Pretika › Jinn & Spirits › कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
भाग 25 (अंतिम भाग): 7 बजकर 14 मिनट, महा-विराम और खंडहरों का अंतिम सत्य
Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 16 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
- Chapter
- 25 of 25
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3134
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
1. ठहरे हुए समय की विभीषिका और दो कबीर
समय जब किसी शीशे की तरह टूटता है, तो उसके किरचों में केवल भविष्य नहीं बिखरता; उसमें मनुष्य का संपूर्ण अस्तित्व एक अंतहीन भूलभुलैया बनकर रह जाता है।
फ़िरोज़ शाह कोटला के उस वीरान, सर्द मैदान में कबीर खड़ा था।
हवा का चलना बंद हो चुका था। पीपल के पुराने पेड़ों के जो सूखे पत्ते ज़मीन की तरफ़ गिर रहे थे, वे हवा में ही अधर में लटके हुए थे। घास पर ओस की बूँदें मोतियों की तरह थमी हुई थीं।
और कबीर के हाथ में पकड़े उस सैमसंग स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन पर सेकंड का काँटा 59 पर आकर कांप रहा था:
13 दिसंबर | शाम 7:13:59
सामने, जामी मस्जिद के पिछले हिस्से की उन संकरी, अंधेरी सीढ़ियों पर... जहाँ काल-कोठरी और बाओली का मुहाना था...
कबीर ने अपनी ही आँखों से अपने अतीत को नीचे उतरते देखा।
वह पच्चीस साल का कबीर मेहरा था।
वही बेदाग़ चेहरा, वही साफ़-सुथरी नीली डेनिम जींस, वही नायलॉन की चमचमाती जैकेट, और गले में लटका वही कैनन का भारी डीएसएलआर कैमरा। उसके चेहरे पर दिल्ली विश्वविद्यालय के एक अहंकारी, अति-तर्कवादी शोधार्थी की वही मुस्कान थी, जिसे लगता था कि यह दुनिया केवल किताबों, वैज्ञानिक सिद्धांतों और समाजशास्त्रीय आँकड़ों से चलती है।
और उस अतीत के कबीर के ठीक दो कदम पीछे...
वही मैला-कुचैला ऊनी ओवरकोट पहने, हाथ में मिट्टी के तीन जलते हुए दीये लिए, वह बूढ़ा डाकिया—क़ासिम—चल रहा था! क़ासिम की वे सफ़ेद, मोतियाबिंद वाली अंधी आँखें उस नौजवान कबीर की पीठ के ठीक बीचों-बीच उस जगह को घूर रही थीं जहाँ मनुष्य की रीढ़ में उसकी आत्मा का लंगर बंधा होता है।
वर्तमान का कबीर—जो 1354 के सुल्तान के नर्क से, 1857 के ग़दर के तहख़ानों से, 1954 के चावड़ी बाज़ार के खूनी कोठों से, भानगढ़ के खौलते पारे से और पोखरण के परमाणु-पाताल से होकर लौटा था—वह कांप उठा।
उसके अपने हाथ अब भी पत्थर के खुरंडों से भरे थे। उसकी छाती का वह तावीज़ वाला ज़ख़्म ताज़ा था। उसकी आत्मा चौबीस जन्मों के असहनीय दर्द, आघात और पश्चाताप के बोझ से लथपथ थी।
"नहीं..." कबीर के सूखे, फटे हुए होंठों से एक फुसफुसाहट निकली।
"अगर उस लड़के ने उस ताक़ में रखे उस ख़त की मुहर तोड़ दी... तो यह पूरा नर्क फिर से शुरू हो जाएगा!
वह फिर से उस पाताल में गिरेगा, फिर से ज़ोहरा कटेगी, फिर से मीरा को वह जिन्न निगलेगा, और फिर से मेरा वह मासूम बेटा उस इंडिया गेट की प्राचीर पर अपने ही पिता के खंजर से छिद जाएगा!"
