PretikaJinn & Spiritsकोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें

भाग 23: मातृ-द्रोह, पाताल का परमाणु-यंत्र और प्रोजेक्ट अग्नि-पुत्र

Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 14 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
Chapter
23 of 25
Category
Jinn & Spirits
Reading time
14 min
Words
2623
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

1. माँ का बर्फीला सच और यादों का कत्लेआम
मनुष्य के जीवन में जब उसका शत्रु उसके सामने आता है, तो वह अपनी तलवार उठाता है। जब कोई राक्षस आता है, तो वह ईश्वर को याद करता है।

लेकिन जब वही माँ—जिसके आंचल की ख़ुशबू उसकी सबसे पुरानी स्मृति हो, जिसके हाथों से उसने पहली बार रोटी का कौर खाया था, और जिसकी मृत्यु पर उसने हरिद्वार के ठंडे गंगाजल में अपने नन्हें हाथों से अस्थियों की राख बहाई थी—अचानक आधुनिक हथियारों से लैस ब्लैक-ऑप्स कमांडोज़ की छांव में एक क्रूर, बर्फीली मुस्कान लिए खड़ी हो जाए... तो मनुष्य के भीतर की आत्मा आत्महत्या कर लेती है।

कबीर उस प्राचीन, भूमिगत सरस्वती नदी के गीले, चमकीले कंक्रीट डॉक पर बुत बना खड़ा था।

उसकी गोद में उसका नन्हा बेटा सो रहा था। कबीर के हाथ-पाँव सुन्न पड़ चुके थे।

सामने खड़ी सुमित्रा मेहरा—उसकी अपनी सगी माँ—के चेहरे पर न कोई ममता थी, न कोई पश्चाताप। उसके हाथों में थमा वह आधुनिक 'ध्वनिक न्यूरो-डिस्रप्टर' गन सीधे कबीर की छाती के उस फटे हुए ज़ख़्म पर तना हुआ था।

उसके पीछे खड़े बारह ब्लैक-ऑप्स कमांडोज़ की असॉल्ट राइफ़लों की हरी लेज़र किरणें कबीर, मीरा और उस बच्चे के माथे पर थरथरा रही थीं।

"माँ..." कबीर के होंठों से निकला यह शब्द हवा में किसी मरे हुए परिंदे की तरह गिरा।

"तुम... तुम ज़िंदा हो? वह 2011 का एम्स का आईसीयू वार्ड... वह मॉनिटर की फ्लैटलाइन... वह डेथ सर्टिफ़िकेट... वह हरिद्वार का श्मशान... क्या वह सब एक नाटक था? तुमने अपने दस साल के मासूम बच्चे को उस अनाथपन की आग में क्यों झोंक दिया, माँ?!"

सुमित्रा मेहरा ने एक बहुत धीमी, ठंडी और परिष्कृत हँसी हँसते हुए अपने हाथ की गन को थोड़ा नीचे किया।

उसकी आँखों में कोई माँ का दर्द नहीं था; वहाँ केवल एक ऐसे वैज्ञानिक की चमक थी जिसने अपनी प्रयोगशाला के सबसे जटिल समीकरण को हल कर लिया हो।

"नाटक?" सुमित्रा की आवाज़ में किसी अस्पताल के आईसीयू के एयर-कंडीशनर जैसी ठंडी सनसनाहट थी।

"कबीर, जज़्बात सिर्फ़ कमज़ोर और अनपढ़ इंसानों की अफ़ीम हैं, जिससे वे अपनी छोटी, नश्वर जिंदगियों का रोना रोते हैं।

तुमने क्या सोचा था कि तुम्हारा यह मेहरा ख़ानदान केवल सर्राफ़ों और इतिहासकारों का ख़ानदान था?

नहीं!

1954 में जब तुम्हारे परदादा हरदयाल ने उस कोटला के जिन्न से सौदा किया था, तभी भारत के रक्षा मंत्रालय के एक अति-गोपनीय विंग ने उस घटना की फ़ाइल को अपने कब्ज़े में ले लिया था।

1970 में जब तुम्हारे दादा ओमकार ने उस तंत्र को लुटियंस दिल्ली से जोड़ा, तब इस देश के डीप-स्टेट ने यह फैसला किया कि हम इन प्राचीन, परलौकिक ताक़तों को केवल अंधविश्वास मानकर छोड़ नहीं सकते... हमें इन्हें 'हथियार' (Weaponize) बनाना होगा!"

