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भाग 24: प्रलय का काउंटडाउन, साइलो का महा-भँवर और अशोक का अंतिम कोड
Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 15 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
- Chapter
- 24 of 25
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 15 min
- Words
- 2829
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
1. लाल सायरन का चीत्कार और मिसाइल साइलो की गड़गड़ाहट
पोखरण के उस दो किलोमीटर गहरे परमाणु-पाताल में हवा का एक-एक कण कांप रहा था।
हू-हू-हू! हू-हू-हू! (EMERGENCY KLAXON)
लाल आपातकालीन बत्तियाँ दीवारों पर इस तरह घूम रही थीं जैसे किसी कसाईखाने में ख़ून का छिड़काव हो रहा हो। फर्श पर पड़े उस बायो-मैकेनिकल रोबोट—मनोरमा देवी—के फटे हुए धड़ से नीली चिंगारियाँ और पिघला हुआ सिलिकॉन रिस रहा था।
और मुख्य कंसोल की विशाल, त्रि-आयामी (3D) होलोग्राम स्क्रीन पर लाल रंग के विशाल, उल्टे अंक घट रहे थे:
[THERMONUCLEAR PAYLOAD STATUS: ARMED]
[AGNI-V SILOS 1 TO 4: PRESSURIZED]
[TARGET: RAISINA HILL / CENTRAL SECRETARIAT / OLD DELHI]
[TIME TO LAUNCH: 08:42... 08:41... 08:40...]
आठ मिनट और चालीस सेकंड।
उसके बाद पोखरण की रेतीली ज़मीन के नीचे से चार विशाल अग्नि-V अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBMs) गर्जना करते हुए आसमान में उठेंगी। हर मिसाइल के शीर्ष पर पचास-पचास किलोटन के थर्मोन्यूक्लियर वॉरहेड लगे थे, जिन्हें साधारण यूरेनियम से नहीं, बल्कि उस क्वांटम-अग्नि रिएक्टर के रेडियोधर्मी जिन्नात की प्लाज़्मा ऊर्जा से चार्ज किया गया था।
यदि वे मिसाइलें दिल्ली के आकाश में फटीं... तो न 1354 का कोई इतिहास बचेगा, न 1954 की कोई याद, और न 2026 के वे पचास लाख निर्दोष नागरिक। पूरी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की धरती एक सेकंड के दसवें हिस्से में दस लाख डिग्री सेल्सियस तापमान पर उबलकर एक कांच के गड्ढे में बदल जाएगी!
"कबीर! इसे रोको!"
मीरा ने अपने बच्चे को छाती से चिपकाए हुए चिल्लाया। बच्चे की आँखों में उस लाल रोशनी का अक्स नाच रहा था।
कबीर पागलों की तरह उस मुख्य कंट्रोल कंसोल पर झपटा।
उसने कीबोर्ड पर अपने हाथ चलाए। कबीर एक आधुनिक शोधार्थी था; उसने अपने कॉलेज के दिनों में कोडिंग और सिस्टम नेटवर्किंग पढ़ी थी। उसने आपातकालीन कमांड टाइप की:
ABORT_LAUNCH --FORCE --OVERRIDE_ALL
लेकिन स्क्रीन पर तुरंत एक भयानक, लाल खोपड़ी का निशान उभरा और एक यांत्रिक आवाज़ गूँजी:
[ERROR: PROTOCOL SEALED BY BIOMETRIC SOUL-LOCK]
[ABORT SEQUENCE REQUIRES ORIGINAL TOPRA PHONETIC CIPHER]
"फ़ोनिटिक सिफ़र?" कबीर के माथे से पसीने की बूँदें टपककर कीबोर्ड पर गिरीं।
उसने स्क्रीन के नीचे देखा।
वहाँ कोई आधुनिक पासवर्ड या न्यूमेरिक पिन नहीं माँगा जा रहा था।
वहाँ एक ऑडियो-ऑप्टिकल स्कैनर लगा था, जिस पर ईसा पूर्व 250 की सम्राट अशोक की ब्राह्मी लिपि के अक्षर झिलमिला रहे थे!
वही अक्षर, जो फ़िरोज़ शाह कोटला के उस विशाल पाषाण लाट के तीसरे मुख्य शिलालेख (Third Pillar Edict) पर खुदे थे!
