और के साथ।
तो हम तीनों थे। अम्मी की सिलाई, मेरी tuition classes, और रीमा की पढ़ाई।
ज़िंदगी सीधी-सादी थी। थकी हुई। लेकिन चलती थी।
जब तक — बगल वाला घर खाली नहीं हुआ।

उस घर के बारे में लोग कम बात करते थे। जो रहते थे, वो चले जाते थे। छः महीने — एक साल। कोई नहीं टिका।
हमारी पड़ोसन — बीबी अम्मा — एक बुज़ुर्ग औरत जो अपनी बहू के साथ रहती थीं — कहती थीं कि उस घर में पहले किसी ने जान दी थी।
'किसने?'
'एक मर्द था। बहुत साल पहले। कहते हैं उसने किसी को बुलाया था — और जो आया, वो वापस नहीं गया।'
मैंने उसे अफ़वाह माना।
गलती थी।

सितम्बर की शुरुआत में वो घर फिर खुला।
कोई नया किरायेदार आया था — लेकिन अजीब था कि न तो कोई ट्रक आया, न सामान। बस एक सुबह दरवाज़ा खुला मिला। और उस रात से उस घर की खिड़की में रोशनी थी।
मैंने रीमा से कहा — 'देखा? नया किरायेदार आ गया।'
रीमा ने अपनी नाक किताब से नहीं उठाई।
'अम्मी कह रही थीं कि बीबी अम्मा रो रही हैं।'
'क्यों?'
रीमा ने किताब ऊपर की और मुझे देखा। उसकी आँखों में कुछ था — बच्चों वाली सीधी बात कहने की क्षमता।
'क्योंकि उन्हें लगता है कोई बुरी चीज़ वापस आई है।'
मैंने खिड़की से उस घर को देखा।
रोशनी थी — नारंगी, गर्म।
Normal लगी।
बिल्कुल normal।
— ✦✦✦ —

अध्याय २ : पहली मुलाक़ात
— रात ११:४७ —

वो पहली बार मुझे उसी हफ़्ते मिला।
रात के क़रीब बारह बजे — मैं छत पर थी। अम्मी सो चुकी थीं, रीमा भी। मुझे नींद नहीं आती थी उन दिनों। एक student की parent ने fees नहीं दी थी, बिजली का बिल था, रीमा की school fees थी।
ज़िंदगी के हिसाब-किताब।
मैं छत की मुंडेर पर कोहनी टिकाए बाहर देख रही थी। रात ठंडी थी — सितम्बर का आखिर था, हवा में थोड़ी नमी।
और तब उसकी आवाज़ आई।
बगल वाले घर की छत से।
❝ बहुत रात को अकेले? ❞
मैंने चौंककर देखा।
वो वहाँ था। उसकी छत पर। मेरी छत से बस एक दीवार का फ़ासला।
अँधेरे में खड़ा था — इसलिए पहले ठीक से नहीं दिखा। फिर वो थोड़ा आगे आया, उस जगह जहाँ पड़ोस के एक मकान की रोशनी पड़ती थी।
और मैंने उसे देखा।
लम्बा था। बहुत लम्बा — शायद छः फुट से भी ज़्यादा। काले कपड़े पहने थे — कुर्ता, ढीला। बाल थोड़े बड़े, माथे पर एक लट गिरी हुई। चेहरा — तीखा। जबड़ा मज़बूत। होंठ पतले।
और आँखें।
वो आँखें।
इतनी गहरी कि जैसे उनमें झाँकने से नीचे कुछ नहीं मिलेगा।
काली। पूरी काली।
मैंने सोचा — रोशनी की वजह से लग रहा है।
बाद में पता चला — नहीं।

'आप नए आए हैं?' मैंने पूछा — थोड़ा awkward।
वो मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में एक चीज़ थी जो मैं describe नहीं कर सकती — एक गर्माहट जो ख़तरनाक थी।
❝ हाँ। आप से मिलने। ❞
मैं चौंकी।
'माफ़ करें?'
❝ मतलब — इस मोहल्ले में। ❞
उसने जोड़ा। लेकिन उसकी आँखों में एक रोशनी थी जो उसकी बात को झुठलाती थी।
मुझे घर जाना चाहिए था। उस वक़्त।
लेकिन मैं रही।
हम देर तक बात करते रहे।
उसका नाम उसने बताया था — 'ज़ुल्फ़िक़ार।'
अजीब नाम।
'काम क्या करते हैं?'
❝ पुरानी चीज़ें ढूंढता हूँ। खोई हुई चीज़ें। ❞
'जैसे antique?'
वो हँसा — और उसकी हँसी में एक गहराई थी जो मेरे सीने में उतर गई।
❝ हाँ। जैसे antique। ❞
उस रात मैं घर गई — तो मेरे होंठों पर एक मुस्कान थी।
पहली बार बहुत दिनों में।
मुझे नहीं पता था — ये मुस्कान एक जाल की शुरुआत थी।
— ✦✦✦ —