सुमित्रा ने एक कदम आगे बढ़ाया। उसके बूटों की आवाज़ उस भूमिगत डॉक पर गूँज उठी:

"मुझे तुम्हारे पिता राजीव के साथ शादी करने के लिए एक 'प्रोजेक्ट असाइनमेंट' के तौर पर भेजा गया था, कबीर! मेरा मक़सद मेहरा ख़ानदान के उस प्राचीन जिन्न-संक्रमित डीएनए (Djinn-Tainted DNA) और ज़ोहरा की रूहानी वंशावली के उस सुप्त जीन को एक प्रयोगशाला में मिलाना था!

2011 में मेरा 'कैंसर' महज़ एक सरकारी काग़ज़ी मौत थी ताकि मैं इस भूमिगत प्रोजेक्ट की चीफ़ डायरेक्टर बनकर इस अंतिम चरण की तैयारी कर सकूँ!

तुम मेरी औलाद ज़रूर हो, कबीर... लेकिन तुम उससे पहले इस राष्ट्र के सबसे बड़े रक्षा-हथियार—'प्रोजेक्ट अग्नि-पुत्र' का प्राथमिक प्रोटोटाइप थे!"

कबीर का दिमाग़ सन्न रह गया।

उसकी ज़िंदगी की हर एक याद—उसकी माँ की वह लोरी, उसके पिता का वह रोना, उसकी पढ़ाई, उसका प्यार—सब कुछ एक प्रयोगशाला के टेस्ट-ट्यूब का हिस्सा था!

"तुम एक माँ नहीं हो..." मीरा ने अपनी दाँत भींचते हुए, अपनी कांपती उंगलियों से बच्चे के कम्बल को कस लिया। मीरा की आँखों में आग धधक रही थी: "तुम एक पिशाचिनी हो जो अपनी ही कोख के ख़ून का व्यापार कर रही हो!"

सुमित्रा ने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी भौंहें ज़रा-सी भी नहीं हिलीं:

"और तुम, मीरा... तुम उस गायिका ज़ोहरा का वह जेनेटिक बर्तन थीं जिसे हमने एम्स की उस न्यूरो-लैब में 22 दिन तक अचेत रखकर इस बच्चे को गर्भस्थ करवाया।

तुम दोनों ने अपना काम पूरा कर दिया है।

अब इस बच्चे को मेरे हवाले करो... वर्ना इस न्यूरो-डिस्रप्टर की एक पल्स तुम्हारे मस्तिष्कों को एक मिली-सेकंड में तरल बनाकर तुम्हारी नाक से बाहर निकाल देगी!"

2. परमाणु-पाताल की यात्रा: सरस्वती का गुप्त निकास
कबीर के पास कोई चारा नहीं था।

बारह कमांडोज़ ने आगे बढ़कर कबीर और मीरा को दबोच लिया। कबीर के हाथ से वह चांदी का खंजर छीन लिया गया।

और उस नवजात बच्चे को... सुमित्रा ने अपने हाथों में ले लिया।

सुमित्रा ने बच्चे को एक सीलबंद, शीशे और लेड (सीसे) से बने 'क्रायो-कंटेनमेंट इनक्यूबेटर' के भीतर रख दिया, जिससे बच्चे की दैवीय ऊर्जा और ऊष्मा बाहर न निकल सके।

"इन्हें सबमर्सिबल में डालो," सुमित्रा ने हुक्म दिया। "हम तुरंत फैसिलिटी ज़ीरो (Facility Zero) के लिए निकल रहे हैं।"

कबीर और मीरा को लोहे की बेड़ियों में बाँधकर उस विशाल, काली परमाणु सबमर्सिबल के भीतर धकेल दिया गया।

हिसस्स... धड़ाम!

पनडुब्बी का भारी हैच-डोर बंद हो गया।

पनडुब्बी के परमाणु रिएक्टर की भारी, शक्तिशाली गूँज शुरू हुई—हूँऊऊऊँ...