मनोरमा और डॉ. सेन के उस वैज्ञानिक सिंडिकेट ने मिसाइलों के कंप्यूटर को केवल हैक नहीं किया था; उन्होंने मिसाइल के फ़ायरिंग सर्किट को उस अशोक स्तंभ की रूहानी तरंगों से बाँध दिया था। इस लॉन्च को केवल वही आवाज़ रोक सकती थी जो उस प्राचीन स्तंभ के उस पवित्र मंत्र को उसकी सटीक आवृत्ति (Exact Quantum-Acoustic Resonance) पर दोहरा सके!
2. टूटी हुई नियंत्रण प्रणाली और साइलो-1 की ऊँचाई
"कबीर! कंसोल जल रहा है!" मीरा चिल्लाई।
मनोरमा के शरीर के शॉर्ट-सर्किट की वजह से कंसोल के नीचे के मदरबोर्ड्स में आग लग गई थी।
तड़ाक! भभक!
कंट्रोल पैनल के मॉनिटर्स काले पड़ गए।
अंदरूनी वायरिंग पिघलकर ड्रिप करने लगी। यहाँ से अब कोई कोड टाइप नहीं हो सकता था!
"मैनुअल ट्रांसमीटर कहाँ है?" कबीर ने चारों तरफ़ देखते हुए चीख़ मारी।
उसने दीवार पर लगे आपातकालीन ब्लूप्रिंट को देखा।
ब्लूप्रिंट पर लाल रंग से चमक रहा था: 'MANUAL LAUNCH ABORT OVERRIDE — SILO 1 GANTRY APEX (+120 METERS)'।
मैनुअल एबॉर्ट का जो बैकअप सेंसर था, वह इस दो किलोमीटर गहरे बंकर के फर्श पर नहीं था; वह साइलो नंबर 1 की सबसे ऊपरी क्रेन पर लगा था—ठीक उस मिसाइल के परमाणु वॉरहेड के नाक के पास, जहाँ से थार रेगिस्तान की सतह केवल पचास फीट ऊपर थी!
काउंटडाउन घट रहा था: 06:15... 06:14... 06:13...
"हमें उस मिसाइल के ऊपर चढ़ना होगा!" कबीर ने मीरा की कलाई पकड़ी।
वे दोनों उस कंट्रोल रूम का भारी, बुलेटप्रूफ़ दरवाज़ा तोड़कर साइलो नंबर 1 के विशाल कंक्रीट चैंबर में दाख़िल हुए।
सामने जो दृश्य था, उसने उनके फेफड़ों की हवा खींच ली।
यह एक सौ बीस मीटर गहरा, गोल, कंक्रीट का कुआँ था।
कुएँ के बीचों-बीच, लोहे के विशाल स्टैंड पर पचास फीट ऊँची, तिरंगे के निशान वाली अग्नि-V मिसाइल सीधी खड़ी थी। मिसाइल के इंजनों के चारों तरफ़ तरल नाइट्रोजन और प्री-इग्निशन गैसों के सफ़ेद बादल फुसफुसा रहे थे—हिस्स... हूशशश!
मिसाइल का शरीर किसी विशाल, सोए हुए दानव की तरह कांप रहा था।
और उसके चारों तरफ़, ऊपर की ओर जाती हुई लोहे की संकरी, जालीदार सीढ़ियाँ (service gantry) थीं जो हवा के दबाव से थरथरा रही थीं।
"मीरा, तुम यहीं रुको! मैं ऊपर जाता हूँ!" कबीर ने कहा।
"नहीं, कबीर!" मीरा ने उस बच्चे को अपने सीने पर और कस लिया।
"तुम अकेले उस कोड को नहीं बोल सकते! अशोक स्तंभ का वह मंत्र कोई साधारण शब्द नहीं है; वह सूर्य की उस आदिम ऊर्जा की ध्वनि है!
इस बच्चे के कंठ में वह सूर्य-स्वर है, और मेरे पास ज़ोहरा की वह आवाज़ है! हम तीनों एक साथ उस सेंसर के सामने बोलेंगे, तभी वह ताला खुलेगा!"
कबीर ने मीरा की आँखों में देखा। उन आँखों में मौत का भय नहीं था; वहाँ केवल एक अदम्य, पाषाण-हठ था।
"चलो!" कबीर ने कहा।
वे दोनों उस लोहे की सीढ़ियों पर दौड़ पड़े।
3. सीढ़ियों पर महा-युद्ध: धातु के पिशाचों का हमला
सीढ़ियाँ लोहे की पतली पट्टियों से बनी थीं, जिनके नीचे सौ मीटर गहरा, खौलता हुआ पाताल दिखाई दे रहा था।
हर कदम के साथ मिसाइल के इंजनों की गड़गड़ाहट उनके पैरों की हड्डियों को हिला रही थी।
क्लिक-क्लिक-क्लिक!