अध्याय ३ : जो रात को होता था
— पहले हफ़्ते में —

पहले हफ़्ते में कुछ अजीब नहीं हुआ।
सिवाय इसके कि मेरे सपने बदल गए।
पहले मेरे सपने — उलझे हुए, थके हुए — fees, बिल, अम्मी की तबियत। लेकिन उस हफ़्ते से — सपने खुलने लगे।
एक बड़ा जंगल। रात। आसमान में तारे — इतने कि उनकी रोशनी में चलना मुमकिन हो। और उस जंगल में एक रास्ता था — और उस रास्ते पर कोई चलता था।
मेरे आगे।
लम्बा। काले कपड़े।
मैं उसके पीछे चलती। वो पलटता नहीं। बस चलता।
और एक आवाज़ — उसकी — कहती:
❝ थोड़ा और। ❞
हर रात यही सपना।
हर रात थोड़ा आगे।
एक रात — वो रुका। पलटने लगा।
और मेरी नींद खुल गई।

उन दिनों ज़ुल्फ़िक़ार से रोज़ मुलाक़ात होती — छत पर। कभी-कभी सीढ़ियों पर। एक बार बाज़ार में भी मिला — अचानक।
वो हर बार ऐसे मिलता जैसे उसे पहले से पता था मैं वहाँ होऊँगी।
मुझे अच्छा लगता था।
उसकी बातें अजीब थीं — पुरानी दुनिया की बातें। शायरी। पुराने क़िस्से। वो ऐसे बोलता था जैसे उसने वो ज़माने खुद देखे हों।
'तुमने कहाँ पढ़ा इतना?' मैंने एक बार पूछा।
❝ पढ़ा नहीं। देखा है। ❞
'मतलब?'
वो मुस्कुराया।
❝ किताबें कम पड़ जाती हैं कभी-कभी। दुनिया ज़्यादा बड़ी है। ❞
उस रात — उसने पहली बार मेरा हाथ थामा था।
सिर्फ एक पल।
जाते हुए।
'रात को ख्याल रखना।' उसने कहा था।
उसका हाथ — ठंडा था। बहुत ठंडा।
लेकिन उस ठंडक में एक करंट था जो मेरी कलाई से ऊपर गया और मेरी साँस रोक गया।
मैंने सोचा — मुझे प्यार हो रहा है।
मुझे नहीं पता था — वो प्यार नहीं था।
वो capture था।
— ✦✦✦ —

अध्याय ४ : बीबी अम्मा का डर

दसवें दिन — बीबी अम्मा मेरे दरवाज़े पर आईं।
सुबह के नौ बजे। उनके चेहरे पर वो expression था जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी।
डर। सच्चा, गहरा, पुराना डर।
'अंदर आइए।'
वो अंदर आईं। चाय नहीं ली। बैठीं नहीं।
उन्होंने मेरी आँखों में देखा।
'बेटी — उस घर के आदमी से बात करती हो?'
मेरे दिल में एक सिकुड़न आई।
'बस थोड़ी-सी।'
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।
'उससे दूर रहो। बिल्कुल दूर।'
'क्यों? वो कुछ गलत —'
'वो इंसान नहीं है।' उनकी आवाज़ काँपी।
मैं हँसी।
'बीबी अम्मा — ऐसी बातें —'
'मैंने उसे पहले देखा है।' उन्होंने कहा।
मेरी हँसी रुक गई।
'पहले?'
'बहुत साल पहले। इसी घर में। यही शक्ल। यही आँखें। उस वक़्त मैं जवान थी।' उनकी आवाज़ टूटी। 'वो तब भी यही था। और जो लड़की उससे मिली — वो...'
वो रुक गईं।
'वो क्या हुई?'
बीबी अम्मा ने अपना दुपट्टा आँखों से लगाया।
❝ वो — वो यहाँ नहीं रही। ❞
'गई कहाँ?'
'कोई नहीं जानता।' वो उठीं। 'बेटी, मेरी मानो। इसका दरवाज़ा बंद रखो। रात को छत पर मत जाओ। और अगर वो कभी कुछ दे — कोई चीज़ — तो मत लेना।'
वो चली गईं।
मैं बैठी रही।
खिड़की से उस घर को देखती रही।
और तब — उस घर की खिड़की में — एक परछाईं खड़ी थी। बिल्कुल स्थिर।
मेरी तरफ देखती।
मैंने खिड़की बंद की।
उस रात मेरा सपना नहीं आया।
पहली बार उस हफ़्ते।
सुबह उठी तो तकिए पर एक फूल था।
काला गुलाब।
घर के सारे दरवाज़े अंदर से बंद थे।
— ✦✦✦ —

अध्याय ५ : वो बात जो रीमा ने देखी
— रात ३:१५ —

रीमा ग्यारह साल की थी। वो कम बोलती थी, ज़्यादा देखती थी।
उसने मुझे रोज़ नहीं बताया।
तीन दिन बाद बताया — जब उससे नहीं रहा गया।
'आपा।'
रात का खाना खाते हुए।
'हाँ?'
'रात को — वो आदमी — बगल वाला —'
मेरी चम्मच रुक गई।
'क्या हुआ?'
'रात को आपके कमरे के बाहर खड़ा था।'
बर्फ़ हो गई मैं।
'रीमा — क्या कह रही हो?'
'मैंने देखा था। तीन रात से। आपके कमरे की खिड़की के बाहर।' उसकी आँखें सच बोल रही थीं। 'वो बस खड़ा होता है। अंदर देखता है।'
'हमारा कमरा दूसरी मंज़िल पर है।'
रीमा ने कुछ नहीं कहा।
उसे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी।
उसकी आँखें कह रही थीं — मुझे पता है। इसीलिए बता रही हूँ।