वह सबमर्सिबल उस पौराणिक, भूमिगत सरस्वती नदी के अंधेरे, अथाह बहाव में गोता लगा गई।

कबीर और मीरा पनडुब्बी के एक छोटे, धातु के बने बंदी-कक्ष में बंद थे।

कबीर ने अपनी हथेलियों को दीवार पर दे मारा। उसकी आँखों से क्रोध और बेबसी के आँसू बह रहे थे।

"कबीर..." मीरा ने अपने दोनों बंधे हुए हाथों से कबीर के चेहरे को छुआ।

"हिम्मत मत हारो। हमारा बेटा अभी ज़िंदा है। मैं उसकी धड़कनों को अपनी नसों में महसूस कर सकती हूँ। वह तावीज़... वह कमल का निशान अभी मरा नहीं है।"

"हम कहाँ जा रहे हैं, मीरा?" कबीर ने अपनी लाल आँखों से उस छोटे से पोरथोल (खिड़की) से बाहर देखा, जहाँ सरस्वती नदी के काले, बर्फीले पानी में हज़ारों साल पुरानी चट्टानें और जीवाश्म तैर रहे थे।

"हम वहाँ जा रहे हैं जहाँ इस देश का सबसे बड़ा परमाणु रहस्य छिपा है," मीरा ने फुसफुसा कर कहा।

"पोखरण... यह सरस्वती नदी थार के रेगिस्तान के नीचे से गुज़रती हुई सीधे पोखरण परमाणु परीक्षण स्थल (Pokhran Test Range) के ठीक नीचे खुलती है!"

3. फैसिलिटी ज़ीरो: पोखरण का परमाणु-तांत्रिक रिएक्टर
दो घंटे की उस मूक, भयानक जल-यात्रा के बाद पनडुब्बी एक विशाल, भूमिगत झील में सतह पर आई।

जब कबीर और मीरा को बाहर निकाला गया, तो जो दृश्य उनके सामने था, उसने आधुनिक विज्ञान और मध्यकालीन जादू की सारी सीमाओं को एक ही झटके में तोड़ दिया।

यह 'फैसिलिटी ज़ीरो' थी।

ज़मीन से दो किलोमीटर नीचे, पोखरण के परमाणु परीक्षण के विशाल गड्ढों के ठीक नीचे खुदी हुई एक ऐसी विशाल, वैज्ञानिक-तांत्रिक नगरी जिसके बारे में दुनिया के किसी जासूसी उपग्रह को भनक तक नहीं थी।

चारों तरफ़ टाइटेनियम और बोरान-कंक्रीट की बनी सौ-सौ फीट ऊँची दीवारें थीं।

हवा में भारी पानी (Heavy Water), ओजोन और रेडियोधर्मी विकिरण (Radiation) की तीखी, धातु जैसी गंध घुली थी।

लेकिन सबसे भयानक बात यह थी कि उस विशाल परमाणु रिएक्टर के चारों तरफ़... प्राचीन संस्कृत और सुलेमानी भाषा के तांत्रिक यंत्र यूरेनियम की छड़ों के ऊपर सोने के तारों से गूँथे गए थे!

सैकड़ों वैज्ञानिक और परमाणु इंजीनियर सफ़ेद हेज़मैट (Hazmat) सूट पहने कंप्यूटर स्क्रीन्स पर डेटा देख रहे थे, लेकिन उनके सूटों के ऊपर प्राचीन अघोरी तांत्रिकों के रुद्राक्ष और लोहे के तावीज़ लटके हुए थे!

कक्ष के केंद्र में एक विशाल, गोलाकार 'क्वांटम-अग्नि रिएक्टर' (Quantum-Agni Reactor) स्थापित था।

उस रिएक्टर के केंद्र में सरस्वती नदी का बर्फीला, भारी पानी खौल रहा था, और उसके भीतर... हज़ारों की तादाद में 1974 और 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों के समय ज़मीन के नीचे फँसे हुए 'रेडियोधर्मी जिन्नात' (Radioactive Marids) नीली प्लाज़्मा लपटों के रूप में घूम रहे थे!

"यह पागलपन है..." कबीर की साँसें अटक गईं। "तुमने परमाणु विखंडन (Nuclear Fission) को जिन्नात की आग से जोड़ दिया है?!"

सुमित्रा मेहरा अपने रेडिएशन सूट का हुड हटाते हुए उस रिएक्टर के कंट्रोल-कंसोल के पास पहुँची:

"पागलपन नहीं, कबीर... यह परम-शक्ति है!