अचानक, साइलो की कंक्रीट की दीवारों में बने स्वचालित सुरक्षा द्वारों से दर्जनों 'साइबर-पिशाच' (Occult-Droids) बाहर निकले!
ये वे स्वचालित सैन्य रोबोट थे, जिनकी धातु की खोपड़ियों पर तांत्रिक तावीज़ और सिंदूर पुता हुआ था। उनके हाथों में मशीन गनें और प्लाज़्मा कटर लगे थे।
मनोरमा के मरने के बाद, इस बंकर का ऑटोमेटेड डिफ़ेंस सिस्टम हर जीवित चीज़ को दुश्मन मानकर ख़त्म करने पर उतर आया था!
तड़ातड़! तड़ातड़!
गोलियों की बौछार लोहे की सीढ़ियों पर हुई। चिंगारियों की बारिश हुई।
कबीर ने अपने दाएँ हाथ को आगे किया।
उसकी त्वचा एक बार फिर काले ग्रेनाइट के पाषाण में बदल गई। उसने गोलियों के उस तूफ़ान को अपनी पत्थर जैसी बाह पर रोक लिया। सीसे की गोलियाँ उसके बदन से टकराकर पिघलती हुई नीचे गिर रही थीं।
"मीरा, आगे बढ़ो!" कबीर दहाड़ा।
उसने आगे बढ़कर पहले रोबोट की गर्दन को अपने पत्थर बन चुके पंजे से पकड़ा और उसे पूरी ताक़त से मरोड़कर नीचे उस सौ मीटर गहरे गड्ढे में फेंक दिया!
धड़ाम!
मीरा बच्चे को अपनी बायीं बाँह में छुपाए, दाएँ हाथ से सीढ़ियों की रेलिंग पकड़ती हुई छलांगें लगा रही थी।
जब दूसरा रोबोट मीरा की तरफ़ झपटा, तो मीरा ने अपने गले की वह अकीक की माला उस रोबोट के ऑप्टिकल सेंसर पर दे मारी। माला के दानों से निकली पवित्र रूहानी तरंगों ने रोबोट के माइक्रोचिप्स को एक ही सेकंड में जलाकर धुआँ कर दिया!
काउंटडाउन स्क्रीन पर साफ़ चमक रहा था: 03:20... 03:19... 03:18...
वे हांफते हुए, ख़ून और पसीने से लथपथ होकर साइलो के सबसे ऊपरी प्लेटफॉर्म पर पहुँचे।
4. वॉरहेड की दहलीज़ और ब्राह्मी का महा-स्वर
वे मिसाइल के नुकीले, काले शंकु (Nose Cone) के बिल्कुल सामने खड़े थे।
ऊपर, साइलो की पचास टन वजनी कंक्रीट की मुख्य सील-छत आधा खुल चुकी थी। उस चौकोर छेद से बाहर, राजस्थान के थार रेगिस्तान का ठंडा, काला आसमान और तारे दिखाई दे रहे थे।
हवा में मिसाइल के बूस्टर रॉकेट्स के इग्निशन की उल्टी गिनती की गूँज आ रही थी:
[T-MINUS 90 SECONDS TO MAIN BOOSTER FIRING]
मिसाइल के ठीक सामने, क्रेन के सिरे पर वह पीतल और टाइटेनियम का बना ऑडियो-ऑप्टिकल एबॉर्ट सेंसर लगा था।
सेंसर की हरी लेज़र लाइट किसी आँख की तरह कबीर, मीरा और उस बच्चे के ऊपर आकर टिक गई।
कबीर ने अपने लहूलुहान हाथों को उस सेंसर के दोनों किनारों पर टिका दिया।
उसने अपने दिमाग़ के भीतर राष्ट्रीय अभिलेखागार की उस 1954 की फ़ाइल, फ़िरोज़ शाह कोटला की उस जामी मस्जिद की दीवार, और सम्राट अशोक के उस तीसरे स्तंभ-लेख को याद किया।
वह लेख अशोक ने कलिंग के नरसंहार के बाद अपने पश्चाताप में लिखवाया था।
वह मंत्र किसी को मारने के लिए नहीं था; वह मंत्र विनाश की आग को करुणा के जल से शांत करने का ब्रह्मांडीय वचन था!