उस रात — मैंने खिड़की की rivet जाँची। पर्दा खींचा। दरवाज़ा बंद किया।
बत्ती जलाकर सोई।
आधी रात को नींद खुली।
बत्ती बंद थी।
मैंने switch दबाया।
बत्ती नहीं जली।
अँधेरे में — एक खुशबू थी।
चंदन और कुछ और। कुछ ऐसा जो इस दुनिया का नहीं था।
मैंने phone की torch जलाई।
कमरा खाली था।
लेकिन मेरी खिड़की —
पर्दा अंदर की तरफ हिल रहा था।
जैसे किसी ने अभी-अभी छोड़ा हो।
मैंने खिड़की खोली।
बाहर — नीम का पेड़। रात की हवा।
और पेड़ की एक डाल पर — एक काली चिड़िया बैठी थी।
वो मुझे देख रही थी।
बिल्कुल स्थिर। आँखें झपकाए बिना।
मैंने पर्दा बंद किया।
और कमरे के कोने में बैठ गई। बाकी रात।
नींद नहीं आई।
— ✦✦✦ —

अध्याय ६ : जब उसने सच बोला — या बोला क्या?
— एक शाम की मुलाक़ात —

अगले दिन — मैंने उससे मिलने की ठानी।
दिन के उजाले में।
उसके घर का दरवाज़ा खटखटाया।
उसने खोला — तुरंत। जैसे पता था।
'आइए।' उसने कहा।
'नहीं, यहीं बात करती हूँ।' मैं दरवाज़े पर खड़ी रही।
उसने एक पल मुझे देखा। फिर दरवाज़े की चौखट पर झुक गया — आराम से।
'पूछो।'
'रात को मेरी खिड़की के बाहर क्या कर रहे थे?'
उसका चेहरा नहीं बदला।
❝ देख रहा था। ❞
'देख रहे थे? मेरी खिड़की पर? दूसरी मंज़िल पर?'
❝ मुझे ऊँचाई से डर नहीं लगता। ❞
वो बात इतनी naturally बोला था कि मैं एक पल को भूल गई कि यह physically impossible था।
'यह ठीक नहीं है।'
❝ मैं जानता हूँ। ❞
'तो क्यों —'
वो सीधा हुआ। मेरे पास एक कदम आया।
मैं पीछे नहीं हटी — मेरे पैर हटे नहीं।
उसने मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखें — वो फिर वही थीं। काली। गहरी। ऐसी जिनमें झाँकते रहो।
❝ क्योंकि मैं देखना चाहता था कि तुम सो रही हो या नहीं। ❞
'यह —'
❝ तुम्हारे सपने। वो मेरे हैं। ❞
ख़ामोशी।
'क्या मतलब?'
❝ जो सपने आ रहे हैं — जंगल, रात, वो रास्ता — वो मैं भेजता हूँ। ❞
मैं एक क़दम पीछे हटी।
'यह — यह पागलपन है।'
वो मुस्कुराया। लेकिन इस बार उसकी मुस्कान में वो गर्माहट नहीं थी।
कुछ और था।
पुरानापन।
अथाह, भारी पुरानापन।
❝ ज़ारा — मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा। लेकिन सच सुनने की तुम्हें आदत नहीं है। ❞
'कोशिश करो।'
उसने मेरी आँखों से नज़र नहीं हटाई।
एक लंबी साँस।
❝ मैं जिन्न हूँ। ❞
और उसने दरवाज़ा बंद कर लिया।

मैं वहाँ खड़ी रही — एक मिनट। दो मिनट।
फिर घर गई।
अम्मी को नहीं बताया।
रीमा को नहीं बताया।
किसी को नहीं।
क्योंकि अगर मैं बोलती — तो सुनने वाले कहते: जाओ, सो जाओ।
और शायद मुझे भी लगता — बस एक झूठ था।
लेकिन उसकी आँखें थीं। उस रात की खिड़की थी। वो काली चिड़िया थी।
और वो सपने — जो हर रात आते थे।
जो उसके थे।
— ✦✦✦ —