परमाणु बम केवल शहर तोड़ सकते हैं, लेकिन जब परमाणु ऊर्जा को जिन्नात की उस आदिम, रूहानी आग के साथ मिलाया जाता है... तो वह समय, स्थान और इंसान के चेतन मस्तिष्क को सीधे नियंत्रित करने वाला 'ब्रह्मांडीय अस्त्र' बन जाता है!

और उस अस्त्र का 'फ़्यूज़न-ट्रिगर' (Fusion Trigger)... तुम्हारा यह बेटा है!"

4. निष्कर्षण का चक्रव्यूह और बच्चे की बलि की तैयारी
सुमित्रा ने उस क्रायो-इनक्यूबेटर को उस क्वांटम रिएक्टर के केंद्रीय चैंबर में रख दिया।

कंप्यूटर के विशाल स्क्रीन्स पर बच्चे के शरीर का बायो-ऑकल्ट स्कैन उभर आया।

स्क्रीन पर लाल रंग से फ़्लैश हो रहा था:

[BIOMETRIC STATUS: AGNI-AVATARA GENE ACTIVE]

[SOLAR RADIANCE CORE: STABLE AT 10,000 KELVIN]

[EXTRACTION READINESS: 98%]

"सुमित्रा!" कबीर अपनी बेड़ियों को खींचते हुए पागलों की तरह चीख़ा।

"वह तुम्हारा पोता है! वह एक दिन का बच्चा है! अगर तुमने उसकी उस आंतरिक अग्नि को उस रिएक्टर में खींचा, तो उसका नन्हा जिस्म भाप बनकर उड़ जाएगा!"

सुमित्रा ने बिना मुड़े अपने मुख्य वैज्ञानिक को आदेश दिया:
"प्रोटोकॉल शुरू करो। बच्चे के हृदय से वह चांदी-कमल का बायो-प्लग निकालो और उसकी रूहानी ऊर्जा को सीधे राष्ट्रीय परमाणु ग्रिड (National Nuclear Grid) में फ़ीड कर दो।"

चार रोबोटिक आर्म्स (mechanical arms) उस इनक्यूबेटर की तरफ़ बढ़े।

उन आर्म्स के सिरों पर लेज़र कटर और न्यूरो-एक्सट्रैक्शन सुइयाँ लगी थीं।

बच्चे ने अपने नन्हें हाथ हिलाए। उसे ख़तरे का अहसास हो गया था। उसकी छाती का वह कमल का निशान फिर से ख़ूनी लाल रंग में धड़कने लगा—धक-धक-धक!

"कबीर... अभी नहीं तो कभी नहीं!" मीरा ने अपने दाँत पीसते हुए फुसफुसाया।

मीरा ने कबीर के कान में कहा:
"तुम्हारी नसों में जो ख़ून है... तुमने जो बच्चे से ज़हर और चांदी अपने भीतर खींची थी... वह मरी नहीं है, कबीर!

उसे जगाओ!

अपने उस 'पाषाण-स्वरूप' को जगाओ!

अगर यह रिएक्टर टूटा, तो हम सब मरेंगे... लेकिन हमारा बेटा बच जाएगा!"

5. कबीर का पाषाण-विद्रोह और रिएक्टर का विध्वंस
कबीर ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

उसने अपने दिमाग़ से हर दर्द, हर डर और अपनी माँ के उस विश्वासघात के सदमे को निकाल फेंका।

उसने अपनी छाती के उस घाव पर ध्यान केंद्रित किया।

उसकी नसों के भीतर... उस खांडवप्रस्थ की पाताल-अग्नि, भानगढ़ के पारे और 1354 के सुल्तान के उस आदिम ख़ून ने एक साथ अंगड़ाई ली!

कड़कड़ाती बिजली! चर्र्र्र्र्र्क!

कबीर की त्वचा का रंग अचानक सामान्य गेहुँए से बदलकर गहरे, अभेद्य काले ग्रेनाइट में तब्दील हो गया!

उसकी दोनों बाहों की मांसपेशियाँ फूलकर लोहे के सरियों जैसी हो गईं।

तड़ाक!

कबीर ने अपनी दोनों कलाइयों को झटका दिया।

वे भारी टाइटेनियम की हथकड़ियाँ किसी काग़ज़ के धागे की तरह टूटकर बिखर गईं!