कबीर ने अपने दाएँ हाथ में पकड़े उस मुग़ल भस्म और चांदी से चमकते खंजर को कसकर पकड़ा।
और उसने उस ठहरे हुए वक़्त की चादर को चीरते हुए सीढ़ियों की तरफ़ दौड़ लगा दी!
2. काल-कोठरी में दो चेहरों का आमना-सामना
खट-खट-खट!
कबीर सीढ़ियों को फांदता हुआ नीचे उस सीलन भरे, अंधेरे तहख़ाने में दाख़िल हुआ।
तहख़ाने में वही दमघोंटू, सड़े हुए चमेली के तेल, कच्चे मांस और कपूर की तीखी गंध भरी थी।
ताक़ नंबर सात के सामने...
वह नौजवान अतीत-कबीर खड़ा था।
उसने उस मिट्टी की पुरानी सुराही और लोहे की कीलों के घेरे के बीच से वह ताज़ा, सूखा हुआ, लाल मोम की मुहर लगा ख़ाकी लिफ़ाफ़ा अपने हाथ में उठा लिया था!
उसकी उंगलियाँ उस मुहर को तोड़ने के लिए आगे बढ़ चुकी थीं।
"रुक जाओ! उसे मत खोलना!"
कबीर की भयानक, चीखती हुई आवाज़ उस तहख़ाने की मेहराबों से टकराई।
नौजवान कबीर झटके से मुड़ा। उसने अपना कैमरा संभाला और टॉर्च की तेज़ रोशनी कबीर के चेहरे पर डाल दी।
"कौन हो तुम?!" नौजवान कबीर ने डर और घिन से पीछे हटते हुए कहा।
उसने देखा कि उसके सामने एक फटेहाल, ख़ून और राख से सना हुआ, आधे पत्थर बन चुके हाथों वाला एक ऐसा ख़तरनाक भिखारी खड़ा था, जिसकी आँखों में पागलों जैसा उन्माद था।
"तुम... तुम यहाँ अंदर कैसे आए? बाहर रहो! मैं दिल्ली पुलिस को फ़ोन कर दूँगा!" नौजवान कबीर ने अपने आधुनिक लहज़े में चिल्लाकर कहा।
कबीर हांफता हुआ आगे बढ़ा। उसने अपना चेहरा उस टॉर्च की रोशनी के सामने कर दिया।
"अपनी आँखें खोलकर देखो, कबीर!" कबीर की आवाज़ रुलाई और क्रोध में कांप रही थी।
"ज़रा ग़ौर से देखो इस चेहरे को! अपनी बायीं अनामिका उंगली पर उस ख़ानदानी अंगूठी को देखो! अपने गाल के इस कटने के निशान को देखो!
मैं कोई चोर या भिखारी नहीं हूँ... मैं तुम्हारा ही आने वाला कल हूँ!
उस लिफ़ाफ़े को नीचे रख दो! उसमें कोई रिसर्च का पेपर नहीं है... उसमें तुम्हारे पूरे ख़ानदान का कफ़न बंधा हुआ है!"
नौजवान कबीर ने टॉर्च की रोशनी में उस सामने खड़े इंसान के चेहरे को देखा।
और जो उसने देखा...
उस दृश्य ने उस अहंकारी, आधुनिक लड़के के पैरों तले से ज़मीन खींच ली।
वह चेहरा हूबहू उसका अपना था!
वही आँखें, वही माथा, वही आवाज़... लेकिन उस चेहरे पर एक ऐसी सदियों पुरानी, गहरी, अंतहीन उदासी और खौफ़ की लकीरें थीं जिन्हें देखकर नौजवान कबीर का दिल धड़कना भूल गया।
"यह... यह कोई साइकोलॉजिकल डिसऑर्डर है..." नौजवान कबीर हकलाया। उसका हाथ उस लिफ़ाफ़े पर कांपने लगा। "तुम... तुम मेरे जैसे कैसे दिख सकते हो?"
3. लाट वाले बाबा का महा-अनावरण
"क्योंकि वह तुम्हारा सच है, कबीर बाबू!"