"मीरा... मेरे साथ बोलो!" कबीर की आवाज़ उस मिसाइल के शोर को चीरती हुई उठी।
कबीर ने अपनी छाती को तान लिया।
उसने शुद्ध, प्राचीन प्राकृत और ब्राह्मी की उस गगनभेदी ध्वनि में बोलना शुरू किया:
"दये, दाने, सचे, सोचवे, मदवे, साधवे च!"
(दया, दान, सत्य, पवित्रता, मृदुता और साधुता!)
मीरा ने अपनी आँखें बंद कीं।
उसने अपनी आवाज़ को कबीर के स्वर के साथ मिला दिया। ज़ोहरा की सात पीढ़ियों का दर्द, उस रेगिस्तान की चौरासी हज़ार माताओं का विलाप और उस मुग़ल भस्म की पवित्रता उस एक स्वर में गूँज उठी!
और फिर—
मीरा की गोद में सो रहे उस नवजात बच्चे ने अपनी आँखें खोलीं।
उस बच्चे ने अपने नन्हें, गुलाबी होंठ खोले।
उसने कोई चीख़ नहीं निकाली। उसने कोई रोना नहीं रोया।
उसने अपने मुँह से एक ऐसी शुद्ध, सुनहरी, अलौकिक 'प्रणव-ध्वनि' (The Primordial Aum) निकाली जिसने उस पूरे साइलो के लोहे और कंक्रीट को एक ही कंपन में बाँध दिया!
ॐॐॐॐॐ...
उस ध्वनि की तरंगें जैसे ही उस ऑडियो-सेंसर के लेंस से टकराईं—
कंप्यूटर का लाल स्क्रीन एक झटके में दूधिया सफ़ेद और सुनहरे रंग में बदल गया!
टिंग! हिसस्स!
एक भारी, यांत्रिक विराम लगा।
मिसाइल के भीतर खौल रही वह परमाणु-प्लाज़्मा की आग अचानक बुझ गई।
नाइट्रोजन के वॉल्व्स खुल गए और लाखों गैलन ठंडी गैस ने उन रॉकेट्स को हमेशा के लिए ठंडा कर दिया।
कंप्यूटर की वह अंतिम उद्घोषणा उस शांति में गूँज उठी:
[THREAT TERMINATED: MISSILE LAUNCH SEQUENCE ABORTED]
[WARHEADS SAFELY POWERED DOWN]
[CAPITAL CITY TARGETS DISENGAGED]
दिल्ली बच गई थी।
पचास लाख इंसान बच गए थे।
आधुनिक दुनिया का वह सबसे भयानक परमाणु-तांत्रिक संहार टल चुका था!
कबीर घुटनों के बल उस लोहे के प्लेटफॉर्म पर गिर पड़ा।
उसने मीरा को और अपने बेटे को अपनी छाती से भींच लिया। तीनों उस लोहे के जाल पर एक-दूसरे के आंसुओं में भीग रहे थे।
5. पोखरण का पतन और सरस्वती का महा-उद्वेलन
लेकिन इतिहास की इस अंतिम जंग में विश्राम का कोई नियम नहीं था।
जैसे ही मिसाइल की वह परमाणु आग ठंडी हुई, उस पूरे भूमिगत बंकर का शक्ति-संतुलन टूट गया।
फैसिलिटी ज़ीरो के उस क्वांटम-अग्नि रिएक्टर के कोर में बंधी वह हज़ारों सालों की रेडियोधर्मी ऊर्जा अब मिसाइलों में नहीं जा सकी; वह ऊर्जा सीधे उस बंकर की कंक्रीट की दीवारों और नीचे बहने वाली उस गुप्त सरस्वती नदी की छाती में फट पड़ी!
गड़गड़ाहट... चर्र्र... धड़ाम!
साइलो की दीवारें चटकने लगीं।
नीचे से सरस्वती नदी का पानी किसी विशाल, उफनती हुई सुनामी की तरह ऊपर उठने लगा। सौ मीटर गहरा वह गड्ढा पानी से भरने लगा!