अध्याय ७ : जब मैंने उसे जाने नहीं दिया
यह मेरी सबसे बड़ी ग़लती थी।
इंसानी फ़ितरत।
जो मना करे — उसी की तरफ खिंचाव।
जो रहस्य हो — उसे जानने की ज़िद।
उस रात — मैं फिर छत पर गई।
वो वहाँ था।
उसने मुझे देखा और कुछ नहीं बोला।
मैं उसके पास गई।
'तुम सच में जिन्न हो?'
❝ तुमने सोचा था मैं झूठ बोल रहा था। ❞
'अब नहीं सोच रही।'
उसने मुझे देखा।
'तो डरो।' उसने कहा — पहली बार normal आवाज़ में। Hindi में। शायरी के बिना।
'डरती हूँ।' मैंने कहा। 'लेकिन जाना नहीं चाहती।'
उसकी आँखों में — कुछ हुआ। जो मैं describe नहीं कर सकती। दर्द जैसा था। लेकिन दर्द से ज़्यादा कुछ।
❝ ज़ारा — मैं तुम्हारे लिए अच्छा नहीं हूँ। ❞
'मुझे पता है।'
❝ मैं तुम्हें खींच लूँगा। ❞
'कहाँ?'
उसने आसमान की तरफ देखा।
❝ वहाँ — जहाँ से तुम वापस नहीं आओगी। ❞
'फिर भी।' मैंने कहा।
वो चुप रहा।
देर तक।
फिर उसने कहा — इतने धीरे कि शायद हवा ने नहीं सुना:
❝ तुम पागल हो। ❞
'हाँ।'
उस रात हम बहुत देर तक बैठे रहे।
उसने बताया — टुकड़ों में। धीरे-धीरे।
वो हज़ारों साल पुराना था।
आग से बना था।
उसने इंसानों को देखा था, ज़माने देखे थे, सल्तनतें उठती-गिरती देखी थीं।
लेकिन एक चीज़ नहीं देखी थी।
❝ मैंने कभी किसी से — ❞
वो रुका।
मैंने इंतज़ार किया।
❝ जाने दो। ❞
मैंने पूछा नहीं।
उसने मेरी तरफ देखा।
और पहली बार उसकी आँखों में वो गहराई नहीं थी।
कुछ और था।
इंसानी।
मुझे उससे डर लगना चाहिए था।
मुझे उससे प्यार हो गया।
— ✦✦✦ —

अध्याय ८ : अम्मी को कुछ हुआ
— चौदहवाँ दिन —

चौदहवें दिन — अम्मी बीमार पड़ गईं।
अचानक।
रात को बिल्कुल ठीक थीं — सुबह उठीं तो बुखार था।
लेकिन normal बुखार नहीं।
वो कुछ बड़बड़ा रही थीं।
अरबी में।
अम्मी को अरबी नहीं आती थी।

मैंने doctor बुलाया। उन्होंने कहा — viral fever। दवा लिखी।
लेकिन दवा से बुखार नहीं उतरा।
रात को — अम्मी उठ कर बैठ गईं।
आँखें खुली थीं। खाली।
'अम्मी!' मैंने हिलाया।
वो मुझे देखती रहीं।
फिर बोलीं — एक आवाज़ में जो उनकी नहीं थी:
उसे छोड़ दो।
मैं काँप गई।
'क्या? अम्मी —'
'उसे छोड़ दो।' वही आवाज़। 'वो तुम्हें खाएगा।'
'अम्मी — अम्मी, देखो —'
उनकी आँखें घूमीं। फिर वो वापस लेट गईं।
सो गईं।
सुबह उन्हें कुछ याद नहीं था।

मैं उसके दरवाज़े पर गई।
उसने खोला।
मेरी आँखें भरी थीं।
'मेरी अम्मी को क्या हुआ?'
उसका चेहरा बदला।
'अंदर आओ।'
'नहीं।'
वो बाहर आया।
❝ यह मैंने नहीं किया। ❞
'तो किसने?'
❝ हमारी दुनिया में — सब अकेले नहीं होते। कुछ और भी होते हैं। जो मुझे देख सकते हैं। ❞
'और वो —'
❝ वो तुम्हें मुझसे दूर करना चाहते हैं। ❞
'तो ठीक है! मैं दूर हो जाती हूँ!' मैं चिल्लाई।
वो एक पल के लिए — रुका।
उसकी आँखों में वो चीज़ फिर आई। वो दर्द।
'जाओ।' उसने कहा।
मैं गई।
घर जाकर रोई।
रीमा आई — उसने मुझे देखा — और बिना कुछ पूछे मेरे पास बैठ गई।
वो ग्यारह साल की थी।
लेकिन उसकी आँखों में उस उम्र से कहीं ज़्यादा समझ थी।
❝ आपा — वो बुरा है। ❞
'मुझे पता है।'
❝ तो फिर क्यों... ❞
मैंने जवाब नहीं दिया।
क्योंकि जवाब था — लेकिन कहने से डर लगता था।
क्योंकि जो जवाब था — वो यह था:
मुझे पता है वो बुरा है। और फिर भी उसे देखकर मेरी साँस रुकती है।
यह प्यार नहीं था।
मैं अब जानती हूँ।
यह उसका जादू था।
— ✦✦✦ —