तहख़ाने के अंधेरे कोने से एक बहुत धीमी, सर्द और हज़ारों पत्थरों के आपस में पिसने जैसी आवाज़ आई।
वह बूढ़ा डाकिया—क़ासिम—आगे बढ़ा।
लेकिन अब उसके हाथों में मिट्टी के दीये नहीं थे।
क़ासिम का वह मैला-कुचैला ऊनी कोट हवा में अपने आप जलकर राख हो गया। उसकी झुर्रियों वाली चमड़ी फटने लगी, और उस पुरानी देह के भीतर से...
एक अस्सी फीट ऊँचा, आग और काले धुएँ का वह महा-दैत्य बाहर निकला, जिसकी छाती में सम्राट अशोक की उस लाट का सिरा धँसा हुआ था!
उसकी आँखों के कोटरों में दो काले सूर्य घूम रहे थे। उसके सिर पर चौदहवीं सदी के सुल्तानों और प्रागैतिहासिक असुरों का संयुक्त मुकुट दहक रहा था।
यह कोई साधारण मारिद नहीं था।
यह कोई मुंसिफ़ या हरदयाल का साया नहीं था।
यह स्वयं 'लाट वाले बाबा' (The Supreme Arch-Marid of Firoz Shah Kotla) था! वह आदिम, निराकार सत्ता, जिसने पिछले सात सौ सालों से इस पूरी दिल्ली को अपने साए की कचहरी बना रखा था!
"क़ासिम... तुम..." नौजवान कबीर की चीख़ उसके गले में ही घुट गई। वह घुटनों के बल गिर पड़ा। उसका तर्क, उसका विज्ञान, उसकी नास्तिकता एक ही सेकंड में जलकर राख हो चुकी थी।
लाट वाले बाबा का वह गगनभेदी अट्टहास उस तहख़ाने के एक-एक पत्थर को हिलाने लगा:
**"हाहाहाहाहा!
स्वागत है, कबीर मेहरा!
तुमने सोचा था कि तुम इस चक्रव्यूह से भाग रहे थे?
अरे मिट्टी के पुतले!
मैं नूह के तूफ़ान से पहले इस ज़मीन पर था, और जब तुम्हारी यह आधुनिक दुनिया ख़ाक हो जाएगी, तब भी मैं यहीं रहूँगा!
तुमने पूछा था न कि मुझे तुम्हारे ख़ून से इतनी हवस क्यों है?
मुझे तुम्हारी दौलत नहीं चाहिए थी!
मुझे तुम्हारी हड्डियाँ नहीं चाहिए थीं!
मुझे चाहिए था—मनुष्य का वह 'अहंकार' जो यह दावा करता है कि वह ज्ञान, विज्ञान और प्रेम से इस सृष्टि के रहस्यों को जीत सकता है!
मैंने तुम्हें चौबीस जन्मों के इस चक्रव्यूह में इसलिए नचाया ताकि मैं यह साबित कर सकूँ कि इंसान चाहे 1354 के सुल्तान का रूप धरे, चाहे 1954 का क्रांतिकारी बने, चाहे 2026 का वैज्ञानिक बने... अंत में वह अपने भय और अपने स्वार्थ के आगे घुटने टेक ही देता है!"**
दैत्य ने अपनी छह उंगलियों वाला दहकता हुआ पंजा नौजवान कबीर की तरफ़ बढ़ा दिया:
"खोलो उस ख़त को, कबीर! मुहर तोड़ो! क्योंकि अगर तुमने मुहर नहीं तोड़ी... तो तुम्हारा यह भविष्य (वर्तमान कबीर) कभी पैदा ही नहीं होगा! तुम दोनों एक ही पल में इस ब्रह्मांड की स्मृति से मिट जाओगे!"