"कबीर! यह पूरा बंकर धँस रहा है!" मीरा चिल्लाई।
कबीर ने नीचे देखा।
वह जल-प्रलय उन्हें पीसने के लिए ऊपर बढ़ रहा था। ऊपर रेगिस्तान की खुली रात थी, लेकिन वहाँ से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था।
तभी, कबीर की नज़र उस बच्चे की छाती पर पड़ी।
उस बच्चे का वह चांदी का कमल का निशान अब पानी की उस उठती हुई लहरों की तरफ़ खिंच रहा था।
"मीरा!" कबीर ने अपनी बाहों को उन दोनों के चारों तरफ़ लपेट लिया।
"यह सरस्वती नदी कोई साधारण पानी नहीं है! यह नदी सीधे हिमालय से निकलकर अरावली और दिल्ली के नीचे से होती हुई यहाँ आई थी!
अगर यह चक्रव्यूह शुरू हुआ था... तो इसका अंत भी वहीं होगा जहाँ से यह शुरू हुआ था!
अपनी आँखें बंद कर लो!"
छपाक! भभक!
सरस्वती नदी के उस विशाल, प्रकाशवान जल-बवंडर ने उन तीनों को अपने भीतर खींच लिया।
कबीर, मीरा और वह बच्चा वक़्त, अंतरिक्ष और पृथ्वी के उस सबसे गहरे भूमिगत जल-मार्ग में प्रकाश की गति से बहते चले गए...
6. कोटला की दहलीज़ पर पुनः आगमन
छपाक!
कबीर के फेफड़ों में एक ज़ोरदार झटका लगा। उसने मुँह से पानी की उल्टी की और ज़मीन पर गिर पड़ा।
उसके हाथ गीली, ठंडी घास और पुरानी लखौरी ईंटों से टकराए।
हवा में वही जानी-पहचानी महक थी—चमेली का इत्र, सरसों के तेल के बुझे हुए दीये, और पुरानी दिल्ली की वही सर्द, मटमैली रात की हवा।
कबीर ने हांफते हुए अपना सिर उठाया।
वह... फ़िरोज़ शाह कोटला के उसी वीरान, ऐतिहासिक मैदान में था!
सामने सम्राट अशोक का वही विशाल पाषाण स्तंभ खड़ा था।
बगल में वही जामी मस्जिद की पुरानी, काली मेहराबें थीं।
और उनके ठीक पीछे... वही गोल बाओली का मुहाना था, जिसके भीतर से वे अभी-अभी उस भूमिगत जल-धारा के सहारे बाहर फेंके गए थे!
मीरा कबीर के बगल में घास पर बैठी थी।
बच्चा उसकी गोद में था—पूरी तरह स्वस्थ, शांत और मुस्कुराता हुआ।
आसमान में दिल्ली का वही सामान्य, तारों से भरा हुआ सर्द आकाश था। दूर बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पर गाड़ियों के हॉर्न, दिल्ली गेट की तरफ़ से आती हल्की हलचल और आईटीओ के दफ़्तरों की बत्तियाँ सामान्य रूप से जल रही थीं।
कोई काला सूर्य नहीं था।
कोई परमाणु सायरन नहीं था।
कोई 1354 का सुल्तान नहीं था।
"हम... हम वापस आ गए, कबीर..." मीरा के चेहरे पर एक अविश्वास भरी, पवित्र मुस्कान खिल गई। उसकी आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। "हम अपनी दिल्ली में वापस आ गए... सब कुछ ठीक हो गया!"
कबीर ने अपने फटे हुए कोट की जेब टटोली।
उसका सैमसंग का स्मार्टफ़ोन उसकी जेब में था!
उसने कांपती उंगलियों से स्क्रीन का पावर बटन दबाया।
स्क्रीन जल उठी।
बैटरी 14% थी। कोई नेटवर्क एरर नहीं था।
लेकिन जैसे ही कबीर की नज़र उस स्क्रीन पर दर्ज तारीख़ और समय पर पड़ी...
कबीर के दिल की धड़कन एक ही झटके में रुक गई।
उसका पूरा शरीर पत्थर से भी ज़्यादा ठंडा हो गया।
स्क्रीन पर लिखा था:
तारीख़: 13 दिसंबर
समय: शाम 7 बजकर 12 मिनट
कबीर की साँसें हलक़ में अटक गईं।
13 दिसंबर?
शाम के 7 बजकर 12 मिनट?!
यह वही तारीख़ थी... यह वही मिनट था... जब वह इस सीरीज़ के पहले भाग (Part 1) में पहली बार इस कोटला के खंडहर में दाख़िल हुआ था!