अध्याय ९ : जब उसने मुझे अपनी दुनिया दिखाई
— रात का एक बजे —

अम्मी तीसरे दिन ठीक हो गईं — जितनी अचानक बीमार पड़ी थीं उतनी ही अचानक।
मैंने ज़ुल्फ़िक़ार से बात बंद कर दी — दो दिन।
दो दिन।
बस।
तीसरी रात — सपने वापस आए।
वही जंगल। वही रात। वही रास्ता।
लेकिन इस बार —
वो रास्ते पर नहीं था।
वो पेड़ से टिका खड़ा था। मेरा इंतज़ार करते हुए।
उसने देखा। मुस्कुराया।
❝ आई। ❞
'यह सपना है।'
❝ हाँ। ❞
'मैं यहाँ नहीं आना चाहती।'
❝ लेकिन आई। ❞
मैं उसके पास गई।
उसने अपना हाथ बढ़ाया।
उस सपने में — मैंने उसका हाथ थाम लिया।

और जो दिखा — वो इस दुनिया का नहीं था।
जंगल खुला। आसमान — नहीं था। बस एक काली छत थी जिसमें हज़ारों रोशनियाँ थीं जो तारे नहीं थीं।
एक शहर था — पत्थर का, पुराना, ऊँचा। मीनारें जो बादलों में थीं। दरवाज़े जो हवा में लटकते थे।
और आवाज़ें — इंसानी नहीं। लेकिन समझ में आने वाली।
'यह — यह क्या है?'
❝ मेरा घर। ❞
'तुम्हारी दुनिया?'
वो आगे बढ़ा। मैं उसके साथ।
और उस शहर में — लोग थे। जिन्न।
लेकिन वो इंसान की शक्ल में थे — कुछ।
कुछ नहीं थे।
जो इंसान की शक्ल में नहीं थे — उन्होंने मुझे देखा।
और उनकी आँखों में — भूख थी।
ज़ुल्फ़िक़ार ने मेरा हाथ कस लिया।
❝ देखना मत। चलती रहो। ❞
हम चलते रहे।
उसने मुझे एक जगह ले जाया — ऊँची मीनार की छत पर।
नीचे वो पूरा शहर था।
और दूर — एक रोशनी।
❝ वो दरवाज़ा है। वापसी का। ❞
'मुझे वापस जाना है।'
❝ मैं जानता हूँ। ❞
'तो क्यों लाए?'
उसने नीचे देखा।
एक लंबी ख़ामोशी।
❝ इसलिए कि तुम समझो — मैं क्या हूँ। और फिर भी जो फ़ैसला करो — वो तुम्हारा हो। ❞
'फ़ैसला?'
❝ यहाँ रहना — या वापस जाना। ❞
'मैं वापस जाऊँगी।'
उसने मेरी तरफ देखा।
उसकी आँखों में — राहत थी। और साथ में — कुछ और।
कुछ जो मैं उस वक़्त नहीं पहचान पाई।
अब पहचानती हूँ।
वो टूटन थी।
मैं नींद से जागी।
रात का एक बज रहा था।
मेरे हाथ में — उसकी उँगलियों के निशान थे।
नीले। ठंडे।
जैसे किसी ने बर्फ़ से थामा हो।
— ✦✦✦ —

अध्याय १० : जो चीज़ उसने दी
— और बीबी अम्मा की आखिरी बात —

अगले हफ़्ते —
ज़ुल्फ़िक़ार ने मुझे कुछ दिया।
एक अँगूठी।
काली धातु की। उस पर नक्काशी थी — अजीब, पुराना pattern।
'यह क्या है?'
❝ हिफ़ाज़त। ❞
'किससे?'
❝ उनसे। जो तुम्हें उस रात शहर में देख रहे थे। ❞
'मुझे यह नहीं लेनी।'
बीबी अम्मा की बात याद आई — 'कुछ दे तो मत लेना।'
'मैं नहीं लूँगी।'
ज़ुल्फ़िक़ार ने अँगूठी वापस ली।
उसका चेहरा — खाली था।
उसने वापस जेब में रखी।
❝ ठीक है। ❞
वो मुड़ा।
'रुको।'
वो रुका।
'तुम मुझे क्यों protect करना चाहते हो? जब तुम खुद मुझे danger में डाले हुए हो?'
एक लंबी ख़ामोशी।
फिर उसने पलट कर देखा।
❝ क्योंकि मुझे — तुमसे... ❞
वो फिर रुका।
बहुत देर।
❝ जाने दो। ❞
'नहीं।' मैं उसके सामने आई। 'बोलो।'
उसने मेरी आँखों में देखा।
उसकी आँखों में — वो पूरी काली गहराई — उस वक़्त टूट गई।
एक पल के लिए।
और उनमें — एक इंसानी रंग आया।
❝ क्योंकि मुझे तुमसे प्यार हो गया है। और मुझे नहीं था पता यह होगा। ❞
हवा रुक गई।
नीम का पत्ता नहीं हिला।
रात ख़ामोश हो गई।
मैंने उसे देखा।
और पहली बार — मैंने उसे ज़ुल्फ़िक़ार की तरह नहीं देखा। जिन्न की तरह नहीं देखा।
एक ऐसे के तरह देखा — जो हज़ारों साल जी कर थक गया हो।
और अब — पहली बार — कुछ महसूस हो रहा हो।
मेरे हाथ काँपे।
मैंने अँगूठी लेने के लिए हाथ बढ़ाया।
बीबी अम्मा की खिड़की से एक चीख़ आई।
हम दोनों के उठने से पहले —
बीबी अम्मा की बहू नीचे आई। दौड़ते हुए।
उसका चेहरा सफ़ेद था।
'बीबी अम्मा को दिल का दौरा पड़ा। Ambulance बुला लो।'