4. ग्रैंडफ़ादर पैराडॉक्स और कबीर का अंतिम महा-त्याग
नौजवान कबीर दहशत के मारे थर-थर कांप रहा था। उसकी उंगलियाँ उस मोम की मुहर को तोड़ने ही वाली थीं।
"कबीर! मत खोलो!" वर्तमान कबीर ने आगे बढ़कर उस नौजवान कबीर की कलाई को अपने पत्थर जैसे हाथ से पकड़ लिया।
"मुझे छोड़ दो!" नौजवान कबीर चीख़ा। "अगर मैंने इसे नहीं खोला... तो तुम मिट जाओगे! हम दोनों मर जाएँगे!"
वर्तमान कबीर ने अपने उस अतीत के रूप की आँखों में देखा।
उन आँखों में वही डर था जो उसने पिछले चौबीस भागों में हर मोड़ पर झेला था—मरने का डर, अपनों को खोने का डर, अपनी पहचान खोने का डर।
और उस पल—
कबीर के मस्तिष्क में एक ऐसा अलौकिक, परम-शांत प्रकाश फूटा जिसने उसके सारे संशयों को एक ही सेकंड में भस्म कर दिया।
उसे समझ आ गया।
यह पूरा चक्रव्यूह केवल इसलिए ज़िंदा था क्योंकि मनुष्य हमेशा 'बचने' की कोशिश करता है! मनुष्य अपनी ज़िंदगी, अपनी सत्ता, अपने परिवार और अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए सौदे करता है। हरदयाल ने अपनी दौलत बचाने के लिए सौदा किया था; ओमकार ने अपनी हुकूमत के लिए सौदा किया था; और कबीर ख़ुद अपने बेटे और अपनी मीरा को बचाने के लिए इस आग से लड़ रहा था!
जिन्न की ताक़त मनुष्य के पाप में नहीं होती... जिन्न की ताक़त मनुष्य के उस 'अहंकार' और 'आसक्ति' (Attachment) में होती है जो उसे किसी भी क़ीमत पर जीवित रहने के लिए मजबूर करती है!
"मिट जाने दो, कबीर..." वर्तमान कबीर की आवाज़ अचानक इतनी शांत, इतनी मधुर और इतनी गंभीर हो गई जैसे किसी बौद्ध भिक्षु की प्रार्थना हो।
"क्या?" नौजवान कबीर की आँखें फटी की फटी रह गईं।
वर्तमान कबीर ने मुस्कुराते हुए उस नौजवान कबीर के हाथ से वह ख़ाकी लिफ़ाफ़ा छीन लिया।
"इतिहास को बचाने का एक ही तरीक़ा है, मेरे भाई..." वर्तमान कबीर ने कहा, "...कि हम उस इतिहास का हिस्सा बनने से ही इनकार कर दें।"
कबीर ने सम्राट अशोक के उस तीसरे स्तंभ-लेख के उन अंतिम अक्षरों को याद किया:
"त्याग ही परम शांति है।"
कबीर ने उस सीलबंद लिफ़ाफ़े की मोम की मुहर को नहीं तोड़ा।
उसने अपने दाएँ हाथ में पकड़े उस मुग़ल भस्म और चांदी से दैदीप्यमान खंजर को उठाया।
और उसने उस खंजर को लाट वाले बाबा पर नहीं चलाया। उसने उस खंजर को अपने अतीत के रूप पर भी नहीं चलाया।
उसने उस खंजर को... उस लिफ़ाफ़े के आर-पार करते हुए... सीधे ताक़ नंबर सात के उस काले उल्कापिंडीय पाषाण के केंद्र में पूरी ताक़त से घोंप दिया!
तड़ाक! भभक!
5. महा-शून्य का विस्फोट और भ्रम की मुक्ति
जैसे ही वह चांदी का खंजर उस लिफ़ाफ़े को चीरता हुआ उस पाषाण के मर्म-स्थल में धँसा—
एक ऐसा धमाका हुआ जिसमें कोई आग नहीं थी, कोई धुआँ नहीं था।
वह परम-क्षमा और पूर्णाहूति का महा-विस्फोट था!
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः!