जब वह अपने प्रोफ़ेसर का प्रोजेक्ट लेकर इस बाओली की सीढ़ियों पर उतरा था!
"नहीं... नहीं, यह कैसे हो सकता है?" कबीर के मुँह से एक दबी हुई चीख़ निकली। "वह 1954... वह एम्स की लैब... वह 1354 का ग़ुलाम-बाज़ार... वह भानगढ़... वह पोखरण... क्या वह सब केवल कुछ ही मिनटों का भ्रम था? क्या हम कहीं गए ही नहीं थे?"
7. वह भयानक, होश उड़ा देने वाला महा-ट्विस्ट: काल-चक्र की शाश्वत क़ैद (The Twist)
तभी—
बाओली की सीढ़ियों की तरफ़ से पत्थरों पर जूतों की 'खट-खट' की आवाज़ आई।
कोई भारी कदमों से, कंधे पर कैमरा बैग लटकाए, सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था।
कबीर ने झाड़ियों की ओट से कांपते हुए उस तरफ़ देखा।
और जो उसने देखा...
उस दृश्य ने कबीर के अस्तित्व, उसकी चेतना और उसके पूरे ब्रह्मांड को एक ही सेकंड में राख कर दिया।
सीढ़ियों से जो लड़का नीचे उतर रहा था...
उसने नीली डेनिम जींस, नायलॉन की वही जैकेट पहन रखी थी, गले में कैनन का कैमरा लटका था, और उसके चेहरे पर वही 25 साल के इतिहासकार का घमंडी, तर्कवादी भाव था...
वह लड़का कबीर ख़ुद था!
भाग 1 का वही कबीर, जो अभी-अभी उस तहख़ाने में उस सीलबंद लिफ़ाफ़े को उठाने जा रहा था!
और उस अतीत के कबीर के ठीक पीछे...
वही बूढ़ा डाकिया—क़ासिम—हाथ में मिट्टी का दीया लिए चल रहा था, और उसकी सफ़ेद आँखें उस लड़के की पीठ को घूर रही थीं!
कबीर का दिमाग़ पागलों की तरह चीख़ उठा।
यह कोई जीत नहीं थी!
यह कोई अंत नहीं था!
यह समय का एक ऐसा बंद, शाश्वत चक्रव्यूह (Infinite Time Loop) था जहाँ वह जितनी बार इस शैतान को हराने की कोशिश करता था, वह उतनी ही बार वापस उसी पहले क्षण में फेंक दिया जाता था!
कबीर मुड़ा: "मीरा! हमें उस लड़के को रोकना होगा! मुझे अपने आपको उस तहख़ाने में जाने से रोकना होगा!"
लेकिन जब कबीर ने मुड़कर मीरा की तरफ़ देखा...
कबीर की आत्मा की अंतिम चीख़ भी उसके गले में घुट गई।
मीरा वहाँ नहीं थी।
जहाँ मीरा बैठी थी... वहाँ केवल काले, सड़े हुए चमेली के तेल और कफ़न की राख का एक ढेर पड़ा था!
और उस राख के ढेर के ऊपर...
वही ख़ाकी रंग का, लाल मोम की मुहर लगा हुआ सीलबंद लिफ़ाफ़ा रखा था!
उस लिफ़ाफ़े के भीतर से मीरा की वही आवाज़... एक अंतिम, ठंडी, प्रेत-फुसफुसाहट बनकर कबीर के कानों में गूँज उठी:
*"कबीर... मैं कभी कोई जीवित स्त्री नहीं थी...
न यह बच्चा कभी कोई हाड़-माँस का इंसान था...
मैं तो उस पहले ख़त का लिफ़ाफ़ा थी...
और यह बच्चा... उस ख़त के भीतर लिखी हुई वह अंतिम अर्ज़ी थी!
तुमने कभी उस शैतान को नहीं हराया, कबीर...
तुमने तो केवल उस चक्रव्यूह का एक चक्कर पूरा किया है!
अब जाओ... और उस नीचे उतरते हुए कबीर को देखो...
क्योंकि घड़ी में 7 बजकर 14 मिनट होने वाले हैं...
और तुम्हारी अंतिम अदालत... अब शुरू होने जा रही है!"*
कबीर उस ठंडे, वीरान मैदान में अकेला खड़ा था...
सामने उसका अपना अतीत उस काल-कोठरी में उतर रहा था...
और घड़ी ने बीप किया: 7 बजकर 13 मिनट और 59 सेकंड!