बीबी अम्मा hospital में तीन दिन रहीं।
वापस आईं — कमज़ोर, लेकिन ज़िंदा।
उनसे मिलने गई तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।
बहुत कमज़ोर पकड़।
'बेटी।'
'हाँ।'
'वो अँगूठी मत लेना।'
मेरी साँस रुकी।
'आपको कैसे पता —'
'वो अँगूठी — बंधन है। जो पहन लेती है — वो हमेशा के लिए उसकी हो जाती है।'
'वो — वो बोल रहा था हिफ़ाज़त के लिए —'
बीबी अम्मा की आँखों में आँसू आए।
'वो झूठ नहीं बोल रहा। वो सच बोल रहा है। लेकिन आधा सच।'
'आधा?'
'हिफ़ाज़त भी होगी। और हमेशा के लिए क़ैद भी।'
उन्होंने मेरा हाथ छोड़ दिया।
'मैं थक गई हूँ।' उन्होंने कहा। 'तुम जाओ।'
मैं गई।
और रात को — अँगूठी के बारे में सोचती रही।
उसने कहा था — बंधन।
ज़ुल्फ़िक़ार ने कहा था — हिफ़ाज़त।
दोनों सच हो सकते थे।
और दोनों — दोनों ने मिलकर एक सवाल बनाया:
क्या मैं उसकी होना चाहती हूँ?
— ✦✦✦ —

अध्याय ११ : वो रात जब घर में घुसा
— रात २:४४ —

वो घर में घुसा।
बिना बुलाए।
रात के पौने तीन बजे।
मैं नींद में थी जब मेरी आँखें खुलीं — किसी आवाज़ से नहीं।
एक एहसास से।
कोई था।
कमरे में।
मैंने साँस रोकी।
अँधेरा था — पूरा।
लेकिन उस अँधेरे में — एक हलकी, धीमी रोशनी थी।
और उस रोशनी में — वो था।
कमरे के कोने में।
खड़ा।
मुझे देखता हुआ।
मेरी चीख़ निकली नहीं। गले में अटक गई।
'ज़ुल्फ़िक़ार।'
मेरी आवाज़ — फुसफुसाहट थी।
वो आगे आया।
'क्यों — यहाँ क्यों आए?'
❝ वो बाहर हैं। ❞
'कौन?'
❝ जो तुम्हें उस शहर में देख रहे थे। आज रात — वो यहाँ हैं। ❞
मैं बिस्तर से उठी।
'रीमा —'
❝ ठीक है। मैंने देखा। ❞
'अम्मी —'
❝ ठीक हैं। ❞
'और मैं?'
वो मेरे सामने आया।
इतना पास कि मैं उसकी साँस महसूस कर सकती थी — ठंडी।
उसकी आँखें — उस अँधेरे में — नीली रोशनी दे रही थीं।
बहुत धीरे उसने कहा:
❝ तुम — तुम safe हो। जब तक मैं हूँ। ❞
'और अगर तुम नहीं रहे?'
वो ख़ामोश रहा।
बाहर से एक आवाज़ आई — दरवाज़े पर।
दस्तक नहीं। खुरचने की आवाज़।
जैसे नाखून।
लंबे, पैने।
खुरच — खुरच — खुरच।
मेरी पीठ ठंडी हो गई।
❝ देखना मत। ❞
'मैं नहीं देखूँगी —'
खुरचने की आवाज़ बंद हुई।
एक ख़ामोशी।
फिर —
खिड़की पर।
वही आवाज़।
ज़ुल्फ़िक़ार ने मेरा हाथ थामा।
उसका हाथ — इस बार ठंडा नहीं था।
गर्म था।
इंसान की तरह।
'तुम —'
❝ शश। ❞
आवाज़ खिड़की से हटी।
एक लंबी साँस — जैसे बाहर से कोई सूँघ रहा हो।
फिर — कुछ नहीं।
ख़ामोशी।
पूरी।

वो उस रात भोर तक रहा।
मेरे कमरे में। कोने में बैठा।
मैंने कहा था — जाओ।
उसने कहा था — नहीं।
और मैंने — मैंने ज़ोर नहीं दिया।
भोर में जब नमाज़ की अज़ान हुई —
वो गायब हो गया।
जैसे कभी था ही नहीं।
बस उसके बैठने की जगह — थोड़ी ठंडी थी।
— ✦✦✦ —

अध्याय १२ : जब मैंने पूछा — तुमने क्यों छोड़ी थी वो लड़की?