उस ताक़ के भीतर से एक ऐसी अंधी कर देने वाली, दूधिया सफ़ेद और सुनहरी रूहानी रोशनी फूटी जिसने उस पूरे अंधेरे तहख़ाने को एक ही पल में नहला दिया।
"नहीं! यह तुमने क्या किया?!"
लाट वाले बाबा की ऐसी भयानक, ब्रह्मांड-कँपा देने वाली चीख़ निकली जैसे किसी ने सूरज को उसकी छाती में उतार दिया हो।
क्योंकि कबीर ने उस ख़त को पढ़कर उसके मुआहिदे को स्वीकार ही नहीं किया था! जब कोई अर्ज़ी पढ़ी ही नहीं गई, जब कोई सौदा हुआ ही नहीं... तो उस जिन्न की सात सौ साल पुरानी कचहरी का वैधानिक आधार ही एक सेकंड में शून्य हो गया!
उस सफ़ेद प्रकाश के छूते ही—
उस महा-दैत्य का वह अस्सी फीट ऊँचा काला शरीर पिघलने लगा।
उसकी छह-छह उंगलियाँ हवा में कटकर भाप बनने लगीं। उसकी वह आग, जिसने सल्तनतों को जलाया था, उस करुणा की रोशनी में एक ठंडी, बेजान ओस की बूँद बनकर ज़मीन पर टपकने लगी!
"कबीर... तूने मुझे मिटा दिया... लेकिन तू भी नहीं बचेगा!" दैत्य की अंतिम फुसफुसाहट हवा में विलीन हो गई।
और उसके साथ ही—
उस कोटला के पत्थरों में दबी हुई वे लाखों अभागे इंसानों की रूहें—ज़ोहरा, 1857 के शहीद, 1954 के बेकसूर, और वह बूढ़ा क़ासिम—सब के सब उन पत्थरों की क़ैद से बाहर निकल आए।
उनके चेहरों पर अब कोई दर्द या विकृति नहीं थी। वे सब सफ़ेद, चमकते हुए देवदूतों की तरह उस तहख़ाने की छत को चीरते हुए, आकाश की ओर हमेशा के लिए मुक्त होकर उड़ गए!
वर्तमान कबीर का शरीर भी उस रोशनी के संपर्क में आकर धीरे-धीरे पारदर्शी होने लगा था।
उसके पत्थर बन चुके हाथ पिघल रहे थे। उसका दर्द मिट रहा था। वह इस भौतिक संसार की सीमाओं से परे जा रहा था।
उसने मुड़कर उस नौजवान अतीत-कबीर को देखा, जो ज़मीन पर बैठकर यह सब अविश्वास से देख रहा था।
वर्तमान कबीर ने मुस्कुराते हुए अपनी अंतिम साँस में कहा:
"घर जाओ, कबीर...
अपनी माँ के हाथ की चाय पियो।
किसी खंडहर में अपनी ज़िंदगी मत ढूँढना...
क्योंकि जो गुज़र चुका है, वह केवल मिट्टी है...
और जो सामने है... वही तुम्हारा जीवन है!"
और इसके साथ ही, वर्तमान कबीर का वह थका हुआ, घावों से भरा शरीर एक सुनहरे प्रकाश के बवंडर में बदलकर उस शून्य में हमेशा के लिए विलीन हो गया।
6. सुबह की ताज़गी और आईटीओ का चौराहा
चिड़ियों की चहचहाहट...
एक ठंडी, ताज़ा, मीठी हवा ने कबीर के चेहरे को छुआ।
"उठो बाबूजी... अरे बाबूजी, उठिए! यहाँ सोना मना है!"