"गार्ड्स! फ़ायर!" सुमित्रा चिल्लाई।

कमांडोज़ ने अपनी असॉल्ट राइफ़लों से गोलियों की बौछार कर दी—तड़ातड़! तड़ातड़!

लेकिन गोलियाँ कबीर के उस पाषाण-शरीर से टकराकर चिनगारियों के साथ ज़मीन पर गिर रही थीं।

कबीर एक विशाल, आदिम शिला-राक्षस की तरह आगे बढ़ा। उसने अपने दाएँ हाथ से दो कमांडोज़ को उठाकर रिएक्टर के कूलिंग टॉवर पर दे मारा।

मीरा बिजली की फुर्ती से आगे बढ़ी। उसने ज़मीन पर गिरी एक शॉक-बैटन उठाई और कंट्रोल रूम के दो वैज्ञानिकों को बेहोश कर दिया।

कबीर रिएक्टर के उस केंद्रीय चैंबर पर कूद पड़ा!

उसने अपने दोनों पत्थर बन चुके हाथों से उस क्रायो-इनक्यूबेटर के रोबोटिक आर्म्स को पकड़ लिया और अपनी पूरी ताक़त से उन्हें मरोड़ दिया!

चर्र्र्र्र्क! धड़ाम!

रोबोटिक आर्म्स टूटकर अलग हो गए।

कबीर ने उस शीशे के बक्से को तोड़ा और अपने बेटे को अपनी छाती से चिपका लिया।

बच्चे ने अपने पिता की छुअन मिलते ही अपनी नन्ही आँखें खोलीं और कबीर के सीने की उस पत्थर जैसी त्वचा पर अपना नन्हा हाथ रख दिया। उस स्पर्श से कबीर का पाषाण-रूप शांत हो गया, उसकी त्वचा वापस सामान्य हो गई।

"मीरा, इसे लो!" कबीर ने बच्चे को मीरा की गोद में सौंप दिया।

सुमित्रा मेहरा अपने कंसोल के पीछे खड़ी कांप रही थी।

उसकी योजना तबाह हो चुकी थी।

कबीर ने आगे बढ़कर सुमित्रा के गले को अपने हाथ से पकड़ लिया और उसे कंट्रोल पैनल से चिपका दिया।

"खेल ख़त्म, सुमित्रा मेहरा," कबीर की आवाज़ में एक बेटे का नहीं, एक न्यायाधीश का फैसला था।

"तुमने इस देश की रक्षा के नाम पर अपनी ही आत्मा को शैतान के हाथ बेच दिया। बोलो... अपनी अंतिम प्रार्थना पढ़ो!"

6. मुखौटे का फटना और सत्य का भयानक प्रलय (The Twist)
कबीर का हाथ सुमित्रा की गर्दन पर था। वह बस अपनी उंगलियों का दबाव बढ़ाने ही वाला था।

लेकिन जो हुआ...

उसने कबीर के पैरों तले की ज़मीन ही नहीं, उसके पूरे अस्तित्व के भूगोल को हमेशा के लिए उलट दिया।

सुमित्रा मेहरा के चेहरे पर कोई डर नहीं था।

कोई घबराहट नहीं थी।

उसकी गर्दन से... किसी इंसान का ख़ून नहीं निकल रहा था!

सुमित्रा ने अपने ही दोनों हाथों से... अपने चेहरे के बाएँ कान के पास की चमड़ी को पकड़ा... और उसे एक भयानक झटके के साथ खींच लिया!

चर्र्र्र्र्र्र्र्क!

कबीर दहशत के मारे पीछे हट गया। मीरा के हलक़ से एक चीख़ निकल गई।

उस चेहरे की चमड़ी के नीचे... कोई माँस नहीं था!

कोई हड्डियाँ नहीं थीं!

सुमित्रा मेहरा का पूरा सिर और धड़... अत्याधुनिक फ़ाइबर-ऑप्टिक्स, सिंथेटिक सिलिकॉन, और काले तरल पारे से चलने वाली एक बायो-मैकेनिकल एंड्रॉइड (Android/Cyborg) मशीन थी!

और उस मशीन की पारदर्शी खोपड़ी के बीच में...