कुछ सवाल होते हैं जो पूछने से पहले ही जवाब का डर लग जाता है।
यह सवाल उनमें से था।
बीबी अम्मा ने कहा था — पहले भी एक लड़की थी। जो गई और नहीं लौटी।
मुझे जानना था — वो कौन थी।
मैंने पूछा — एक शाम। जब वो छत पर था और मैं उसके पास बैठी थी।
'ज़ुल्फ़िक़ार — पहले भी कोई था? इस घर में? इस गली में?'
उसके हाथ रुके। वो आसमान देख रहा था।
❝ कहाँ से सुना? ❞
'कोई मायने नहीं रखता।'
एक ख़ामोशी।
फिर:
❝ बहुत साल पहले। यहाँ नहीं — दूसरे शहर में। ❞
'कौन थी?'
❝ एक लड़की। ❞
'उसके साथ क्या हुआ?'
उसकी जबड़े की मांसपेशी हिली।
❝ वो मेरे साथ गई। ❞
मेरा दिल धसका।
'और वापस आई?'
उसने मुझे देखा।
उसकी आँखें — उस पल — इतनी पुरानी लगीं। इतनी थकी।
❝ नहीं। ❞
एक शब्द।
बस।
'क्यों?'
❝ क्योंकि मुझे पता नहीं था — उस वक़्त — कि इंसान हमारी दुनिया में नहीं रह सकते। उनकी रूह — ❞
वो रुका।
❝ उनकी रूह घुल जाती है। ❞
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसकी।
'घुल जाती है?'
❝ धीरे-धीरे। पहले वो याद नहीं रहता कि वो इंसान थे। फिर वो याद नहीं रहता कि उन्हें कोई याद करता है। और फिर — सिर्फ — बस नहीं रहते। ❞
'और तुमने — उसे — रोका नहीं?'
वो मुड़ा। मुझे देखा। उसकी आँखें — भरी थीं।
जिन्न रोते हैं — मुझे नहीं पता था।
❝ मैंने बहुत बाद में जाना। जब बहुत देर हो गई थी। ❞
'और इस बार?'
वो मेरी आँखों में देखता रहा।
❝ इस बार — मैं तुम्हें नहीं जाने दूँगा। अपनी दुनिया में। ❞
'लेकिन तुम मुझे खींच रहे हो।'
❝ हाँ। ❞
'यह contradiction है।'
वो मुस्कुराया — उदास।
❝ मैं जानता हूँ। मैं — मैं ख़ुद contradiction हूँ। ❞
— ✦✦✦ —

अध्याय १३ : वो रात — jump scare
— रात ३:३३ — तिहरे तीन की रात —

रात के तिहरे तीन को — मैंने पहली बार उसे तोड़ते देखा।
नहीं — ज़ुल्फ़िक़ार को नहीं।
उसे — जो उस रात बाहर था।
उसने दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश की।
मैं सो रही थी। रीमा भी।
अम्मी का कमरा नीचे था।
मैंने एक धमाके की आवाज़ से आँखें खोलीं।
कमरे में — रात।
और तब — दरवाज़ा खुला।
धीरे।
मैंने सोचा — हवा।
मैंने phone उठाया — torch जलाने के लिए।
और तब मेरी बाँह पकड़ ली गई।
बिस्तर के नीचे से।
एक हाथ।
ठंडा। इतना ठंडा कि जलन हुई।
मैं चीख़ी।
रीमा ने — दूसरे कमरे से — जवाब दिया: 'आपा?!'
मेरी चीख़ के साथ — जो पकड़ थी — वो छूट गई।
मैंने torch जलाई।
बिस्तर के नीचे देखा।
कुछ नहीं।
लेकिन मेरी बाँह पर — निशान थे।
उँगलियों के। काले।
पाँच नहीं।
सात।
सात उँगलियाँ।
मेरा दिल रुकने को था।
रीमा दरवाज़े पर थी। उसने देखा।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
'कमरे से मत निकलो।' मैंने कहा।
'आपा —'
'मत निकलो।'
मैंने ज़ुल्फ़िक़ार को call किया।
Phone उठाया — ring गई।
एक।
दो।
तीन।
उठाया।
आवाज़ आई — लेकिन उसकी नहीं।
एक और आवाज़।
गहरी। भारी।
أين هي؟
अरबी।
'वो कहाँ है?'
मैंने phone काटा।
हाथ काँप रहे थे।
और तब — खिड़की से —
ज़ुल्फ़िक़ार।
दूसरी मंज़िल की खिड़की से। ऐसे जैसे दीवार से उतरा हो।
❝ घर मत छोड़ना। किसी के लिए भी दरवाज़ा मत खोलना। समझी? ❞
'वो — जिसने phone उठाया —'
❝ मेरा दुश्मन। ❞
'इंसान है?'
उसने मेरी आँखों में देखा।
❝ नहीं। ❞
'और वो चाहता क्या है?'
ज़ुल्फ़िक़ार ने मेरी बाँह पर निशान देखे।
उसका चेहरा बदला — पहली बार — गुस्से से।
वो गुस्सा — इंसानी नहीं था।
कुछ और था।
ऐसा गुस्सा जो सदियों का था।
❝ वो तुम्हें चाहता है। इसलिए कि मैं तुम्हें चाहता हूँ। ❞
'यह — यह मेरी वजह से —'
❝ नहीं। ❞
वो एक कदम आया।
मेरे बिल्कुल सामने।
उसने मेरी बाँह — धीरे से — उठाई। निशानों को देखा।
और उन निशानों पर — उसने हल्के से अपना हाथ रखा।
ठंड — और फिर — गर्मी।
निशान — हल्के हुए।
'यह तुमने —'
❝ मैं जिन्न हूँ। इतना तो आता है। ❞
उसने मेरी बाँह छोड़ी।
मेरी साँस अभी तेज़ थी।
उसकी — normal थी।
जैसे उसे डर नहीं था।
'क्या तुम्हें डर लगता है?'
अजीब सवाल था — उस वक़्त।
लेकिन मैंने पूछा।
वो एक पल के लिए रुका।
❝ पहले नहीं लगता था। ❞
'और अब?'
उसने मेरी तरफ देखा।
❝ अब — तुम्हारे साथ कुछ होने का डर लगता है। ❞
— ✦✦✦ —