एक भारी, देहाती आवाज़ कबीर के कानों में पड़ी।
कबीर ने झटके से अपनी आँखें खोलीं।
उसने अपने फेफड़ों में एक लंबी, गहरी साँस खींची। हवा में कोई गंधक नहीं थी। कोई सड़ा हुआ चमेली का तेल नहीं था।
हवा में सुबह की ताज़ा ओस, गीली घास और दूर बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पर बन रहे पराठों और चाय की सोंधी महक तैर रही थी।
कबीर फ़िरोज़ शाह कोटला के मुख्य लॉन की हरी, मखमली घास पर लेटा हुआ था।
सूरज पूरब दिशा में, यमुना के पार से अपनी सामान्य, सुनहरी, जीवनदायी किरणों के साथ आसमान में चढ़ रहा था। सुबह के सात बज रहे थे।
उसके सामने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का एक बूढ़ा खाकी वर्दी वाला गार्ड खड़ा था, जो अपनी लाठी से ज़मीन को थपथपा रहा था:
"अरे नौजवान! पूरी रात यहीं घास पर सोए रहे क्या? शुक्र मनाओ कि किसी गार्ड ने तुम्हें रात में बंद नहीं किया! चलो, उठो, स्मारक खुलने का समय हो गया है!"
कबीर उठकर बैठ गया।
उसने कांपते हाथों से अपने शरीर को देखा।
उसकी नीली डेनिम जींस बिल्कुल साफ़ थी। उसकी नायलॉन की जैकेट पर कोई ख़ून या कालिख का धब्बा नहीं था।
उसने अपनी हथेलियों को अपनी आँखों के सामने फैलाया।
उसकी दसों उंगलियाँ पूरी तरह सलामत थीं! कोई कटी हुई उंगली नहीं थी, कोई पत्थर की त्वचा नहीं थी, कोई छह उंगलियों का निशान नहीं था!
उसकी छाती पर कोई तावीज़ का घाव नहीं था; केवल उसकी कलाई पर उसकी टाइटन की सामान्य घड़ी टिक-टिक कर रही थी।
उसके बगल में उसका कैनन का कैमरा और उसका रिसर्च बैग सुरक्षित रखा हुआ था।
तभी—
उसकी जेब में रखे फोन ने सामान्य रिंगटोन के साथ आवाज़ दी।
कबीर ने कांपते हाथों से फोन निकाला।
स्क्रीन पर उसके कॉलेज के प्रोफ़ेसर—डॉ. सरीन, हेड ऑफ हिस्ट्री डिपार्टमेंट, डीयू—का नाम चमक रहा था।
कबीर ने कांपती आवाज़ में कॉल उठाया: "ह... हैलो, सर?"
"कबीर! कहाँ हो तुम?" प्रोफ़ेसर की सामान्य, थोड़ी नाराज़ आवाज़ गूँजी।
"कल शाम से तुम्हारा फोन नहीं लग रहा था! तुमने कोटला की उस 'अर्जी परंपरा और लोक-आस्था' वाले प्रोजेक्ट का फील्ड-सर्वे पूरा किया या नहीं? क्या मिला तुम्हें वहाँ खंडहरों में?"
कबीर ने खड़े होकर चारों तरफ़ देखा।
सामने सम्राट अशोक का वही प्राचीन लाट सुबह की धूप में शांत खड़ा था।
जामी मस्जिद की वही पुरानी मेहराबें थीं, जहाँ अब सुबह की नमाज़ के बाद कुछ कबूतर शांति से दाना चुग रहे थे।
बाओली का लोहे का फाटक सामान्य तालों से बंद था।
कोई छह उंगलियों वाला जिन्न नहीं था। कोई 1354 का नरमेध नहीं था। कोई 1954 का खूनी कोठा नहीं था।
कबीर के चेहरे पर एक ऐसी गहरी, परिपक्व और शांत मुस्कान खिल गई जो केवल उन लोगों के चेहरे पर होती है जिन्होंने साक्षात मृत्यु के पार जाकर जीवन का मोल समझ लिया हो।
"सर..." कबीर ने एक गहरी साँस लेते हुए कहा, "मैंने सब देख लिया।
वहाँ कुछ भी नहीं है, सर।
वहाँ सिर्फ़ पुराने पत्थर हैं, गुज़रे हुए ज़मानों की बेजान धूल है... और इंसान के अपने ज़ेहन का वहम है।