एक कांच के जार के भीतर, पीले फॉर्मेलिन के घोल में तैरता हुआ... एक अस्सी साल पुराना, सूखा हुआ इंसानी दिमाग़ रखा हुआ था!

उस दिमाग़ के न्यूरॉन्स से हज़ारों बारीक सोने के तार निकलकर उस रोबोटिक चेहरे की आँखों और होंठों को चला रहे थे!

और उस सिंथेटिक चेहरे के फटे हुए जबड़े से जो आवाज़ निकली...

वह सुमित्रा की नहीं थी!

वह 1954 के दीवान हरदयाल मेहरा की असली, तांत्रिक पत्नी—मनोरमा देवी की तीखी, डरावनी और सदियों पुरानी आवाज़ थी:

**"हाहाहाहा! कबीर!

तूने सचमुच सोच लिया कि मैं तेरी माँ थी?

अरे नादान लड़के... तेरी असली माँ सुमित्रा तो 2011 में ही उस एम्स के अस्पताल में सचमुच कैंसर से मर गई थी!

उसकी लाश तो उसी दिन हरिद्वार में जलकर राख हो चुकी थी!

मैं तो तेरी परदादी—मनोरमा हूँ!

1954 में जब हरदयाल ने उस तवायफ़ ज़ोहरा के चक्कर में मुझे छोड़ा था... तो मैंने अपना दिमाग़ इस आधुनिक विज्ञान के गुप्त सिंडिकेट को सौंप दिया था!

पिछले पंद्रह सालों से मैं सुमित्रा की इस सिंथेटिक खाल को पहनकर... तुम्हारे इस पूरे ख़ानदान को नचा रही थी!"**

कबीर के हाथ से हथियार छूट गया। उसका पूरा शरीर कांप उठा। "नहीं... नहीं, यह झूठ है..."

उस बायो-मैकेनिकल मनोरमा ने अपने सीने में लगे एक लाल आपातकालीन स्विच को अपने ही धातु के पंजे से दबा दिया!

क्लिक!

पूरे पोखरण फैसिलिटी ज़ीरो में लाल सायरन पागलों की तरह गूँज उठे:

हू-हू-हू! (EMERGENCY KLAXON)

और कंप्यूटर के ऑटोमेटेड वॉर्निंग सिस्टम ने जो एलान किया... उसने कबीर और मीरा की साँसों को हमेशा के लिए रोक दिया:

[CRITICAL WARNING: MANUAL OVERRIDE INITIATED]

[STRATEGIC FORCES COMMAND: TARGET LOCKED]

[NUCLEAR WARHEAD INTERFACE ONLINE]

[TARGET COORDINATES: RAISINA HILL & OLD DELHI]

[MISSILE LAUNCH IN T-MINUS 10 MINUTES... 9... 8...]

मनोरमा के उस फटे हुए, रोबोटिक चेहरे ने अपनी लाल बत्तियों वाली आँखों से कबीर की तरफ़ देखा:

**"कबीर... तुमने इस बच्चे को तो बचा लिया...

लेकिन मैंने इस बच्चे के उस पहले रोने की फ़्रीक्वेंसी को इस देश के परमाणु मिसाइल साइलो (Nuclear Silos) से जोड़ दिया है!

ठीक दस मिनट बाद... पोखरण से चार थर्मोन्यूक्लियर मिसाइलें उड़ेंगी...

और तुम्हारी उस पूरी राजधानी—उस कोटला, उस जामा मस्जिद और उस पूरी दिल्ली को... पचास लाख इंसानों के साथ... एक ही सेकंड में भाप बना देंगी!

अब बचाओ अपनी दिल्ली को... अगर बचा सकते हो!"**

मनोरमा का वह रोबोटिक शरीर एक ज़ोरदार शॉर्ट-सर्किट के धमाके के साथ फट गया और ज़मीन पर तारों का मलबा बनकर बिखर गया।

रिएक्टर का तापमान 5000 डिग्री की तरफ़ बढ़ रहा था।

मिसाइल लॉन्च का काउंटडाउन शुरू हो चुका था: 9 मिनट... 58 सेकंड...

कबीर, मीरा और वह बच्चा उस दो किलोमीटर गहरे परमाणु-पाताल में फँसे थे... और उनकी अपनी राजधानी पर देश की ही परमाणु मिसाइलें गिरने वाली थीं!

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