अध्याय १४ : भाग — एक का अंत
— एक रात जो सब बदल गई —

यह भाग एक का आखिरी अध्याय है।
और जो इसमें हुआ — वो वो था जिसने सब कुछ पलट दिया।

उस रात ज़ुल्फ़िक़ार रुका।
सुबह तक।
हम छत पर थे — जब भोर हुई। आसमान में रंग आए — पहले गहरा नीला, फिर बैंगनी, फिर नारंगी।
ज़ुल्फ़िक़ार उस रंग को देखता था — जैसे पहली बार देख रहा हो।
'तुमने पहले सूरज नहीं देखा?'
❝ देखा है। लेकिन इस तरह नहीं। ❞
'इस तरह मतलब?'
❝ किसी के साथ। ❞
हवा ठंडी थी। उसके बाल हवा में थे।
मैंने उसे देखा — हज़ार साल पुरानी रूह। आग से बनी।
और वो — वो भोर का रंग देख रहा था जैसे एक बच्चा।
मेरे दिल में कुछ टूटा।
'ज़ुल्फ़िक़ार।'
उसने देखा।
मैंने — एक ग़लती की।
मैंने उसका हाथ थाम लिया।
उसकी साँस रुकी।
वो जमा रहा।
उसका हाथ — ठंडा — धीरे-धीरे गर्म होने लगा।
मेरे हाथ में।
उसने मेरी तरफ देखा।
उसकी आँखों में — वो नीली रोशनी — बुझ गई।
पहली बार।
आँखें — भूरी थीं। गहरी भूरी।
इंसान की आँखें।
❝ ज़ारा — ❞
'हाँ।'
❝ अगर — अगर मैं तुमसे कहूँ — कि मैं यह सब छोड़ सकता हूँ — ❞
'क्या?'
❝ अपनी दुनिया। वो घर। वो जो हूँ — छोड़ सकता हूँ। अगर — ❞
'अगर?'
उसने मेरा हाथ कस लिया।
❝ अगर तुम — एक बार — मुझे एक मौक़ा दो। ❞
'वो कैसे possible है? तुम जिन्न हो।'
❝ कुछ जिन्न — अगर इंसान का उनसे सच्चा लगाव हो — रूप बदल सकते हैं। ❞
मेरी साँस रुकी।
'रूप बदलना मतलब?'
❝ इंसान बनना। ❞
ख़ामोशी।
'और तुम्हारी दुनिया?'
❝ छूट जाएगी। हमेशा के लिए। ❞
'और वो जो तुम्हारे दुश्मन हैं?'
❝ वो — वो एक समस्या है। ❞
'मतलब?'
❝ अगर मैं रूप बदलने का process शुरू करूँ — तो वो रोकने की कोशिश करेंगे। ❞
'कैसे?'
वो चुप रहा।
'ज़ुल्फ़िक़ार — कैसे?'
❝ तुम्हें hurt करके। ❞
एक पल।
दो पल।
मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा।
'तो — क्या करना होगा?'
वो मुझे देखता रहा।
उसकी आँखों में — अब वो गहराई नहीं थी। बस एक इंसान था।
थका हुआ।
डरा हुआ।
लेकिन — उम्मीद था।
❝ तुम्हें — मुझ पर भरोसा करना होगा। पूरा। ❞
'और अगर तुमने धोखा दिया?'
लंबी ख़ामोशी।
❝ तो — तुम जो सज़ा दो। ❞
नीचे — रीमा ने आवाज़ दी।
'आपा! नाश्ता!'
हम दोनों ने एक साथ — हाथ छोड़ा।
मुस्कुराए — दोनों।
भोर की रोशनी में।
उस पल — वो सबसे ज़्यादा ज़िंदा लगा।
और मैं — मैंने सोचा — ठीक है।
मैं भरोसा करूँगी।
उस फ़ैसले का नतीजा —
भाग दो में।

भाग — एक समाप्त

आगे क्या हुआ — जानना चाहते हो?
भाग दो में — असली ख़तरा शुरू होता है।

— ✦✦✦ —

「 उसने कहा था — भरोसा करो। 」
「 मैंने किया था। 」
「 और वो रात आई — जब भरोसे की क़ीमत चुकानी पड़ी। 」

— ✦✦✦ —

अगला भाग →

ज़ुल्फ़िक़ार · सभी भाग →