मैं अपना शोध-पत्र बदल रहा हूँ, सर। मैं अब भूतों पर नहीं... मैं जीवित इंसानों के मनोविज्ञान पर लिखूँगा।"
कबीर ने कॉल काटा। उसने अपना बैग कंधे पर टांगा।
उसने एक आख़िरी बार पलटकर उस जामी मस्जिद के वीराने को देखा।
उसने हाथ जोड़कर उस मिट्टी को नमन किया, और वह कोटला के उस बड़े लोहे के फाटक से बाहर निकलकर बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग की व्यस्त, सामान्य, गाड़ियों से भरी दुनिया में आ गया।
7. वह अंतिम, रूह-कँपा देने वाला महा-ट्विस्ट: दर्पण का सत्य (The Ultimate Twist)
कबीर आईटीओ के बस स्टॉप के पास पहुँचा।
सामने एक पुरानी, मशहूर चाय की दुकान थी जहाँ पीतल के बड़े पतीले में अदरक और इलायची की चाय खौल रही थी।
"उस्ताद, एक कड़क चाय देना," कबीर ने एक बेंच पर बैठते हुए कहा।
उसे लगा कि उसका पुनर्जन्म हुआ है। वह बस अब घर जाना चाहता था, अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहता था और एक सामान्य, खूबसूरत, शांत ज़िंदगी जीना चाहता था।
दुकानदार ने कुल्हड़ में गर्म चाय कबीर के सामने रख दी: "ये लीजिए बाबूजी। दस रुपये हुए।"
कबीर मुस्कुराया। उसने अपनी पैंट की पिछली जेब से अपना चमड़े का बटुआ (wallet) निकाला।
उसने दस रुपये का नोट निकालने के लिए बटुआ खोला।
लेकिन जैसे ही बटुए की अंदरूनी ज़िप खुली...
कबीर की उंगलियाँ किसी बहुत बारीक, मुड़े हुए, पुराने काग़ज़ के टुकड़े से टकराईं।
कबीर ठिठक गया।
उसने वह काग़ज़ बाहर निकाला।
यह कोई आधुनिक रसीद या नोट नहीं था।
यह वही सवाई काग़ज़ का एक छोटा, पीला, जला हुआ कोना था... जिस पर ताज़े, लाल ख़ून जैसी स्याही से, कबीर की अपनी हस्तलिपि में... एक अकेला वाक्य लिखा हुआ था:
**"ख़त तुमने नहीं खोला, कबीर...
ख़त ने तुम्हें खोल दिया है।
यह दुनिया आज़ाद नहीं हुई है...
यह तो केवल एक नए चक्रव्यूह का पहला दिन है।
अगली गुरुवार की शाम...
अब तुम्हारी कचहरी लगेगी!"**
कबीर के हाथ से चाय का कुल्हड़ छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा।
छपाक!
कबीर के बदन का सारा ख़ून एक ही सेकंड में जम गया। उसका दिल पाताल में गिर गया।
उसने कांपती हुई नज़रों से चाय की दुकान की लकड़ी की दीवार पर लटके उस छोटे से, दाढ़ी बनाने वाले आईने (mirror) की तरफ़ देखा।
आईने में कबीर का चेहरा साफ़ दिखाई दे रहा था।
कबीर ने डर के मारे अपनी दोनों आँखें ज़ोर से झपकाईं।
लेकिन आईने के भीतर...
कबीर की बायीं आँख तो बंद हुई...
लेकिन आईने में दिख रहे उस अक्स की दाहिनी आँख... पूरी तरह खुली रही!
और उस खुली हुई आँख की पुतली के बिल्कुल केंद्र में...
एक बहुत बारीक, धधकती हुई, नीलम जैसी नीली आग की लपट... चुपचाप, ख़ामोशी से जल रही थी!
और आईने के अक्स के होंठ... बिना कबीर के हिले... एक बहुत भयानक, शांत और प्राचीन मुस्कान में फैल गए...
[संपूर्ण कथा समाप्त]
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